अनुराग मिश्र की कवितायें

- पाप -
अनुराग मिश्र 

बाण-बद्ध भीष्म के लिये,
तृषा बाण गंगा का
मेरे लिये वैसा ही
गाँव मेरा।

अभिशप्त प्रियतमा के लिये
स्मृति यक्षिणी का जैसा
मेरे लिये वैसा ही
ताप मेरा।

कामदग्ध सूर्य के लिये
कौमार्य कुन्ती का जैसा
मेरे लिऐ वैसा ही
पाप मेरा।

- ज्वालामुखी -

गाँव में ज्वालामुखी फूटता है
जलता है भूख और प्यास,
धधकता है आदिम अग्नि
मर गई है रत्नगर्भा,
प्रयोजन है पार्थ का जो
कर सके निसृत बाण-गंगा
और फिर से फेके एक बार
नई पत्तियाँ
उस पुराने पीपल में
फिर से कामना की लत्तियाँ बाँध दे
विवश पुरूषार्थ को,
एक बार फिर अहिल्या
कर सके पश्चात्ताप।