मानव-जीवन में विवेक

पद्मश्री डॉ. रवीन्द्र कुमार

रवीन्द्र कुमार

पद्मश्री और सरदार पटेल राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित डॉ. रवीन्द्र कुमार भारतीय शिक्षाशास्त्री एवं मेरठ विश्वविद्यलय, मेरठ (उत्तर प्रदेश) के पूर्व कुलपति हैं।

मानव सृष्टि का श्रेष्ठ प्राणी है, इसलिए जगत में मनुष्य की स्थिति भी अतिविशिष्ट है। मानव की श्रेष्ठता और अतिविशिष्ट स्थिति के दो कारण हैं। प्रथम, मनुष्य में बुद्धि का होना। यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिए कि बुद्धि और बुद्धिमत्ता** (”बुद्धिमता" –गीता, 7: 10), एक ही व्युत्पत्ति के साथ ही समान प्रतीत होने के उपरान्त भी दो अलग-अलग बातें हैं। द्वितीय, रचनात्मकता की उसकी प्रवृत्ति। यहाँ रचनात्मकता से मेरा अभिप्राय क्रियाशीलता या सक्रियता –विशेषकर उसके द्वारा कुछ (नया) प्रारम्भ करने से है। सृजनात्मकता भी इसी से जुड़ा पक्ष है। ये दोनों, बुद्धि और रचनात्मकता, प्रत्येक मनुष्य में विद्यमान हैं। बुद्धि के स्तर और क्रियाशीलता या रचनात्मकता की क्षमता का सभी में एक समान न होना दूसरी बात है।

बुद्धि और रचनात्मकता, वास्तव में, मानव को प्रदत्त वे दो महागुण हैं, जो, जैसा कि पहले भी कहा है, प्राणिजगत में उसकी श्रेष्ठ अथवा अतिविशिष्ट स्थिति का निर्धारण करते हैं। ये मानव-जीवन के उद्देश्य को प्रकट करते हुए जीवन-लक्ष्य के मार्ग का निर्माण करते हैं, जिसकी प्राप्ति अन्ततः विवेक के बल पर होती है। विवेक, बुद्धि का समुचित विकास है। यह जीवन के अनुभवों –निरन्तर परिवर्तित होती परिस्थितियों में उत्तरोत्तर वृद्धि अथवा विकास का विषय है। विवेक के साथ बुद्धि देव-गुण तुल्य है। अति कल्याणकारी मुक्ति-मार्ग प्रशस्त करने वाली है।

बुद्धिमत्ता, विवेक की समानार्थी है। यह सत्य-ज्ञान का आधार या मार्ग है; विवेक के बिना बुद्धि अधूरी है और विवेक के बिना ज्ञान यथार्थ नहीं है। 

विवेक, मानव-मन को सुदृढ़ बनाता है, जिसमें तर्क संगतता और मानसिक स्वस्थता सम्मिलित है। चेतन अवस्था का संवर्धन विवेक द्वारा ही होता है। इसके बल पर ही मनुष्य अपने चरित्र का निर्माण करता है और जीवन में किसी भी प्रकार की प्रतिकूल अथवा कठिन स्थिति से सफलतापूर्वक बाहर निकलने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करता है।

विवेक, व्यक्ति को अंधानुकरण से दूर करता है और उसे स्वयं अपनी वैचारिक क्षमता से सत्य-बोध कराता है। मानव-जीवन में विवेक की सर्वकालिक महत्ता को स्वीकार करते हुए इसलिए यह कहा गया है: 
"हितमत्वाज्ञान केन्द्र स्वातंत्र्येत विचारयेत्/ 
नान्धानुसरणं कुर्यात कदाचित् कोऽपि कस्याचित//"

अर्थात्, “विवेक को ही कल्याण का मूल कारक समझकर प्रत्येक विषय के सम्बन्ध में स्वतंत्र स्थिति में विचार करना चाहिए। किसी भी दशा में अन्धानुकरण नहीं करना चाहिए।"

सूक्ष्म और विशेष का प्रकटकर्ता विवेक, वास्तविक-अवास्तविक का बोध कराता है। जैसा कि कहा है, यह मनुष्य को भ्रम-स्थिति से बाहर निकालकर चिन्तन, तर्क और विश्लेषण द्वारा सत्य-असत्य के निर्धारणार्थ निर्णय-क्षमता प्रदान करता है।‘नोद्विजेत्’ –अविचलन (गीता, 5: 20) अवस्था से मुक्त दशा में लाकर मानव में यथार्थ के आलिंगन हेतु निश्चय के लिए सामर्थ्य सुनिश्चित करता है। 

विवेक मानव-जीवन के चहुँमुखी विकास का माध्यम है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि विवेक के बिना मानव-जीवन अर्थपूर्ण नहीं हो सकता; जीवन अपने उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकता। 
शिक्षा भी, जो जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है, और अपने वास्तविक अर्थ में भीतर विद्यमान गुणों को बाहर लाती है तथा उनके निरन्तर विकास द्वारा व्यक्ति को, उसकी आत्म-निर्भरता का मार्ग प्रशस्त करते हुए, अन्ततः मुक्ति-द्वार तक ले जाती है (“सा विद्या या विमुक्तये"), विवेक के बिना फलदायी नहीं हो सकती।

भारत की मूल प्राचीन-शिक्षा पद्धति, जिसकी जड़ें प्राचीन गुरुकुलों से जुड़ी हैं और जिसके प्रसारक आचार्यों में वाल्मीकि, वामदेव, विश्वामित्र, धौम्य, च्यवन, कपिल, कण्व, शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य जैसे दार्शनिक ऋषि व परमविद्वान भी थे, निरन्तर विवेक के विकास को समर्पित थी। इस पद्धति के साथ सभी विषयों में अध्ययन के साथ चिन्तन-मनन, तर्क, विश्लेषण, संवाद आदि अनिवार्य रूप से जुड़े थे। प्रचीनकालिक नालन्दा, वल्लभी, विक्रमशिला, तक्षशिला सहित अनेक अन्य संस्थानों में व्याकरण, खगोल-ज्ञान, विज्ञान के साथ अन्वेषण, शोध कार्य और नैतिकता व सदाचार की शिक्षा विवेक को विकसित करने के लिए ही थी। विद्यार्थी में विवेक को एक समुचित व अपेक्षित स्तर तक लाने हेतु थी, जिसकी प्रासंगिकता आज भी ज्यों-की-त्यों है।  
यह मानव का विवेक ही है, जो उसे एक निरन्तर बहती सरिता की धारा की अनुभूति कराते हुए, उसके जीवन के उद्देश्य एवं लक्ष्य की वास्तविकता का ज्ञान देता है, एवं तदनुसार जीवन-मार्ग पर आगे बढ़ने हेतु उसका पथप्रदर्शन भी करता है। विवेक, मानव का आह्वान करता है कि वह जीवन को एक नदी की भाँति जिए। नदी कभी पीछे नहीं जाती। इसलिए, भूतकाल को भूलना, वर्तमान पर ध्यान केन्द्रित करना और अपरिहार्य कर्मों (“न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् –कोई एक क्षण के लिए भी कर्मविहीन नहीं रह सकता”, श्रीमद्भगवद्गीता, 3: 5) को सुकर्म बनाकर उनके बल पर भविष्य के मुक्ति-मार्ग का निर्माण करना ही मानव-जीवन की सार्थकता का मूलमंत्र है। सुकर्म, शाश्वत समग्र एकता को केन्द्र में रखकर वृहद् कल्याणार्थ किए जाने वाले कर्म हैं। इस सन्दर्भ में  मानव-जीवन में विवेक की भूमिका अतिमहत्त्वपूर्ण होने के साथ ही निर्णायक भी है।
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**निस्सन्देह, उचित-अनुचित; वृहद् परिप्रेक्ष्य में सत्य-असत्य का भेद करने की क्षमता, जो उचित, वास्तविक तथा सत्य का अनुसरण करने की सामर्थ्य व शक्ति प्रदान करती है।

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