आधुनिक संस्कृत कविता और नारीवाद

अरुण कुमार निषाद 
अरुण कुमार निषाद
(शोधच्छात्र, संस्कृत तथा प्राकृत भाषा विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ)


शोध सारांश
स्त्री और पुरुष एक गाड़ी के दो पहिए है। बिना दोनों के सहयोग के कोई भी कार्य सुचारू रूप से नहीं हो सकता है। पुरुष ने सदैव भी नारियों का साथ दिया है। पुरुष लेखक भी नारियों की पीड़ा को समझता है। उसने भी अपनी कलम से उस नारी पीड़ा, नारी शोषण के खिलाफ आवाज उठाई है। यह अलग बात है कि- पुरुष लेखक की अपेक्षा महिलायें अपनी अनुभूति को अधिक अच्छे ढंग से प्रस्तुत है रहीं हैं। परन्तु सहयोग में कोई कमी नहीं है।

की वर्ड: संस्कृत साहित्य, स्त्री लेखन, नारीवाद।


आज की नारी अपने शोषण के खिलाफ आवाज उठाने में पीछे नहीं है। वह आज घूंघट के बाहर निकल चुकी है। उसमें स्व की भावना आ गयी है। वह अपनी बात आज अपने लहजे में कहती है। समाज में फैली विभिन्न कुरीतियों का वह डटकर मुकाबला कर रही है। आज का युग विमर्शों का युग है। आज दलित-विमर्श, आदिवासी-विमर्श, स्त्री-विमर्श आदि खूब चर्चे में है। इन्हीं विमर्शों में नारीवाद का भी नाम आता है। इसकी शुरुआत 19वीं शताब्दी से मानी जाती है। ब्रिटेन की मैरी वुल्स्टनक्राफ्ट की पुस्तक ‘विन्डिकेशन ऑफ दि राइट्स ऑफ विमेन’ (1792 ई.) को आधुनिक नारीवाद का प्रथम प्रेरणा स्रोत माना जाता है। इसके बाद सन् 1873 ई. में प्रकाशित हुई जे. एस.मिल की पुस्तक ‘सब्जेक्शन ऑफ विमेन’ नारीवाद की दूसरी महत्त्वपूर्ण पुस्तक थी। स्त्री-विमर्श सम्बन्धी साहित्य को वर्जिनिया बुल्फ तथा सिमोव द बोउआर ने काफी प्रभावित किया। इस विषय पर समकालीन संस्कृत कवियों-कवयित्रियों ने भी खूब लिखा है।

बालिका शिक्षा आदि के स्वर को मुखरित करती हुयी वेद्कुमारी घई लिखती हैं कि शिक्षा और जागरूकता के अभाव में मानवता आज दम तोड़ रही है। मानव मानव का दुश्मन हो गया है।
 कृषक शिशुभिरुदरपूर्ति: प्राप्त: च चेत्
श्रमिकबाला यदि शिक्षया वंचिता
जीर्ण-शीर्ण कुटीरे हि यदि रोगिणी
ग्राम्यवनिता चिकित्सा विरहिता मृता।1

‘ऋषे क्षुब्धे चेतसि’ कविता में हर्षदेव माधव लिखते हैं कि – किसी सहपाठिनी को देखकर युवा मन में क्या विचार उपन्न होता है। युवा मन पुस्तकालय में क्या-क्या करता है, इसका जीता-जागता उदाहरण प्रस्तुत है -

(क) कालेज कन्या: ग्रन्थालये
दुग्धोत्सुका:
सुश्री मार्जार्य:।2

कष्णक्याक्षिप्तं कविता में वे लिखते हैं कि किस प्रकार एक बहू अपने दु:खों हो सहती है। वह अकेले में स्नानगृह में जाकर रोती है और अपने मन को शान्त करती है।
(ख) स्नानगृहं गत्वा/गृहक्लेशश्रान्ता वधू:
नि:शब्दं रोदति तदा स्नानगृहं
तस्या पितृगृहं भवति।3

 ‘ऋषे क्षुब्धे चेतसि’ कविता (पृष्ठ 65) में वेद हर्षदेव माधव वेश्या की दशा का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि- उस स्त्री दशा ठीक वैसे ही होती है, जैसे किसी वधिक के जाल में फंसी हिरनी की।
(घ) हरिणी हता/ व्याधेन निष्ठुरेण
सायं खादिता
सा पुनश्च श्वसिति व्याधबध्वा वक्षसि।4

पुरुष द्वारा विभिन्न प्रकार से छली जा रही नारी के विषय में हर्षदेव माधव का कथन है –
केनापि रामेण त्यक्ता
केनापि नलेन निर्वासिता
केनापि दुष्यन्तेन वञ्चिता
केनापि हरिश्चन्देण विसृष्टा।5

वनमाली विश्वाल वेश्यावृत्ति पर लिखते हैं-
कोऽत्र पापी?
जठराग्निं शमयितुं
याऽनिच्छया प्रकाश्येन देहं विक्रीणाति
अथवा स:
देहक्षुधा- निवृत्तये
स्वेच्छया यो गोपनेन
नित्यं भिन्नं शरीरं क्रीणाति।6

आज भी समाज में बहुत सारी स्त्रियाँ प्रेम के धोखे में आकर अपना सब कुछ गंवा रही हैं। समाज के लोग वेश्या को पापी कहते हैं, परन्तु असली पापी कौन है, इस प्रश्न उठाते हुए कवि कहता है कि- जो पेट भरने के लिए असामाजिक कार्य कर रहा है वह या जो अपनी वासना की भूख मिटाने के लिए वेश्या के पास जा रहा है वह। डॉ. विश्वाल जी की कविता पाठक के मन को झकझोर देती है।

डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी अपने ‘काव्याऽमृतम्’ काव्यसंग्रह में सती प्रथा पर अपनी लेखनी से लिखती हैं कि- झूठे शान-शौकत और सामाजिक दिखावे के चक्कर में लोग एक नारी को किस प्रकार से जिन्दा जला देते हैं। ‘देवराला नारीदाह:’ कविता में वे लिखती हैं-
अहो दुर्मेधस: क्रूरा: नार्य्येगृहविभूतय:।
दहेजलोभाद् दुर्वृतै: हन्यन्ते लुब्धकामकै:।।7

घटते जीवन-मूल्यों के विषय में कवयित्री का कथन है –
एकता विलुप्ता
मानवता निर्वासिता
अहिंसा उपेक्षिता
धर्मस्य अवज्ञा
न्यायस्य अवहेलना
नीति लुण्ठिता
प्रीति पराजिता
मानवजातिर्विभक्ता
मतवादानां चक्रवाते
विवेको दीपो निर्वापित:
कथम् युगगतिम्
त्वरापूर्ण करिष्यति?8

स्त्री की ताकत की पहचान कराते हुए डॉ. अनीता मिश्रा लिखती हैं कि- हे नारियों ! जागो और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाओ।
जागर्ति तदा देशो जागर्ति यदा नारी, निद्राति तदा देशो निद्राति यदा नारी।
तावद् भवन्ति पुरुषा धीराश्च शूरवीरा, यावन्न तत्समक्षं समुदेति काऽपि नारी।।
पुरुषा: कठोररूपा: पाषाणतुल्यशुष्का:, स्तान् रसै: स्वकीयै: सरसान करोति नारी।
शीघ्रं हि पुरुषवर्ग: गृहणाति परस्य धर्मम्, म्रियते स्वधर्महेतो: ससुखं सदैव नारी।।9

नारी-समाज को उद्बोधन करती हुई कवयित्री कहती हैं कि– हे नारियों अपने अधिकारों के लिए जागो और अन्याय का प्रतिरोध करो। किसी के भरोसे मत बैठो। स्वयं में चेतना का संचार करो।
हे नार्यो ! जागृत देशोऽयं वाञ्छित नवजागरण।
भक्तिं त्यजत दर्शयत शक्तिं भक्त देशहितमरणम्।
दुष्ट वधाय समर्था दुर्गा नारी शक्ति समेता,
जागृत जागृत नार्यो देशे पुरुषो ढपोरनेता।।10

इसी प्रकार ‘नागरिका’ शीर्षक कविता में वह कहती हैं कि– सभी को अपने कर्तव्य पथ पर लगे रहना चाहिए।
स्वदेशे परम्परा: सदैव लालनीया:, देशस्य विधय: सर्वे पालनीया:।
द्रष्टाचारम् देशाद् दूरी करवाणि, कर्त्तव्यपालने सदा रता भवानि।
संस्कृता राष्ट्रभाषा भवेद् इयं प्रथमकारिका ! अहं स्वतन्त्रदेशस्य नागरिका!11

दहेज प्रथा पर अपनी कलम से चोट करती हुई डॉ. सिम्मी कन्धारी लिखती हैं-
तत: श्रोत्रृषु एका नारी उत्थाय ताम्
अध्यक्षा तत् कर्तव्यं स्मारयन्ती
अवोचत् –
भाषणं दत्वा गृहं गच्छतु
मारुतिं क्रीत्वा पुत्राय यच्छतु
यस्मात् स: यौतुकरूपेण –
प्राप्तया मारुत्या न भ्राम्येत्।।12

‘अग्निशिखा’ काव्य में नायिका अपने नायक से कहती है कि – तुम्हारा हृदय रेत के समान है, जिस पर लिखा कुछ भी बहुत देर तक नहीं रहता।
मम पाषणमये हृदिं लिखितं ललिततरं तव रूपमिदम्।
कोऽस्ति समर्थो भुवि कर्त्तुम् प्रस्तरालिखितं वितथाकारम्।
चिह्नमात्रमपि नाऽवशेषितं मृदुसिकतासमहृदये ते।।13

डॉ. सिम्मी कन्धारी ‘स्नेहक्रीडा’ कविता में लिखती हैं कि – किस प्रकार से कोई स्त्री किसी पुरुष के प्यार में अपना सब कुछ न्यौछावर कर देती है।
मे मन: त्वयि स्निह्याति
क्रीडा एषां दु:साध्यं हि-
यन्मे मन: पाशात् पराजय
स्वमेव हि बन्धनाति स्पृह्याति
मे मन: त्वयि स्निह्याति।।14

इस प्रकार हम देखते हैं कि, आज बहुत सारे कवि-कवयित्रियाँ स्त्री शोषण के विरुद्ध आवाज उठा रहे हैं। समाज में जितनी भी अच्छाई-बुराई उन्हें दिखती है वह उसे अपनी कलम से उतार दे रहा है। आज का रचनाकार यथार्थ लिखने से घबराता नहीं है, उसे समाज में जो जिस प्रकार नजर आ रहा है, उसी प्रकार लिख दे रहा है। इस नारीवाद के फलस्वरूप बहुत हद तक महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त हुए। लोगों के सोच-विचार में परिवर्तन हुए। अनेक अन्धविश्वासों और रुढियों का अन्त हुआ।

संदर्भ
[1] आधुनिक संस्कृत काव्य की परिक्रमा, डॉ. मंजुलता शर्मा, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 75  
[2] आधुनिक संस्कृत काव्य की परिक्रमा, डॉ. मंजुलता शर्मा, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 75 
[3] आधुनिक संस्कृत काव्य की परिक्रमा, डॉ. मंजुलता शर्मा, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 76
[4] आधुनिक संस्कृत काव्य की परिक्रमा, डॉ. मंजुलता शर्मा, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 76  
[5] आधुनिक संस्कृत काव्य की परिक्रमा, डॉ. मंजुलता शर्मा, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 76  
[6] आधुनिक संस्कृत काव्य की परिक्रमा, डॉ. मंजुलता शर्मा, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 77
[7] काव्याऽमृतम्, श्लोक संख्या 36
[8] काव्याऽमृतम्, श्लोक संख्या 59
[9] संस्कृत कवयित्रियों का व्यक्तित्त्व एवं कृतित्व, डॉ. कैलाशनाथ द्विवेदी, जनार्दन प्रकाशन,लखनऊ, प्रथम संस्करण 1997 ई.,पृष्ठ 225
[10] संस्कृत कवयित्रियों का व्यक्तित्त्व एवं कृतित्व, डॉ. कैलाशनाथ द्विवेदी, जनार्दन प्रकाशन,लखनऊ, प्रथम संस्करण 1997 ई.,पृष्ठ 225
[11] संस्कृत कवयित्रियों का व्यक्तित्त्व एवं कृतित्व, डॉ. कैलाशनाथ द्विवेदी, जनार्दन प्रकाशन,लखनऊ, प्रथम संस्करण 1997 ई., पृष्ठ 225 [12] कर्त्तव्यम्, पारिजातम् (पत्रिका), डॉ. सिम्मी कन्धारी, जून 1994 ई., पृष्ठ संख्या 21
[13] अग्निशिखा, डॉ. पुष्पा दीक्षित, पृष्ठ 52-53  
[14] आधुनिक संस्कृत कवयित्रियाँ, डॉ. अर्चना कुमारी दुबे, नवजीवन पब्लिकेशन, निवाई, राजस्थान, प्रथम संस्करण 2006 ई., पृष्ठ 267