कविता: अखबार

सुधीर केवलिया
ज़रूरत रहती है अखबार की 
बहुत लोगों को आज भी
सुबह के समय हर दिन 
लेकिन पढ़े जाने के बाद उसे
ज़रूरत नहीं रहती उसकी
रद्दी बन जाता है यह हर दिन...
ज़रूरत मेरी भी है 
अखबार ही की तरह कुछ 
मेरे नौकरी से सेवानिवृत्त होने से 
पहले भी थी
और आज भी है
मेरे ही अपनों को
लेकिन
जो आज सिमटकर रह गई है
पूरे महीने में केवल एक दिन...
ज़िंदा रखा हुआ है मुझे
हर महीने के उस एक दिन के लिए
लिखाए जाने के लिए कुछ
मेरे ही अपनों ने 
टूट जाती है मेरे कमरे में पसरी
चारों ओर खामोशी उस दिन
उसके बाद मैं भी हो जाता हूं 
पूरे महीने के लिए उस पढ़े हुए 
अखबार की तरह 
लेकिन 
रहना पड़ता है अपने कमरे में
भूलकर अपनी हर ज़रूरत
सिमेटकर अपना अस्तित्व
पढ़े बिना ही मुझे ' सुधीर '
पढ़े हुए अखबार की तरह 
हर दिन...।

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