चक्रवत् - महिम ब'रा (असमिया कहानी)

लेखक: महिम ब'रा

अनुवादक: शिव किशोर तिवारी
महिम ब'रा
(6 जुलाई 1924 - 5 अगस्त 2016)
चित्र साभार: www.dy365.in
      असम साहित्य सभा के अध्यक्ष रह चुके महिम ब'रा (6 जुलाई 1924 - 5 अगस्त 2016) असमिया के नामी और लोकप्रिय कथाकार थे। उन्होंने अधिकतर ग्रामीण जीवन पर केंद्रित उपन्यास-कहानियों की रचना की। 2001 में उन्हें 'एधानी माहीर हाँही' उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।

      ब'रा की सबसे बड़ी विशेषता है सूक्ष्म दृष्टि-सम्पन्न, रोचक वर्णन शैली। वे अपनी कथा को रस लेकर, आराम से, धैर्यपूर्वक सुनाते हैं पर कहन का ढंग इतना आकर्षक होता है कि सुनने वाला एक क्षण के लिए भी अपना ध्यान नहीं हटा पाता।

      1960 के आसपास लिखी गई कहानी  चक्रवत् एक अकिंचन परिवार की करुण कथा है, पर ब'रा ने उसे जिस तरह प्रस्तुत किया है उसमें एक प्रकार की आत्मीय विनोदपटुता है जो कहानी के नायक की तरह जीवन को यथावत् ग्रहण करते हुए अपनी आशावादिता बनाये रखती है।

चक्रवत्

मरम्मती साइकिल को बीच सहन में लिटाकर बाप-पूत सभी उसके इर्दगिर्द घेरा बनाकर बैठे हैं। बाप तो अगले पहिए का ट्यूब निकालकर उसमें हवा भर एक कटोरे पानी में डुबा-डुबाकर 'लीक' ढूँढ़ रहे हैं। पुत्रगण चारों ओर से घेरकर इस काम को एकांत मन से देख रहे हैं। ट्यूब की लीक मिलते ही पानी में बुलबुले उठते हैं।ये बुलबुले बच्चों के कौतूहल का केंद्र हैं। इस बीच दो जगह चिप्पड़ लग चुके हैं। तीसरे के लिए बाप ने पुराने ट्यूब से रबर का एक टुकड़ा कैंची से गोलाकार काट लिया है। कैंची की धार की तरफ से घिसकर उस टुकड़े को बराबर कर रहे हैं।सलूसन का ट्यूब बगल में पड़ा है जिसका पेट अब तक खाली हो चुका है। मनि ने आहिस्ता हाथ बढ़ाकर ट्यूब को एक बार सहलाया। पिता ने कुछ नहीं कहा। फिर धीरे से उसे यहाँ से उठाकर वहाँ रखा। इस बार भी पिता ने कुछ नहीं कहा। शायद देखा ही न हो। अंतत: वह सलूसन को लेकर उठ आया। ढक्कन खोलकर ट्यूब को नाक तक ले गया। यह गंध उसे बड़ी अच्छी लगती है। सलूसन को लेकर एक अजीब-सा ख्याल उसे बराबर आता है - कि नया ट्यूब लेकर उसे लकड़ी के किसी टुकड़े पर रखकर जोर से मुक्के या किसी चीज से प्रहार करे और सलूसन छिटककर चारों ओर फैल जाय। फिलहाल इस इच्छा को दमित करने के अलावा कोई चारा नहीं है। बड़ा होकर पैसे कमायेगा तो पहला काम यही करेगा।

छोटे दो भाई सलूसन की ट्यूब को ललचाई नजरों से देख रहे थे। उन्हें भी हाथ में लेना है एक बार। दो नंबर का भाई बड़े-बूढ़ों की तरह बोला, “छूना नहीं, छूना नहीं, गड़बड़ हो जायेगी। देउता (पिता) को बोल दूँ क्या...”

मनि ने जल्दी से ट्यूब उसे पकड़ा दिया। छोटे ने लपककर खुद लेना चाहा।

शिव किशोर तिवारी
“देखो क्या कर दिया!” मँझला चिल्ला पड़ा, छीनाझपटी में ट्यूब दब गया था और सॉल्यूशन बाहर आ गया था। बाप के हाथ का रबर का टुकड़ा चिपकाने लायक हो गया तो उन्होंने बगल में ट्यूब को टटोला। न मिला तो ऊपर देखा और माजरा सामने आया। गरजकर उठे, मुँह से सलूसन की तरह शब्द निकलने लगे, “तुम लोगों का यहाँ क्या काम? बिल्ली, चूहे, सियार, कुकुर की औलाद सब!" निकले हुए सलूसन को रबर के टुकड़े पर लगाकर जो बचा उसे वापस ट्यूब के मुँह में ठेलने की चेष्टा की। छोटे दोनों लड़के इस बीच बिजली की सी फुर्ती से भाग लिये। केवल मनि बगलें झाँकता बैठा रहा। बाप ने घूरकर देखा उसे, “तंबाकू का क्या हुआ रे बड़मनई के बेटे? एक पहर से एक चिलम तंबाकू के लिए बोल-बोलकर मुँह दुख गया। गंधैले!  भुक्खड़! खाने के बदले कुछ कर भी दिया कर कभी। खाने को तो सब चाहिए। कितनी बार खा चुका अब तक?”

बात बीच में रह गई। गृहस्वामिनी एक हाथ में हुक्का और दूसरे में चाय का गिलास लिए प्रकट हुईं। वाग्धारा बेटे को छोड़कर पत्नी की ओर मुड़ गई, “अब जाके फुरसत मिली बड़मनई की बेटी को। इतनी देर से बाइसिकल बना बनाकर हलकान हो गये इधर।”

“तो मैं कौन सा आराम कर रही थी? ढेकी पर दूसरी कुटनी का धान पड़ा है। करघा भी कितना तंग कर रहा है!” गृहिणी का उत्तर भी उसी सुर में आया। साथ-साथ चाय का गिलास आगे कर दिया। दो घूँट पीकर पति चिप्पड़ जोड़ने में लगे - सलूसन सूख रहा था।

गुस्से से जवाब देने का थोड़ा अफसोस हुआ गृहिणी को। फसाद की जड़ तो यह साइकिल है, इसलिए अपना गुस्सा आखिर उस पर उतारा, “ये बाईसकल या तेईसकल जो भी है कितनी बार खराब होती है जी? इस पाप को कुल्हाड़ी से काटकर फेंक क्यों नहीं देते? जब देखो, दिन में सौ बार उसी में लगे हैं! देख-देखकर थक गई मैं तो।"  गृहस्वामी ने भौंहें सिकोड़कर उनकी ओर देखा तो दूसरी ओर देखकर बात पूरी की, “हाँ नहीं तो!”

“हुँह! जमीन नहीं, गाय-गोरू नहीं, नौकरी नहीं। ये बाइसिकल ही खिला रही है। उसका अनादर!” गृहस्वामी बड़बड़ा उठे। चाय खत्म होने पर हुक्का पकड़ाकर और चाय का गिलास उठाकर गृहिणी चली गईं।

गृहस्वामी कहते हैं बाइसकल, गृहस्वामिनी कहती हैं तेईसकल, मनि कभी साइकल कभी सार्कल। मूलत: किसी अच्छी कंपनी की थी। गृहस्वामी हरिनाथ पहले एक चाय कंपनी में नौकर लगे थे - कम उम्र के मजदूरों के मुहर्रिर। वहीं एक अंग्रेज साहब से यह साइकिल खरीदी थी। इस इलाके में तब इसे लेकर कुल जमा दो साइकिलें थीं। हरिनाथ को भी कम गुमान नहीं था इस बात का।

तब से कई साल बीत चुके। साइकिल का अस्थिपंजर याने फ्रेम भर हरिनाथ के गौरवशाली अतीत का साक्षी रह गया। नाना नई-नई कंपनियों के अनेक पार्टों को लगाकर साइकिल अब वर्णसंकर हो चुकी है। हरिनाथ की नौकरी छूटे दस साल से ऊपर हुआ। नये शिक्षित युवा आ गये। बागानों की नौकरियाँ उन्होंने दखल कर लीं। हरिनाथ को अब कोई नहीं रखता। फिर भी कहीं नौकरी की खबर मिलते ही इस साइकिल पर ही सवार होकर दौड़ते हैं। नौकरी नहीं मिलती। लेकिन बागान में कोई पुराना परिचित कर्मचारी मिल जाता है। कोई रुपया दो रुपया देकर मदद कर देता है। किसी के यहाँ से खराब पड़े टायर, ट्यूब, फ्री व्हील वगैरह मिल जाते हैं। घर वापस आकर हफ्ते भर रेंच, हथौड़ी लेकर कारखाना चलता है। उसके बाद साइकिल से हाट-बाजार का काम। एक बार फिर सुनाई पड़ता है नौकरी खाली हुई है - शायद 50-60 मील दूर के किसी बागान में। पुन: साइकिल से यात्रा आरंभ।

आज 15-20 साल से यह दुपहिया वाहन हरिनाथ के जीवन का सुख-दु:ख का साथी है। इस समय पाँच प्राणियों का परिवार उसी पर निर्भर है। जर-जमीन नहीं है। पत्नी कपड़ा बुनती है जिसे हरिनाथ स्थानीय बाजार में या पास के बागानों में बेचता है। फिर नये कपड़े बुनने के लिए सूत लाता है। यही क्रम। सब साइकिल के सहारे। इसकी निंदा हरिनाथ को सह्य नहीं है; अर्जुन चाहे गांडीव की निंदा सुन लेता।

इस बीच साइकिल की मरम्मत पूरी हुई। ट्यूब को टायर में वापस डालकर टायर को रिम पर चढ़ाना है। इस काम के लिए मनि का सहयोग अनिवार्य है। टायर का आखिरी हिस्सा चढ़ाने के लिए दैवी कोटि की युक्ति लगती है। पुराना टायर, जरा जोर लगाने पर "थ्रेड" छोड़ने लगता है। रेंच एक ही है तो लोहे का कोई चपटा टुकड़ा लेकर उससे टायर का एक सिरा रिम में फँसाकर दबाये रखना पड़ता है। यह काम मनि का है। पिता रेंच की मदद से बाकी का टायर रिम पर चढ़ाते हैं। मनि अपने इष्टदेव का नाम जपता लोहे के टुकड़े को यथास्थान जमाये रखता है। बराबर डर रहता है फिसल न जाय। साथ-साथ पिता के चेहरे पर नजर रखता है, भाव- परिवर्तन लक्ष्य करता रहता है। पिता की आँखों के पास की चमड़ी कपड़े पर दर्जी की बनाई चुन्नट जैसी सिकुड़ आई है। मनि की आँखों के पास की त्वचा भी सिकुड़ जाती है। बाप की गरदन की शिरा फूल उठती है। मनि की भी फूल जाती है। अब पिता के मुख से एक के बाद एक प्राग्वैदिक श्लोक बाहर होंगे; मनि भी मन ही मन वही शब्द दुहराता जायेगा।

साइकिल 'फिट' हुई। अब मनि उसे पकड़कर खड़ा करेगा। पिता हवा भरेंगे। मनि के पैरों में असह्य चुनचुनी महसस होने लगी, क्योंकि उसने बिना सीट पर बैठे पेडल मारकर साइकिल चलाना सीख लिया है। ज्यादा दिन नहीं हुए अभी।

ट्रिंग...ट्रिंग...

प्रताप आया है, मनि का दोस्त। तीन-चार दिन पहले ही साइकिल की सीट पर बैठने लायक हुआ है। अब भी पेडल घुमाने के लिए पैर छोटा पड़ रहा है।उसी ढंग से भाई की नई रेली साइकिल चलाता आया है। उसका बड़ा भाई पास के चाय बागान में काम करता है। शनिवार-शनिवार घर आता है। आज आया होगा।
मनि ने दोनों हाथों से साइकिल को पकड़े- पकड़े सिर घुमाकर प्रताप की ओर देखा। प्रताप पास आकर उतरा।

“आ प्रताप, तू ऊपर चढ़ना सीख गया?” मनि के स्वर में सम्मान था।

“कुछ बिगड़ा है क्या?” अर्थात् मनि की साहकिल की खबर पूछी।

मनि ने बिना बोले आगे के पहिये की ओर सिर से इशारा किया।

हवा भरना पूरा हुआ। हरिनाथ ने प्रताप की ओर देखा, “भाई आया है क्या?”

“हाँ।”

हरिनाथ जैसे अपने आप से कुछ कह रहा हो, इस तरह भुनभुन करता रहा -- साइकिल दिखाने आया है! पता है इस जवार में पहली साइकिल चलाकर फलाने ने ही दिखाई थी? -- फलाने माने हरिनाथ स्वयं -- आजकल जिसे देखो नई साइकिल चलाता घूम रहा है। लेकिन जितनी भी नई साइकिल हो, बस ऊपर की चमक-दमक है। हरिनाथ की
साइकिल का लोहा लेकिन खाँटी है, असल हार्डी मार्का, ऐसी दूसरी साइकिल आजकल कहाँ मिलेगी? खुद अंग्रेज साहब की साइकिल!

प्रताप को न यह सब पता है न पता होने की उसकी उम्र है। वह हरिनाथ की बातों का मतलब नहीं समझा। वह तो मनि को यह दिखाने आया था कि अब सीट पर बैठकर चलाना सीख गया है। यह काम पूरा हुआ। वह साइकिल पर वापस सवार होकर चला गया।

हरिनाथ ने रेंच, नट और बाकी लोहा-लक्कड़ जमा करके सामने रखे लिली बिस्कुट के छोटे डब्बे में डाल दिये। साइकिल को इसी होमियोपैथिक बक्से ने जिला रखा है। उसके सभी रोगों की दवा इस बक्से के अंदर है। एक हाथ में बक्सा और दूसरे में हुक्का लिए हरिनाथ अंदर गया। मनि साइकिल पर चढ़ना चाहता था पर रुक गया। साइकिल को दीवार से लगे एक खम्भे पर अटकाकर वह थोड़े फटे – पुराने कपडे ढूंढ लाया। साथ – साथ अन्दर से किरासन की ढिबरी भी लाया। कपड़ा थोड़े से किरासन में भिगोकर वह एक ओर से साइकिल को रगड़ने में जुटा। फ्रीव्हील के इर्द-गिर्द बहुत मैल जमा थी। एक सींक लेकर जहाँ तक हो सका खोद-खोदकर साफ़ किया। बीच की संकरी जगह में आरपार एक फटा कपड़ा डालकर दोनों सिरों से पकड़कर घिस दिया। स्पोकों में किरासिन लगाकर ठीक से सफाई कर दी। रिंग, एक्सिल, क्रैंक, पेडल, यहाँ तक कि फ्रेम भी पूरी ताकत लगाकर एक ओर से साफ़ कर गया। तेल लेकिन नहीं दे पाया। माँ का इस्तेमाली नारियल तेल थोड़ा मिल जाता! पिछले सप्ताह ही नारियल तेल ख़त्म हो गया, माँ कह भी चुकी है कई बार। कड़वा तेल और किरासन मिलाकर लगाने से काम चलेगा। वह आयल कैन उठा लाया और किरासिन – कड़वे तेल का मिश्रण लगाने लगा। पीछे के पहिये में, फ्रीव्हील में, पेडल में, फोर्क में भी। अब वह साइकिल लेकर एक चक्कर लगा सकता है।

आयल कैन को वापस रखकर साइकिल जहाँ टिका रखी थी वहाँ से उठाकर हेंडिल सीधा किया। दर्द से परेशान बीमार जैसे सात सुर में बाप-बाप करता है वैसे ही साइकिल भी चिल्ला उठी। हर जोड़ में दर्द है। हर जोड़ से चीख निकलती है। कितना तेल लगाया पर चीख गई नहीं। मनि का मन टूट गया। तेल-मालिश के बाद साइकिल का रूप बेतरतीब ढंग से पाउडर लगे, तेल-सने मुँह की तरह हो गया था। प्रताप की साइकिल का फ्रीव्हील कैसे टिक-टिक करता चलता है! चेन को ज़रा सा घुमा देने से क्या कर्र कर्र की आवाज निकलती है! लगता है कोई मुँह में चबेना चबा रहा हो। और अपनी साइकिल! जहाँ आवाज आनी चाहिए – यानी फ्रीव्हील वहाँ तो पूरी गूंगी; उसके अलावा पेडल से सैडल तक, मडगार्ड से हैंडल तक, फोर्क, क्रैंक, व्हील सब कुछ एक साथ चिल्ला उठते हैं। जो भी हो, मौक़ा है तो एक चक्कर चला ही आया जाय।

कड़ कड़ कड़त।

चेन बीच-बीच में दांतों के ऊपर से फिसल जाती है।

थोड़ी दूर जाकर लौट आया। पेडल पर पैर रखने के बाद घुमा नहीं पाया। बहुत बार कोशिश करके आखिर रास्ते के किनारे के गड्ढे में जा घुसा। आगे की पहिए में कचकच शब्द क्यों आ रहा है? आगे के पहिए की नाना प्रकार की आवाजें उसने सुनी हैं। उल्लू जैसी आवाज दिन में 18 बार। लेकिन ऐसी आवाज तो नहीं सुनी।

पिता ने अंदर से ही वह आवाज सुनी। बाहर आ गये। हाथ में हुक्का और जबान पर हिंदी, “कुछ काम का आदमी नहीं है तुम! रिंच वाला बक्सा ले आ - चूहे का बच्चा!”

पिता इसी तरह कभी-कभी हिंदी बोलते हैं। खूब गुस्सा आने पर भी और मौज में भी। कोन ढीला होने की वजह से पहिया ढीला होकर रिम फोर्क के बार में लग रहा है। पहिया मनि को यही बताना चाह रहा था।

कोन को टाइट किया गया।

करीब एक घंटे बाद साइकिल बाजार के मार्ग पर थी। कैरियर पर एक बोरा पान-सुपाड़ी, हैंडिल बार पर लटके साग-सब्जी, केले के फूल, नींबू आदि अनेक प्रकार का बिकाऊ सामान। एक फटे झोले के अन्दर दो-एक बेचने का माल, दो-एक खाली बोरे, फटे कपडे, किरासिन, कड़वा तेल और नारियल तेल लाने के लिए खाली बोतलें और वह विख्यात होमियोपैथिक बक्सा। चार अदद नारियल चार अंगुल छिलका उतारकर अपने ही छिलके से हैंडल में बाँध दिए गए हैं। दो मील का रास्ता है बाजार का।
पिता हैंडल पकड़कर साइकिल को संभाले हैं और मनि कैरियर पर रखी चीजों पर एक हाथ रखे पीछे चल रहा है। गड्ढा आदि आने पर वह पीछे से धक्का लगा देता है। चौथाई मील दूर से जानने वाले समझ लेते हैं कि बाप-बेटे की साइकिल आ रही है या जा रही है। उस दिन मनि के हाथों तेल-मालिश होने के बाद साइकिल की चीखें कम होने के बजाय बढ़ गयी थीं, सारे रास्ते हाय-हाय करती जा रही है।

बाजार में बिक्री अच्छी हुई। फ़ायदा हुआ। गाँव में बेचने लायक कुछ खरीद सकते हैं क्या, यह देखना शुरू किया। सूरन, शकरकंदी, नागा चटाइयाँ आदि कुछ चीजों के दाम आज कम हैं। गाँव में ले जाकर बेचने से लाभ होगा। मनि ने भाइयों के लिए एक पैसे का लाचीदाना खरीद लिया – युद्ध की मंहगाई के पहले का समय था, एक पैसे की खरीद-बिक्री अभी चलती थी।

लगभग पहले जैसा बोझ लेकर साइकिल वापस लौटी। घर पहुंच ही गए थे, केवल चौथाई मील और। घर में माँ बेटे कान लगाकर साइकिल की आवाज सुन रहे होंगे। पर वह मूल्यवान आवाज सहसा बंद हो गई।

“धक्का दे धक्का!”

मनि का हाथ पैंट की जेब में मिठाइयों पर था। थोड़ा खा लेने से भी भाइयों के लिए कम पड़ जाएगा। जेब के भीतर नाखूनों से मिठाइयों को चिकोटी-सी काटता सारे रास्ते अपनी जीभ का पानी रोके हुए था। जल्दी-जल्दी साइकिल को धक्का देने के लिए हाथ निकाला तो मिठाइयां बहुत सी बाहर गिर गई। फिर जेब की एक तरफ की सिलाई निकल गई है तो वह भी सूखे ताल के पेंदे जैसी हो रही है, नीचे की ओर जरा-सा कुछ रखा जा सकता है। हाथ हटाया तो आफत!

किन्तु साइकिल के पहिये अचल होने की तुलना में यह सब कुछ भी नहीं था। पहिये लेकिन घूमे नहीं। पिछले चक्के के कोन जाम हो गए हैं। पिता के मुँह से पहले हिंदी, फिर प्राग्वैदिक संस्कृत निकली। उ...हूँ....। आज साइकिल जुलू भाषा में भी गाली सुनने को तैयार है। बोझ कम करके साईंकिल को दो बार जोर से ठोकर मारी। बेकार! मनि ने पेडल चलाकर देखा। ओ... फ्रीव्हील तो दोनों तरफ घूम रहा है। दाहिनी ओर घूमने से साइकिल आगे चलेगी, बाई ओर घुमाओ तो सिर्फ फ्रीव्हील चलेगा, इस समय वह दोनों तरफ “फ्री” है। ...गया जहन्नुम में! स्प्रिंग टूटा है जरूर। गुस्से में हरिनाथ ने पीछे वाले पहिये को दो बार और ठोकर मारी। पहले भी बीच-बीच में फ्रीव्हील काम करना बंद कर चुका है।  स्प्रिंग नहीं पकड़ता, पर ठोकर मारने से ठीक हो जाता है। अभी तो किसी तरह पहिया घूमे।

हरिनाथ ने साइकिल को जोर से पीछे की ओर धक्का दिया। कोन कुछ ढीले हुए। थोड़ी देर इसी तरह पीछे की ओर ठेलकर जब पहिया घूमने लगा तो फिर आगे की ओर चला। 15-20 हाथ आगे गया। फिर चक्का जाम! पिछली पद्धति फिर अपनाई। फिर थोड़ी दूर चले। फिर जाम! चार-पांच बार इस तरह आगे-पीछे करके घर के पास पहुँच गए। फिर जाम! घर जाकर होमियोपैथी करनी पड़ेगी। लेकिन फिलहाल आसुरी चिकित्सा चाहिए। गुस्से में जोर लगाकर साइकिल को खींचा। बेटा मिठाइयों की उम्मीद पूरी तरह छोड़ दोनों हाथों से धक्का देने लगा।  कड़त कड़! बाल शायद टूट गए हैं। लेकिन साइकिल चल दी। साथ-साथ रिम पर टन टन कुछ टकराने की आवाज आई। नहीं तो, मनि की जेब से लाचीदाने की गोलियाँ नहीं गिरी उधर। पीछे के पहिये के बाल नाच-नाच बाहर निकलने लगे। जरूर कोन टूट गए हैं या हब का घाट गया। मनि ने एक फटे कागज़ में बाल बटोरकर जमा किये। बहुत-से नहीं मिले। जो मिल जाय! घर का सहन आ गया। अब साइकिल अन्दर तक कैसे जाय?

हरिनाथ ने बेटे को हैंडिल पकड़ाकर पीछे का पहिया उठा लिया। अगला पहिया रोते – रोते और पिछला मुस्कराते हुए अंदर दाखिल हुए। सात दिन सात रात होम्योपैथिक, आसुरी इत्यादि सब प्रकार की चिकित्सा चली। ठक ठक, ठाँय-ठाँय की आवाज से आधी रात तक पड़ोसियों की नींद हराम हुई। पहली दो रातों तक तो मनि की माँ ने सोने की प्रबल चेष्टा की परन्तु अंत में हारकर “तेईसकल” की छत्तीस पुश्तों को सरापते हुए रेशम का सूत कातने बैठी। मनि के सोने का तो सवाल नहीं था। साइकिल की उसे जरूरत है और मरम्मत का काम देखना उसे अच्छा लगता है। पिता की बुद्धिमता में उसकी गहरी आस्था है। पिता साइकिल में जिस तरह पैबंद लगाते जाते हैं, उसे विश्वास है कि वे चाहें तो फ्री व्हील, चेन आदि दो – एक चीजें छोड़कर बाकी एक साइकिल घर में ही बना लें। बायाँ पेडल निकल गया, एक टुकड़ा काठ लगा दिया, हो गया पेडल। चेन टूट गई, एक कील ठोक दी। फ्री व्हील का स्प्रिंग सफाई से बदल दिया, चल गया फ्री व्हील। एक बार सुनते हैं कहीं भोल्टू (वाल्व ट्यूब या ट्यूब वाल्व) टूट गया तो पिता ने एक जोंक से काम चला लिया था। बाईं  ओर का क्रैंक एक्सल घिस जाने से पूरा टाइट नहीं हो रहा था तो टीन का एक टुकड़ा काटकर एक्सल में लपेट दिया। बस फिर हो गया! काटर पिन ढीला हो गया था, वही उपाय – टीन के टुकडे का पैबंद।

 सात दिन पहिया उठाये पड़ी रही साइकिल। सात दिन बाद दीवाल के सहारे खड़ी हुई।

दोपहर को खाना खाने के बाद हरिनाथ ने सात दिन की थकान दूर करने की चेष्टा की। मनि एक ओर बैठा। दूसरी ओर उसकी माँ तकली लिए बैठी। छोटे भाई दो बी.बी. कप (साइकिल के छोटे पार्ट) लेकर  “घिला खेल” खेल रहे हैं। पति, पत्नी और मनि तीनों के मुँह पर आश्वस्ति का भाव है। साइकिल ठीक हुई कम से कम। सौभाग्य से पिछले बाजार के दिन फायदा हुआ था तो चावल थोडा अधिक खरीद लाये थे। दो बेला खाते तो फिर भी कम पड़ गया होता। लेकिन चार-पांच साल से एक बेला ही खाते आये हैं। इसलिए घर में सभी का यही स्वाभाविक अभ्यास हो गया है। मनि समझने बूझने लायक हो गया है, पर बाकी दोनों भाई तो यही जानते हैं कि लोग एक बेला ही खाते हैं।

मनि ने इतना कुछ नहीं सोचा। उसकी नजर दीवार से टिकाकर रखी साइकिल पर है। बहुत मेहनत करके भी वह उसे चमका नहीं पाया। हैंडिल बार कैसा कुष्ठरोगी जैसा हो गया है! पहिये थोड़ा दबे हुए हैं। टायर में कोई तीन चिप्पड़ हैं। दो जगह भीतर टायर के टुकडे लगाकर डबल टायर बनाया हुआ है। इन जगहों में टायर की तोंद-सी निकल आई है। “फुल पम्प” देकर पहियों को टनाटन रखें तब तो सर-सर चलती साइकिल। ज्यादा हवा देने से टायर निकल भागेंगे या “बर्स्ट” करेंगे। प्रताप की साइकिल जिधर भी जाती है, टायरों के बीच की डिजाइन की छाप रास्ते पर छोड़ जाती है। प्रताप की साइकिल के स्पोक चलते समय कैसे चमकते रहते हैं! उस दिन प्रताप ने उसे थोड़ी देर चलाने दिया था। समझ में ही नहीं आया कि पेडल मारा या साइकिल अपने आप चल गई। अपनी साइकिल में सात बार पेडल मारो तो पहिया ज्यादा से ज्यादा चार बार घूमता है। .... देखते देखते साइकिल ब्रैंड न्यू रेली बन गयी।

“मुझे कल सुबह ही एक बागान में जाना है। सुना है वहाँ सारे स्टाफ को निकाल दिया गया है और नई भर्ती करेंगे” बड़ी देर के बाद हरिनाथ ने बात शुरू की, “अभी रामनाथ बोल गया है। वह भी जाएगा।“ गृहणी को इसमे कोई नई बात नहीं दिखी। ऐसी जगहें कित्तनी बार खाली हुई हैं! मिलते मिलते हर बार रह जाता है। कितने साहब लोगों ने कितनी बार पता मांगकर रख लिया है। किन्तु मनि की आँखे एकदम चमक उठीं। ढेर सारी नौकरियाँ खाली हुई हैं? एक तो मिल ही जायेगी तब! इस बार जरूर मिलेगी। “इस बार जरूर मिलेगी”, उसके मुँह से हठात निकल गया। “ठीक है, बाल भगवान के मुँह से बात निकली है तो...।” देखूँ तो मनि, एक उंगली पकड़ तो। गुलाब और कमल।” हरिनाथ इस तरह से सगुन देखता है। दाहिने हाथ की तर्जनी और मध्यमा को नाक के पास रख फिर मनि की ओर बढ़ा देता है – गुलाब या कमल, या ऐसे कोई दो नाम। एक को पकड़े तो काम होगा, दूसरे को पकड़े तो नहीं होगा।

मनि ने भगवान के अनेक नामों में से जितने याद आये, सबका स्मरण कर खट से एक उंगली पकड़ ली।

“गुलाब। मिलेगा, मिलने की उम्मीद है।”

मनि तो जैसे अभी कूदकर साइकिल पर चढ़ जाएगा।

“नौकरी मिलेगी तो पहली तनख्वाह से नई साइकिल लेंगे।” बाकी दोनों भाई भी अब तक समझ गए थे कि कुछ पाने की बात चल रही है।

“मेरे लिए कमीज।”

“मेरे लिए जूते।” सबसे छोटा भी बोला। माँ ने देखा कि बात को गंभीरता से भी लिया जा सकता है। कोई ठीक नहीं, मिल भी सकती है नौकरी। फिर बच्चों पर गुस्सा आया, “अभी से शुरू हो गए – यह चाहिए, वह चाहिए। यही सब कुलच्छनी हैं। नहीं तो मिलने वाली नौकरी हाथ से निकल जाय? किसी का एक बच्चा होता है – ऐसा कि धन धान्य से घर भर जाता है। और हमारे ये तीन? एक और की उम्मीद भी दिख रही है। क्या हुआ? सब चूने की हांड़ी!”

“ए कुलच्छनी अभागों! और कुछ भी मांग लो! अधिकई तो देखो! खाने को पूरा नहीं पड़ता, शरीर पर लत्ता नहीं, राजा की तीन साल की मालगुजारी उधार करके घर जाने की नौबत आने वाली है, पढ़ने के लिए फीस नहीं, किताब नहीं। और पहले नई साइकिल चाहिए!”

गृहस्वामी बातें सुन रहे थे। आजकल बुरा नहीं लगता। इस तरह की बातों में एक तरह का मजा ही आता है। पर साइकिल की बात पर गंभीर हो गये, “अंग्रेज साहब की साइकिल है। असली स्टील। पूरा हार्डी। रंग कर देने से हो गयी नई। चलती का नाम गाड़ी!”

“नहीं, ये टिक टिक नहीं बोलती, ब्रेक नहीं है, बेल नहीं... चलाने में कितनी सख्त है!”

“अरे सख्त ही तो चाहिए। ढीली क्यों चाहिए? नया एक फ्री व्हील लगा देने से टिक टिक बोलेगी। कहाँ – मैं चलाता हूँ तो ब्रेक-फ्रेक कुछ लगता है? तू चलाना नहीं जानता। तेरे चलाने से खराब लगती है साइकिल।”

मनि के कान में एक बात नहीं गयी। वह नई बाईस इंच की साइकिल पर बैठकर भन्न-भन्न घूम रहा है, वह भी सीट पर बैठकर। पेडल पूरा घुमा लेता है। प्रताप जैसी ऊँची साइकिल नहीं है।
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रामनाथ और हरिनाथ की नौकरी की दिशा में साइकिल यात्रा आरम्भ हुई। दोनों एक ही उम्र के हैं। लगभग एक ही साथ दोनों की नौकरियाँ भी छूटी थीं। ज्यादातर नौकरी खोने वाले न इधर के होते है न उधर के। न घर की खेती कर सकते हैं, न कोई धंधा–रोजगार। नौकरी दुबारा मिलती नहीं। रामनाथ की थोड़ी जमीन थी। स्त्री के पास गहने भी थे। साथ में थी युवाकाल से शराब की लत। जमीन, जेवर और शराब एक साथ नहीं रह पाते, सो पहली दो चीजें जल्दी ही घर छोड़ गयीं। रामनाथ की जबर्दस्त मस्तमिजाजी लेकिन काबू में नहीं आई। अब भी बाबू साहब ही हैं।

रामनाथ के पास भी साइकिल है। इस इलाके में जिन दो लोगों ने पहले साइकिल के दर्शन कराये, उनमें दूसरे रामनाथ थे। रामनाथ को साइकिल मरम्मत का काम नहीं आता, इसलिए उसकी साइकिल की हालत और खराब है। बेल और ब्रेक नाम की वस्तुएँ भी साइकिल ईजाद करने वाले ने बनाई थीं, रामनाथ की साइकिल (रामनाथ “बाइक” कहता है) को देखकर अंदाजा करना कठिन है। पिछले पहिये में मडगार्ड नहीं है, अगले में मडगार्ड – जैसा कुछ सड़ा-गला एक फुट लंबा पदार्थ बचा हुआ है। वही बेल और ब्रेक का काम करता है। पैर उठाकर उसे जोर से दबाने से पहिया रुक जाता है। दोनों टायर सांप की पीठ जैसे चिकने और कागज़ जैसे पतले हो गए हैं। पिछले चक्के में कई स्पोक गायब हैं। इस वजह से रिम थोड़ा झुका हुआ है। चलते हुए पीछे से देखकर लगता है जैसे भावना नाट्य का सूत्रधार नाचता चल रहा है। सीट पर किसिम किसिम का कपड़ा लपेटकर उसे मजबूत और आरामदेह बनाया गया है। इस अवस्था में पृथ्वी की प्राय: सभी वस्तुएं अचल हो जायेंगी पर रामनाथ की साइकिल अपने धर्म का पालन किये जा रही है।

हाँ, रामनाथ को भी नौकरी मिलनी चाहिए। मनि सोच रहा है। रामनाथ को बच्चे काका कहते है। रामनाथ का लड़का जीवन मनि का हमउम्र और दोस्त है। उस बेचारे के पास भी साइकिल नहीं है। दोनों ही नई साइकिलें लेंगे। हफ्ते भर तक और कुछ काम नहीं करेंगे, साइकिल पर बैठकर घूमना और घूमना।

उसे साफ़ दिख रहा है -  देउता (पिता) और काका साइकिल पर बीस मील चल चुके हैं। चाय बागान के गेट पर साहब इन्तजार कर रहा है। दोनों फट से साइकिल से उतरकर सलाम करते हैं। साहब “हैंडशेक” करता है। तत्काल आफिस में बुला लेता है। देउता की साइकिल की ओर साहब कई बार देख चुका है। जो भी हो, अंग्रेज साहब की साइकिल है। पिता ने साथ-साथ हिंदी–अंग्रेजी में साहब को बता दिया है कि फाक्स साहब की साइकिल थी। उस जमाने में साहब ने पंद्रह रुपये कीमत मांगी थी। “ए वेरी गुड साइकिल साहब, खांटी स्टील, व्हाट माई सन...”

धत, उसकी बात क्यों करेंगे वे लोग? वैसे भी साहब साइकिल की मर्यादा की रक्षा करेगा। उसके बाद “अप्वाइंटेड।”

नौकरी से सम्बंधित शब्दों के अर्थ माँ-बेटे सभी जानने लगे हैं।

उस यात्रा में पहली बार रामनाथ की साइकिल अचल हुई। आगे के पहिये का ट्यूब फट गया। हरिनाथ का क्रैंक व्हील भी अनुशासन तोड़ने लगा। बिना दाँत के बूढ़े जैसा हो गया। चेन पकड़ नहीं रही। रास्ते के किनारे एक पेड़ की छाया में दोनों बैठे। बीडी पीते-पीते हरिनाथ के खजाने का मुँह खुला। बक्सा बाहर करके रेंच, पलास, हथौड़ी सब निकाले गये। एक घंटे में रामनाथ के ट्यूब की मरम्मत पूरी हुई। लेकिन हरिनाथ का क्रैंक व्हील ठीक नहीं किया जा सका। अब तय हुआ कि रामनाथ साइकिल चलाएगा, हरिनाथ अपनी साइकिल पर बैठकर रामनाथ को पकडे चलेगा। पाँच मील का रास्ता है बस। रामनाथ खींच ले जाएगा।

मनि ने दो उंगलिया थोड़ी देर नाक के पास रखकर आँख बंद करके जाप किया। एक बकुल एक टगर। बकुल को पकड़ने से नौकरी मिलेगी, टगर को पकड़ने से नहीं मिलेगी। छोटे भाई को प्यार से बुलाकर उंगलिया उसके सामने कर दीं। - “पकड़ तो भोला, सही पकड़ेगा तो लाचीदाना मिलेगा। उस दिन जो खाया था।” लाचीदाने की उम्मीद में भोला ने दोनों उंगलियाँ जोर से पकड़ ली।

“गेरेला (एक जंगली जानवर), बिडाल, मेकुरी (बिल्ली)! एक पकड़!”

दूसरी बार फिर मंत्र मारकर उंगलियाँ आगे की। इस बार टगर को पकड़ने से मिलेगी, बकुल को पकड़ने से नहीं मिलेगी। भोला गाली खाकर पहले ही डरा हुआ था, डरते-डरते बकुल को पकड़ा। तीन बार में पक्का होता है। इसलिए आखिरी बार मंत्र पढ़कर उंगलिया बढ़ाई – कमल और जवा। कमल से मिलेगी, जवा से नहीं मिलेगी। कमल वाली उंगली चालाकी से थोड़ी आगे कर दी। कमल – मिल गयी नौकरी। मिलेगी ही मिलेगी।

माँ करघे पर बैठी सुन रही थी। बाल भगवान की बात! किस्मत बदलने में कितना वक्त लगता है? बच्चों के पास आ कर खड़ी हो गई। मनि ख़ुशी से चिल्ला उठा।

“उस दिन का तला घिला पिठा (पुआ) है क्या, देख। एक भोला को दे। उसने सही उंगली पकड़ दी।”

“चार ठो पुए इतने बच्चों के बीच बचेंगे। टपाटप खा लिए, ख़त्म हुए। अच्छा, दस दाने धान ले आ तो, मै ‘मंगल’ देखूंगी।” मनि दौड़कर एक मुट्ठी धान ले आया। बच्चे घेरकर बैठे।

धान के कुछ दाने लेकर माँ ने मंत्र पढ़ा, अर्थात, भगवान के कई नाम दुहराए। उसके बाद धान के दाने जमीन पर बिखेर दिये। एक जोड़ा, दो जोड़ा, तीन जोड़ा, ... सब जोड़े ही मिले। ‘मंगल’ तो कह रहा है नहीं मिलेगी। दूसरी बार देखते हैं। इस बार ताक हो गया – एक दाना अकेला बचा। सभी उत्साहित हुए।

अब जमीन में कई रेखाएँ खींचकर गिनी गईं। इस बार भी ताक निकला। मिलेगी नौकरी। पिता आज लौटने वाले हैं। नौकरी मिलनी चाहिए। ईश्वर की दयादृष्टि हो जाय, बस। मनि की आँखें नई साइकिल के स्पोक की तरह चमक उठीं।

बहुत दूर से कोई आवाज आ रही है। अपनी साइकिल ही है। माँ-बेटे उत्कर्ण हुए। यह आवाज उनकी साइकिल की ही होगी। मनि बाहर दौड़ा। हाँ, पिता साइकिल ठेलते आ रहे हैं। साइकिल के अनेक पार्ट – क्रैंक व्हील, टायर, पेडल, ट्यूब – साइकिल पर जहाँ-तहाँ लटके हैं। साइकिल से टकराकर लोहे की चीजें एक अद्भुत संगीत रच रही हैं। रामनाथ काका भी अपनी साइकिल ठेलकर ला रहे हैं। उनके फोर्क की दोनों तरफ बाँस की खपच्चियाँ बंधी हुई हैं। फोर्क टूट गया शायद। हिलते डुलते आ रहे हैं।
मनि ने आगे बढ़कर साइकिल पकड़ी। रामनाथ बाहर-बाहर अपने घर चला गया। साइकिल पार्ट बहुत आये हैं। बागान के किसी कर्मचारी मित्र के यहाँ फालतू पड़े पार्ट। पक्का है कि घर फिर एक हफ्ते के लिए कारखाने में तब्दील हो जाएगा।

माँ जल्दी से एक कप चाय बना लाई। चिलम तैयार करके ला दी। मनि सामान बाहर करने लगा – चावल, चीनी की दो पोटलियाँ भी बैग में आई है। शायद खरीदकर लाये हैं। थोड़ी चाय है। बागान के किसी कर्मचारी से मांगकर लाये होंगे। इसी तरह लाते है अक्सर।

लेकिन यह क्या? फ्रेम का जइन (ज्वाइंट) तो खुल गया है। उँगली लगाकर जायजा लिया। पिता ने डांटकर कहा, “रहने दे, रहने दे। अपना काम कर। उंगली से छूकर जइन ठीक करने का कोई मंत्र नहीं है। मिस्त्री के पास ले जाकर वेल्डिंग करानी पड़ेगी। फ्रेम में कोई खराबी नहीं है – असल हार्डी!”

पहिया, सीट, क्रैंक, सब निकालकर केवल फ्रेम दीवाल से टिकाकर रख दिया गया,  फिर भोजन–पानी; तब तक सूरज ढलने लगा था। आज फ्रेम को मिस्त्री के यहाँ ले जाना न हो पायेगा। हरिनाथ का बदन टूट रहा है। थोड़ी देर बिछौने पर लेटे बिना आराम नहीं मिलेगा।

पहले की तरह सब औजार जमा किये। नौकरी की खबर जानने के लिए सभी व्यग्र हैं, पर पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। मिली तो नहीं, फिर भी क्या हुआ यह जानने की उत्सुकता है। शायद साहब ने पता लेकर रख लिया हो, या सर्टिफिकेट दिखाने को कहा हो।

“आउटडोर में एक नौकरी खाली हुई थी। सारा स्टाफ हटाने वाली बात झूठी थी। सत्तर के लगभग लोग गए थे साहब को मिलने। बूढों को नहीं रखेंगे, एक नौजवान को रख लिया। मैट्रिक पास। मकान बनाने का ठेका निकल सकता है। साहब ने पता रख लिया है। बस्ती के मकान बनेंगे। बाँस, इकरा (एक तरह का सरकंडा) सप्लाई का ठीका भी निकलेगा। पर इसी बीच सिलहटी (पूर्व बंगाल के सिलहट क्षेत्र के निवासी) लोग घुस आये हैं। ठीके सब वही ले ले रहे हैं। यह सब ख़त्म हो जाएगा। अंग्रेज लोग जायेंगे। पिछले दो साल से उनके देश में युद्ध चल रहा था। अब वह भारत तक आ गया है। साहब लोगों (अंग्रेजों) को यह देश छोड़कर जाना पड़ेगा। उसके बाद बहुत नौकरियाँ निकलेंगी। बहुत से ठीके भी।”

पिता हुक्का पीते-पीते निर्विकार भाव से यह सब बोलते रहे। बहुत नौकरियाँ, बहुत ठीके। मनि ने सोचा वह भी बड़ा होगा। पैसे कमायेगा। एक साइकिल - चमकती हुई, नई!

लेकिन कमरे में ढेर किये ये औजार – कल – साइकिल के पार्ट? इस बार फिट करने में कितना समय लगेगा? साइकिल आगे की तरह खड़ी हो पायेगी?

हरिनाथ को भी पहली बार कमजोरी की अनुभूति हुई। टूटा मरम्मत करो, यहाँ जोड़ लगाओ, वहाँ पैबंद साटो, हजार काम! शरीर की नसें सिकुड़ गयी जैसे। साइकिल के खुले हुए हिस्सों की तरह शरीर की मशीन भी बेकार हो रही है।

पर साइकिल तो ठीक करनी पड़ेगी। पत्नी की ओर देखा हरिनाथ ने। रेशमी मेखला पहने है। असमिया स्त्रियाँ अति सुखी या अति अभावग्रस्त होने पर ही रेशमी मेखला पहनती हैं। (या तो ख़ुशी के मौके पर या सूती मेखला का जुगाड़ न कर पाने की स्थिति में)। पिछले दो साल में एक साधारण मेखला भी नहीं दे पाया।

मनि यह सब नहीं सोच सका। उसकी आँखों के सामने तो साइकिल के सारे पार्ट नये, चमकते हुए प्रकट हो रहे थे। फ्रेम में नया रंग होगा जिसके किनारे लाल धारी – दमक उठेगा बिल्कुल। क्रैंक, रिम सब नये! देखते देखते सब मिलाकर एक ब्रैंड न्यू रेली साईकिल खड़ी हो गई। मन में उसकी आनंददायक ध्वनि गूंजने लगी। कूदकर मनि चढ़ गया और साइकिल अपने आप चलने लगी। टिक... टिक... फर्र... फर्र... ट्रिन... ट्रिन... बाहर साइकिल की घंटी सुनाई दी। जरूर प्रताप आया है।

लेकिन आश्चर्य! आज हरिनाथ के मन में प्रताप की साइकिल देखकर ईर्ष्या का प्रवेश नहीं हुआ। नये लोग, नये जवान, बूढों को नौकरी से, कर्मक्षेत्र से हटा दिया है। नई-नई साइकिलें आई हैं। अंग्रेज साहब की साइकिल, देसी साइकिल  -- एक ही बात  है। देखो न, खाँटी स्टील होकर भी साइकिल का जइन टूट गया – क्यों टूट गया?

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