श और ष का अंतर - हिंदी दिवस विशेष

- अनुराग शर्मा

भारतीय भाषाओं में कुछ ध्वनियाँ ऐसी हैं जिनके आंचलिक उच्चारण कालांतर में मूल से छिटक गए हैं। कुछ समय के साथ लुप्तप्राय हो गए, कुछ बहस का मुद्दा बने और कुछ मिलती-जुलती ध्वनि के भ्रम में फंस गए। उच्चारण के विषय में इस प्रकार की दुविधा को देखते हुए सेतु पत्रिका समय समय पर भाषा, लिपि और ध्वनियों की बारीकी स्पष्ट करते हुए आलेख प्रकाशित करने को प्रतिबद्ध है। आज हिन्दी दिवस पर इसी शृंखला में एक और बड़े भ्रम पर बात करना स्वाभाविक ही है। यह भ्रम है श और ष के बीच का।

भारतीय वाक् में ध्वनियों को जिस प्रकार मुखस्थान या बोलने की सुविधा के हिसाब से बांटा गया है उससे इस विषय में किसी भ्रम की गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए परंतु हमारे हिन्दी शिक्षण में जिस प्रकार वैज्ञानिकता के अभाव के साथ-साथ तथाकथित विद्वानों द्वारा परंपरा के साथ अस्पृश्यता का व्यवहार किया जाता है उससे ऐसे भ्रम पैदा होना और बढ़ना लाज़मी है।

ष की बात करने से पहले सरलता के लिये आइये आरंभ "श" से करते हैं। श की ध्वनि सरल है। आमतौर पर विभिन्न भाषाओं में और भाषाओं से इतर आप श (SH) जैसी जो ध्वनि बोलते सुनते हैं वह श है। यदि आज तक आप श और ष को एक जैसे ही बोलते रहे हैं तो यक़ीन मानिए आप श की ध्वनि को एकदम सही बोलते रहे हैं, अलबत्ता ष का कबाड़ा ज़रूर करते रहे हैं। ओंठों को खोलकर, दंतपंक्तियों को निकट लाकर, या चिपकाकर, जीभ आगे की ओर करके हवा मुँह से बाहर फेंकते हुये श आराम से कहा जा सकता है। श बोलते समय जीभ का स्थान स से थोड़ा सा ऊपर है। वस्तुतः यह एक तालव्य ध्वनि है और इसके बोलने का तरीका तालव्य व्यंजनों (चवर्ग) जैसा ही है। ओठों से फूंककर सीटी बजाते समय "श्श" जैसी जो ध्वनि सुनाई देती है वह "श" ही है, इसमें कुछ विशेष नहीं है।

अब आते हैं ष पर। जहां श तालव्य है, ष एक मूर्धन्य ध्वनि है। कई शब्दों में आम वक्ता द्वारा "श" जैसे बोलने के अलावा कुछ भाषाई क्षेत्रों में इसे "ख" जैसे भी बोला जाता है। अगर स और श से तुलना करें तो ष बोलने के लिए जीभ की स्थिति श से भी ऊपर होती है। बात आसान करने के लिए यहाँ मैं बाहर से आई एक ध्वनि को भी इस वर्णक्रम के बीच में जोड़ कर इन सभी ध्वनियों को जीभ की स्थिति नीचे से उठकर उत्तरोत्तर ऊपर होते जाने के क्रम में रख रहा हूँ

स (s) => श (sh) => ज़ (z) => ष (?)

स कहते समय क्षैतिज (दंत्य) रहा जीभ का ऊपरी सिरा ष कहने तक लगभग ऊर्ध्वाधर (मूर्धन्य) हो जाता है। इन दोनों ध्वनियों के बीच श की तालव्य ध्वनि आती है। शब्दों में ष के प्रयोग का त्वरित अवलोकन इसे और सरल कर सकता है क्योंकि ण से पहले श के मुकाबले ष कहना नैसर्गिक है। बहुत से लोग ण को ही न की तरह बोलते हैं, उन्हें शायद ष और ण का सम्बंध समझना कठिन हो। ऋ की ध्वनि के साथ भी ष का अच्छा मेल बनता है। आइये ऐसे कुछ शब्दों पर नज़र डालें जिनमें ष का प्रयोग हुआ है -

विष्णु, जिष्णु, षण्मुख, दूषण, ऋषि, षट, षड, षडयंत्र, षोडशी, षडानन, षट्‌कोण, चतुष्कोण, झष, श्रेष्ठ, कोष्ठ, पुष्कर, कृषि, आकर्षण, कष्ट, चेष्टा, राष्ट्र, संघर्ष, ज्योतिष, धनिष्ठा, निरामिष, पोषण, शोषण, भाषा, परिषद, विशेष

संस्कृत वाक् में ध्वनियों को सहज बनाने का प्रयास तो है ही, उनके मामूली अंतर को भी प्रयोग के आधार पर चिन्हित किया गया है। यद्यपि उपरोक्त अधिकांश शब्दों में ष को श से प्रतिस्थापित करना आसान है लेकिन आरंभ के शब्दों में यदि आप यह प्रतिस्थापन करेंगे तो आप शब्द को प्रवाह से नहीं बोल सकते। यदि अंतर अभी भी स्पष्ट नहीं हुआ है तो निम्न दो शब्दों को प्रवाह से बोलकर देखिये और उनमें आने वाली SH की ध्वनि (और जिह्वा की स्थिति) के अंतर को पकड़िए -

विष्णु और विश्नु का अंतर, तथा विष्णु और विश्ड़ु का अंतर

उपरोक्त उदाहरण में विष्णु सही है और विश्नु तथा विश्ड़ु विकृत उच्चारण हैं। मूर्धन्य स्वर ऋ तथा मूर्धन्य व्यंजनों र, ट, ठ, ड, ढ, ण के साथ ‘ष’ की उपस्थिति सहज और साभाविक है। ण के साथ तो ष का चोली-दामन का साथ है। इसके अतिरिक्त अवसरानुकूल अन्य वर्गों के वर्णों (उपरोक्त उदाहरणों में क, घ, त आदि) के साथ भी प्रयुक्त किया जा सकता है। एक बार फिर एक सरल सूत्र -
स - दंत्य
श - तालव्य
ष - मूर्धन्य

मुझे लगता है कि भाषा/लिपि पढ़ाते समय इन ध्वनियों को अंत में एक साथ समूहित करने के बजाय संबन्धित व्यंजनों के साथ पढ़ाया जाना चाहिए ताकि गलतियों को रोका जा सके। क्या कहते हैं आप?
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