अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

प्रिय पाठकों,

मुखर अभिव्यक्ति मानव समाज की एक विशेषता है। हम सब अपने सुख-दुख, अपने विचार, भावनाएँ, और अनुभव एक दूसरे से बाँटना चाहते हैं। अभिव्यक्ति का महत्व सदा से रहा है।  गाँव की चौपाल और मुहल्ले की अड्डेबाज़ी से लेकर साहित्यिक गोष्ठियाँ और कवि सम्मेलनों तक अभिव्यक्ति का शासन रहा है। लेकिन इंटरनैट क्रांति के बाद मोबाइल संचार माध्यम तथा सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति के रूप को तो बदला ही है, साथ ही सूचना के आधिक्य का माहौल भी उत्पन्न किया है। पाकिस्तानी शायर स्वर्गीय ओबैदुल्ला अलीम ने काफ़ी पहले कहा था:
पढ़ता नहीं है अब कोई, सुनता नहीं है अब कोई
हर्फ़ जगा लिया तो क्या, शेर सुना लिया तो क्या।

स्वतंत्रता के किसी भी रूप की तरह ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता असीमित नहीं हो सकती। कुछ करते, कहते, लिखते और प्रसारित करते समय न केवल हमें अन्य लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखना चाहिये बल्कि यह भी देखना चाहिये कि कही जा रही बात कितनी प्रामाणिक और तथ्यपूर्ण है, और वह समाज का कितना हित कर सकती है।

अनियंत्रित और अराजक अभिव्यक्ति-वार्धक्य के इस युग में भी अच्छे साहित्य का महत्व बना हुआ है और वह भविष्य में भी अपनी पहचान बनाए रखेगा, इसका मुझे पूर्ण विश्वास है। सांसारिक भागदौड़ और जोड़-तोड़ की दुनिया के बीच भी, आज भी अच्छे साहित्यकार अलग से पहचान में आ जाते हैं। सेतु सम्पादन मण्डल के सदस्य डॉ. कन्हैया त्रिपाठी भी एक ऐसे ही सम्माननीय लेखक-सम्पादक हैं जिन्हें इस मास भारत के राष्ट्रपति का विशेष कर्तव्य अधिकारी चुना गया है। ज्ञातव्य है कि डॉ. त्रिपाठी इससे पहले भारत की पूर्व राष्ट्रपति डॉ. प्रतिभा पाटिल के कार्यकाल में राष्ट्रपति भवन में सम्पादक का कार्यभार निभा चुके हैं। सेतु परिवार के लिये यह गर्व का विषय है। हम सबकी ओर से कन्हैया जी को उल्लासमय बधाई और हार्दिक शुभकामनाएँ!

इस महीने दिल्ली में तमिळनाडु से दिल्ली आये तथाकथित कृषकों द्वारा चूहे मारकर उन्हें दांतों में दबाकर फ़ोटो खिंचाने, मानवमूत्र पीने, भोजन मार्ग में बिखेरकर खाने से लेकर सार्वजनिक स्थान पर पूर्ण नग्न होकर विडियो बनवाने जैसे कृत्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल सूत्र का उल्लंघन है, जिसके अनुसार मेरी स्वतंत्रता आपकी स्वतंत्रता में बाधक नहीं बननी चाहिये।

तमिळ दल के वायुयान से दिल्ली छोड़ने के दिन ही छत्तीसगढ़ के सुकमा क्षेत्र में सड़क-निर्माण कार्य की सुरक्षा में लगे केंद्रीय पुलिस बल के दल पर नक्सली-माओवादी आतंकवादियों ने नृशंस हमला किया। राष्ट्रीय संसाधनों तथा विकासकर्मियों की सुरक्षा में लगे पच्चीस जवानों की शहादत के बाद आतंकियों द्वारा जवानों के शवों को क्षत-विक्षत करने की घटना घृणित तो है ही अराजकता को समाप्त कर न्याय-व्यवस्था को प्रभावी बनाने की त्वरित आवश्यकता पर भी ध्यान आकर्षित करती है। इस हमले के शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए इस दुखद अवसर पर एक बार फिर दोहराऊँगा कि प्रशासन-व्ययवस्था का अभाव भारत की एक प्रमुख समस्या है, जिसके हल के लिये एक राष्ट्रव्यापी योजना पर प्राथमिकता से काम होना चाहिये।

सेतु की 2016 की प्रथम काव्य प्रतियोगिता के बहुप्रतीक्षित परिणाम प्राप्त हो चुके हैं। हमारे अनुमानित समय से अधिक हुई देरी के लिये मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। देर आयद, दुरुस्त आयद: आपके धैर्य के लिये धन्यवाद। काव्य प्रतियोगिता के सभी विजेताओं को बधाई और भाग लेने वाले सभी प्रतियोगियों और निर्णायकों का आभार और अभिनंदन।

प्रतियोगिता परिणाम के अतिरिक्त, इस अंक में और भी बहुत कुछ है: लघुकथा, कहानी, काव्य, संस्मरण, फ़ोटो फ़ीचर, साक्षात्कार, अनुवाद, तथा, आपका प्रिय स्तम्भ बिस्मिल की आत्मकथा।  तो, देर किस बात की? आइये पढ़ते हैं, सेतु का अप्रैल 2017 अंक

शुभकामनाओं सहित,
अनुराग शर्मा
सेतु, पिट्सबर्ग