प्रवासी हिन्दी कहानी में संस्कृति चित्रण

(महिला कहानीकारों के संदर्भ में)

डॉ. मधु संधु


                 संस्कृति शब्द की व्युत्पति सम उपसर्ग, कृ धातु और क्तिन प्रत्यय के योग से हुई है, जिसका अर्थ संस्कार करना, परिमार्जन करना, शुद्ध करना है। इसमें शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक- यानी सर्वांगीण परिष्कार समाहित है। इसका संबंध भाव और विचार, मन और बुद्धि दोनों से है। संस्कृति के अंतर्गत धार्मिक विश्वास, उत्सव, त्योहार, पर्व, रीति- रिवाज, खान-पान, वेशभूषा, रहन-सहन- सभी आते हैं। प्रवासी भारतीय कहानीकारों ने स्थानीय और भारतीय संस्कृति को एक साथ चित्रित किया है, जबकि उनकी चिंता देशीय संस्कृति को बचाने की भी लगती है। पराई संस्कृति में साँसे लेने के बावजूद अपने देश की संस्कृति का मोह मनुष्य से छुड़ाए नहीं छूटता।
                 भारतीय संस्कृति के जिन तत्वों ने पश्चिम को सब से अधिक प्रभावित किया है, उनके विषय में अर्चना पेन्यूली ‘वीरा बनाम सिल्विया‘ में लिखती हैं-  “भारतीय भोजन व अध्यात्म- दोनों ने ही पश्चिमी देशों में बड़ी प्रसिद्धि पाई है। उदर की पूर्ति के लिए भोजन और आत्मा की शुद्धि के लिए अध्यात्म।“ [1]

                 उनकी ‘अनुजा‘[2] में भारतीय समुदाय ने डेनमार्क में मंदिर बनाए हुए हैं।  हर रविवार और त्योहारों के दिन वहाँ भजन- कीर्तन औए भोजन का आयोजन होता है। जन्माष्टमी को भारत से कीर्तन मंडलियाँ बुलाई जाती हैं। उनकी मीरा बनाम सिल्विया में मुख्य समस्या ही घाटे में चल रहे इस्कॉन मंदिर की है। ऐसे में भारत से आई-टी-आई इंजीनियर सदभाव को विजिटिंग वीजा पर धर्म प्रचार के लिए भेजा जाता है। भारत का इस्कॉन आश्रम कोपेनहेगेन में कई एकड़ में फैला हुआ है। इसके अनुयायी जयकृशन, हरिहरन, दिव्यांग, आर्यन- सब अंग्रेज़ हैं। सद्भाव मंदिर में मन की शांति के अनेक कार्यक्रम चलाता है। मन के भीतर की दिव्यता को खोजने के रहस्य बताता है। डेनमार्क में बसे भारतियों से व्यक्तिगत सम्पर्क स्थापित करता है। उनके घरों में जाकर गीता और वेद के उपवचन का पाठ करता है। लोगों को धर्म तत्व और योग के सम्मिश्रण का ज्ञान देता है। उनके व्यक्तित्व और शारीरिक सौंदर्य से प्रभावित हो सिल्विया मीरा बन इस्कॉन संप्रदाय की सक्रिय कार्यकर्ता बन जाती है।

                 विदेश में जाकर भोजनालय खोलना भारतियों के लिए अच्छा व्यवसाय है। भारतीय चटपटे भोजन की पूरे विश्व में पैठ है। इस ढंग से भारत ने विदेशी संस्कृति के भोज्य पक्ष में अच्छी जगह बनाई है। हर देश में भारतीय भोजनालय मिल जाते हैं। दिव्या माथुर की ‘मेड इन इंडिया’[3] में सतनाम के ससुराल वालों का ब्रिटेन में ‘छईया छईया’ भोजनालय है। उषा राजे सक्सेना की ‘और जल गया उसका सर्वस्व’[4] में गोपाल और सचिन मल्होत्रा साहब के रेस्तरां में काम करते हैं और अवैध रूप से रहने के कारण रात को वहीं छुप कर सो जाते हैं। अर्चना पेन्यूली की ‘मीरा बनाम सिल्विया’ का सद्भाव डेनमार्क में धार्मिक इस्कॉन संस्थान के साथ-साथ उसके शाकाहारी रेस्टौरेंट गोविंदा को भी संभालता है। वह अंग्रेज़ जो कभी भारतीय प्याज, लहसुन, परान्ठों की गंध बर्दाश्त नहीं कर पाते थे, आज भारतीय रेस्टोरेन्ट घेरे रहते हैं।  दिव्या माथुर की ‘एक शाम भर बातें’[5] में ब्रिटेन के लोग एक बार खाना बनाकर फ्रीज़ कर लेते हैं और महीनों वही खाते रहते हैं- यहाँ तक कि पार्टियों में भी वही परोसा जाता है। उबली सब्जियों का भी चलन है। फिश, बर्गर, सौसेज का भी चलन है। पुरुष-स्त्रियाँ सब पैग पर पैग चढ़ाते हैं, सिगरेट पीते हैं। उपहार में शराब या फूलों का ही चलन है, जबकि भारत में कीमती उपहार दिये जाते हैं।

                 ‘कुंठा’[6] में अमेरिका में रह रहे भारतीय प्रवासियों की जीवन शैली पर इला प्रसाद लिखती हैं- बच्चे पराँठे या राजमाह की जगह पीज़ा या सैंडविच पसंद करते हैं। नॉन वेज माँ-बाप के लिए भले ही अखाद्य हो, बच्चों को वही अभीष्ट है। वह कुछ नहीं कर सकते, बल्कि   माँ बाप तो घबराये रहते हैं कि बच्चे कहीं 911 डायल करके पुलिस को न बुला लें। उषा प्रियम्वदा की ‘शून्य’[7] में हरे नारियल में जिन पी जाती है।  सुषम के यहाँ भी माँ-बाप में बच्चों द्वारा 911 डायल करने का आतंक दिखाई देता है।

            उत्सव, त्योहार, पर्व, रीति रिवाज, आस्था विश्वास किसी भी समाज, जाति, राष्ट्र की समृद्धि, वैभव और हर्षोल्लास के द्योतक हैं। भारत के पास इसकी समृद्ध परंपरा है। ऐसे में भारतीय यहाँ रहें या वहाँ, दीवाली, जन्माष्टमी, होली, तीज आदि का उन्हें इंतजार रहता है। प्रवासी भारतीय दीवाली खूब धूमधाम से मनाते हैं। पूर्णिमा वर्मन की ‘ उसकी दीवाली’[8] में दो साल पहले नंदिता त्रिवेदी ने ‘संस्कृति’ नाम से बुटीक खोला था। दीवाली के दिन हैं। ग्राहकों  की भीड़, काम की अधिकता, निपटाने की तत्परता से वह दो-चार हो रही है। दूकान की दीवाली, घर की दीवाली, ग्राहकों की दीवाली, कारीगरों की दीवाली, मायके की दीवाली, दूकान पर आए किन्नरों की दीवाली –कहीं कोई कमी नहीं छोडती। थक कर चूर चूर हो जाती है। पर दीवाली की रात दिन भर की सारी थकान आतिशबाज़ी के धुएँ की तरह घनी होकर धीरे-धीरे गायब होने लगती है। “आसमान में सितारे टिमटिमा रहे थे और ज़मीन पर दीये। नंदिता के चेहरे पर भी संतोष की आभा फैलने लगी। वह देर तक बूंदी के लड्डुओं की मिठास, दीयों के प्रकाश और रंगोली के रंगों में डूब कर दीपावली के साथ एकसार होती रही तब तक, जब तक माँ की पुकार ने उसे रात के खाने की याद नहीं दिला दी।“ कहानी त्योहार का उल्लास और  गहमागहमी लिए है।

           भारतीय भारत मे हों, अमेरिका में या यूरोप में, दीपावली यानि दिये की लौ का उनके लिए खास महत्व है। शैल अग्रवाल की ‘दिये की लौ’[9]   में दीपावली का उत्सव है। संगीत लहरियाँ उत्सव मे प्राण संचारित कर रही है। अविक कुछ देर पहले ही हॉस्टल आया है। कमरे में कुछ और मित्र भी आते हैं। अविक माँ द्वारा दी पूजा सामग्री और दीपक निकाल पहले पूजा करता है, फिर सभी दीवाली बाजार जाते हैं और फिर एक घंटे का सफर करके अविक के घर पहुँचते हैं। यहाँ दीपों, घण्टियों, बंदनवार, रोली, पूजा, प्रणाम, आशीर्वाद, भोजन आदि से माँ उनका वैसे ही स्वागत करती है, जैसे चौदह वर्ष बाद लौटे राम का कभी हुया था।

           अर्चना पेन्यूली की ‘अनुजा‘ में भारतीय समुदाय ने डेनमार्क के मंदिर में  जन्माष्टमी को भारत से कीर्तन मंडलियाँ बुलाई जाती हैं। इला प्रसाद की ‘कुंठा‘ में कभी दुर्गा पूजा पर, कभी गरबा नृत्य पर लोग मिलते हैं।

           कविता वाचक्नवी के ‘रंगों का पंचांग’[10] की नायिका भारत से नार्वे के त्रोदहाइम नगर में आज से लगभग एक वर्ष पहले आई थी। तब होली के दिन थे और आज भी भारत से आए बहन के फोन से पता चलता है कि होली खतम होने में नार्वे के हिसाब से पाँच घंटे रह गए हैं। नायिका को लगता है कि यह देश कितना बेगाना है। न बसंत है, न कोयल की कूक, न फाग की अमराई, न लहलहाते खेत। होली के चटक रंग और पिचकारियों की बौछारों की यादें उसे बेचैन कर देती हैं।

           नीलम जैन की ‘प्रश्न’[11] में त्योहार टूटे रिश्तों को जोड़ने, उनमें मधुरता भरने का काम कर रहे  हैं। नायिका अमेरिका से भारत आई है। तीज का त्योहार है। नाईन बुलावे दे आती है। सभी रिश्तेदार भी आ रहे हैं, तरह-तरह के पकवान बन रहे हैं, झूले खोल दिये जाते हैं गाने- बजाने का कार्यक्रम भी है और इस अवसर पर नायिका बुआ की बहू को आमन्त्रित कर उनके वर्षों से चले आ रहे मन-मुटाव को मिटा देती है।

           अर्चना पेन्यूली की ‘ एक छोटी सी चाह’[12] में डेन्मार्क के दूतावास में 15 अगस्त को स्वतन्त्रता दिवस मनाया जाता है। ‘पहचान’ में भारतीय डेनमार्क की धरती पर एक मेले का आयोजन करते हैं- इंडिस्क फेयर। इसमें रंगारंग कार्यक्रम, कवि सम्मेलन, सांस्कृतिक नृत्य गाँ एवं भारतीय भोजन के स्टालों का आयोजन किया जाता है।

            सुषम बेदी की “हवन उर्फ किरदारों के अवतार’[13] में नायिका गुड्डो हमेशा पहली जनवरी को हवन करती है। हवन के बाद मंत्र पाठ होता है। सभी बहनें मिलकर भजन गाती हैं। शांतिपाठ होता है।

           प्रवासी महिला कहानिकारों ने वहाँ के त्योहारों का भी वर्णन किया है। इला प्रसाद की ‘बैसाखियाँ’[14]  में हर साल अमेरिका में भारतीय होली जैसा ही एक आयरिश त्यौहार ‘सेंट पैट्रिक्स डे’ मनाया जाता  है । लोग हरे रंग के कपड़े पहनते हैं। गाड़ियों में जुलूस निकलता है। दर्शकों पर चाकलेट, मोतियों की माला, तीन पत्ती वाला शैमराक फेंका जाता है। सुषमा को पहली बार शैमराक मिला तो उसका रिसर्च पेपर स्वीकृत हो गया। दूसरी बार तीन पत्ती मिली तो अचानक लुईस आकर उसके पैसे लौटा गया। तीसरी बार वह इसलिए जाती है कि बूस्टन में उसकी नौकरी लग जाये। सुषमा भारतीय संस्कृति की झलक अमेरिकी /आयरिश संस्कृति में देखती है जहां हर अच्छी घटना को धार्मिकता से जोड़ लेते हैं।

            दिव्या माथुर की ‘कथा सत्यनारायण की’[15] की  सुशीला भारतीय पुत्रवधू पाकर अति प्रसन्न है। उसके भारतीय संस्कार, सुबह उठकर सबको चाय देना, नाश्ते का पूछना, जी-जी करके पूरे सम्मान से बात करना उसे अच्छा लगता है।

           पूर्णिमा वर्मन की ‘एक शहर जादू जादू’[16] में शहर विशेष यानि राजस्थान के जयपुर के अभिजात रहन सहन, वेश-भूषा, खान-पान, सभ्यता- संस्कृति का वर्णन है। अनन्या बीस साल पहले का वह समय याद कर रही है, जब पति के लखनऊ से जयपुर तबादले पर वह वहाँ आई थी । मुंबई, पंजिम, भोपाल, चंडीगढ़, लखनऊ आदि के बाद जयपुर तबादला हुया था । जयपुर की भाषा ही नही, लाल हरे बैंगनी नारंगी... बाँधनी और लहरिया  रंग बिरंगे परिधान, मितभाषिता, धीरे धीरे गरमाता और ठंडाता मौसम का मिज़ाज, सादी लेकिन प्रगतिशील जीवन शैली, हर ओर सुरक्षा, गीत- संगीत– सब  अलग ही लगते हैं। पर जल्दी ही वे उस संस्कृति में इतना रच-बस जाते हैं कि लगता है पति सोनी टी वी के रीजनल मैनेजर राजा कमल प्रताप सिंह उर्फ केसरिया बालम और पत्नी रानी अनन्या बाई सा उर्फ रंगीली रानी पूरी तरह जयपुर के हो चुके हैं ।    

           शैल अग्रवाल की ‘दिये की लौ’   में पात्र स्थान विशेष की संस्कृति से इतने प्रभावित होते हैं कि बच्चों के नाम शहरों के नाम पर रख रहे हैं। पैरिस के माँ-बाप बनारस से हैं। रविशंकर, बिस्मिलाहखाँ जैसे संगीतज्ञ बनारस की देन हैं। उन्हें पैरिस शहर पसंद था, इसलिए उन्होने अपनी बेटी का नाम पैरिस रखा। पैरिस को काशी पसंद है, इसलिए वह अपनी बेटी का नाम काशी रखने का सोचती है।

          जन्म, मृत्यु और विवाह के संस्कार संस्कृति विशेष का अभिन्न अंग होते हैं। अनिल प्रभा कुमार की ‘जिन की गोदभराई नहीं होती’[17] में बच्चा गोद लिया जाता है, फिर भी बेबी शावर यानी गोद भराई की रस्म की जाती है।
           उषा राजे सक्सेना की ‘खुशबू रिश्तों की’[18] में मिहिर और मंजरी का विवाह सगे संबंधियों के सम्मुख वैदिक ऋचाओं के मंत्रोच्चार के साथ होता है। दिव्या माथुर की ‘एक था मुर्गा’[19] में दादी विवाह के रीति रिवाज दोहराती है। बताती है कि बन्ना-बन्नी के गीत गाये जाते थे- बन्ना तेरे नाना तांगे वाले, बन्ना तेरी नानी भेंगी-कानी। लगन की रसम होती थी। लड़की का छोटा भाई भात लेकर आता था। दूल्हे को इतर में डूबा सेहरा पहनाया जाता था। भाभियाँ दूल्हे को काजल लगाती थी और बहनें घोड़ी को दाना खिलाती थी। उन्हें सोने की बालियाँ दी जाती थी। सुषम बेदी की ‘संगीत पार्टी’[20] में बेटा माँ को अपने विवाह में नही बुलाता, फिर भी आरती अपने यहाँ संगीत पार्टी करके शगुन कर लेती है- ‘राजा की आएगी बारात’, ‘मेरे बन्ने की बात न पूछो’ जैसे गीत गाये जाते हैं। सुदर्शन प्रियदर्शिनी की ‘देशांतर’[21] में वह विदेशी संस्कृति है, जहां शादी दूल्हा- दुल्हन का वैयक्तिक मामला होती है। बेटे जॉन की शादी का कार्ड आया है। वह आयरिश लड़की जेनी से शादी कर रहा है। वर्षों से दोनों लिव-इन में थे। शादी भारतीय और क्रिश्चियन दोनों विधियों से होगी, लेकिन कार्ड में लड़के के माता- पिता का कहीं नाम तक नहीं। मानों उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका जाता है। कार्ड लड़की की उस माँ की तरफ से है, जिसकी दूसरी शादी के कारण सरनेम बेटी से भिन्न है।

           सुषम की ‘कलश’[22] में अमेरिका में अमरेश के मित्र की एक पार्टी में अचानक मृत्यु हो जाती है और पराये देश में, बेगाने नियम- कायदों के बीच वह अनेक संवेदनशील- असंवेदनशील और कानूनी- गैर कानूनी स्थितियों- प्रक्रियाओं- संकटों- अनुष्ठानों से गुजरता है। उसके समक्ष अनेक प्रश्न हैं, पोस्टमार्टम, ताबूत, फ्यूनरल गृह से पहले के दर्शन, कपड़े, जूते, मौजे, गुलदस्ते, फूल, गाडियाँ, राख़ के लिए लिफाफा या भस्म कलश और हरिद्वार के पंडों की तरह हर स्तर पर मोल-भाव। शव- दाह से पहले एक मित्र द्वारा गीता–प्रवचन और राख विसर्जन से पहले कालिंदी द्वारा भारतीय वेशभूषा मे पूजा- अनुष्ठान करना भारतीय संस्कृति का अनुमोदन है।

           उनकी ‘अवसान’[23] में छप्पन- सत्तावन वर्षीय डॉक्टर दिवाकर की मृत्यु हो जाती है। उसके अन्त्येष्टि कार्यक्रम में चर्च में पाँच सौ के आसपास लोग जुटते हैं, पर मित्र शंकर को छोड़ कोई भारतीय नहीं। उसने तीन शादियाँ की थी। पाँच बच्चे हैं। तीनों पत्नियाँ और उनके परिवार हैं, पर कोई पितृ परिवार से नहीं। चर्च में बाइबल से मृत्यु संस्कार के प्रवचनों का पाठ किया जाता है, पर गीता, महाभारत, रामायण से कुछ नहीं। यह सब मित्र शंकर से बर्दाश्त नहीं हो पाता, मित्र की आत्मा की शांति के लिए वह डायस पर जा गीता के कुछ श्लोक पढ़, उनका अँग्रेजी अनुवाद करता है। एक भारतीय की अमेरिका में मृत्यु और उसकी मृत्यु पर न भारतीय संस्कार विधि और न किसी भारतीय सगे संबंधी की उपस्थिति– यही कहानी का मूल कथ्य है। ।

           प्रवास में पड़ोसी की मृत्यु भले ही अखबार की खबरों जैसी हो, भारतीय मानसिकता इसे स्वीकार नहीं सकती। सुदर्शन प्रियदर्शिनी की ‘अख़बारवाला’[24] में वर्षों से विदेश मे रहने वाली जया की परेशानी यह है कि सामने घर के बाहर शव गाड़ी देख वह विचलित हो जाती है, जबकि अंग्रेज़ पडोसी इसे सम्बद्ध परिवार का व्यक्तिगत मामला मानते हैं। उसकी संवेदनाओं के पार्श्व में वह भारतीय संस्कृति है, जहां अपरिचित पडोसी भी मृत्यु की खबर सुन घंटों भूखे- प्यासे वहाँ बैठे रहते थे। अर्चना पेन्यूली की “माँ”[25] में भारत में माँ की मृत्यु हो जाती है इंग्लैंड में रहने वाली रानू के स्कूल के गौरे अध्यापक उसे सामूहिक रूप से पुष्प गुच्छ भेंट करते हैं और साथ में एक कार्ड देते हैं और भारतीय मित्र घर आकार संवेदना प्रकट करते हैं।

           दिव्या माथुर की ‘उत्तरजीविता’[26] में अनेक धरातलों पर भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति का तुलनात्मक अध्ययन मिलता है। उत्तरजीविता में नायिका का मस्तिष्क बीच आँगन में मृत चुहिया को देखकर भिन्न अंध विश्वासों, आस्थाओं, मान्यताओं आदि का अवलोकन करने लगता है। कभी सोचती है कि मृत चुहिया किसी अशुभ घड़ी का संकेत तो नहीं, कभी उसकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करती है। याद आता है कि दिल्ली वाले घर में चाचा चूहे को मार देता था और दादी इसे पाप कहती थी। दादी चुहिया की जून को पिछले जन्म के पापों का फल भी कहती थी। चाचा चुहिया को इस जीवन से मुक्त कर अपने इस कृत्य को पुण्य बटोरने का साधन कहता था। नायिका के आवास के नीचे अफ्रीकी और पड़ौस में अंग्रेज़ महिला रहती है। अफ्रीकी सबसे अधिक मांस खाते हैं और घर के बाहर कभी सफाई नहीं करते, जबकि डेन्मार्क के लोग आँगन के साथ-साथ अपनी पगडंडियों को बुहारते-बुहारते सड़क तक आ जाते हैं। सुधा ओम ढींगरा की ‘लड़की थी वह’ में मनु और मीनू का विश्वास है कि कुत्ते मृत्यु दूत यम को देखकर लगातार भौकना शुरू कर देते हैं। उनकी ‘कैसी विडम्बना’[27] में नायिका का विश्वास है कि आँख का फड़कना और काली बिल्ली का रास्ता काटना अपशकुन हैं।
           भारतीय धर्म, दर्शन और संस्कृति में पुरुष का स्थान अति उच्च रहा है। पितृसत्ताक में पुत्रेच्छा बड़ी प्रबल होती है। भारतीय संस्कृति में वैतरणी पार करने के लिए, मुक्ति के लिए पुत्र का होना अनिवार्य है। आज संविधान चाहे कुछ भी कहे, पर पिता की जायदाद का उत्तराधिकारी सिर्फ पुत्र ही बनाता है। सुषम बेदी की ’विषकन्या’[28] में पिता ने सेवा बेटी के नाम और मकान बेटे के नाम लिखा हुआ है।

           प्रवासी स्त्रियाँ चुस्त-दुरुस्त दिखने के लिए अक्सर पैंट टॉप पहनती हैं। वहाँ काले, भूरे, सलेटी रंग को ज्यादा पसंद किया जाता है। सुषम बेदी की ‘विभक्त’[29] की अनन्या भारत से लौटने के बाद खिले खिले रंग पहनने लगती है। ‘झाड़’[30] के सैम को नानी का साड़ी पहनना पसंद नहीं। ‘अवशेष’ की कमला जानती है कि उसकी साड़ियाँ सिर्फ दान के काम ही आ सकती हैं। उषा राजे सक्सेना की ‘दरारों के बीच’[31] की लड़कियां चुस्त लेदर लुक की हिप हाई जीन्स और वाई शेप गले की छोटी- छोटी चोलियां पहनती हैं।  

                                    सोमवीरा की ‘डायरी के स्वर’[32] में भारतीय और अमेरिकन शादियों का समानान्तर तुलनात्मक चित्रण है। आलोका की उन्नीस वर्षीय मित्र कैथोलिक ग्रेस की प्रस्बिटेरियन रिचर्ड से शादी है। दोनों रोज मिलते हैं। खर्च से लेकर बच्चों तक– हर विषय पर चर्चा करते हैं। दोनों ईसाई हैं, फिर भी ग्रेस और उसका परिवार चाहता है कि पहले रिचर्ड कैथोलिक धर्म में दीक्षा ले ले। महीना पहले कचहरी मे डॉक्टर का सर्टिफिकेट और फीस दे आज्ञा लेनी पड़ती है। कहानी विवाह के रीति-रिवाजों से भरी हुई है। सफेद कपड़ों में सजी दुल्हन, ब्राइड्ज मेड, फ्लावर गर्ल्स और ढेरो रीति रिवाज हैं। एक दिन पहले हर चीज का चर्च में रिहर्सल होता है। खर्च इतना कि ग्रेस के पापा को कर्ज लेना पड़ता है। भारत में आलोका की सेना में डॉक्टर मौसेरी बहन विभा की राजेश से शादी है। उन्होने एक दूसरे का चेहरा भी ठीक से नहीं देखा होगा। मंत्रो के साथ पुरोहित विवाह क्रिया सम्पन्न करता है। दुल्हन लाल साड़ी पहनती  है। ढेरों रीति-रिवाज हैं। उनकी ‘डायना की परछाई’ में अंतर्देशीय विवाह और सांस्कृतिक वैभिन्य है।

                 दिव्या माथुर की ‘तुम नहीं सुधारोगी रूना’[33] भारतीय और पाश्चात्य चिंतन का अंतर लिए है। भारतीय माता पिता जीवन भर बच्चों को संरक्षण देते हैं, जब कि पश्चिम उन्हें  उन्हे अपने ढंग से जीने की आजादी देता है।

                 प्रत्येक संस्कृति अपने मे महान होती है। मानव मूल्य उसे महान बनाते हैं। उषा राजे सक्सेना ष्खुशबू रिश्तों की में लिखती हैं- कई मायनों में इंग्लैंड एक ऐसी जगह है, जहां मनुष्यता, भाईचारा और उदारता अपने श्रेष्ठ रूप में देखी जा सकती है। संसार में वही एक ऐसी जगह है जहां लोग अनजाने में की गई गलतियों के लिए इंसान को पत्थर नहीं मारते हैं। ...इंग्लैंड एक विचित्रा देश है। एक ओर जहां वह अतिभैतिकवादी है वहीं दूसरी ओर अत्यंत उदार, कत्र्तव्यनिष्ठ और श्रेष्ठ सेवाभाव को समर्पित भी है।

                 भारतीय भारत में हों या विदेश में- अपनी संस्कृति के प्रति उनमें विशेष आकर्षण है। यह उनकी रगों में बसी है। दीवाली, तीज, होली, जन्माष्टमी, दुर्गा पूजा, गरबा, हवन, स्वतन्त्रता दिवस, इंडिस्क फेयर, पूजा, कीर्तन उनके जीवन सूत्र हैं। विदेशियों पर भारतीय संस्कृति का प्रभाव अनेक स्तरों पर दिखाई देता है। आध्यात्मिक स्तर पर देखें तो विदेशों में बने भारतीय मन्दिर न मात्र भारतीयों की धार्मिक- सांस्कृतिक संवेदनाओं के पोषक हैं, अपितु उन देशों के लोग भी इस आत्मिक दुनिया से प्रभावित दिखाई देते हैं। भारतीय रेस्टोरेन्ट तो वहाँ उद्योग की तरह पनप रहे हैं। भारतियों पर विदेशी संस्कृति का प्रभाव तो है ही। अखाद्य को खाने की संस्कृति, पीज़ा, सैंडविच की संस्कृति, पैंट- टॉप की संस्कृति, उन्मुक्त यौन/ लिव-इन की संस्कृति, सेंट पेट्रिक डे- यानी विदेशी विश्वासों पर आस्था की संस्कृति, सब की वैयक्तिकता के प्रति संवेदनशीलता की संस्कृति। कुल मिलाकर प्रवासी भारतीय की संस्कृति वैश्विक संस्कृति को सहेजे है।

 संदर्भ:
[1] अर्चना पेन्यूली, मीरा बनाम सिल्विया, आधारशिला-97, दिसम्बर 2011
[2] वही, अनुजा, हंस, जून 2005
[3] दिव्या माथुर, मेड इन इंडिया, गद्य कोश, http://gadyakosh.org/gk/मेड इन इंडिया / दिव्या माथुर
[4] उषा राजे सक्सेना, और जल गया उसका सर्वस्व, कथा बिम्ब, जनवरी-जून 2014
[5] दिव्या माथुर, एक शाम भर बातें, आक्रोश, हिन्दी बुक सेंटर, दिल्ली, 2000
[6] इला प्रसाद, कुंठा, हिन्दी चेतना, जनवरी 2009
[7] उषा प्रियम्वदा, शून्य, शून्य और अन्य कहानियाँ, राजकमल, दिल्ली
[8] पूर्णिमा वर्मन, उसकी दीवाली, अभिव्यक्ति, 01 नवम्बर 2005
[9] शैल अग्रवाल, दिये की लौ, अभिव्यक्ति, 15 अगस्त 2002
[10] कविता वाचक्नवी, रंगों का पंचांग, साहित्यकुंज, 18 मार्च 2008
[11] नीलम जैन, प्रश्न, अभिव्यक्ति, 9 अगस्त 2005
[12] अर्चना पेन्यूली, एक छोटी सी चाह,
[13] सुषम बेदी, हवन उर्फ  किरदारों के अवतार, सड़क की लय, नेशनल, दिल्ली, 2007
[14] इला प्रसाद, बैसाखियाँ, उस स्त्री का नाम, भावना, दिल्ली, 2010
[15] दिव्या माथुर, कथा सत्यनारायण की, पंगा तथा अन्य कहानियाँ, मेघा बुक्स, दिल्ली, 2009
[16] पूर्णिमा वर्मन, एक शहर जादू जादू, अभिव्यक्ति, 4 फरवरी 2013
[17] अनिल प्रभा कुमार, जिनकी गोद भराई नहीं होती, अभिव्यक्ति, 15 नवम्बर 2016
[18] उषा राजे सक्सेना, खुशबू रिश्तों की, संचेतना-164
[19] दिव्या माथुर, एक था मुर्गा, पंगा तथा अन्य कहानियाँ, मेघा बुक्स, दिल्ली, 2009
[20] सुषम बेदी, संगीत पार्टी, सड़क की लय, नेशनल, दिल्ली, 2007
[21] सुदर्शन प्रियदर्शिनी, देशान्तर, गद्य कोश, http://gadyakosh.org/gk/देशान्तर/ सुदर्शन प्रियदर्शिनी        
[22] सुषम बेदी, तीसरी आँख, पराग, दिल्ली, 2016
[23] सुषम बेदी, अवसान, सड़क की लय, नेशनल, दिल्ली, 2007
[24] सुदर्शन प्रियदर्शिनी, अख़बारवाला, वतन से दूर, पूर्णिमा वर्मन, http://abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/vatan_se_door/2015/akhbarwala.htm
[25] अर्चना पेन्यूली, माँ,
[26] दिव्या माथुर, उत्तरजीविता, हिन्दी नेस्ट, 5 मई 2004
[27] वही, कैसी विडम्बना,
[28] सुषम बेदी, विषकन्या, सड़क की लय, नेशनल, दिल्ली, 2007
[29] वही, विभक्त,
[30] वही, झाड़, चिड़िया और चील, पराग, दिल्ली, 1995
[31] उषा राजे सक्सेना, दरारों के बीच,
[32] सोमवीरा, डायरी के स्वर, दो आँखों वाले चेहरे, नेशनल, दिल्ली, 1968
[33] दिव्या माथुर, तुम नहीं सुधारोगी रीना, पंगा तथा अन्य कहानियाँ, मेघा बुक्स, दिल्ली, 2009

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