सेतु सम्पादकीय

प्रिय मित्रों,

31 जुलाई सन् 1880 को हिंदी साहित्य की महान विभूति प्रेमचंद का जन्म हुआ था। एक शताब्दी से भी अधिक बीत जाने के बाद भी आज भी उनकी कथाएँ पढ़ी और सुनी जाती हैं। मेरा सौभाग्य है कि मैं पिछले एक दशक से इंटरनैट पर देवनागरी लिपि में उपलब्ध हिन्दी (उर्दू एवं अन्य रूप भी) की मौलिक व अनूदित कहानियों के ऑडियो बनाने से जुड़ा रहा हूँ। विभिन्न वाचकों द्वारा "सुनो कहानी" और "बोलती कहानियाँ" शृंखलाओं के अंतर्गत पढ़ी गई कहानियों में से अनेक कहानियाँ मुंशी प्रेमचंद की हैं। आप उनकी कालजयी रचनाओं को घर बैठे अपने कम्प्यूटर या चल उपकरणों पर सुन सकते हैं। गौरव की बात है कि प्रेमचंद की कुछ कहानियों की, हिन्दयुग्म द्वारा जारी, पहली ऑडियोबुक सीडी मेरे स्वर में बनी थी। प्रेमचन्द को कम्प्यूटर युग से जोड़ने का वह सरल प्रयोग हिंदी के डिजिटलीकरण के कई प्रकल्पों की प्रेरणा था जिनमें वर्धा का हिंदी समय भी शामिल है।

एक फ़रवरी 2010 को प्रेमचंद की कहानियों के एल्बम 'सुनो कहानी' के विमोचन कार्यक्रम में महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के तत्कालीन कुलपति और कथाकार विभूति नारायण राय ने प्रेमचंद के डिजिटल रूप की प्रशंसा करते हुये कहा था कि विश्वविद्यालय डिजिटलीकरण की ओर अग्रसर होकर हिन्दीसमय डॉट कॉम पर जल्द ही एक लाख साहित्यिक पृष्ठों को अपलोडिंग करके हिन्दी के बड़े समुदाय तक हिन्दी साहित्य की बातें पहुँचायेगा।

प्रेमचंद की कहानियों के ऑडियो आर्काइव.ओर्ग तथा रेडियो प्लेबैक इंडिया पर उपलब्ध हैं। प्रेमचंद के जन्मदिन के अवसर पर आइये एक बार ध्यान दें कि कोई लेखक कालजयी कैसे बनता है और कई रचनाएँ हमारे मन में किस प्रकार घर कर जाती हैं। प्रेमचंद का रचनाकर्म साहित्यकार के सामाजिक सरोकारों और राष्ट्र के प्रति उसकी ज़िम्मेदारियों का ध्यान दिलाता है।
जिस युग में उन्होंने लिखना आरंभ किया, उस समय हिंदी कथा-साहित्य जासूसी और तिलस्मी कौतूहली जगत में ही सीमित था। उसी बाल-सुलभ कुतूहल में प्रेमचंद उसे एक सर्व-सामान्य व्यापक धरातल पर ले आए।
~ महादेवी वर्मा
जहाँ इंटरनैट ने संसार को जोड़ा है वहीं इसके गैर-ज़िम्मेदार बाज़ारीकरण के कुछ दुरुपयोग भी सामने आये हैं। एक ताज़ा खबर के अनुसार एक ऑनलाइन सोशल मीडिया खेल में बच्चों को 50 चुनौतियाँ दी जाती हैं। इसकी अंतिम चुनौती को पूरा करने के लिये मुम्बई में एक चौदह वर्षीय बालक ने पाँचवीं मंज़िल से कूदकर जान दे दी। पढ़ने में आया है कि संसार भर में अब तक अनेक लोग, आत्महत्या की चुनौती वाले इस ऑनलाइन गेम के शिकार बन चुके हैं। समय आ चुका है कि ऑनलाइन गतिविधियों पर कड़ी नज़र रखी जाय और प्रशासन द्वारा इसके नियमितीकरण के गम्भीर प्रयास आरम्भ किये जाएँ। हम सब मिलकर इस संसार को एक सुरक्षित स्थल बना सकते हैं। हमारा चिंतन सदैव संसार की बेहतरी की दिशा में होना चाहिये।

अनेक दुष्प्रभावों के बावजूद सोशल मीडिया हमें एक दूसरे के निकट लाया है। कुछ वर्ष पहले मेरी ऐसी ही आकस्मिक भेंट सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट तथा माधुरी जैसी प्रसिद्ध पत्रिकाओं के प्रथम सम्पादक अरविंद कुमार से हुई थी। लम्बे समय से पत्रकारिता, सम्पादन तथा शब्दकोश सम्बन्धी कार्यों में अग्रणी रहे अरविंद जी से एक त्वरित साक्षात्कार इस अंक में प्रस्तुत है। मृदुभाषी अरविंद जी के कम शब्दों से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।

हिंदी साहित्य और पत्रकारिता के कुछ बड़े संकट जानकारी, तकनीक, प्रामाणिकता और विशेषज्ञता के अभाव के हैं। पिछले अंक में प्रसिद्ध साहित्यकार विवेक मिश्र से हमने इस विषय पर भी जानकारी ली थी और अब अरविंद जी के साथ भी प्रामाणिकता पर बात की है। आशा है हिंदी में प्रामाणिकता लाना हिंदी स्थिति को बेहतर बनायेगा।

इस बीच सेतु के अंग्रेज़ी संस्करण के सम्पादक और अंतरराष्ट्रीय ख्याति के लेखक डॉ. सुनील शर्मा की अठारहवीं पुस्तक 'Aesthetic Negotiations' को सेतु प्रकाशन की पहली पुस्तक बनने का गौरव प्राप्त हुआ है। यह पुस्तक एमेज़ोन अमेरिका तथा एमेज़ॉन भारत पर उपलब्ध है।

भारत के कुछ क्षेत्र बाढ़ की विभीषिका से जूझ रहे हैं। पानी की ताकत को कम मत आँकिये। बहते जल की सतह पर वाहन चलाते समय रबर के पहिये अक्सर ज़मीन पर अपनी पकड़ छोड़कर सतह से कुछ मिलीमीटर ऊपर उठ जाते हैं। अंग्रेज़ी में इस घटना को हाइड्रोप्लेनिंग कहते हैं। यह मामूली सा विस्थापन भारी से भारी वाहन को पल भर में आसानी से बहा देने के लिये काफ़ी है। जानकारी न होने और अति-आत्मविश्वास के कारण बीते समय में हाइड्रोप्लेनिंग की घटनाओं में कई नौजवानों की जानें जा चुकी हैं। कृपया ऐसे खतरों के प्रति चेतना जागृत करें और दुर्घटना से बचें।

अनुराग शर्मा
साथ ही वर्षाऋतु का यह समय नए पौधों के लिये सर्वथा अनुकूल है। जहाँ तक सम्भव हो, सबकी सुरक्षा का ध्यान रखते हुए, बीजों, गुठलियों तथा नर्सरी की पौधों द्वारा नई पौध लगाने के शुभकार्य से जुड़ें।

आज स्वतंत्रता सेनानी ऊधमसिंह उर्फ़ सरदार शेरसिंह की पुण्यतिथि भी है। ब्रिटेन जाकर जालियाँवाला हत्याकाण्ड का आदेश देनेवाले ब्रिटिश अधिकारी से बदला लेने वाले ऊधमसिंह को 31 जुलाई 1940 को पेण्टनविल जेल में फांसी दे दी गयी थी। आज स्वतंत्र वातावरण में साँस लेने लेने वाले हम लोग ऊधमसिंह जैसे हुतात्माओं की दृढ़ इच्छाशक्ति के ऋणी हैं, उन्हें नमन।

पिछले मास जारी हुए सेतु वार्षिकांक की अपूर्व सफलता के लिये आप सबका आभार। संसाधनों की सीमा के बावजूद इस अंक में भी सेतु की गुणवत्ता को बनाये रखने का प्रयास जारी है। आशा है आपको पसंद आयेगा। आपकी राय, मौलिक व अप्रकाशित उत्कृष्ट रचनाओं, और सुझावों का स्वागत है। रचनाएँ भेजने से पहले कृपया लेखकों से निवेदन अवश्य पढ़ें।

शेष शुभ!

अनुराग शर्मा
सेतु, पिट्सबर्ग

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