मैं वफाओं के उपवन उगाता रहा - कविता

सुरेंद्र अरोड़ा

सुरेंद्र अरोड़ा 

मैं वफाओं के उपवन उगाता रहा
वो बेवफाई के ऊसर में भटकते रहे
मैं प्यार की धुन में गाता  रहा
वो नफरत की दलदल में उलझे रहे

मैं जिंदगी को हमदम बनाता रहा
वो मरघट की वीरानी  में  रोते रहे
मैं सपनो में उनसे कुछ कहता रहा
वो हकीकत से मुँह को छुपाते  रहे

मैं मंदिर में मूरत बिठाता रहा
वो मूरत को खण्डों में बदलते रहे
मैं पूजा की थाली सजाता रहा
वो थाली को छेदों से बुनते  रहे

मैं धुनों में स्वरों को पिरोता रहा
वो कर्कश धुनों पर थिरकते रहे
मैं तपिश को ठंडक बनाता रहा
वो बनके बादल  गरजते  रहे

मैं  कोयल के गीतों को गाता रहा
वो कोयल की कालिख से डरते रहे
मैं यादों में  उनकी डूबा रहा
वो यादो को हरदम  कुचलते रहे