एक कविता और एक टिप्पणी

इस अनियमित स्तम्भ में नवोत्पल के सम्पादक और कवि डॉ श्रीश पाठक किसी कविता पर एक संक्षिप्त टिप्पणी करते हैं, जिससे कविता का आनंद बढ़ जाये। आज की कवयित्री हैं, डॉ स्वाति गाडगिल - सम्पादक

स्वाति गाडगिल की कविता

स्वाति गाडगिल
किसी के इंतजा़र में आज,
इस तरह तनहा हैं हम...
कब दिन ढल गया और शाम हुई
बेखबर अनजान हैं हम...
दिलोजान यूँ ही लूटा बैठे,
उन साँसों की कशिश में...
हाय! होश हम गवाँ बैठे,
उन चंद लम्हों की तपिश में...
काश! वो समझ पाते,
इस मरीज़े इ़श्क की उलझन...
कभी सिसकियाँ सुनते,
तो कभी खामोश दिल की धड़कन...
दिल थाम के बैठे हैं,
इ़श्क की शहजा़दी हैं हम!
कहकशा पेश है सौगा़त में,
माहताब की महबूबा हैं हम!
कोई रहम नहीं माँगते,
नही कमजोर और बेबस हम.....
इ़श्क में तनहा जरूर हैं,
आपकी तबस्सुम हैं, दिलोजान है हम!

श्रीश पाठक की टिप्पणी

डॉ. श्रीश पाठक
कम शब्दों का कमाल का गीत है यह, जिसकी तासीर इक उम्दा ग़ज़ल की मानिंद है। शिल्प सहज है और गेय गुणों के साथ पंक्तिबद्ध है। इक जिंदादिल विषय जिसपर अमूमन हर संजीदे की कलम चलती है पर रौ इसमें कुछ को ही नसीब होती है। इश्क में होश किसे पसंद, उमर तमाम ऐसे ही जाया जाती हैं। वो दीवानापन इस कविता में शुरू से ही काबिज है। लम्हों की खता जिसकी सजा सदियों की मुकर्रर हो, ऐसी बेताबी बयाँ है हर हर्फ़ में। कवयित्री आगे उस अनकही उलझन को भी लिख जाती हैं जिसमें दर्द न कहा जाता है और ना ही छुपाया जाता है। दीदार की इक नजर पे वारे न्यारे हो जाते हैं और दीद हो जाने पर नजर महकने लग जाती है। इश्क में कुछ बाकी नहीं रहा निशां पर अभी भी बची है मुकम्मल अपनी चाहत और ये चाहत ही फिर फिर बख्शती है इश्क को बारहा एक उमड़ती शख्सियत, जो कभी मिटती नहीं, तारी होती जाती है जिंदा रूहों के जेहन पर।