साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा से साक्षात्कार: अनुराग शर्मा

प्रख्यात साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा से अनुराग शर्मा की वार्ता
मैत्रेयी पुष्पा
हिंदी के अग्रणी साहित्यकारों में शुमार, मैत्रेयी पुष्पा, हिन्दी अकादमी (कला, संस्कृति एवं भाषा विभाग, दिल्ली सरकार), दिल्ली की उपाध्यक्ष भी हैं। सेतु के अगस्त अंक के लिये उनसे अनुराग शर्मा की वार्ता


अनुराग: आप मुख्यतः एक कहानीकार हैं, क्या आप अन्य विधाओं में भी लिखती हैं?

मैत्रेयी: ज़्यादातर साहित्यकार शुरुआत में कविता लिखते हैं, मैंने भी लिखी। तीसरी कक्षा से ही मुझे कविताएँ अच्छी लगती थीं। हमारी बालपोथी में थीं। कविता गेय होने के कारण जल्दी असर करती है, बच्चे भी उसे गाने लगते हैं। इसलिये रचनात्मक प्रवृत्ति के लोग अक्सर पहले कविता लिखते हैं।

जब मैं ग्यारहवीं कक्षा में थी, तब एक लड़के ने मुझे एक पत्र लिखा। यह पत्र कविता में था, खूबसूरत प्रेमपत्र। 14-15 साल की आयु थी, मुझे अच्छा भी लगा और मैं घबरा भी गई। कई बार पढ़ा। पहली बार मन में यह बात भी आई कि वह लड़का लिख सकता है तो मैं भी लिख सकती हूँ। लिख-लिखकर मैंने कविता लिखने की आदत डाली, और उसे सुधारा। कॉलेज में कविताएँ लिखीं, लेकिन वे साहित्य पटल में नहीं आईं। हिंदी में मेडल भी लिये।

फिर विवाह हुआ - अरेंज्ड मैरिज। जीवन ऐसा था जिसमें विवाह, जैसे एक आवश्यकता हो। एक घर मिलेगा, एक छत मिलेगी। डॉक्टर से शादी की हैसियत नहीं थी। लेकिन हुुई, शादी के बाद जीवन गृहिणी का हुआ। शादी के बाद जब जीवन पलटता है तब साहित्य संस्कृति सब दब गये। साहित्य का बीज दब गया। मेरे शिक्षकों को मुझसे बहुत आशा थी, लेकिन इस नये जीवन में मैं अपनी पहले की लिखी कविताएँ भी भूल गई।

बीज की प्रवृत्ति है कि वह उग आता है। पानी देने से ठूंठ भी जीवित हो जाते हैं, उनमें पत्ते आ जाते हैं। वैसे ही हमारी मनुष्यगत रचनात्मकता है। बच्चे बड़े हुए। उनके बड़े होने के बहुत दिन बाद मुझे लगा कि मैं लिखूँ। लिखना शुरू किया तो सोचा कि मैं कविताएँ लिख तो लूँगी लेकिन हो सकता है कि वह बात न बने, मैं उस लड़के जैसी न लिख पाऊँ। तब मुझे उसके बारे में कुछ पता भी नहीं था। मैंने गद्य में लिखने के बारे में सोचा और अपने आसपास की कहानियाँ उठाईं। जो कुछ मेरे बिल्कुल आसपास थीं, महसूस की, देखीं। जो मेरे करीबी लोगों के साथ घटित हुईं।

वहाँ क्या था? क्या हुआ? जिसे सबने घृणा से देखा, पूरे गाँव ने अपराधिनी माना, मैं उसके पक्ष में क्यों थी? मेरी सम्वेदना और सहानुभूति क्यों रही? मैं बार-बार उसके पास क्यों जाती थी? ... जब आप सबसे अलग हटकर सोचते हैं तो उसमें ज़रूर आपके भीतर का लेखक, रचनाकार ज़िंदा होता है। मुझे नफ़रत नहीं होती थी। मुझे क्यों लगता था कि गाँव की राय ग़लत है? उस विषय पर मैंने अपनी पहली कहानी लिखी - आक्षेप। स्त्री अगर अच्छा भी करती है तो उसमें भी शक़ और संदेह ढूँढा जाता है, खासकर यदि घटना में कोई पुरुष भी उपस्थित हो।


अनुराग: आपकी कहानी जिस घटना के गिर्द बनी थी उसने आपको उद्वेलित किया। जब यह घटना घट रही थी, क्या तब भी आपने अपना पक्ष मुखरता से सामने रखा था?

मैत्रेयी: हाँ, और इस बात पर सबको आश्चर्य होता था। मेरी माँ भी कहती थीं कि जो स्त्री अपराधिनी हुई उसे जेल जाना चाहिये। तो यह उसके पक्ष में क्यों बोलती है। क्या इसे यह समझ नहीं आता कि इसने क्या है? सब यही देखते थे कि उसने क्या किया है। उससे आगे कुछ यह देखते थे कि कैसे किया है, जबकि मैं यह सोचती थी कि मैं उसने ऐसा क्यों किया। जब सोचते हैं कि क्यों किया है तब सारी परतें खुलती जाती हैं।


अनुराग: साहित्यकारों का एक वर्ग कहता है कि वे अपनी रचना में पात्रों की भाषा को यथावत प्रस्तुत करते हैं। साहित्य में भाषा की अश्लीलता के प्रश्न पर राही मासूम रज़ा जैसे कथाकारों को उद्धृत करके भी कहा जाता है कि जो पात्र बोलते हैं, वही सामने रखा जा रहा है। मेरा मत है कि साहित्यिक रचना न्यूज़-रिपोर्टिंग से कहीं अलग स्तर की प्रस्तुति है। सेतु में भी लेखकों से हमारा अनुरोध भाषाई संयम का हैं। साहित्य की भाषा के विषय में आपका क्या विचार है?

मैत्रेयी: पहले भाषा शैली की बात। चूंकि मेरे पात्र ग्रामीण हैं, इसलिये मैंने अपनी शैली बनाई – शब्द लोकभाषा के, क्रिया खड़ी बोली के। इससे भाषा पाठकों की समझ में आ सकी। यदि शब्द और क्रिया दोनों ग्रामीण होते तो पाठकों को कठिनाई होती। रेणु जी का मैला आँचल मुझे तीन बार पढ़ना पड़ा। लेकिन जो मैंने लिखा है उसे समझने के लिये तीन बार पढ़ने की ज़रूरत नहीं है।

अब दूसरी बात भाषा में अश्लीलता के प्रयोग पर – मैंने भाषा पर अवश्य ध्यान दिया है, अपने स्त्री होने के कारण नहीं, बल्कि पाठकों को ध्यान में रखते हुए। जब तक बहुत ज़रूरत नहीं पड़ती, मैं ऐसी भाषा से बचती हूँ जिसे अश्लील माना जाता है हमारे यहाँ – जैसे छुटकारा एक कहानी है, उसमें, छोटे शहर के भारतीय शौचालय की एक सफ़ाई कर्मचारी पर जब लोग अत्याचार करते हैं तो उसके मुँह से क्या निकलता है, जुल्म के विरुद्ध उसकी क्या भाषा है। बड़े स्वाभाविक रूप से निकलता है, और खराब भी नहीं लगता है। वहाँ तो मैं एकाध जगह यह कर देती हूँ कि खराब भी न लगे, और हम अपनी बात कह दें, रोष व्यक्त हो सके। इतना रोष था उसे, तब यह भाषा फूट पड़ी। खाली गाली देने के लिये, अश्लीलता फैलाने के लिये, या केवल चटखारे लेने के लिये नहीं। ऐसी भाषा के प्रयोग से बचती रही मैं।


अनुराग: आप खुद इतनी बड़ी कथाकार हैं। 2015 की हिंदी साहित्य की राही रैंकिंग के 100 वर्तमान साहित्यकारों में आपका प्रथम स्थान रहा है। उत्सुकता है कि आप खुद क्या पढ़ती हैं? आपके प्रिय कथाकार कौन हैं? और क्यों?

मैत्रेयी: लिखने के लिये पढ़ना ज़रूरी है। घटनाएँ हमें पता हैं, लेकिन उनकी प्रस्तुति तो आपको सीखनी पड़ेगी। मैंने बहुत किताबें पढ़ीं। रेणु सबसे पसंदीदा हैं। उनकी बहुत सी कहानियाँ, उपन्यास मुझे बहुत पसंद हैं। मैला आँचल, तीसरी कसम, सम्वदिया, और बहुत सी कहानियाँ कंठस्थ कर डालीं। उनकी भाषा अलग है, लेकिन बातें तो वही हैं। ... और भी बहुत से लेखकों को पढ़ा। अनेक भाषाओं को अनुवाद के सहारे पढ़ा। रेणु जी के अलावा मैं स्टीवन किंग से प्रभावित हुई। स्टीवन किंग की रचनाएँ, एन फ़्रैंक की डायरी, मैत्रेयी देवी की न हन्यते, सब पढ़े।

अनुराग: अहा! न हन्यते मेरी प्रिय पुस्तकों में से एक है। 1984 में खरीदी एक प्रति यहाँ पिट्सबर्ग में अभी भी मेरे पास रखी है।

मैत्रेयी: बहुत अच्छा। अगर प्रेम की बात पढ़नी है तो वह 'न हन्यते' है। मैंने उसे कई-कई बार पढ़ा। वैसे, लेखक तो मैं कई गिना सकती हूँ। लेकिन मेरी रुचि क्या प्रस्तुत करने में है, वह अलग बात है। लोग कहते हैं कि मेरा विषय स्त्री है, परंतु आप देखेंगे तो वास्तव में मेरा विषय प्रेम है। मैंने जहाँ-जहाँ प्रेम को ढूंढा, वहाँ-वहाँ मेरी नज़र टिक गई। अन्ना करेनीना भी पढ़ा। बांगला से मैत्रेयी देवी का न हन्यते पढ़ा, तो आनंद यादव का मराठी से अनुवाद भी पढ़ा। मैंने भाषा की सीमा नहीं रखी। प्रेम शाश्वत चीज़ है, वही कनवे करनी है। उसी की ज़रूरत है। जिन्होंने प्रेम को लिखा, जिन्होंने मनुष्यता लिखी, मैं उन्हीं से प्रभावित हुई और खुद भी उसी रास्ते पर चली।

मैंने इदन्नमम लिखा उसमें स्त्री की समस्या भी है और ज़मीन की भी। जो हमारे प्रेम को खारिज़ कर देती है। मैंने लोकगीतों पर ध्यान दिया है। गाँव में गाये जाने वाले गीत वाचिक परम्परा में हैं। स्त्रियाँ गा देती हैं, और बस खत्म, उसका कोई साहित्यिक मूल्य नहीं दिखता। कोई उनपर ध्यान भी नहीं देता। लेकिन मैंने उन्हें उठाया। क्योंकि उनमें मेरी रुचि है। उनमें नारी जाति की कहानी है। जिसे वह कबसे कह रही है, यह आपने सुना ही नहीं। स्त्री क्या मांगती है? वह प्रेम मांगती है, मुहब्बत मांगती है। प्रेम करने की आज़ादी मांगती है। वह आप सबमें प्रेम बाँटना चाहती है। आप सौ इल्ज़ाम लगा-लगाकर उसको बंद कर देते हैं। यह उसका जुर्म नहीं, यह आपका जुर्म है। 'चाक' साढ़े 400 पृष्ठों का है, लोकगीतों से ही निकला है। लोकगीतों का मेरे ऊपर बहुत बड़ा ऋण था। मैंने दादी से सीखे थे।


अनुराग: आपने स्त्री की आज़ादी की बात की। स्त्री के ग्रामीण या नागर होने से, अपढ़ या शिक्षित होने से उसकी आज़ादी का रूप और सीमाएँ दोनों बदल जाती हैं। शहर की पढ़ी-लिखी लड़कियाँ नौकरी करते हुए बाहर आने-जाने के लिये स्वतंत्र हैं। लेकिन उनमें भी बहुत सी स्त्रियाँ आर्थिक शक्ति रखते हुए, भी अपने ही कमाये धन के निवेश, निस्तारण, या दान के लिये स्वतंत्र नहीं हैं। पिता, पति, या अभिभावक पर निर्भर हैं। दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्र की अनपढ़ स्त्री को आने-जाने की वह आज़ादी भी नहीं है। उत्तरप्रदेश के गाँव की किसी स्त्री का मन अगर चेन्नई घूमने को करे तो उसे हज़ार सीमाएँ हैं। स्त्री स्वतंत्रता के विभिन्न आयामों को, आज़ादी की परतों को आप किस तरह देखती हैं। आपने उनका वर्णन किस प्रकार किया है?


मैत्रेयी: चूँकि गाँव की स्त्री मेरी रचनाओं के केंद्र में है तो मैं उसीके बारे में बताती हूँ - जहाँ तक वह इन बंधनों को तोड़ सकती है, या खोल सकती है, वहाँ तक खोले हैं। 'चाक' की नायिका का नाम सारंग है। जब वह देखती है कि बच्चे को स्कूल में दाखिल करने के लिये पिता का नाम लिखा जाता है। आजकल नियम बदला है कि माँ का 'भी' होगा - 'भी' - अब भी ऐसा नहीं है कि खाली माँ का हो जायेगा। वह मास्टर से कहती है कि मैं अपने बच्चे को दाखिल कर रही हूँ, क्या तुम तैयार नहीं हो इसके लिये? वह समझ रहा है, कहता है, "मैं बिल्कुल तैयार हूँ, लेकिन इसके लिये गाँव के आदमी, और आपके अपने पति, तैयार नहीं होंगे।" क्योंकि वह बेटा स्त्री का नहीं अपना मानते हैं। स्त्री का इतना ही मानते हैं कि वह पैदा करने और पालने के लिये है। स्त्री का नाम रजिस्टर में चढ़ाने के लिये नहीं है। वह कहती है, "नहीं, यह तो करना पड़ेगा", करवाकर भी आती है।

दूसरी बात, मैंने लोकगीतों की बात की। लोकगीत गाये जा रहे हैं। गीत में वर्णित स्त्री अपने पति से जेवर, गहने, चुनरी आदि मांग रही है। और पति कह रहे हैं कि तुम्हारे साँवले रंग पर यह पाँच रंग की चुनरी आदि अच्छी नहीं लगेगी। स्त्री नाराज़ हो जाती है। यह गीत सुनते हुए नायिका सोच रही है कि यदि वह अपने पति से यह चीज़ें मांगे तो फ़ौरन दे देंगे, लेकिन मैं तो आज़ादी मांगती हूँ, जो वे दे नहीं सकते। जब यह बात मन में आती है तो बेड़ियाँ खुल जाती हैं। आज़ादी मांगती हूँ, वे दे नहीं सकते, लेकिन लेनी तो है। उसे पता है, वे नहीं देंगे। जब स्त्री को यह तय हो जाता है कि नहीं जो मैं चाहती हूँ, घर का पुरुष वर्चस्व उसे वह लेने नहीं देगा लेकिन मैं लूंगी। मैंने यह प्रस्तुत किया है क्योंकि यह होता भी है कि नहीं, यह तो हम करेंगे।

जब हम किसान कहते हैं तो एक पुरुष का चित्र उभरता है, स्त्री का नहीं। मैंने कहा मैं किसान स्त्री की कहानी लेकर आई हूँ। सिपाही स्त्री है, पायलट स्त्री है। मज़दूर स्त्री है लेकिन किसान स्त्री नहीं है क्योंकि उसमें ज़मीन की बात आ जाती है, जिसका वर्चस्व पुरुष नहीं छोड़ना चाहता। देश से परदेश तक सारी लड़ाइयाँ ज़मीन के लिये हैं। पहली लूट ज़मीन की होती है और दूसरी स्त्री की।


अनुराग: अपकी पहली प्रकाशित रचना कौन सी थी?

मैत्रेयी: मेरी पहली प्रकाशित कहानी आक्षेप साप्ताहिक हिंदुस्तान में 8 अप्रैल 1990 को छपी।


अनुराग: अपने साप्ताहिक हिंदुस्तान का नाम लिया। उस समय की पत्रिकाएँ, धर्मयुग, सारिका, साप्ताहिक हिंदुस्तान, यह सब क्षितिज से ग़ायब कैसे हो गये? हिंदी साहित्य में ऐसा क्या हुआ कि साहित्य बाज़ार में नहीं टिका?

मैत्रेयी: व्यवसायिक घराने नाम के लिये ये पत्रिकाएँ निकालते रहे थे – लाभ होता रहा परंतु जब अपेक्षा से कम हुआ तो उन्होने एक नई युक्ति खोजी – पत्रिकाओं को बंद करके इनकी जगह सम्मान व पुरस्कार जारी करें । हिंदुस्तान परिवार जहाँ व्यास सम्मान और सरस्वती सम्मान देता है वहीं टाइम्स समूह ज्ञानपीठ पुरस्कार देता है। इससे आयकर की बचत होती है। व्यवसायिक घरानों से हमें इतनी ही आशा रखनी चाहिये कि वे अपनी लाभ-हानि ही देखेंगे।

उनकी जगह फिर लघु पत्रिकाओं ने ली। लघु पत्रिकाएँ अपने पैसे से निकालनी पड़ती हैं। वे बिक्री संख्या पर भी निर्भर रहती हैं। यहाँ-वहाँ से कुछ विज्ञापन भी मिल जाते है। तो, उन दो-तीन पत्रिकाओं की जगह अब 40-50 पत्रिकाएँ निकलती हैं, ये अच्छी बात हुई। इन पत्रिकाओं में हंस, कथादेश, पाखी, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, और हमारी इंद्रप्रस्थ भारती भी है। लेखकों को कोई दिक्कत नहीं है। पढ़नेवालों का भी कोई टोटा नहीं है। और फिर अब तो सोशल मीडिया भी है।


अनुराग: आपकी रचनायात्रा में हिंदी अकादमी जैसी संस्थाओं या पुरस्कारों की क्या भूमिका रही है? एक नये लेखक को सामने लाने में उनका क्या योगदान है? आप ऐसी संस्थाओं को क्या दिशा देना चाहती हैं?

मैत्रेयी: मुझे काफ़ी संघर्ष करना पड़ा या। क्योंकि मैं किसी को जानती नहीं थी, न मुझे कोई जानता था। और हर क्षेत्र में जानकारियाँ बहुत महत्व रखती हैं। लेखन, संगीत, मंच, कहीं भी चले जायें, जानकारी से मार्ग आसान हो जाता है। रास्ता तो आसान हो जाता है लेकिन वह आपको साहित्यकार बना दे, यह ज़रूरी नहीं। कई बार संघर्ष आपको रचनाकार बनाता है। रचनाएँ नहीं छपतीं, तो वह भी एक चुनौती होती है। आप अच्छे से अच्छा लिखकर अपने को प्रमाणित करना चाहते हैं कि नहीं आप छपेंगे।

हंस में सब छपना चाहते थे, मैंने भी सोचा। राजेंद्र यादव ने मेरी पाँच कहानियाँ लौटाईं लगातार। मैंने सोचा जैसे सबकी लौटाते हैं, मेरी भी लौटा दी होगी। उन्होंने कहा, "तुम जाओ, तुम हमें गाली तो दोगी, क्योंकि हम नहीं छाप रहे। मैंने कहा, मैं गाली नहीं देती, वह मेरी प्रवृत्ति नहीं है। मैं छठी कहानी भी भेजूंगी। और मैंने भेजी भी, और वह छपी भी। वह दिन मुझे आज भी याद है। इन संघर्षों ने मुझे बनाया।

धर्मयुग ने मेरी कहानी कभी नहीं छापी। हमेशा वापस कर देते थे। मैं देखती थी, काफ़ी कच्ची कहानियाँ भी छाप देते थे। उनकी लौटाई कहानी, महाराष्ट्र सरकार ने बारहवीं कक्षा के कोर्स में लगाई। मुझे तो बच्चों ने ही बताया।

इंद्रप्रस्थ भारती में मैं यह प्रयास करती हूँ कि यदि किसी अंजान व्यक्ति की रचना मेरे पास आती है तो मैं उन्हें हतोत्साहित न करूँ। उदीयमान साहित्यकारों के लिये हमने 'नई पौध' स्तम्भ रखा है। 'चलें गाँव की ओर' नामक स्तम्भ में गाँव से रचनाएँ आती हैं। हम लोक को त्यागकर नहीं चल सकते हैं।


अनुराग: महाराष्ट्र सरकार ने आपकी रचना को कोर्स में लगाया, यह बात आपको बच्चों ने बताई। मतलब यह कि न तो आपकी रचना लेने से पहले आप से पूछा गया और न ही आपको कोई आधिकारिक सूचना दी गई। प्रतिष्ठित हिंदी अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं द्वारा इंटरनैट, ब्लॉग आदि से रचनाएँ छापने का चलन पिछले 10-15 सालों से है। वहाँ भी, कम से कम मेरे ब्लॉग से ली हुई रचनाएँ छपते समय, चाहे जनसत्ता हो चाहे जागरण, उन्होंने न अनुमति ली, न सूचना दी। हिंदी साहित्य और संस्थानों से जुड़े लोग क्या मूलभूत व्यवहार भी नहीं जानते?

मैत्रेयी: हाँ, यहाँ यह सब चलता है, चाहे लापरवाही कहें या होशियारी। उपन्यास कहीं लगा होता है और मुझे पता ही नहीं होता। किसी ने बताया कि इलाहाबाद में मेरा उपन्यास छह साल से चल रहा था लेकिन मेरे पास कोई आधिकारिक सूचना नहीं थी।


अनुराग: हिंदी अकादमी में आने से पहले क्या आपके पास कोई प्रशासनिक अनुभव था?

मैत्रेयी: नहीं। मैंने नौकरी की नहीं, यह मेरा पहला अवसर है। मेरी यह सब करने की कोई योजना नहीं थी।यकायक सामने आया। अरविंद केजरीवाल ने मुझसे कहा, आप अपने डोमेन में जा रही हैं, सम्हालिये। स्वभाव से ही रचनाकार हूँ। अब तक तो 26 साल का, लेखन का अनुभव भी हो गया था। जाते ही मुझे लगा कि मुझे क्या-क्या करना है। मैंने कई बदलाव कर डाले। पहले, उपाध्यक्ष के बिना मीटिंग नहीं होती थी, वही नीतियाँ तय करता है, करवाता है। पहले लेखकों को उनके नाम, ख्याति के हिसाब से पारिश्रमिक दिये जाते थे। मैंने वरिष्ठ-कनिष्ठ का भेद हटाकर लेखकों का पारिश्रमिक समान किया, उसे बढ़ाकर समान रूप से 10,000 किया। इंद्रप्रस्थ भारती में भी लेखन का पारिश्रमिक बढ़ाकर 5,000 किया। जब बजट है तो वह पैसा रचनाकारों को मिलना चाहिये, उनके लिये ही आया है। इंद्रप्रस्थ भारती त्रैमासिक पत्रिका थी, तीन महीने में असर खो जाता है। उसे मासिक किया। मुझे कहा गया कि यह कैसे होगा, बहुत आदमी चाहिये, आदि। मगर हुआ। बाधाएँ आईं तो उनका सामना सोच-समझकर किया। मेरी ज़िंदगी में ऐसा ही रहा है कि जो सोच लिया, वह कर दिया। इससे पहले भी जीवन के अनुभव थे। जब पढ़ना था तो पढ़े, जब तय किया शादी करनी है तो शादी की। तय किया कि अरेंज्ड विवाह करना है। जबकि माँ खुले विचारों की थी। उन्होंने पूछा भी कि कोई लड़का है? चिट्ठीवाले लड़के से कर ले। मैंने कहा नहीं, अरेंज्ड ही करनी है। फिर बच्चे पाले, पढ़ाया-लिखाया, डॉक्टर बनाया। 44 साल में वापस साहित्य से जुड़ी, लिखा, जल्दी-जल्दी लिखा। मुझे यह नहीं पता कि इसमें मेरा कंट्रीब्यूशन कितना है, यह सब होता भी गया। बच्चों को पालने में, उन्हें कुछ बनाने में संघर्ष होते हैं। लिखने में चैलेंज बहुत मिले, संघर्ष करना पड़ा, लेकिन ठान लो मन में तो होता है। सबसे अच्छी बात यह हुई कि जो लेखन गाँव से आया था वह लोगों तक पहुँचा। मंदा, अल्मा, सारंग को पहचान मिली, चाहे इसे मेरा भाग्य कहो या कुछ भी कहो। मैं कभी राजनीतिक परिदृश्य में नहीं रही, न मेरी किसी से जान-पहचान थी। लेकिन जब यह ज़िम्मेदारी मिली तो मैंने सोचा कि इसे ऐसे निभाकर दिखाएँ कि एक अनुकरणीय उदाहरण बने। जितने दिन भी रहूँ, वह याद किया जाये कि ऐसे हुआ था ... इसलिये बहुत मेहनत करनी पड़ी यहाँ।


अनुराग: कुछ लोग कहते हैं कि हर सफल पुरुष के पीछे एक स्त्री की भूमिका होती है। आपकी साहित्यिक यात्रा का श्रेय क्या काव्य-पत्र लेखक, उस लड़के को दिया जा सकता है?

मैत्रेयी: हाँ, चाहे किसी से सम्पर्क हो, किसी से भी सम्बंध बने, चाहे वह धरती और मिट्टी ही हो मैं उन्हें भूल नहीं पाती, इसे गॉड गिफ़्ट कह सकते हो। मैं जहाँ-जहाँ रही, उन्हें नहीं भूल पाती। जिसे मुहब्बत या प्रेम कहते हैं, वही मेरी पूंजी है। नहीं तो क्या ज़रूरत है कि मैं चिट्ठी वाले लड़के को याद करूँ। लेकिन जब मेरा पहला उपन्यास आया तो पहली प्रति उसे ही भेजी। , पुराने पते पर ही। और यह भी लिख दिया कि तुम उस लड़की को भूल गये होगे जिसे तुम चिट्ठी लिखते थे। उसने कहा कि मैं तुम्हें बिल्कुल नहीं भूला और बहुत खुशी हुई कि तुम किताब के रूप में मेरे पास आईं। तो, जिसने भी हमारे जीवन में कोई रोल अदा किया है, उसे हम कैसे भूलें?


अनुराग: मैथिली, भोजपुरी आदि को अलग भाषा की मान्यता दिलाने की बहस चल रही है, आपका क्या स्टैंड है? क्या इनके अलग अस्तित्व के लिये उर्दू की तरह एक अलग लिपि देना ज़रूरी है?

मैत्रेयी: हर भाषा का अपना अलग महत्व है। हिंदी में बुंदेली मिलाना अलग बात है, लेकिन बुंदेली को अलग दर्ज़ा मिले तो बुंदेली का अलग ही रुतबा होगा। ऐसी ही बोलियाँ जीवित रहेंगी। अभी तो कभी-कभार ही उनका नम्बर आता है। कौन पूछ रहा है? ऐसे तो बोलियाँ मर जायेंगी। एक समूह ऐसा कह रहा कि इन्हें अलग करने से हिंदी की हानि होगी। ऐसा होता तो इनमें साहित्य अकादमी का पुरस्कार क्यों है? यदि बुंदेली को अलग से मौके मिलें तो और फले-फूलेगी। इससे हिंदी को कोई नुकसान नहीं होने वाला। हिंदी जीवित है, बोलियाँ मर रही हैं। पौधे को जीवित रखना है तो पानी देना है।


अनुराग: क्या इनके अलग अस्तित्व के लिये उर्दू की तरह एक अलग लिपि देना ज़रूरी है?

मैत्रेयी: नहीं अलग लिपि की आवश्यकता नहीं है लेकिन प्रोत्साहन की है। अभी प्रोत्साहन बिल्कुल नहीं है। नहीं है। ब्रज में कितना साहित्य था, लेकिन अब ब्रज कहाँ है? ब्रज मर रही है। उसे बचाना चाहिये। मैंने चाक ब्रज में लिखा। तो लिख तो हम हिंदी में ही रहे हैं लेकिन लोक की महक, लोक की शक्ति को सामने आने दो। महत्व देंगे तो लोग उन्हें प्रयोग करेंगे। कोई बुंदेलखंड से आता है तो हम तो स्वतः बुंदेली बोलने लगते हैं। आप तो विदेश में हैं। जब कोई हिंदी बोलने वाला मिलता है तो कैसा अच्छा लगता है। लोक भाषाओं का विरोध मुझे समझ नहीं आता।


अनुराग: हिंदी भारत गणराज्य की और भारत के अनेक राज्यों की राजभाषा है, भारत सहित पूरे उपमहाद्वीप में बोली जाती है। सभी बोलियाँ जोड़ें तो संख्याबल में शायद अंग्रेज़ी और चीनी से भी आगे ही होगी। फिर भी आज तक हम उसे संयुक्त राष्ट्र में स्थान नहीं दिला सके। कमी कहाँ रही?

मैत्रेयी: नेताओं की कमी है। कमिटियाँ बनाई जानी चाहिये, जो वहाँ सम्पर्क करें। काम इसलिये नहीं हुआ कि जो लोग अपॉइंट किये जाते हैं वे प्रयत्न नहीं करते। उनमें जो लोग चुने जाते हैं वे साहित्यकार हैं, अनुकूल लगते हैं, लेकिन अपनी स्वार्थसिद्धि में लग जाते हैं। जब हिंदी अकादमी में हमने श्रम किया तो वह ऊपर आ गई। मैं भी देश-विदेश के दौरे करने लगती तो यहाँ काम कौन करता? संस्थाओं के पदाधिकारी आत्मप्रसार के लिये, अपनी पुस्तकों के अनुवाद कराने में, पुरस्कारों की जुगाड़ में जितना श्रम करते हैं, उतना संस्था के लिये भी करें। जब कोई संस्था बन गई, तो उसे चलाना होता है।


अनुराग शर्मा
अनुराग: अहिंदीक्षेत्रों पर हिंदी थोपे जाने के आरोप अक्सर सुनाई देते हैं। आपका क्या विचार है?

मैत्रेयी: नहीं, राष्ट्रभाषा है पर थोपी नहीं जाती है। हर जगह हिंदी विभाग हैं। इसे थोपना नहीं कह सकते।


अनुराग: देश आज़ाद हुए सात दशक हो गये। क्या यह आज़ादी हर नागरिक तक पहुँची? यदि नहीं तो कैसे पहुँचाई जा सकती है? साहित्यकार इसमें क्या भूमिका निभा सकते हैं?

मैत्रेयी: अधिकारों के साथ कर्तव्यों का पालन करें। लोकतंत्र के लिये वोट सोच-समझकर दें। वोट के योग्य शिक्षा नहीं है। गोरे चले गये तो देशी शासक पैदा हो गये। लोकतंत्र होते हुए भी आपपर अत्याचार कैसे हो पाता है? क्योंकि आप सोचसमझकर दृढनिश्चय होकर वोट देने के बजाय किसी लालच में आ जाते हैं। जिस दिन वोट के प्रति सचेत हुए, उस दिन लोकतंत्र सच्चे मायने में आ जायेगा। स्त्री फिर भी अलग हैं – न हिंसा चाहती हैं, न नफ़रत करती हैं। क्या उन्हें खून-खराबा करते देखा? समानता तब आयेगी जब हम एक सा सोचेंगे। पुरुष स्त्रीवत हो जायें तो समाज बेहतर होगा। स्त्री भ्रष्टाचार करती भी है तो कोई आदमी पीछे होता है जो ऐसा कराता है। स्त्री जब मॉडर्न हो रही है तो अपने स्त्रियोचित गुण छोड़कर पुरुष बन रही है। सबसे बड़ी दौलत मिलजुलकर रहना है। अमीर होकर अकेले पड़े रहने से निर्धनता में मिलजुलकर रहना अच्छा है। मैं सम्वेदनाओं की, प्रेम की पक्षधर हूँ। जो प्रेम का व्यवहार करता है, मैं उनकी पक्षधर हूँ।

अनुराग: उद्देश्योन्मुख साहित्य, दलित विमर्श, नारी विमर्श, आदि ने हिंदी साहित्य और पत्रकारिता को कैसे प्रभावित किया है? भविष्य में इनकी क्या भूमिका है?

मैत्रेयी: इक्कीसवीं सदी के 17 साल हो गये हैं, उससे पहले के साहित्य बेहतर था। अब वह साहित्य नहीं आ रहा जो पहले आता था। अब यह हल्का होता जा रहा है। आज इसमें केवल सूचना है, साहित्य नहीं। पाठन में मनुष्य को मनुष्य तक पहुँचाएँ। मनुष्य मशीनी होता जा रहा है। मानवता की आँच हल्की न हो।


अनुराग: सेतु के सम्पादनमंडल के लिये आपका संदेश?

मैत्रेयी: पहले तो अमेरिका से हिंदी में पत्रिका निकालने के लिये मुबारकबाद। धन्यवाद कि आप लोग विदेश में रहते हुए हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिये काम कर रहे हैं। आपलोग कोशिश करें कि भारत के कोने-कोने में झाँकें। जैसे इंद्रप्रस्थ-भारती में हम ग्रामीण भारत के लेखन को भी सामने ला रहे हैं, आप भी उसे प्रकाशित करें जिसे भारत कहते हैं।


अनुराग: सेतु के पाठकों के लिये आपका संदेश?

मैत्रेयी: श्रम से साधन जुटाकर सेतु जो दे रही है, उसे समझें। जो छप रहा है उसमें भारत दिखाई देगा, ध्यान से पढें। जो इतने प्रयत्न कर रहा है उसे देश से कितना प्रेम है इसे पहचानें। शुभकामनाएँ!

अनुराग: सेतु के पाठकों के लिये अपना समय और विचार साझा करने के लिये आपका आभार!

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