संस्मरण: आदमी कुछ अलग सा

देवेंद्र कुमार

देवेंद्र कुमार


मैंने इन्हें सबसे पहले लोकप्रिय बाल पत्रिका ‘नंदन’ के संपादक श्री जयप्रकाश भारती के कक्ष में देखा था। बात वर्ष 1986 की है। मैं ‘नंदन’ में कार्यरत था। उस दिन भारती जी ने मुझे तलब किया। काम के सिलसिले में कई बार उनके कक्ष में जाना होता था। उनके सामने एक चश्माधारी व्यक्ति बैठा था। उसने नजर उठाकर मेरी ओर देखा और बस...यह प्रथम देखादेखी मुझे आज भी याद है। बात करके मैं अपनी सीट पर चला आया। मैं सोच रहा था कि वह व्यक्ति अपनी कहानी छपाकर लेखक बन जाने की अदम्य इच्छा रखने वाले उन लोगों में से कोई होगा, जो रोज भारती जी को घेरे रहते थे। भारती जी लोकप्रिय बाल पत्रिका ‘नंदन’ के प्रसिद्ध संपादक थे। लोग समझते थे कि उनकी कृपा मिल जाए तो कोई भी बाल साहित्यकार बन सकता है।

उनमें से कई जनों को भारती जी मेरे पास भेज देते थे, कथा-सूत्र डिस्कस करने के लिए। यह एक सामान्य प्रक्रिया थी। उस दिन भी भारती जी के भेजे हुए कई ‘लेखक’ मेरे पास आए, पर उस चश्माधारी को मैंने नहीं देखा। शायद वह ‘नंदन’ में छपने का इच्छुक ‘लेखक’ नहीं था या भारती जी का कोई घनिष्ठ मित्र था। पर उनके निकट मित्रों को मैं अच्छी तरह जानता था। नहीं, वह उनका मित्र नहीं था तो?...हुँह, होगा कोई। और मैं अपने काम में लग गया।
इसके कई दिन बाद मैंने उसे फिर भारती जी के सामने बैठे देखा। सब कुछ पहली बार की तरह घटा। अब मैं उसके बारे में और कुछ जानने के लिए उत्सुक हो उठा। और कुछ दिन बाद हमने उसे अपने बीच पाया। उनका नाम प्रकाश मनु था और वे हमारे सहकर्मी बन गए थे। ‘नंदन’ ज्वाइन करने से पहले दिल्ली प्रेस में काम कर चुके थे। वहाँ तो मैंने भी काम किया था। निश्चय ही कोई भी स्वाभिमानी व्यक्ति दिल्ली प्रेस में ज्यादा समय तक नहीं रह सकता था। तो दिल्ली प्रेस से पहले मनु जी कहाँ थे? उनके बारे में और जानने की इच्छा बलवती हो गई।

प्रकाश मनु
मनु जी जल्दी ही हम जैसे हो गए। उनकी उन्मुक्त हँसी मुझे जैसे अपने निकट आने का बुलावा देती थी। वे दिल खोलकर हँसते हैं—तब भी और आज भी। ‘नंदन’ में आने के कुछ समय बाद की बात है, मैंने उन्हें परेशान देखा। वे जैसे अपने से बात कर रहे थे। मालूम हुआ कि उन्होंने अपनी पत्नी को बस में बैठाया था। अब उन्हें चिंता सता रही थी कि वे सकुशल गंतव्य तक पहुँच तो जाएँगी। मेरी आँखों के सामने एक अनजान छवि उभर आई—कोई शहर से अपरिचित ग्रामीण महिला, जिन्हें दिल्ली के बारे में कुछ भी पता नहीं था। यह तो बाद में जाना कि उनकी पत्नी (प्रसिद्ध लेखिका डॉ. सुनीता) उच्च शिक्षा प्राप्त अत्यंत जागरूक महिला हैं। अपने आत्मीय जन के प्रति उनकी भोली चिंता का दूसरा छोर कठिन-कठोर समसामयिक सरोकारों से कितनी गहराई से जुडा है, इसे मैंने उनकी उत्तप्त कविताओं को पढ़कर जाना। मेरे और उनके बीच परिचय की धारा गहरी होकर दोस्ती में बदल रही थी।

उन्हीं दिनों एक बड़ी घटना हुई—हिंदुस्तान टाइम्स में हड़ताल हो गई। मनु जी को ज्वाइन किए थोडा ही समय हुआ था। वे अभी प्रोबेशन पर थे। उनके हाव-भाव से लगा कि वे भी हड़ताल में शामिल होना चाहते थे। अगर वे ऐसा करते तो उनकी नौकरी जा सकती थी। हम साथियों ने सोच लिया कि उन्हें रोका जाएगा। पर वे तो जिद पर अड़े थे। यह एक बड़ी मुश्किल थी। उन्हें हड़ताल से दूर रखने में हम लोगों को बहुत मशक्कत करनी पड़ी। सबके साथ आंदोलन में शामिल होने के उनके निर्मल आग्रह ने हम सबके मन में उनके कद को ऊँचा उठा दिया।
यह मैंने बाद में जाना कि अपने सच के लिए सत्याग्रह और आंदोलन करना उनके स्वभाव में था। अपने छात्र जीवन में उन्होंने अचिंत भाव से एक नहीं, अनेक बार ऐसा किया था।

मुझे ठीक ठीक याद नहीं वह कौन सी विशेष बात थी, जिसकी डोर थामकर मैं धीरे-धीरे उनके निकट पहुँचता जा रहा था। यह निकटता ‘नंदन’ की व्यस्तता के बीच दफ्तर से बाहर एक अनजान पगडंडी पर चल दी थी। वे धीरे-धीरे खुल रहे थे। विज्ञान के स्नातक और पढाई में अव्वल रहने के बावजूद साहित्य-रचना की आत्म-संतोष देने वाली लेकिन कठिन राह पर चले आए थे। घर-परिवार, विशेषकर माँ से अपार जुडाव के बावजूद वे परिवार से अलग रहकर कुछ ऐसा रचना चाहते थे, कुछ ऐसा, जैसा शायद अभी तक किसी ने नहीं किया था।

अब हम ‘नंदन’ में रहते हुए भी, उसके दायरे से बाहर निकलकर साहित्य और उससे जुड़े सामाजिक सरोकारों की रचनाधर्मिता पर चर्चा कर रहे थे। अगला चरण ऐसी रचनाएँ लिखना और उन्हें पाठकों की आँखों के सामने खोलना था। मेरे लिए यह सब नया था, लेकिन मनु जी तो बहुत पहले से यह करते आ रहे थे। मुझे धीरे-धीरे पता चल रहा था कि अपने विचारों के अनुरूप अपने जीवन को आगे ले जाने के लिए वे हर कठिनाई से जूझने और लड़कर नई राह बनाने में अपना सब कुछ झोंकने के लिए तैयार थे। वे प्रभु जोशी की कथा ‘अलग-अलग तीलियाँ’ में से एक ऐसी कड़क तीली थे, जो टूट भले ही जाए पर झुकेंगे कभी नहीं।

एक दिन उन्होंने ‘हमारी’ कविता पुस्तक तैयार करने की बात कही। ‘हमारी’ मतलब हम दोनों की, उन्होंने खुलासा किया। पर मैं बस यों ही कुछ लिख लेता था।’हमारी’ का मतलब क्या था? उनका मतलब यही था कि मैं कुछ नई कविताएँ लिखूँ। यहाँ तक तो ठीक था, पर मेरी कविताएँ किसी कविता-संकलन में भला कैसे शामिल हो सकती थीं? उनके प्रोत्साहन पर मैंने कुछ कविताएँ लिख डालीं। वे संकलन की प्रेस कॉपी तैयार करने में जुट गए। लेकिन कौन सा प्रकाशक इस संकलन को प्रकाशित करेगा? प्रकाशक तो यही रेडीमेड तर्क देते हैं कि कविता-संकलन बिकते ही नहीं। मनु जी की योजना थी कि संकलन हम स्वयं प्रकाशित करें। मुझे यह असंभव लगा। प्रकाशन के लिए पैसों का प्रबंध कहाँ से और कैसे होगा, यह मुझे नहीं सूझ रहा था।

कई दिन इसी उलझन में बीत गए। मनु जी ने धन का प्रबंध कर लिया था। लेकिन कैसे, कहाँ से! उन्होंने इसके लिए पत्नी की सोने की चूड़ियों का बलिदान कर दिया था। क्या उन्होंने सोने की चूड़ियाँ पत्नी से जबरदस्ती छीनी थीं? नहीं, सुनीता जी भी मनु जी की साहित्य-यात्रा में कंधे से कंधा मिलाकर चल रही थीं। यह सब मैंने बाद में धीरे धीरे जाना था।

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‘कविता और कविता के बीच’ कविता-संकलन प्रकाशित हो गया। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि खुद को मनु जी की तेज-तर्रार कविताओं के साथ खड़े पाकर मुझे बहुत अच्छा लगा था। लेकिन संकलन की बिक्री एक समस्या थी। मनु जी कह रहे थे कि रचनाकार का काम लिखना है। उसे प्रकाशक नहीं बनना चाहिए। मैं उनकी बात से पूरी तरह सहमत था, लेकिन मन कहता था, अभी एक-दो ऐसे प्रयास और कर लें, फिर इससे हाथ खींच लिया जाए। हिंदुस्तान टाइम्स के विज्ञापन विभाग में मित्र रमेश तैलंग काम करते थे। वे बाल साहित्य के अग्रणी कवि थे और हैं। मैं और मनु जी भी बाल कविताएँ लिख रहे थे। योजना बनी कि एक बालगीत संकलन प्रकाशित किया जाए, जिसमें रमेश तैलंग के साथ मनु जी और मैं भी रहूँ।

इस संकलन के चित्र और आवरण बनाने के लिए प्रसिद्ध चित्रकार हरिपाल त्यागी को मनु जी ने मना लिया। इसका संयोजन—संपादन भी पहली पुस्तक की तरह मनु जी ने अपने हाथ में सँभाल लिया था। संकलन का शीर्षक रखा गया, ‘हिंदी के नए बालगीत’।

इसी बीच एक दिन मनु जी रिक्शा से गिरकर चोटिल हो गए। इसके लिए उनका धुनी स्वभाव जिम्मेदार था। वे कोई भी काम डूबकर करते हैं। जब तक हाथ का काम पूरा न कर लें, उससे बाहर नहीं निकलते। और एक योजना पूरी होते ही तुरंत दूसरा काम शुरू कर देते हैं। न कोई अंतराल, न कोई विश्राम। उनके विपुल रचना भंडार के पीछे उनकी एकाग्र साहित्य-साधना ही है। यह क्रम लंबे समय से निरंतर चलता आ रहा है, और कभी रुकने वाला नहीं। दुर्घटना के समय वे डगमग रिक्शा में असावधान बैठे हुए प्रूफ पढ़ रहे थे। रिक्शा ज्यादा हिला, तो वे गिरकर चोट खा गए। इसके बाद वे कई दिन तक ऑफिस नहीं आ सके। कोई सूचना भी नहीं भेज सके।

इसे अनुशासनहीनता माना गया और उनके विरुद्ध विभागीय कार्यवाही की बात होने लगी। तब मैं फरीदाबाद में उनके घर चला गया और बीमारी के अवकाश का प्रार्थना-पत्र ले आया। वहीं उनकी पत्नी डॉ. सुनीता से पहली बार मिला। मुझे बरबस वह दिन याद आ गया, जब वे सुनीता जी के सुरक्षित घर पहुँचने को लेकर आकुल-व्याकुल हो रहे थे।

‘नंदन’ में उनसे मिलने अनेक लोग आया करते थे। वे आपस में क्या और किस संदर्भ में विमर्श करते थे, यह जानना कठिन नहीं था। बातों के केंद्र में हमेशा साहित्य, रचना-धर्मिता और सामाजिक सरोकारों के संदर्भ रहते थे। ‘नंदन’ की नौकरी से परे यह कोई दूसरे ही प्रकाश मनु थे जिनकी कलम अविराम लिख रही थी। ‘नंदन’ में आने से पहले दिल्ली प्रेस की ‘मुक्ता’ पत्रिका में उन्होंने ‘साहित्य-संसार’ स्तंभ लिखना शुरू कर दिया था। उसमें ‘काफी हाउस और प्रेमचंद’, ‘अज्ञेय का पाँचवाँ सप्तक’, ‘साहित्य, कला और आम आदमी’ जैसे तीखे व्यंगात्मक लेख लिखे। इसके बाद समकालीन कविता, कहानी, महिला लेखन, हिंदी गजल और नवगीत, कला फिल्में, साहित्य में फैशनवाद और लघु पत्रिकाओं की भूमिका पर कई तीखे लेख लिखे।

उनके शब्दों में, “यह दिल्ली में मेरे साहित्यिक लेखन की शुरुआत थी।...यहीं तीनों उपन्यास, कविता, कहानियाँ, आलोचनात्मक लेख, लंबे-लंबे इंटरव्यू और भी बहुत कुछ लिखा गया। एक लेखक के रूप में पहचान दिल्ली में ही बनी।”

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वे कहते हैं कि दिल्ली आने का फैसला किया था तो उसके पीछे एक बड़ा कारण दिल्ली आकर लेखकों से मिलना और उन्हें बहुत पास से देखना भी था। कहते हैं, “दिल्ली आकर एक बार तो हिम्मत बिल्कुल टूट गई थी। तब जिन लेखकों ने हिम्मत बँधाई उनमें घुमंतू लेखक और मेरे कथागुरु देवेंद्र सत्यार्थी भी थे। उन्होंने बहुत कुछ सिखाया। वे कहते थे, अरे मनु, जिंदगी कोई सजा थोड़े ही है। जिंदगी तो जीने के लिए है भाई, पूरी मस्ती से जीने के लिए। इसे डर-डरकर नहीं जीना चाहिए।”

मनु जी के मित्र अनेक थे, पर उनकी निर्मम और बेबाक लेखनी ने नाराज भी बहुतों को किया। अपने मित्र, ‘दैनिक हिंदुस्तान’ के विजयकिशोर मानव के आग्रह पर उन्होंने आलोचनात्मक लेख, टिप्पणियाँ और समीक्षाएँ लिखीं, जिनकी व्यापक चर्चा हुई। उस दौर को याद करते हुए वे लिखते हैं, “उन दिनों लिखे गए लेखों से कुछ लेखक भीषण रूप से नाराज हुए थे। जहाँ कहीं मैं जाता, यह सुनाई पड़ता कि फलाँ-फलाँ लेखक तुम्हें बहुत गालियाँ दे रहे थे। मैं हँसकर कहता, कोई बात नहीं वे गालियाँ भी मेरे लिए आशीर्वाद हैं।”

असल में मुसीबत यह थी कि लोग आलोचना को दोस्ती और दुश्मनी के खाँचों में डालकर देखते। वे कहते हैं, “दिल्ली की साहित्यिक दुनिया बहुत अधिक स्वार्थी और आत्मकेंद्रित हो चुकी है। इसलिए यहाँ ‘साहित्यिक आलोचना’ का सीधा सीधा मतलब यह समझ लिया गया है कि जो आपकी झूठी प्रशंसा करे सो मित्र और जो खरी आलोचना करे सो दुश्मन।”

हालाँकि आलोचनात्मक लेखों और समीक्षाओं से अलग अपने बचपन के दिनों के लिए आज भी उनके मन में गहरी ललक है, “बचपन में मुझे याद है, माँ और नानी की सुनाई गई कहानियाँ मुझे किसी और ही दुनिया में पहुँचा देती थीं...मुझे लगता था, मैं बिना पंखों के उड़ रहा हूँ—एक अंतहीन आकाश में। बचपन में एक अधकू की कहानी भी थी, जो मुझे सबसे ज्यादा अच्छी लगती थी। भला क्यों? इसलिए कि यह अधकू बड़ा विचित्र था। एक हाथ, एक पैर, एक आँख, और एक कान...सब कुछ आधा। और मैं भी तो कुछ ऐसा ही था। एकदम दुबला पतला, सींकिया सा।”
अगर घर में कोई कुछ कह देता तो माँ बरजतीं। वे जो कुछ कहतीं, उसका मतलब होता—जैसे तिनके एक-दूसरे में अटके हों, वैसे ही मेरा कुक्कू तो बस किसी तरह जुडा हुआ है। हाथ लगते ही तिनके बिखर जाएँगे। इसलिए इसे जरा भी छेडो मत।

अधकू की माँ उसकी सबसे बड़ी ताकत थी, लेकिन चोरी-डकैती करने वाले उसके भाई उसके दुश्मन। वे उसे मारना चाहते थे, पर माँ की चेतावनी ने उसे बचा लिया। इसके बावजूद अधकू भाइयों से नाराज नहीं था। वह उन्हें सही रास्ते पर लाना चाहता है। और आखिर वह इस मुश्किल काम में सफल भी हो जाता है।

मनु जी कहते हैं, “इस कहानी में कुछ बात थी कि मैं उसे आज तक नहीं भूल पाया। क्यों भला? शायद इसलिए कि मुझे लगता था, मैं ही अधकू हूँ—दूसरोँ से बहुत अलग। कुछ है मुझमें कि मैं भी कुछ कर सकता हूँ। सारी दुनिया से कुछ अलग कर सकता हूँ। वह क्या चीज थी जिस पर इतना भरोसा था मुझे? तब तो शायद बहुत साफ न रही होगी। पर आज जानता हूँ कि वह मेरी चुपचाप सोचते रहने की आदत थी और लिखने-पढने की धुन, जो शायद पाँच-छह बरस से ही शुरू हो गई थी। वही धुन जो आगे चलकर मुझे साहित्य की खुली दुनिया में लाई।”

ऐसे ही माँ की सुनाई कहानियों में एक और कहानी थी, एक ऐसे राजकुमार की जिसे सात कोठरियों वाले महल में कैद कर दिया जाता है। उससे कहा जाता है कि वह छह कोठरियाँ तो देख ले, पर सातवीं न खोले। क्योंकि इससे उसका अनिष्ट हो सकता है। राजकुमार ने पहली कोठरी खोली, दूसरी कोठरी खोली, तीसरी कोठरी खोली। एक-एक करके छह कोठरियाँ देख लीं, पर सातवीं कोठरी...? राजकुमार ने सोचा, क्या सातवीं कोठरी भी खोलकर देखूँ? उसने धड़कते दिल से सातवीं कोठरी का दरवाजा खोला और उसे खोलते ही भीषण हलचल हुई, बवंडर सा आ गया। जैसे सिर पर आसमान टूट पड़ा हो। एक से बढ़ कर एक विपत्तियाँ आईं। कभी मौत के खेल सरीखा खौलता हुआ समंदर, कभी आग की ऊँची-ऊँची,प्रचंड लपटें, कभी फुफकारते हुए बड़े-बड़े विशालकाय साँप...कभी जलती हुई आँखों के साथ गरजते शेर, चिंघाड़ते हाथी और दूसरे हिंस्र जंगली जानवर। एक के बाद एक सात समंदर, भीषण आपदाओं के।

पर राजकुमार ने एक-एक कर सातों समंदर पार किए। बीच-बीच में डरा, काँपा, लेकिन जूझा हर विपत्ति से। और अंत में उसने भयानक राक्षस से लड़कर उसे मार दिया, और कैद राजकुमारी को मुक्त करा दिया और सकुशल लौट आया।

मनु जी कहते हैं, “मुझे आज भी अच्छी तरह याद है यह कहानी। सुनते हुए हर पल मेरी साँस अटकी रहती थी। लगता, आँधियों के बीच फँसा वह राजकुमार मैं ही हूँ। ...सोचता हूँ, अगर राजकुमार सातवीं कोठरी का दरवाजा न खोलता तो...? बाकी छह कोठरियों के दरवाजे तो हर कोई खोलता है, पर सातवीं कोठरी का दरवाजा तो कोई-कोई ही खोलता है और वही शायद अपने समय का नायक भी होता है।”

प्रकाश मनु में अधकू और सातवीं कोठरी का दरवाजा खोलने का दुस्साहस करने वाला राजकुमार, दोनों आ मिले हैं। न जाने कितनी सातवीं कोठरियाँ खोलकर अंदर जाकर संघर्ष करना शेष है अभी।
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देवेंद्र कुमार
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