श्याम सुन्दर अग्रवाल की लघुकथाएँ

श्याम सुन्दर अग्रवाल
गिरे हुए लोग 
                                    

विभाग में उच्च पदस्थ बेटा जब दफ्तर से घर लौटा तो महीने भर के लिए उस के पास रहने आए माता-पिता, उसे पहले से खुश दिखाई दिए।

आपका मन लग गया लगता है, धीरे-धीरे और लग जाएगा। यहाँ जितनी फैसिल्टीज वहाँ कहाँ मिलेंगी।

बेटे, घर में खाली बैठे मन कहाँ लगता है! तुझे कहा तो है कि कुछ दिनों के लिए बच्चों को मुंबई से यहाँ बुला ले। माँ ने कहा।

उनका आना संभव नहीं है मम्मी? …लेकिन आज तो आप खुश लग रहे हो।
टाइम पास हो जाए तो मन को अच्छा तो लगता ही है। आज हम कॉलोनी में घूमने चले गए। वो राम खिलावन है न, उसकी घरवाली ने बुला लिया। उसके दो बच्चों संग मन लगा रहा बस पिता बोले।
इन लोअर क्लास इंप्लाइज से दूर ही रहो। ये बहुत गिरे हुए लोग हैं बेटा बोला।
अगले दिन बेटा आया तो माँ बोली, आज वह डी क्वार्टर वाला सोहनलाल बुला कर ले गया, चाय पर। बेचारे ने हमारी बहुत आव-भगत की…
बेटे की त्योरियाँ चढ़ गईं। माँ की बात बीच में ही काटता हुआ बोला, तुम्हें कहा था न कि इन नीचे दर्जे वाले लोगों के पास नहीं जाना। इन लोगों से दूरी बना कर रखना जरूरी है… तुम्हें मेरे सटेट्स का जरा भी ध्यान नहीं!
बेटे की बात सुन माता-पिता दोनों स्तब्ध रह गए। पिता से रहा नहीं गया, बोले, “तू भी एक क्लर्क का बेटा है, इस बात को कैसे भूल गया?
“प्लीज, यह बात किसी और को न बता देना।” बेटा इतना ही बोल पाया।
अगली सुबह ही बेटे ने बुजुर्ग माता-पिता को वापसी गाड़ी से घर को रवाना कर दिया। गाड़ी चलते ही माँ बोली, “क्यों जी, हमारा बेटा इतना नीचे कैसे गिर गया?
                                 

बाबूजी की पीड़ा
                               

रविवार का दिन था। न बच्चों ने स्कूल जाना था, न राजेश ने दफ्तर। रीता तो कहीं जाती ही नहीं थी, घर पर ही रहती थी। सुबह आठ बजे के बाद रीता उठी तो वह थोड़ी हैरान थी। बाबूजी के कमरे का दरवाजा अभी भी बंद था। ‘बाबूजी तो सुबह अंधेरे ही उठ जाते हैं, आज क्या बात हो गई?’–सोचते हुए वह रसोईघर की ओर हो ली। चाय वाले बरतन इस बात की स्पष्ट गवाही दे रहे थे कि बाबूजी ने आज उन्हें छुआ तक नहीं।

रीता ने धीरे-से बाबूजी के कमरे का दरवाजा खोला। अंदर का दृश्य देख उसने अपने भीतर से निकलती हँसी को मुश्किल से रोका। वह तेजी से राजेश के पास गई और उसे उठाते हुए बोली, आओ तुम्हें एक नज़ारा दिखाऊँ।

क्या हो गया? राजेश ने बिस्तर छोड़ अँगड़ाई लेते हुए कहा।

बताने वाला नहीं, देखने वाला है। रीता चहक रही थी। 
वह राजेश को बाबूजी के कमरे में ले गई। बिस्तर पर बाबूजी की छोटी-सी ट्रंकी खुली पड़ी थी, जिसे वे सदा ताला लगाकर रखते थे। ट्रंकी का सामान सारे बिस्तर पर बिखरा पड़ा था। राजेश ने नजदीक जाकर देखा–छोटा-मोटा सारा सामान उसकी स्वर्गीय माँ का ही था; कई तरह की चूड़ियाँ, चुटकियाँ, बिंदियाँ, कंघी, चश्मा, माला, रुमाल, कुछ तस्वीरें और ऐसा ही बहुत कुछ। बाबूजी गहरी नींद में दिखाई दे रहे थे। उनके दोनों हाथ छाती पर टिके थे। राजेश भी मुस्कराए बिना न रह सका।
पति-पत्नी के चाय पीने तक भी बाबूजी नहीं उठे तो राजेश थोड़ा चिंतित हुआ। वह फिर से उनके कमरे में गया और बाबूजी को आवाज दी, लेकिन वे बेहरकत रहे। तब उसने उन्हें हिलाया तो पता लगा कि वे तो कभी न टूटने वाली नींद में थे।
सीने पर टिके हाथो के नीचे एक कागज दिखाई दिया। राजेश ने कोशिश कर उसे खींच कर बाहर निकाला तो देखा, वह तो उसकी माँ की तस्वीर थी। तस्वीर के पीछे टूटे-फूटे अक्षरों में लिखा था, ‘अपने पास ले जा अंगूरी, यहाँ किसी के पास मेरे लिए समय नहीं है। बेटे को तो मिले भी दस दिन हो गए।’

                             

बुढ़ापे के लिए
                      

अब तो रिटायर होने वाले हो, दफ्तर का मोह त्याग दो। नीलिमा ने रोज की तरह देर से घर लौटे पति को मुस्कराते हुए कहा।

“मैने तो दफ्तर से ऐसा कोई मोह नहीं पाला और अब तो कुछ ही दिन शेष बचे हैं…” सुभाष बोला।

“तभी तो कह रही हूँ, रियायरमेंट नजदीक आते ही लोग तो छुट्टियाँ लेकर घर बैठ जाते हैं, आगे की तैयारी करते हैं…और आप हैं कि रोज देर से घर लौटते हैं।”

“आगे की तैयारी तो मैं बहुत दिनों से कर रहा हूँ, नीलू। तभी तो देर से आता हूँ।”
“दफ्तर में आगे की तैयारी?” नीलिमा हैरान थी, “आगे कहीं नैकरी का जुगाड़ कर रहे हो क्या?”
“ना नीलू, नौकरी तो बहुत करली। अब तो बुढ़ापे में ठीक से रह पाने की तैयारी में लगा हूँ,” उसने आसपास देखा और आश्वस्त होकर पत्नी के नज़दीक बैठते हुए कहा, “देख नीलू, हम बेटे के मकान में रह रहे हैं, जैसा बेटे-बहू का व्यवहार है, उससे तो यही लगता है कि रिटायरमैंट के बाद यहाँ रह पाना कठिन हो जाएगा…”
“यह चिंता तो मुझे भी सताती है, लेकिन कर भी क्या सकते हैं? जैसे रखेंगे, रह लेंगे।”
“नहीं नीलू, मैं अपना बुढ़ापा खराब नहीं करना चाहता।”
“तो फिर…?”
“रिटायरमेंट से पहले ही मैंने अपनी भविष्य-निधि से पैसे निकलवा कर शहर के वृद्धाश्रम में एक अच्छा-सा कमरा बनवा दिया है, आँगन का फर्श पक्का करवा दिया है और लॉन को भी खूब हरा-भरा कर दिया है।”
“मगर बच्चों से दूर…?” नीलिमा परेशान मन से बोली।
“हाँ नीलू, हम बच्चों से दूर नहीं रहना चाहते, वहाँ तो तभी जाएंगे, जब ये घर छोड़ने को मजबूर कर देंगे।”
“अगर नहीं गए तो फिर उस कमरे का क्या होगा?”
“होगा क्या, और जरूरतमंद रह लेंगे, बुढ़ापे में बहुतों को जरूरत पड़ती है।” सुभाष धीरे से बोला।
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