सम्पादकीय: एक इतिहास से साक्षात्कार

एक राष्ट्र के रूप में भारत की पहचान प्राचीन है। लेकिन भारतीय संस्कृति पुनर्जजन्म में विश्वास रखती है। सत्तर साल पहले 15 अगस्त 1947 को एक राष्ट्र का पुनर्जन्म हुआ। भारत स्वतंत्र हुआ लेकिन उसके पहले ही धार्मिक आधार पर भारत का विभाजन करके पाकिस्तान का निर्माण कर दिया गया था। बँटवारे के फलस्वरूप देश के विभिन्न भागों, विशेषकर वर्तमान सीमाओं व उनके पार के क्षेत्रों में नृशंस दंगे हुए। जिन्होंने विभाजन में अपना घर-परिवार, मित्र-परिजन और सबसे बढ़कर, अपना विश्वास खोया है उनके घाव सात दशक बाद आज भी टीस देते हैं।

सेतु के अगस्त अंक में जहाँ प्रसिद्ध साहित्यकार देवी नागरानी ने विभाजन और उससे उपजे पलायन के दंश पर दृष्टिपात किया है वहीं सेतु के अंग्रेज़ी सम्पादक सुनील शर्मा के अनुरोध पर डॉ. स्वाति गाडगिल ने कुछ वरिष्ठ नागरिकों से स्वतंत्रता की याद पर बातचीत की है। इस अंक में हम उस बातचीत के विडियो आपसे साझा कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त सेतु के इस अंक में अभिमन्यु अनत की कविता अनजान आप्रवासी 'गिरमिटिया' के कारुणिक गीत का विडियो भी है जिसकी रोचक कहानी आगे है।
 
इस महीने आप्रवासी साहित्य सृजन सम्मान के कार्यक्रम में भाग लेने के लिये मैं मॉरीशस के महात्मा गांधी संस्थान में गया था जहाँ मित्र विनय गुदारी के साथ आप्रवासी हिंदी साहित्य के आधार स्तम्भ अभिमन्यु अनत के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पहाड़ी रास्ते से पोर्ट-लुई और उत्तर प्रांत के दृश्यों का आनंद लेते हुए हम अभिमन्यु अनत के गाँव त्रियोले पहुँचे। उनके घर पहुँच कर मैं अवाक रह गया क्योंकि घर की नामपट्टिका हिंदी में लगी हुई थी, 'सम्वादिता'।

आप्रवासी घाट
अल्पभाषी और कृशकाय अभिमन्यु जी शॉर्ट्स में थे। लाइलाज बीमारी के आगे नत-मस्तक न होने वाले 'अनत' ने सौम्य मुस्कान से हिन्दी में कुछ ऐसे हमारा स्वागत किया जैसे वर्षों की पहचान हो। बेशक मैंने किशोरावस्था में ही उन्हें पढ़ लिया था, इस नाते उनसे मेरी पहचान दशकों पुरानी थी। हम लोगों ने चाय के एक-एक प्याले के साथ कुछ देर बातचीत की। जब मैंने उन्हें अमेरिका आने का निमंत्रण दिया तो उन्होंने हिंदी में, "अवश्य आयेंगे" कहा और हम रुखसत हुए।

अगले दिन महात्मा गांधी संस्थान के कार्यक्रम के बीच में इन्हीं अनत जी की कविता 'अनजान आप्रवासी' के गीत रूपांतरण का गायन हुआ। गिरमिटिया, एंगाजी, कुली, इंडेंचर्ड लेबर, शर्तबंदी ग़ुलाम, या अनुबंधित दास के नाम से पुकारे गये 462,000 आप्रवासियों को मॉरिशस लाने वाला तट आज आप्रवासी घाट के नाम से वैश्विक धरोहर के रूप में संरक्षित है। संयोग यह भी है कि यह वर्ष 2017 गिरमिटिया प्रथा के अंत का शताब्दी वर्ष है। अनत जी की छोटी सी कविता 'अनजान आप्रवासी' दशकों के अत्याचार को उघाड़कर सामने रख देती है। मेरी मॉरिशस यात्रा ने, भारत से वहाँ आये गिरिमिटियों की सक्षम और सहृदय संतानों ने, मेरे मन में यह विश्वास दृढ़ किया कि भारतीयता की आत्मा को कोई बल कभी मिटा नहीं सकता।

गिरमिटिया प्रथा का अंत करने के लिये सबसे प्रबल शस्त्र था, फ़ीजी देश में 25 वर्ष बिताने वाले तोताराम सनाढ्य की आत्मकथा। सेतु के इस अंक में हमने इस आत्मकथा का एक अंश आपके लिये प्रस्तुत किया है। आशा है हम अपने पूर्वजों के संघर्ष को, उनके सामने आई कठिन परिस्थितियों को सही परिप्रेक्ष्य में देख सकेंगे।

इस अंक में अन्य कविताओं के साथ-साथ नीलम सक्सेना चंद्रा के सौजन्य से आठ कवयित्रियों की रचनाएँ भी उपस्थित हैं। कथा, आलेख, यात्रा-वृत्तांत, अनुवाद, और स्थाई स्तम्भों के साथ इस अंक का एक आकर्षण मैत्रेयी पुष्पा का साक्षात्कार भी है।

सेतु में आपकी रचनाओं का स्वागत है। यदि आप रचना भेजने के इच्छुक हैं तो कृपया लेखकों से निवेदन पढ़कर नियमों से स्वीकृति का संदेश भी रचना के साथ अवश्य भेजें।

शुभकामनाएँ! अमर हो स्वतंत्रता! जय हे!

अनुराग शर्मा


सेतु, पिट्सबर्ग

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