सामंतशाही टापों की भयावह आहट से लहूलुहान स्त्री जीवन का सच

कृष्णा सोबती का उपन्यास ‘डार से बिछुड़ी’ एक मूल्यांकन
‘साडा चिड़ियाँ दा चंबा नी ,बाबल असां उड्ड जाना’ 
यह एक पंजाबी लोक गीत की पंक्ति है जिसमें स्त्री जीवन को लोक में रेखांकित करते हुये एक सच प्रदर्शित किया गया है, एक बर्दाश्त कर लेने वाला सच। यह सच अपने आगे की राह भी दिखाता है लेकिन कुछ-कुछ चुप होते हुये भी, आगे का अंदाजा लगाया जा सकता है। लोकगीतों का अपना समाजशास्त्र है जो कि बहुत व्यापक अध्ययन की मांग करता है। यथार्थ को इतना कटु सत्य के रूप में ही वहाँ जगह मिलती है, जितने से मर्माहत हृदय उसे सहन कर जाए। शादी-विवाह के समय गाये जाने वाले गीत भी स्त्री-पक्ष के अलग होते हैं और पुरुष-पक्ष के अलग।

स्त्री-पक्ष के लोकगीतों में स्त्री की सामाजिक संरचना एक बेहद दुखद घटना के रूप में दिखाई देती है। इस गीत में भी अनब्याही लड़कियां अपनी दशा के दंश को उकेरती हैं। कि हम तो चिड़ियों की चंबा हैं जिन्हें आखिरकार बाबुल के घर से उड़ जाना ही है। यह उड़ जाना महज़ उड़ जाना नहीं, इस उड़जाने में दुखों की आर्त नांद सुनाई दे जाती है। एक पुरुषवादी सामंतशाही व्यवस्था में लड़की का उड़ना आखिर क्या कहता है, क्या जिस घर में वह पैदा हुई उस घर से उड़ना या उसे छोड़ना क्या नियति है?, कानून है? क्या है यह? किस हित में है। अपने ही घर से बिदा होती लड़की दहाड़े मार कर रोती है, यह हस्तांतरण है, एक सत्ता से दूसरी जटिल सत्ता को और स्त्री सिर्फ एक वस्तु भर है। ‘चिड़ियों का चंबा’ शीर्षक से ही पंजाब की धरती के कवि पाश एक बहुत ही महत्वपूर्ण कविता लिखते हैं-
“चिड़ियों का चंबा उड़कर कहीं नहीं जाएगा 
ऐसे ही कहीं इधर-उधर बांधों में घास खोदेगा 
रूखी मिस्सी रोटियाँ ढोएगा 
और मैली चुनरियाँ भिगोकर 
लूओं से झुलसे चेहरों पर फिराएगा 

चिड़ियों का चंबा उड़कर कहीं नहीं जाएगा 
यों ही कहीं इधर-उधर छिपकर 
अकेला-अकेला रोया करेगा शापित यौवन के मरसिए गाया करेगा ” 
पाश ने सामंती जटिलता में जकड़ी व्यवस्था के गिर्द एक सच को विस्तार दिया है। यह कविता लोकगीत के समय को उसके समाज में खोलती है और आज के सच को कहती है। कहीं कोई परिवर्तन अगर दिखता है तो वह चेतना का परिवर्तन है, परिस्थितियाँ बदलीं हैं लेकिन सामंती मिजाज पूंजीवादी संरचना में गहरे तक पैठ चुका है। यह लोकगीत और उसकी संरचना को खोलती पाश की यह कविता कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘डार से बिछुड़ी’ की भूमिका भी है और निष्कर्ष भी।

डार से बिछुड़ी उपन्यास एक ऐसी कृति है जो सामंती समाज की संरचना को खोलती है और स्त्री की दशा का उस समाज में गंभीर रेखांकन करती है। सामंतशाही जिन मूल्यों का व्यापार समाज में करती, उनका स्थितिजन्य उद्भव पुरुषवादी मानसिकता का चरम है। इससे ‘मान’ और ‘मर्यादा’ की अवधारणा पौरुष का परुष ढांचा लिए उपस्थित दिखता है। जातीय कट्टरता अपने चरमराए अभिमान से घायल हो अपने अधीन स्त्री पर कहर ढाता है। यह मानसिक ग्रंथि है लेकिन यह सांस्कृतिक आवरणों का पुनीत सहारा ले समाज में पवित्र और सुरक्षित जगह बना लेती है। इस उपन्यास में हम लगातार देखते हैं कि मनुष्य किस तरह कुंठा का निर्माण करता है और निर्मित कुंठा फिर किस तरह मर्यादा का सहारा ले पतित की कठोरता को विस्तार देती है जो मूल्य मान लिए जाते हैं। इसमें एक कहानी है जो एक स्त्री की है। यह एक स्त्री नहीं भारत की स्त्री है। जब यह स्त्री की कहानी है तो यह महज़ नहीं मान लेना चाहिए कि इसमें पुरुष की कहानी नहीं होगी। कहानी यह ध्वनित करती हुई आगे बढ़ती है।  कहानी जैसे ही शुरू होती है एक महत्वपूर्ण उधेद्बुन सामने आ खड़ी होती है। कहानी मन के विचारों में उठती है-“जिएँ ! जागें ! सब जिएँ जागें !  
अच्छे, बुरे, अपने, पराए- जो भी मेरे कुछ लगते थे सब जिएँ !

घड़ी भर पहले चाहती थी कि कहूँ सब मर-खप जाएँ। न कोई जिए न जागे। मैं मरूँ तो सबको ले मरूँ!इस अभागी के ही जीने के लेख बिसर गए तो कोई और क्यों जिये? क्यों जागे?
कृष्णा सोबती 
पर कौन होती थी मैं अपने दुर्भाग्य से हरी-भरी झोलियों को जला देनेवाली! कौन होती थी मैं दूध भरी झोलियों को सुखा देनेवाली!कौन होती थी मैं भरी-भराई, लाड़-सनी झोलियों को दहला देने वाल!”  समाज में दुखतम जीवन के पराजित जीवनचक्र को निर्वहन कर स्त्री के सामने यही तीन विकल्प हैं जो विकल्प कम निष्कर्ष अधिक हैं। इन्हें प्रताड़ित मनः अवस्था के रूप में देखा जा सकता है। यह तीनों स्थितियाँ वह अलग-अलग भी जीती है और एक-साथ भी। समाज और जगत में जीना और जगाना मौलिक अधिकार है लेकिन इस जीने और जगाने में ऐसा क्या होता है कि उसी में एक वर्गीय विभेद खड़ा होता है जो दूसरे वर्ग पर जीने और जागने पर अपनी अधिकारिकता जताता है। कौन होता है यह अधिकार जताने वाला, उत्तर स्पष्ट है। जब कि वह घड़ी भर पहले सोचती थी सब मर-खप जाएँ , मैं मरूँ तो सबको साथ ले मरूँ। यहाँ एक अधिकार प्राप्त करने और खोने के बीच क्या फर्क होता है, दिखता है। इन सबके बीच एक नागरिक आवाज आती है मैं कौन होती हूँ  हरी भरी झोलियों जला देने वाली ? दूध भरी झोलियों को सूखा देने वाली ? लाड़ सनी झोलियों को दहला देने वाली ? यह सभ्यता के महानतम सवाल है जिनसे मनुष्यता का निर्माण होता है। यह सवाल पाशो खुद से कर रही है, व्यवस्था की जटिलता में मर्यादा के पहाड़ों पर पशुवत पराकाष्ठा में पिसी पाशो, जहां उसकी व्यवस्था नहीं वह विस्थापन में दासी है, जिसकी जटिलता में उसके यौवन को बेदर्दी से और बेशर्मी से पेरा जाता है, जहां वह सदैव डरी और बंधी रहे मर्यादा की जंजीरे इसी निममित्त श्रजित की गई है, जहां झूठ और ढोंग और कट्टरता के पहाड़ निर्मित किए गए हैं। इन पहाड़ो ने इस महादेश की स्त्री को बहुत छला है। पाशो इस महादेश की एक अविरल कथा जो धारावाहिक नियति सी बनी हुई है क्योंकि व्यवस्था पुरुष की प्रभुसत्ता अपने मुखौटे बदलता है तो लोग परिवर्तन की आस्था में एक कदम जी लेने को तैयार हो जाते हैं।

शैलेन्द्र कुमार शुक्ल
भारत का सांस्कृतिक ढाँचा पुरुषवादी मानसिकता से निर्मित एक जटिलता लिए हुये है। यहाँ जटिलता कोई गंभीर उपक्रम के रूप में नहीं बल्कि नितांत समझौता परस्ती के सिद्धांतों से निर्मित हुआ है। ये समझौता पुरुषत्व की एकाधिकारिणी शक्ति की सबलता में अपराधी कट्टरता को प्रश्रय देते हुये छूट के देवत्व के रूप में पनपा जहाँ धार्मिकता को आए दिन नए-नए  आवरणों  में ढका जाता रहा। जातीय श्रेष्ठता को इसमें खुली छूट मिली, इसीलिए ये देखा जा सकता कि बड़ी जतियों मेें स्त्री पराधीनता की जटिलता अधिक है, वहाँ पुरुष स्त्री के प्रति ज्यादा क्रूर है, वहाँ धार्मिक वितंडातवाद अधिक है, वहाँ शोषण के पैमाने बहुत बारीक हैं। ‘डार से बिछुड़ी’ उपन्यास में यह लगातार महसूस होता रहता है, हालांकि लेखिका इस मामले में ज्यादा संजीदा नहीं दिखती वह कहानी को कहानी के भरोशे छोड़ आगे बढ़ती दिखती है, कहानी उसे जहां ले जाए चलती जाएगी। लेखिका किताब की भूमिका में इसे स्वीकार भी करती है –“ ‘डार से बिछुड़ी’ का सहज सीधा-सादा पाठ है बिना किसी शिल्प के सहारे स्वयं ही अपने समय के सूत्र गूँथता गया और मेरे बाहर के कथ्य को कहानी की आंतरिकता की ओर मोड़ ले गया। मुझे इस दबाव का एहसास तक न हुआ। इतना ही लगा कि मैं इसे प्रस्तुत करने के निमित्त हूँ।”  कहानी पढ़ते हुये यह लगातार लगता रहता है कि लेखिका जल्दी में है। यह जल्दबाज़ी खटकती है लेकिन भाषा की स्थानीयता उसे बहुत कुछ बचा लेती है, यहाँ तक कि लेखिका से कथा की भाषा बहुत कुछ कहला लेती है, यही इस कहानी का केंद्रीय प्राणत्व है, कम से कम शिल्प के संदर्भ में। सामान्य दृष्टि से देखें तो कहानी अपने साथ पाठक को बांधने में सफल है लेकिन यह बांधने की प्रवृत्ति उद्देश्यत्मक होनी चाहिए जिसमें परिवेश का सच अपने यथार्थ के साथ बोलता हो, घटनाओं की जादूगिरी कहानी का ध्यान भटका कर उसे यथार्थ से दबा देती है। इस छोटी सी कृति में घटनाओं का एक अंबार है। जैसे कुछ विंदु देखें -1.पाशो का नानी के घर में तरुणकाल और मामा मामी से प्रताड़ित होने की घटना, सर फटना, करीम को रूमाल देने की झूठी अफवाह पर पिटाई और दिन भर कोठारी में बंद अकेले बंद कर देने की प्रताड़णा, जोड़ मेले में पाशो को ठिकाने लगाने की साजिशपूर्ण घटना, पाशो का सख्त पहरेदारी के बावजूद जान बचाने के लिए देर रात घर के भाग निकलेने की भयावह घटना, शेखों की हवेली में आश्रय मिलने की घटना जहां उसकी खत्राणी जाति माँ शेख की पत्नी केरूप में रहती है, (जब की पाशो की माँ की क्या कथा है इस कहानी से घनीभूत जुड़ती है लेकिन इतना बता कर आगे नहीं बढ़ती)। 2. शेख के घर से पाशो बूढ़े दीवान के यहाँ जबर्दस्ती भेजी जाती है, फिर एक बच्चा पैदा होता है और कुछ दिन बितते ही दीवान की मृत्यु, दीवान के मरते ही घर का मालिक बरकत बन बैठता है और पाशो को उसकी रखैल बनने पर मजबूर होती है। 3. एक बड़ी घटना फिर घटित होती है पाशो को बरकत बूढ़े लाला को बेच देता है, पाशो अपने बच्चे से अलग थलग लाला के अधेड़ मझले लड़के की हवस का शिकार बनती है और दिन भर घर का काम करती। 4. एक और घटना है जहां स्वतन्त्रता संघर्ष में अंग्रेजों के विरुद्ध देशी सामंत लड़ रहे हैं, मझले भी किसी सामंत की तरफ से लड़ रहा है, मझले एक दिन पाशो को छवानी उठा लाता है उसे भोगने के लिए, एकदिन लड़ाई में गया मझले वहाँ मारा जाता है, वह अकेली वहाँ से भागती है महिलाओं के झुंड में उसे पता नहीं कहाँ जाना है, उसे कोई राजा का लड़का बेहोशी की हालत में उठा ले जाता है, वह उसे बहन मानता है, 5.एक अंतिम घटना वह रजवाड़ा भी अंग्रेज़ो से युद्ध करते हुये मारा जाता है, रियासत की औरते अंग्रेजों की अदालत में तलब होती हैं, जहां अचानक पाशो अपनी जीवन में मिली और बिछुड़ी औरतों मौशी माँ, शेख, अपने बच्चे, से मिल जाती है। यह मिलना कोई मिलना नहीं है और इस मिलने का को मकसद भी नहीं दिखता। उपन्यास का अंत सुखात्मक बनाने की एक असफल कोशिश भर लगता है। 

इतनी लंबी कहानी और ढेरों-ढेर घटनाएँ और उन घटनाओं के बीच सिमटे परिवेश को अगर सामाजिकता का महीन शिल्प दिया जाता तो यह उपन्यास काफी बड़ा और ज्यादा दिलचस्प होता। प्लाट की भूमि बहुत विस्तृत है लेकिन लेखिका के सामाजिक सरोकार और उसके लेखकीय उद्देश्य उसे समेटते नजर आते हैं। इसमें संवाद के माध्यम से जो आया है वह अपने समय की समस्याओं के रूप में जरूर टकराता है और यही इस उपन्यास की मजबूती है। अमेरिकी आलोचक रेने वेलक और आस्टिन वारेन (Rene Wellek and Austin Warren) ने अपनी मशहूर कृति साहित्य सिद्धान्त  (Theory of litereture) में गंभीर चिंतन कराते हुये इस बात पर ज़ोर दिया है कि उपन्यास को गंभीरता से विश्लेषित करने किए किन चीजों पर ज़ोर देना आवश्यक है। वह लिखते हैं-“जब हम उपन्यास की जीवन से तुलना करने का प्रयास करें या किसी उपन्यासकार की कृति को नैतिक या सामाजिक दृष्टि से परखने चलें तो हमें उपन्यासकार के संसार के संसार या सृष्टि की – इस प्रतिरूप या संरचना या सजीव पिंड की जिसमे कथानक, चरित्र, माहौल, विश्वदृष्टि और “टोन” आते हैं- छानबीन ही करनी चाहिए, जीवन या ‘यथार्थ’के अनुरूप होने की परख इस या उस ब्योरे की तथ्यपरक युक्तियुक्तता से वैसी ही नहीं की जा सकती जैसे नैतिक परख इस आधार पर नहीं की जा सकती कि किसी उपन्यास में यह या वह यौन या निन्दात्मक शब्द हैं या नहीं,जैसे बोस्टन सेंसर किया करता है। अधिक स्वस्थ दृष्टि है पूरे गल्प-जगत की हमारे अनुभव और कल्पना के जगत से तुलना जो कि उपन्यासकार के जगत से कम संघटित होता है।”   इन विद्वानों ने जिन तथ्यों पर ज़ोर दिया है कथानक, चरित्र, माहौल, विश्वदृष्टि और टोन। टोन यहाँ सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बिन्दु है और यही “टोन” इस उपन्यास को एक अलग पहचान देती है। यह टोन ही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। यह टोन दरअसल उपन्यासकार के अनुभव और कल्पना की सबसे श्रेष्ठतम अभिव्यक्ति बन कर सामने आती है। पंजाब के स्थानीय भाषिक संरचना इसके उपन्यासिक परिवेश याने माहौल को जीवनतता की शक्ति से व्यापक कर देती है। इस भाषिक संरचना में उस समाज की पुरुषवर्चस्व में जड़वत संस्कृति का एक सटीक रूप दिखता है। कुछ संवाद के सूत्र इस उपन्यास से देखिये और स्थानीयता सामंतीपन की जटिलता देखिये-

“तंदूर लगाने को क्या यही चुड़ैल रह गई है ? इसे बर्तन-भाड़े दिया करो मलने को... ” 

“अरी मरन जोगी, कल आती मौत तुझे आज आ जाए ! जा बेटा काम-धंधे लग, मैं इस नासहोनी को संभालती हूँ।” 

“बहू, जहान खड़ा सुनता है। इस डूबजानी को कोठारी में डाल” 

“पाशो, मामू का कहा-किया बुरा मानने लगी? घर के खसम ने कुछ कह ही दिया तो जी को लगा बैठी ?”    

“इन दिनों इस इस ठठरी का ध्यान न दिया कर ! कहीं लड़की ही आई तो मालन, मुझसे बुरा कोई न होगा ! माँ-बेटी दोनों को तबेले डाल आऊँगी। समझी !” 
“बहाना, शेखों का लड़का हूँ तो क्या, माँ तो खत्राणी है !” 
“भागभरी, खरी बात कहता हूँ । सीधी रह चलेगी तो भला! तीन-तीन पहरू हैं; भूल कर भी ड्योढ़ी से बाहर पाँव न रखना! समझ रख बीबी, बरकते को घड़ा भर मोहरें दी हैं, तू अब इस घर की दात!”   
“बस कर दीवानों की, अब बस कर! इस मुह जितना पड़ेगा उतना ही इन बाहों से कहर बरसेगा।”   
“नानी ठीक कहती थी – सँभलकर री, एक बार का थिरका पाँव ज़िंदगानी धूल में मिला देगा!”  

इन उद्धरणों से से यह अंदाजा लगाया जा सकता कि जिस परिवेश में ऐसे संवाद हैं उस समाज की दशा-और दिशा क्या होगी। यह स्थानीय भाषा में संवादवादिता के बीच झलकते कहर में स्त्री-पराधीनता को समाजशास्त्रीय दृष्टि में देखा जा सकता। इससे हमारे समाज की संरचना में घुलेमिले कट्टर पुंशवादी स्वभाव के बारे में पता चलता है। हमार समय किस अड़ियल समाज से दर्शन और राजनीति लेकर यहाँ तक पहुंचा है, इससे साफ झलकता है। सामंती मूल्य अपनी जातीय संरचना से मनुष्य की प्रगतिशीलता में सबसे ज्यादा बाधक और कट्टर बने हुये हैं। उन कुछ मूल्यों का स्ट्रक्चर आज भले ही गुणकारी दिखे लेकिन उनकी सर्जना में इतिहास की पुरुषवादी साजिश ही होगी। इस उपन्यास में भी प्रेम दिखाई दे जाता है, उससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता। लेकिन प्रेम के सारे स्रोत पुरुषत्व की कट्टरता से निकलते दिखाई देंगे। भारत की समाज व्यवस्था का समाजशास्त्रीय मूल्यांकन करने के लिए इन उपन्यासों का विश्लेषण होना चाहिए। स्त्री के प्रति ऐसा समाज कैसे आकार में साम्राज्यवादी पाँव पसारता गया इसे देखा जा सकता है।

इस उपन्यास के उद्भव में भारत की कट्टर जातीय संरचना की समस्या उभर कर सामने आती है, हिंदू और मुस्लिम धार्मिक जातीयता शेख और खत्री के बीच स्त्री एक वस्तु के रूप में, एक मरजाद के रूप में दिखती है। इसे लेखिका देशी रजवाड़ों से अंग्रेज़ो की लड़ाई तक दिखाती है  जिसमे स्त्री  बद-से-बदतर हालात में दिखाई पड़ती है। इस उपन्यास के बारे में लिखते हुये राजेन्द्र यादव कहते हैं-“पाशो माने व्यक्ति नहीं, चीज है,पशु है-जिसे जो मन हो उठाकर ले जाए, जहां है वहाँ उसका घर संभाले, बिस्तर गर्म करे और वंश चलाने के लिए संतान दे... और पाशो है कि पिछले को छती से चिपकाए जहां है वहाँ की खैर मानाती रहे, मर्दों की हलचल भरी जिंदगी को अपनी नस-नस में जीती रहे...चाहे वह दीवान जी की मौत हो या ख़ालसों की अंग्रेजों से लड़ाई की बजती तुरहियाँ...उसे तो बांदी, बीबी या बहन कुछ भी बन कर रहना है और कभी भी जन बचाने के लिए पशु की तरह इस घर से उस घर भागना है या खरीदी-बेची-छीनी जाकर एक से दूसरे को सौपे जाना है।”   पाशो इस भारतीय समाज का एक चरित्र है, वह भारतीय अस्मिता के संक्रामणकाल में पिसती हुई सबसे संवेदनशील कोमलता है, जिसे मनुष्यता की आधिकारिक ज़िंदगी मुहाल है, वह संवृद्ध विराटता और मर्यादित ठिकानों पर सबसे ज्यादा ठगी हुई प्रजाति है। 

निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि कृष्णा सोबती की यह कृति स्त्री अस्मिता की चिंता करने के लिए एक बौद्धिक वर्ग में चेतना पैदा करती है। यह चिंता करना कोई छोटा काम नहीं, भारत जैसे महादेश में यह एक महानतम कमजोरियों में सामील है। पाशो यहाँ स्त्री जीवन की विपदा-सम्पन्न प्रतिनिधि है जिसे मनुष्यता के दर्जे की आज भी दरकार है। कहानी के माध्यम से लेखिका ने सचेत भाव से अपनी संवेदनशीलता का एक प्रतिबिंब यहाँ प्रस्तुत किया है। कहानी कहने की भाषा अपनी सम्पूर्ण सफलता लिए हुये। यह भाषा इस उपन्यास में प्राण फूँकती है जो क्रूरता और कट्टरता को पिघलने का भी काम करती है। यह उपन्यास सामंतशाही टापों की भयावह आहट से लहूलुहान स्त्री जीवन का सच कहने में काफी हद तक सफल हुई है।

संदर्भ-
  1. चमनलाल.(2013). सम्पूर्ण कविताएं: पाश. हरियाणा, आधार प्रकाशन. 147 
  2. सोबती,कृष्णा.(2008).डार से बिछुड़ी.दिल्ली.राजकमल प्रकाशन.पृष्ठ.15 
  3. वही, पृष्ठ 7 
  4. रेने वेलेल और आस्टिन वारेन.(2012).साहित्य सिद्धान्त.इलाहाबाद.लोकभारती प्रकाशन.पृष्ठ.280 
  5. सोबती, कृष्णा. (2008). डार से बिछुड़ी.दिल्ली.राजकमल प्रकाशन. पृष्ठ.17 
  6. वही, पृष्ठ 22 
  7. वही, पृष्ठ 24 
  8. वही, पृष्ठ 26 
  9. वही, पृष्ठ 49 
  10. वही, पृष्ठ 59 
  11. वही, पृष्ठ 82 
  12. वही, पृष्ठ 84 
  13. वही, पृष्ठ 91 
  14. यादव, राजेन्द्र (2001). आदमी की निगाह में औरत, नई दिल्ली, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 128

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