साक्षात्कार संजीव सराफ़: अनुराग शर्मा

रेख्ता के संस्थापक संजीव सराफ़ से अनुराग शर्मा की वार्ता
आज के इंटरनेट युग में उर्दू शायरी में रुचि रखने वालों में विरले ही होंगे जिन्होने रेख़्ता.ओर्ग का नाम न सुना हो। रेख़्ता उर्दू शायरी की ऐसी साइट है जिसपर इस समय 1900 से अधिक उर्दू शायरों की हज़ारों रचनायें उपलब्ध हैं। इसे अन्य सभी अंतर्जालीय स्थलों से अलग करने वाला विशिष्ट पक्ष यह है कि इसमें उर्दू शायरी को फ़ारसी के अतिरिक्त देवनागरी और रोमन लिपियों में भी देखा सुना जा सकता है ताकि फ़ारसी लिपि से अपरिचित व्यक्ति भी उर्दू शायरी के अपने पसंदीदा कलाम पढ़ सकें। ऑडियो और वीडियो की सहायता से यहाँ पर उर्दू शायरी को पढ़ने के साथ ही सुना भी जा सकता है। शक्ल में भी पेश किया गया है। रेख़्ता।ओर्ग की एक प्रमुख शक्ति इसका शब्दकोष है जिसमें शायरी के किसी भी शब्द पर क्लिक करके उर्दू, हिंदी या अंग्रेज़ी में उसका अर्थ जानने की सुविधा उपलब्ध है।
रेख़्ता के इस अनूठे कृतित्व के बारे में सेतु के पाठकों को अधिक जानकारी देने के लिये अनुराग शर्मा ने रेख़्ता के संस्थापक श्री संजीव सराफ़ से बातचीत की जिसका गद्य यहाँ प्रस्तुत है।

अनुराग: नमस्ते, सबसे पहले तो आप हमें यह बताइये कि उर्दू शायरी में आपकी रुचि कैसे बनी? क्या उर्दू आपकी मातृभाषा है?
संजीव: नमस्कार, उर्दू मेरी मातृभाषा नहीं है, मैं हिंदी और अंग्रेज़ी के माहौल में पला बढा हूँ। उर्दू पर पकड़ मैंने हिंदी-अंग्रेज़ी के बाद में हासिल की । मुझे उर्दू शायरी से गहरा भावनात्मक लगाव है और मैंने उर्दू लिपि भी सीखी है।

अनुराग: उर्दू मातृभाषा नहीं होने पर भी आपने उर्दू की प्रगति के लिये इतना काम किया, उर्दू से कुछ तो पहचान रही होगी
संजीव: जी, बचपन से ही घर में बेगम अख्तर, फ़रीदा खानम और मेहदी हसन जैसे कलाकारों की आवाज़ में उर्दू की स्वर लहरी गूंजती रही है। पिताजी को संगीत और खासकर गज़लों का बहुत शौक था। अपना बचपन यही सुनते हुए बीता। बाद में, पहले पढाई और फिर काम-काज़ के सिलसिले में शौक पीछे छिप गये, लेकिन जुडाव बना रहा।

अनुराग: जी, आपने पढाई की बात की तो हमारे पाठकों को अपनी शिक्षा-दीक्षा के बारे में कुछ बताइये
संजीव: आइआइटी खड़गपुर में जाने से पहले मैं ग्वालियर के सिंधिया स्कूल का छात्र रहा हूँ।

अनुराग: अरे वाह। आप तो शिक्षा के मामले में भी चमकते सितारे रहे है। पढाई के बाद का सफ़र कैसा रहा?
संजीव: पढाई पूरी करके मैंने ओडिशा में अपना पुश्तैनी कारोबार संभाला और फिर पॉलिप्लेक्स कंपनी की स्थापना की। पॉलिप्लेक्स भारत और थाईलैंड़ की एक पंजीकृत कंपनी है।

अनुराग: रेख़्ता आरम्भ करने का विचार कैसे आया?
संजीव: देखिये। मैं भारत में हूँ और आपने अमेरिका में बैठकर रेख़्ता को देखा। यह है इंटरनैट की पहुंच। ये जानकारी का ऐसा सागर है जिसकी कोई सीमा नहीं है। जो महंगी किताबें, रिसाले नहीं पढ सकते उन तक भी साहित्य को पहुंचाने के लिये यह एक बहुत अच्छा साधन है। न कोई भौगोलिक सीमा है और न ही वैसा आर्थिक बंधन जैसा कि परम्परागत साधनों में होता है।  रेख़्ता को डेढ सौ से ज़्यादा देशों में देखा जाता है। पिछले एक साल में ही इसे लगभग ढाई लाख लोग देख चुके हैं।

वार्ताकार: अनुराग शर्मा
अनुराग: रेख़्ता जैसे स्तम्भ को खडा करना आसान काम नहीं। अपने व्यवसाय और अन्य ज़िम्मेदारियों के साथ अपने शौक को निभाना, ये सब कैसे किया आपने?
संजीव: काम की ज़िम्मेदारियों को बखूबी निभाया। व्यवसाय अब स्थापित है और मेरे कर्मचारी बहुत ही अच्छे हैं। अब मुझे काम में से समय निकालना आसान है। तो 4-5 साल पहले मैं अपनी पहली रुचि की तरफ़ वापस आ गया।

अनुराग: साहित्य के बारे में वैसे तो इंटरनैट पर बहुत कुछ है लेकिन अच्छी पहचान वाली साइट्स गिनी चुनी हैं। उनमें भी रेख़्ता अनूठी है। आपके ख्याल से रेख़्ता में क्या खास है?
संजीव: रेख़्ता में स्थापित नामों के साथ-साथ बहुत से नये शायर भी अपने कलाम के साथ मौजूद हैं। यहाँ मौजूद शायरी को उर्दू के साथ-साथ हिंदी (नागरी) और अंग्रेज़ी (रोमन) में भी पढा जा सकता है। किसी शब्द पर क्लिक करके आप उसका अर्थ देख सकते हैं ...

अनुराग: जी, प्रामाणिक शब्दार्थ के लिये तो मैं कितनी ही बार इंटरनैट पर खोजते हुए रेख़्ता तक ही पहुंचा हूँ। रेख़्ता की कुछ अन्य खासियतें?
संजीव: रेख़्ता में ऑनलाइन सामग्री के अलावा एक बडा ई-पुस्तक भाग भी है जहाँ उर्दू की पुरानी किताबें भी हैं,  उर्दू शायरी से संबंधित हिंदी और अंग्रेज़ी पुस्तकों को भी डिजिटाइज़ करके सुरक्षित रखा गया है। रेख़्ता ऐसी पहली वेबसाइट है जहाँ मीर तक़ी मीर और मिर्ज़ा ग़ालिब की सारी ग़ज़ले और सआदत हसन मंटो की सारी कहानियाँ एकसाथ मौजूद हैं।

अनुराग: रेख़्ता के बारे में कुछ और?
संजीव: रेख़्ता पर शायरों की आवाज़ में ऑडियो और वीडियो भी मौजूद हैं। हमने एक लेक्चर सीरीज़ भी शुरू की गई है जिसे उर्दू के छंद-विधान अरूज़ के माहिर श्री भटनागर ‘शादाब’ प्रस्तुत करते हैं। इस सीरीज़ में उर्दू के छंद-विधान अरूज़ से परिचय कराया जाता है। इसके अलावा रेख़्ता को अधिक फैलाने के लिए, अब इसे टैबलेट और मोबाइल फ़ोन पर ऐप के ज़रिये भी उपलब्ध कराया जा रहा है। इसके अलावा हमने जश्न ए रेख्ता भी शुरू किया है जिसका बहुत स्वागत हुआ है।

अनुराग: इतना कठिन प्रयोग इतनी अच्छी तरह से कैसे किया गया?
संजीव: मेरा उसूल है कि जो काम किया जाये उसे अच्छी तरह किया जाये, श्रेष्ठ बनाया जाये।

अनुराग: क्या उर्दू की तरह हिंदी के लिये भी रेख़्ता जैसा कुछ करने की इच्छा है।
संजीव: बहुत इच्छा है लेकिन फिर इच्छाओं का कोई अंत भी तो नहीं है। कितना कर पायेंगे पता नहीं, फ़िलहाल रेख़्ता को तो बेहतर बनाते ही रहेंगे।

अनुराग: जी, आपकी यह बात भी सही है। उर्दू शायरी के अलावा आपकी क्या अभिरुचियाँ हैं?
संजीव: मुझे पढ़ने का ज़बर्दस्त शौक़ है। चित्रकला और संगीत से तो गहरा गहरा लगाव है ही।

अनुराग: हमारे पाठकों के लिये आप क्या सलाह देना चाहेंगे?
संजीव: अपने दिल की बात सुनिये, उसका अनुसरण कीजिये। प्रयास कीजिये। और कभी अड़चन आये तो नया मार्ग बनाइये। जो भी करें, उसे दिल लगाकर कीजिये।

अनुराग: बहुत उपयोगी सलाह है संजीव जी। हमें इतना समय देने के लिये आपका बहुत बहुत धन्यवाद!

नोट:श्री संजीव सराफ़ पॉलिप्लेक्स कार्पोरेशन लिमिटेड के संस्थापक, अध्यक्ष और मुख्य अंशधारक हैं। यह कार्पोरेशन दुनिया में पीईटी फ़िल्में बनानेवाली सबसे बड़ी कंपनियों में एक है। श्री सराफ़ ने ‘मनुपत्र’ नामक क़ानूनी सूचना उपलब्ध करनेवाली वेबसाइट भी बनाई है। पर्यावरण से अपने गहरे सरोकार को दर्शाते हुए उन्होंने पंजाब, उत्तराखंड़ और सिक्किम में पन-बिजली प्रॉजेक्ट स्थापित किये हैं। वे कई कंपनियों के बोर्ड के सक्रिय सदस्य भी हैं। श्री सराफ़ की कंपनी की जनहितकारी गतिविधियों के अंतर्गत चलाये जा रहे चैरिटेबल स्कूल में 1200 बच्चे शिक्षा पा रहे हैं।