साक्षात्कार: कादंबरी मेहरा

◆क्या किसी साहित्यिक पत्रिका का कोई अंक दिवंगत प्रवासी लेखकों के नाम भी निकलेगा कभी?◆
कादम्बरी मेहरा
【प्रवासी भारतीय साहित्य में प्रतिष्ठित-प्रशंसित नाम है 'कादम्बरी मेहरा'। अक्खड़-फक्कड़ बनारस उनके बिंदास बैन में बोलता है, अंग-संग डोलता है, किस्से-कहानियों में धड़कता है। उनकी कलम उनकी अभिन्न सहचरी है। दुःख-सुख हास-परिहास, दो संस्कृतियों (भारत-ब्रिटेन) के अन्तर्सम्बन्ध, द्वन्द्व, भोगा हुआ, देखा हुआ यथार्थ, अतीत-वर्तमान की सुनहरी स्मृतियाँ, भावी का दिवास्वप्न सब कुछ उनकी समर्थ लेखनी अपनी विरासत में मिली परिष्कृत-विलक्षण भाषा-शैली में बड़ी ही सजग कुशलता से रच डालती है। सामन्ती परिवेश से मुठभेड़ करती, जीवन के मायने तलाशती और अपनी अस्मिता से रूबरू होती स्त्रियों का अविराम-अडिग संघर्ष उनकी कहानियों में मुख्य रूप से परिलक्षित होता है।
सुमन सिंह

मेरा परम सौभाग्य है कि आदरणीया कादम्बरी मेहरा जी से यह बातचीत सम्भव-सम्पन्न हुई। प्रवासी जीवन जीते हुए अपनी जड़ों से अभिन्न लगाव, भाषा-संस्कृति के क्षरण की चिंता और उनके संरक्षण-संवर्धन के प्रयत्न उल्लेखनीय ही नहीं स्तुत्य भी हैं, यह साक्षात्कार उन्हीं स्तुत्य प्रयत्नों से परिचित कराने की बहुत ही छोटी सी कोशिश है~~~~ सुमन सिंह

सम्पादकीय नोट: कादम्बरी जी का प्रश्न 'क्या किसी साहित्यिक पत्रिका का कोई अंक दिवंगत प्रवासी लेखकों के नाम भी निकलेगा कभी?' बहुत वज़नी है। सुखद संयोग है कि श्री रमेश जोशी के सम्पादन में प्रकाशित त्रैमासिक विश्वा का जनवरी-मार्च 2018 का अंक स्वर्गीय गुलाब खण्डेलवाल जी को समर्पित है। धीमी गति से ही सही, प्रवासी साहित्यकार अपनी पहचान बना रहे हैं। 

★सुमन :- आपकी प्रारम्भिक शिक्षा बनारस में हुयी, आपकी सुधियों में यह शहर किन-किन कारणों से सुरक्षित है? 
◆◆कादम्बरी मेहरा :- मुझे बनारस से लगाव है। यहाँ मेरे परिवार की जड़ें हैं। इस शहर की संस्कृति इतनी प्राचीन है कि उसे उखाड़ना या बदलना संभव नहीं। सच पूछो तो विदेश में 50 वर्षों से रहते-रहते अपनापन कहीं मिलता है तो अभी भी बनारस जाकर। दिल्ली या कलकत्ते का जो तेजी से मिटता चरित्र है वह अपने बनावटी ढाँचे से क्षुब्ध करता है। बनारस में अभी भी धरती पैरों को थामती है। कुछ पुराना अपने जैसा ढूंढती हूँ तो वहीं मिलता है।

उसकी भाषा, आचार-विचार, विश्वनाथ गली की शॉपिंग, गोदौलिया की धूल, रंगीन टिकुलियाँ, सिन्दूरी पूरी भरी मांग, संकट मोचन के तुलसी हार, भोजपुरी भजन जाती दुर्गा मंदिर की भक्तिनें, आरती की छोटी बड़ी घंटियाँ, जलयोग के रसगुल्ले। माँ कभी सब्जी भाजी के हिसाब से एक रुपया बचा लेती थीं तो गंगा से कहतीं, अच्छा जा रसगुल्ले ले आ। एक रुपये के बत्तीस रसगुल्ले, या एक रुपये के सोलह समोसे खूब बड़े। जब गंगा को देतीं तो ईमानदारी से चहकता, हम खाय लिए बहूजी। घाते का मिला रहा।

अब कोई 'घाते' शब्द का अर्थ ही नहीं जानता। नारायण नगर में हमारा बसेरा था। पुरखों की हवेली। पिताजी का ननिहाल। 'बोलता सिनेमा', गाँवों में चलचित्र दिखाने का काम। विशाल से आँगन में मोहल्ले भर के अमीर गरीब। छोटे बड़े, पिताजी के मास्टरजी, जो उनको छड़ी से पीट चुके थे बचपन में। धार्मिक फिल्में, नागिन के गाने, मौलश्री के पेड़ का झूला, बड़े भाई की सीटी पर निकाली धुनें, ठुमरी की आवाज़ें, बिनाका गीतमाला, श्री किचलू साहब का साप्ताहिक कीर्तन। आप श्री रवि किचलू के पिता जी और हिन्दू स्कूल के प्रिंसिपल थे। चार बरस की मैं सामने खड़ी होकर कविता पाठ करती थी सभा में। जिसने सूरज चाँद बनाया / जिसने तारों को चमकाया / जिसने फूलों को महकाया / जिसने चिड़ियों को चहकाया / उस ईश्वर के हम गुण गाते / उसे प्रेम से शीश नवाते। बी टी एस में पहला दिन। उम्र पाँच साल। सहाय जी के सामने माँ ले गयी। इसे कुछ आता भी है? जोड़ घटाना गुणा। भाग देना नहीं आता। ले जाइये इसे दूसरी कक्षा में। सो मेरी शिक्षा दूसरी से शुरू हुई।

सुधियाँ? पूरी किताब लिखने का मन बना रही हूँ।

कभी कोई खतरा महसूस नहीं किया अपने बचपन में। हाँ, शवयात्रा से डर लगता था। फिर भी गुरुबाग के सामने वाले घर की बालकनी में खड़े हम चिल्लाते जब नीचे सड़क से अर्थी गुजरती, राम नाम सत् है। मुर्दा साला मस्त है। और सन् सत्तावन में कितने मुर्दे गुजरे। हमारा मनोरंजन और चेचक का महाकाल। अब सोचो तो...

क्या-क्या न याद करूँ... क्या-क्या न याद करूँ। अभी भी ऐसी संस्कृति है वहाँ। बोलता सिनेमा नामक कंपनी को नागरी प्रचारिणी सभा का ठेका मिल गया। विशाल संगीतज्ञों का मेला लगा। मैं दस वर्ष की। संगीत सभा में पूरी बच्चा पार्टी। घर आकर बताया, "अम्मा वहाँ न, एक आदमी साढ़े तीन घंटे तक नाचता ही रहा। उसका नाम गोपी कृष्ण था। और हिन्दू स्कूल की एक लड़की भी नाची थी जिसका नाम रूबी चटर्जी था।"

पता नहीं कहाँ जा पड़ी होगी। वो कविता याद आती है --- ज्यों निकल कर बादलों की गोद से / बूँद एक छोटी सी कुछ आगे बढ़ी ... मगर उसका सफ़ेद जॉर्जेट का लँहगा, जिसमे लाल और हरे सितारे जड़े थे, यादों में बसा है। मेरा दाखिला डागर ब्रदर्स के डांस स्कूल में हो गया। दो वर्ष कत्थक सीखा। आज भी मेरे घुँघरू हैं। मेरी पोतियाँ पहन कर ठुमक लेती हैं। मगर लानत इस शहर को। जाने क्या कर दिया है हमारी नई पीढ़ी को। सब कुछ अंग्रेजी। जब मैं वहाँ थी तब डागर बंधु के बड़े भाई के एक लड़का पैदा हुआ था। अभी पिछले वर्ष वही सुपुत्र यहाँ द्रुपद गाने आये थे साउथ बैंक में। रवि किचलू भी जब यहाँ आये थे मैं सुनने गयी थी। गिरिजा देवी भी मिलीं। झट पहचान लिया। कहाँ जा सकता है मेरा अमित / अमिट बनारस?

★सुमन :- कविता कब कुलबुलाई अंतस में, क्या कारण था? 
◆◆कादम्बरी मेहरा :- मालूम नहीं, याद नहीं। बहुत बचपन में एक बार बुआ ने धौल मारा था और खूब हँसी भी थीं। एक गाना था मुकेश जी का गाया हुआ --- ज़माने का दस्तूर है ये पुराना / बना कर मिटाना, मिटा कर बनाना। अपन को धुन तो आ गयी, शब्द कुछ -कुछ। सो सारे काफिये जोड़ लिए। रुला कर हँसाना, हँसा कर रुलाना, .-- गिरा कर उठाना, उठाकर गिराना। -- पकाकर खिलाना, खिलाकर पकाना --- आदि -आदि। उम्र सात साल थी तब। तुकबंदी को ही कविता गिना जाता था। बनारस में फ़िल्मी गाने सभ्य लोग तब नहीं गाते थे। फिल्मे लड़कियों को '' खराब '' करने के लिए बनाई जाती हैं ऐसी मान्यता थी / अभी भी है। इसलिए हमें कविता और दोहों से अंताक्षरी खेलने की आदत थी। रामलीला से सुनी - सुनाई चौपाइयाँ, कबीर के दोहे। बेसिक रीडर की कविताएँ अभी तक याद हैं। यहाँ शिक्षा विभाग में शुरू-शुरू में बहुत बहस की थी मैंने कि रोट मैमोरी बच्चों के विकास में कितनी आवश्यक है। इस तरह आठवीं नौवीं में कुछ लड़खड़ाती कविताएँ लिखी थीं। मगर कभी किसी को नहीं सुनाईं। फिर मिल गए प्रसाद, दिनकर और महादेवी। रामचरितमानस पढ़ डाली। हनुमान चालीसा रट डाला, मन्त्रों से जुड़ाव हुआ। फिर अन्य विषयों में अभिरुचि तूल पकड़ती चली गयी।

आठवीं में थी तो एक व्यक्ति क्लास में आया। उसने सारा दिन हमारा टेस्ट लिया। जब मैं घर आई तो देखा वह पापा के पास बैठा चाय पी रहा था। यह बताने आया था कि मेरा IQ सबसे ऊपर था। उसने मुझे जीनियस बताया था, मगर मैं महज़ एक लड़की = भार / ही रही, अन्यथा कुछ भी नहीं। हाई स्कूल में तीन डिस्टींक्शन्स लेकर पास हुई। मेरी आगे की शिक्षा का भार लखनऊ में चाचा जी ने उठाया। पापा का तबादला इटावा हो गया जहाँ लड़कियों के लिए इण्टर कॉलिज था ही नहीं। बस तभी से बनारस पीछे रह गया। इसके साथ ही बहुत कुछ।

अवकाश लेने के बाद, बाल बच्चों को उनके घरों में सेटल करने के बाद, लेखनी उठाई। आठ दस कविताएँ लिखी हैं जो सभी छप चुकी हैं। मेरी ग़ज़ल शायद अभी नहीं गयी है किसी पत्रिका में।

एक बात बताओ सुमन! क्या अभी भी छात्र पढ़ते समय किताबों में हाशिये पर लिखते हैं 'ग. बो.'? यदि हाँ तो बनारस कभी नहीं बदल सकता।

★सुमन :-  यह ग.बो. क्या है ? 
◆◆कादम्बरी मेहरा :- हमारे ज़माने में एक अंध विशवास था कि अगर पढ़ते समय गधा बोले तो वह हिस्सा जरूर इम्तिहान में आएगा। अतः सभी लोग अपनी किताबों में हाशिये पर '' ग० बो '' लिख लेते थे। अब शायद अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव से यह रिवाज़ गायब हो गया हो। क्योंकि मेरी भांजी को नहीं पता। उसकी माँ को याद है। किसी कबाड़ी की दूकान से पुरानी किताबें उठाकर देखना या किसी लाइब्रेरी में।

होली के दिनों में वसंत के आगमन के साथ नए मेमने, नए चूज़े, नए पंछी आदि पैदा होते हैं। यह महीना चैत्र और बैशाख का होता है। अतः गधे को '' बैशाख नंदन ''कहा जाता है। होली पर जो हास्य कवी सम्मलेन बनारस की शान माना जाता है उसमे बैशाख नंदन की उपाधि भी दी जाती थी। अब का पता नहीं।

विज्ञान के अनुसार, इस मौसम में घास बहुत तेजी से बढ़ती है। अतः गधे की मौज होती है। भरे पेट सभी रेंकते हैं गधे की तो बात क्या। इम्तिहानों की बारी भी इसी मौसम में आती है। अब जो भरम बन गया सो बन गया। वैसे किसी बड़े-बूढ़े से पूछ कर देखना।

★सुमन :- आप कथा लेखन की ओर कब प्रवृत्त हुईं? 
◆◆कादम्बरी मेहरा:- 13 वर्ष की उम्र में एक कहानी लिखी थी जो आज पत्रिका में छप गयी। माँ को मेरा साहित्यिक सफर अजीब लगता था। वह अक्सर मुझे हतोत्साहित कर देती थीं। मगर जब कहानी छप गयी तब उनको सबसे ज्यादा ख़ुशी हुई। वह स्वयं एक कुशल कथा वाचक थीं। वर्षों बाद भी वह अपनी सहेलियों की और अध्यापिकाओं की नक़ल हूबहू निकाल कर हँसाती थीं। उनका सपना था कि वह लेखिका बनें मगर गृहस्थी की उलझनों में पूरा न कर पाईं। मरने से कुछ दिन पहले मुझसे कहा कि मैं उनकी कहानियों को लिखूँ। वह 2001 की फरवरी में स्वर्गवासी हो गईं। बस तभी से मैंने दृढ़ता से कलम पकड़ ली। करीब आठ किताबें लिखीं हैं। पाँच छप चुकी हैं। तीन प्रकाशक के आधीन हैं अभी।

★सुमन :- गणित विषय और कथा -लेखन कितना दुर्लभ संयोग है, इतनी कुशलता से कैसे साधा आपने इन दोनों को? 
◆◆कादम्बरी मेहरा :- गणित को एक रूढ़ विषय समझने की गलती अक्सर लोग करते हैं। आँकड़े बताते हैं कि विश्व इतिहास में अनेक कलाकार, संगीतज्ञ, लेखक, दार्शनिक आदि चतुर गणितज्ञ थे। गणित केवल एक सुलझी हुई मानसिकता का विषय है। केवल एक योग्यता, तार्किक प्रवृत्ति। कोई भी इसे सीख सकता है। अलबत्ता इसके विषय में पूर्वाग्रह अनेक हैं जो सदियों से हमारे, विशेषकर स्त्रियों के, अंदर बैठ गए हैं। हाँ गणित के तर्क अपना समय लेते हैं। अगर एक-एक सीढ़ी चला जाये तो कठिनाई नहीं होती। मैंने तो केवल दसवीं तक पढ़ा था। यहाँ गणित अनिवार्य विषय था। अनिवार्य शिक्षा में हर तरह के बच्चे आते हैं। मुझे सेकेंडरी के बालकों को पढ़ाना था। प्रारंभिक स्कूलों में परीक्षा नहीं थी। जिसने जो सीखा सीख लिया। उम्र के हिसाब से कक्षा चढ़ गए। पढ़ाना यानि उनकी पहली कठिनाइयों को स्पष्ट करना। किसी को यह काम पसंद नहीं आता था। अतः हर नए आगंतुक को यह काम सौंप दिया जाता था। मुझे क्या पता। सो शुरू हुई नौकरी गणित पढ़ाने की।

किसी मनचले सहकर्मी ने नौंवीं का प्रश्नपत्र थमाकर उपहास से कहा, "इसे सही कर लोगी तो समझूंगा गणित जानती हो।" उसकी और मेरी दोनों कक्षाएँ, यानि 60 कद्दावर चहकते, खिलवाड़ी बच्चे, सामने खड़े थे। मेरी बेइज़्ज़ती की जा रही थी। हँसकर पर्चा पकड़ लिया। अगली घंटी लंच की थी। सैंडविच खाते-खाते जवाब भी लिख डाले। 23 वर्ष के बाद मैं अपना साक्ष्य दे रही थी। 45 मिनट के बाद उसके ऑफिस में गयी तो वह कैलकुलेटर पर उत्तर निकाल रहा था। अब उस पर हँसने की बारी मेरी थी।

चार बरस के बाद लंदन यूनिवर्सिटी ने एक कोर्स ऑफर किया। मुझे छुट्टी मिल गयी तनख़्वाह समेत। सो पूरा किया। कई बार तालियाँ बजीं। ऐसी थी उस समय के बनारस की नींव। हाँ, लेखन के क्षेत्र में गरीब हूँ। इण्टर के बाद हिंदी साहित्य नहीं पढ़ा। अंग्रेजी साहित्य लेकर एम.ए किया। मनोविज्ञान, इतिहास, अंग्रेजी।

★सुमन :-  प्रवास का सुयोग कैसे बना? 
◆◆कादम्बरी मेहरा :- यह सुयोग नहीं था। पलायन था। नेहरू काल की विषम आर्थिक असमर्थता के कारण पलायन शुरू हुआ था। हज़ारों युवा आगे पढ़ने विदेश जाते थे। मेरी शादी ऐसे ही एक बाहर से पढ़े हुए व्यक्ति से हुई। पतिदेव की नौकरी भी अंग्रेजी कंपनी में थी। जब वह बंद हो गयी तब हमें भी वहीं बुला लिया। जहाँ का अन्न पानी लिखा था, खा लिया। पर सफल बनाया हमने अपने बनवास को। हम सब अनेक कठिन परिस्थितियों से जूझते, अपने स्वत्व को पीछे धकेलते, एक नई खाल में खुश हो लिए। अपने से ज्यादा अपनों पर खर्चा, पर हमें क्या मिला? एक उपाधि --- प्रवासी। इसकी विडम्बना आप लोग नहीं समझेंगे क्योंकि आप विदेशों से मोहाच्छन्न हैं।

★सुमन :-  लंदन में आपने लगभग तीस वर्षों तक अध्यापन कार्य किया है। उन अविस्मरणीय क्षणों को साझा करना चाहेंगी जिन्होंने आपको सदैव संतुष्ट और सानंद रखा? 
◆◆कादम्बरी मेहरा- अवकाश लेने के बाद ही मैंने कलम से दोस्ती साधी। अध्यापन काल बहुत रंगा-रंगी रहा। दस वर्ष पढ़ाने के बाद गणित को तिलांजलि दे दी। प्रारंभिक शिक्षा में अध्यापकों की कमी आ गयी थी। मैं उसी में खिसक ली। कारण था मेरा बहुरंगी व्यक्तित्व। गणित का एक सार पाठ्यक्रम, सालों साल। मैं किसी सुरंग का चमगादड़ हो चली थी जो शाम पड़े आकाश में उड़ता था। मन आकाश में और तन रसोई में। घर के धंधे अनेक। अपने बच्चों से भी मैं छिटक गयी थी। अतः प्रारम्भिक शिक्षा की ओर उन्मुख हो गयी जहाँ बहुमुखी ज्ञान का अवसर था।

मेरा संगीत, मेरी कविता प्रेम, मेरे नाटक, मेरा कथावाचन, और हस्त कौशल, सबकी जरूरत पड़ी। खूब निखारा अपनी कलाओं को। मेलों में बिकनेवाले हाथ के बने खिलौने, खुद बनाये। जैसे ...कागज़ के रंगीन सांप जो मिट्टी की गराड़ी पर धागे से चलते हैं। बच्चों ने रंगे, मैंने उनमे मशीन के धागे की खाली गुल्लियाँ फिट करीं। आँखें चिपकाईं। लम्बे कागज़ की पूँछ को चुन्नटों से समेटा। पूरे स्कूल के प्लेग्राउंड में मेरे तीस साँप बच्चों ने चलाये। इसी तरह मैंने दही के प्लास्टिक के खाली कुझौं से टपर-टपर चलनेवाली गाड़ी बनाई। सामान की कमी नहीं थी। पंचतंत्र की कहानियाँ सरलतम भाषा में अनूदित करके नाटक करवाए जो दस से बारह मिनट में दिखाए जा सकें। खरगोश और शेर की कहानी अंग्रेजी में गानों के रूप में लिखी फिर नृत्य नाटिका करवाई। धुनें अपनी फिल्मो से ली। संगीत की अध्यापिका ओरलांडा कोल ने पियानो पर मिनटों में निकाल लीं। सारा ड्रामा 20 मिनट। नो स्टेज सेटिंग। ड्रेसें सिर्फ कार्ड के रंगे हुए मुखौटे जो मैंने ही बनाये थे इलास्टिक लगा कर। अब इंटरनेट पर हर जानवर का मुखौटा मिल जाता है। तब यह सुविधा नहीं थी। रामलीला तो हर साल करवाई। मुख्य पात्रों के आलावा बाकी क्लास के आधे बच्चे वानर और आधे राक्षस। सब अपना मुखौटा खुद सजाते थे। मैं नन्हें मुन्नो की अध्यापिका थी, केवल 5, 6, 7 वर्ष के बालक। सबसे अच्छा नाटक अलादीन का हुआ। कठपुतलियाँ बनाना भी सीखा। सब लॉलीपॉप पपेट बनाते थे। मैंने उसमे इजाफा किया। दही के कुज्झे में छेद करके वह स्टिक पपेट उसमे पिरो दी। पपेट के गले में एक कपड़ा स्कर्ट की तरह चिपका दिया और फिर उसे कुज्झे के चारों ओर चिपकाकर घाघरा बना दिया। अब अगर बच्चा डंडी को हथेलियों में रोल करेगा तो गुड़िया नाचेगी। घुँघरू पहनाकर गरबा डांस करवाया। घुँघरू बड़े महंगे। कम ही आये। सोचा सोचा, बहुत सोचा। फिर लड़कियों को बाएँ पैर में और लड़कों को दाएँ में पहना दिए। ताल में सब बराबर आ गए। इसके आलावा अंग्रेजी के आइटम्स भी कराये। यह सब अतिरिक्त काम था। गणित में तिकोन, चौकोन, आयत आदि बताने थे। सब कार्ड से कटवाए। उनको एक नगर की तरह दीवार पर चिपकाया। चौकोनो के ऊपर तिकोनी छतें, आयतों की सड़क दरवाज़े। जनम भर वह बालक शेप नहीं भूलेंगे। काश मैं यह सब किसी हिंदी के स्कूल में करवाती। सारी अंग्रेजी की कहानियाँ हिंदी में प्रस्तुत करती। जब वहाँ की नई पौध को अंग्रेजी में पढ़ाई करते देखती हूँ तो रोना आता है।

अपनी रचनात्मकता का इस्तेमाल करना मानसिक बल के लिए आवश्यक है। यह सब संस्कार बनारस से मिले थे। जन्माष्टमी की झांकियाँ सजाने में। अम्मा की कढ़ाई सिलाई की ट्रेनिंग से। अंग्रेज अध्यापिकाएँ केक बनवाती थी। मैंने पूरियाँ बिलवा डालीं। मेरी असिस्टेंट ने कड़ाही में तलीं। हर साल दिवाली पर घर से खाना बनाकर पूरे स्टाफ को खिलाती थी। वह सब अब मिस करती हूँ। पर शरीर में इतना करने की ताकत नहीं रह गयी है। वरना मेरी सास ने तो मेरा नाम हलवाइन रख दिया था। अध्यापन काल के कुछ किस्से मेरी कहानियों में हैं। पढ़ सको तो।

★सुमन :-  परदेस की कितनी भूमिका रही आपके रचनात्मक मन को गढ़ने -सँवारने में? 
◆◆कादम्बरी मेहरा :- अगर मैं भारत में रहती होती तो यह एकांत मुझे नहीं मिलता। भारत की स्त्री की विडम्बना उसका शादी के बाद का जीवन होता है। यहाँ परदेस में अपना खुद का करियर बनाने से मेरा आत्म विश्वास निखरा वरना सच तो यह है कि शादी के बाद डिग्री चूल्हे का पलीता बन गयी थी। प्रथम आठ वर्ष तो मैंने सोचा भी नहीं कि ससुराल की रसोई से कभी निजात मिलेगी। पर ईश्वर के चक्र निराले होते हैं। यहाँ आकर नौकरी करना जरूरी लगा। मेरा क्षेत्र अध्यापन था।

इंग्लैंड के बहुसांस्कृतिक परिवेश में मैं पचासों देशों के अभिभावकों के संपर्क में आई। पचासों देशों की सभ्यता का स्वाद लिया। अनेकता, विभिन्नता में भी मानव मूल्यों की समरसता को पहचाना। सारे पूर्वाग्रह बेमानी हो गए। कालों (अश्वेत) से डर लगता था, अब वह मेरे सबसे प्रिय समाज हैं। अंग्रेजों की मित्रता और सहभावना देखी। अकेले, अपने जिम्मे पर स्कूल के ट्रिप्स जगह-जगह लेकर गयी। जिम्मेदारी, सुरक्षा के नियम, समय की पाबंदी। सब सीखा। वह गृहणी जिसे सुबह मर्दों को काम पर भेजने के बाद नहाना मयस्सर होता था।

यहाँ शिक्षा के साधन अपार हैं, सुलभ हैं, हर मोहल्ले में लाइब्रेरी है, बिजली पानी मच्छरों से नहीं जूझना पड़ता। अपने हर शौक को आप बिना किसी की सहायता के पूरा कर सकते हो। पति और परिवार की बंदिश के बावजूद मैंने दो डिग्रियाँ ली। अब रात के एक बजे लेखन में जुटी हूँ। कोई पूछनेवाला नहीं। मेरी रचनात्मकता इस समय इस चुपचाप में निर्बाध लहर मार रही है। भारत में संभव नहीं होता स्त्रियों के लिए।

अलावा इसके जो विस्तार मुझे भ्रमण ने दिया है, देश-विदेश की यात्राओं ने दिया है वह भारत की गृहणी को कहाँ मिलता। आप जब प्रवासी लेखकों को पढ़ती हैं तो यह भौगोलिक विस्तार, कल्पनाएँ व उपमाएँ जरूर अलग से चमकते होंगे। मुझे भारतीय कहानियाँ एकरस लगने लगी हैं। उनमे वैरायटी कम है। उनकी कथावस्तु की सामग्री 50 वर्षों में भी नहीं बदली है।

★सुमन :-  अपने नवीनतम कथा-संग्रह 'चिर परायी' के बारे में कुछ बताइये। यह अपने शीर्षक से बेहद आकर्षित करता है। कहानी चिर परायी का मूल कथ्य क्या है? 
◆◆कादम्बरी मेहरा :- कहानी लेखन माँ की सुनाई कहानियों से आरंभ हुआ था। बचपन कब विदा हो गया याद नहीं। होश संभालने के बाद स्त्रियों के दुःख दर्द का एक अनवरत रुदन सुनाई पड़ा। इसकी शुरुआत श्रीमती महादेवी वर्मा की जीवनी से हुई। हम भारतीय लडकियाँ अपने पुरुष समाज को बहुत आदर और प्रेम से देखती हैं, कारण हम घर के पुरुषों के परे किसी को नहीं जानते थे। विभक्त समाज में पले, बड़े हुए। फिर एक पुरुष से नाता। अच्छा तो ठीक। न अच्छा तो? और इन ' ना अच्छों ' की सारिणी कितनी लम्बी?

नानी के वंश से 21 बहनें, चार मौसियाँ, चार मामियाँ, बड़े होने पर सबके किस्से। दादी के वंश में भी तक़रीबन इतनी ही भीड़। ससुराल मिला अति रूढ़। मैं स्वयं संवेदना की पात्र बन कर रह गयी। और शायद बनी ही रहती। मगर कहीं देवी माँ है जो सहायता करती है। परिस्थितिवश उभर गयी। यहाँ अपना सबकुछ भूलकर जीवन संग्राम में जो दृष्टिकोण बना उसी का खुलासा हैं मेरी कहानियाँ। अब मैं निडर हूँ। सभी कहानियाँ मेरे जीवन में आनेवाले लोगों से सम्बंधित हैं। टुकड़ा-टुकड़ा सच को जोड़कर बनाई झूठी कहानियाँ। अधिकाँश स्त्रियों पर आधारित हैं।

यह मैंने किसी विमर्श के अंतर्गत नहीं लिखी हैं। यह मैंने सिर्फ इसलिए लिखी हैं कि इनका सत्य उजागर हो और पाठक अपने दृष्टिकोण को बदलें। चिर पराई एक ऐसी ही महिला की कथा है। मेरी महिला पात्र सशक्त नारियाँ हैं जो परवश दुःख भोगती हैं। मेरे पाँच कहानी संग्रह आ चुके हैं। अभी तीन और प्रकाशक के पास छपने का इन्तजार कर रहे हैं। 'चिर पराई' में अधिकांश कहानियाँ यहाँ के समाज से उठाई गयी हैं। सबका विषय अलग-अलग है। इसके बाद मेरी किताब जो छपी है उसका नाम है 'डैफ्नी एवं अन्य कहानियाँ'। डैफ्नी एक ऑस्ट्रेलियन लड़की की कहानी है। इस किताब में 15 कहानियाँ हैं। मेरी दूसरी पुस्तक 'पथ के फूल' गुजरात की सयाजी यूनिवर्सिटी में पाठ्यक्रम में लगाई गयी है।

★सुमन :- आपने भारतीय और पाश्चात्य दोनों ही परिवेश की स्त्रियों को देखा है। आज की स्त्री की दशा पर क्या टिप्पणी करना चाहेंगी? 
◆◆कादम्बरी मेहरा :- इस विषय पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है। जहाँ तक भारतीय स्त्रियों का प्रश्न है मुझे बहुत गर्व है कि शिक्षा ने उनके व्यक्तित्व को एक नया आकाश दिया है। हर तरह से आज नारी सक्षम है। हमारी लडकियाँ विदेश की नारियों से कम नहीं। मगर शिक्षा के क्षेत्र में अभी भी पुरुषों को दीक्षित करने का प्रयास पोच है। पुरुषों में शिक्षा केवल धनोपार्जन का साधन है। नौकरियों में योग्यता का मानदंड कागज़ी डिग्रियाँ हैं। यह कैसे भी हासिल की जाती हैं। इसके अतिरिक्त शिक्षा क्या है यह उनको नहीं पता। शिष्टाचार कोई नहीं जानता। हर कोई एक भगदड़ का भागी है। जितना तेज दौड़ सकते हो दौड़ो ताकि तुम दूसरे को हरा सको। अक्सर वह सबसे नज़दीकी व्यक्ति होता है। नज़दीक वालों को पछाड़ने में रिश्ते टूट कर बिखर रहे हैं। जीवन का सत, जुड़ाव की चिपकन सूख रही है। अपने आस पास देखे बगैर भागने का नाम प्रगति हो गया है। यह शुष्कता स्त्रियों में भी आ गयी है जबसे उन्होंने अर्थोपार्जन की राह पकड़ी। मानसिक अंधी दौड़ शारीरिक अंधेपन में भी उफन रही है। एक बीस बाइस वर्ष का युवा भरे बाजार में साइकिल चलाता गुज़रता है, जहाँ भीड़ का अंत नहीं। वह घंटी टनटनाता तेज रफ़्तार आता है। वह समझता है कि घंटी सुनकर सब उसे रास्ता दे देंगे। भीड़ अपने निकलने की राह बनाती जैसे तैसे चलती जा रही है। सवार एक बूढ़े के पैर को कुचलता गुजर जाता है। बूढ़ा दर्द से चिल्लाता है, "हाय अंधे, मार डाला।" साइकिल सवार दस गज़ पीछे आता है साइकिल पर से उतरकर गुर्राता है, "साले खूसट, अँधा किसे कहा?" बूढ़ा पैर हिला भी नहीं पा रहा था। कराहते हुए बोला, '' देखकर नहीं चलता। ऊपर से गाली दे रहा है? '' साथ में उसकी साठ वर्षीया बीबी थी। वह पति का बचाव करती हुई बोली, "इतनी भीड़ में साइकिल चला रहे हो? यहाँ सड़क तो नहीं।"

अब तक लड़का मारने की तैयारी कर चुका था। स्त्री की तेज आवाज़ पर दो चार खड़े होकर तमाशा देखने लगे। वह खीसें निपोरकर गन्दी तरह से हँसा और बोला, "आप इतनी स्मार्ट न होतीं तो दो झापड़ मारता इसे। मुझे अँधा कह रहा है। उमरवाला है तो घर बैठे न।"

यह आम जनता है। अपनी आत्मरक्षा के लिए डंडा उठाये तैयार मगर गलत सोच और बेरहम। स्त्री के प्रति कोई आदरभाव नहीं। ऐसे पुरुष केवल भारत में हैं। ऐसे में स्त्रियाँ फिर दब कर चलती हैं। अपनी इज़्ज़त अपने हाथ। विदेशों में क्राइम है अवश्य मगर स्त्री, बच्चे और बूढ़े की सुरक्षा व आदर सबमें है।

जब सोच में ही कमी है तो सुरक्षा का इंतजाम कौन करे? पदासीन पुरुष अधकारी भी तो इसी जनता से आये हैं। आर्थिक तंगी बढ़ी है बाज़ारवाद के चलते। अब संतोष का पर्याय है मजबूरी। लोग अपनी जरूरतों को बढ़ाते जा रहे हैं। नक़ल का बाज़ार गर्म है। अंग्रेजी में एक कहावत है, "Every luxury next door, is a necessity at home." अर्थात अगले घर की समृद्धि हमारे घर की जरूरत है। इस कारण लोग अपने आप में सिमटते जा रहे हैं। सामाजिकता फन (fun), मनोरंजन का दूसरा नाम है। हमें रिश्ते या उनकी जिम्मेदारियाँ खलने लगी हैं।

इसका सबसे बुरा असर शादियों पर पड़ा है। हरेक बहू केवल अपना सोच रही है। जिसमे उसे रूचि हो बस वही घर में आये जाए। अकारण वह पति के परिवार की उपेक्षा एवं अवमानना करती हैं ताकि वह स्वयं आना छोड़ दें। जो माँ-बाप अपना जीवन बेटों को सक्षम बनाने में खर्च देते हैं वह उसकी शादी होते ही कूड़ेदान की तरह बाहर कर दिए जाते हैं। उनकी बेटे-बहू के घर में समाई नहीं। दुःख झेलें बी फाख्ता, और कौए अंडे खाएँ। कितनी सहजता से कहती हैं, "आप मेरी माँ नहीं हो सकतीं।" अरे तो तुम्हारी माँ पति की माँ कैसे बन गयी। दूसरा संवाद देखिये। यहाँ, भारत से आई एक बहू रोज सुबह एक घटिया हिंदी दो सितारा फिल्म का वीडियो सीढ़ी के पहले खम्भे पर रख देती थी ताकि आते-जाते पहली नज़र उसी पर पड़े. फिल्म का नाम था "मेरा पति सिर्फ मेरा है।" यह बता दूँ, बेचारे पति को हिंदी का ज्ञान बहुत कम था। वैसे भी काम पर जाने की जल्दी में वह कहाँ पढता। अपने ही घर में माता पिता को आते ही बेगाना करार दे दिया। यह बगावत कहाँ से आई? कौन है इसका पोषक। सक्षम स्त्री का अस्त्र बदतमीजी और कृतघ्नता हो गया है।

पहले समय में माँ बाप आर्थिक रूप से अगली पीढ़ी के ऊपर निर्भर रहते थे तब अगर बहुएँ उनको अनावश्यक बोझ समझती थी तो ऐसी अदावत की गुंजाइश रही हो। मगर यहाँ न घर की कमी है न अन्य साधनों की और सब अपनी अलग पेंशन पाते हैं। देते ही देते हैं, लेते कुछ भी नहीं। आज से 40-50 वर्ष पहले के परिवार में तीन चार पुत्र होते थे। अब एकलौता पुत्र एकलौती पुत्री। आगे भी इसी का, पीछे भी। नौकरी वालियाँ जी हुजूरी के लिए तैयार नहीं तो ठीक है। मगर सर्व संपन्न, घर बैठी स्त्रियाँ भी परिवार की गरिमा को नहीं समझ रहीं। किटी पार्टी, रमी की बैठकें, सखियों के जन्मदिन। और भी न जाने क्या क्या। पत्नी बदल कार्यक्रम आम हो गए हैं - यानि वेश्यावृत्ति। भाग तो पुरुष भी ले रहे हैं फिर इसे पति बदल खेल क्यों नहीं कहा जाता? वाइफ़ स्वैपिंग को हसबैंड स्वैपिंग कहने में पुरुषों की हेठी होती है इसलिए। यानि पुरुष आइटम नहीं है। क्या आप इसे लिंगों की बराबरी कहेंगे? आधुनिक सोच में स्त्री यदि बराबरी करना चाहती है तो यह खेल कतई फेल है। सभ्य समाज में कितने ही घर टूट गए हैं।

मुझे देखकर दुःख होता है कि पाश्चात्य फैशन के नाम पर हमारी स्त्रियाँ गलत को भी सही बना रही हैं। मैं उन अनपढ़ सासों को माफ़ कर सकती हूँ जो अपनी आर्थिक असुरक्षा के कारण रूक्ष व्यवहार को शक्ति का पर्याय मानती थीं, अपने पद की रक्षा बहुओं पर शासन करके करती थीं, मगर मैं इन घर फोडणी शिक्षित, बेशरम भारत की नई पौध को नहीं माफ़ कर सकती। उन अशिक्षित नारियों ने भारत को कई रत्न दिए। आधुनिक शिक्षा ने पिछले 40 वर्षों में एक भी काम का नेता नहीं दिया भारत को। हाँ, विश्व को शिक्षित दास अवश्य सैकड़ों की संख्या में पहुँचा दिए हैं। सड़कों पर भीड़ बढ़ी है। युवा आक्रोश उनकी अकर्मण्यता की अभिव्यक्ति है। परिवार समाज की इकाई होता है मगर अब सैकड़ों की संख्या में परिवार टूटे हैं। नींव में दरार पड़ रही है। दादा-दादी के निश्छल प्रेम से वंचित हो गए हैं बच्चे। संस्कृति रो रही है। यह भी सुना कि भारत में नर्सरी राइम्स हैं ही नहीं। इंग्लिश की रिंग आ रिंग आ रोजेज प्लेग से मरते बच्चों को बहलाने के लिए कही गई थी जो हर घंटे में दो की दर से मर रहे थे। यानी हम भारत के, "राम नाम सत्य है" को कविता की तरह पेश करें।

 हम बोलेगा तो बोलोगे के बोलता है !

स्त्रियों का प्रत्येक रूप देख चुकी हूँ। और सबसे ज्यादा यहाँ विदेश की स्त्रियों को जाना समझा। यही नहीं अनेक देशों की, अनेक भाषा भाषी स्त्री को देखा और बरता। विदेश में नारी शिक्षित न होते हुए भी ज्ञान से वंचित नहीं। अखबार भी पढ़ती है ख़बरें भी देखती है। गृहणी का जीवन भारत से अलग नहीं। सब अपनी चादर में पैर पसार कर चलती हैं। जितनी ही अधिक शिक्षित हैं उतनी अधिक विनम्र। कोई किसी पर रौब नहीं झाड़ता। आपका काम याद दिलाने के लिए भी प्लीज़ का उपयोग करते हुए बोलती हैं। विनम्रता की भाषा इस देश में सर्वाधिक विकसित है। भारत में हर दूसरी नारी शिट शिट कहते नहीं थकती। यहाँ सभ्य समाज में कोई नहीं ऐसे बोलता। गाली देनेवालों को निम्नस्तर का गिना जाता है। ज़रा अनुवाद करिये। हिंदी में यदि कोई प्रत्येक वाक्य में आगे और पीछे कहे टट्टी टट्टी। क्या अंग्रेजी के --- में बदबू नहीं आती?

अब यह भी बता दूँ कि हिंदी में टट्टी का मतलब शिट या विष्ठा नहीं है। टट्टी टाट के परदे को कहा जाता है। पूरे विश्व में निवृत्त होने के लिए घर से बाहर जाना पड़ता था। अतः बरसात आदि के मौसम में या रात बिरात, जानवरों से बचने के लिए, घर से कुछ दूर पर टाट की चटाइयाँ बाँस के सहारे खड़ी करके जगह घेरना भारत में शुरू हुआ। इसलिए कथन बना, '' हम टट्टी जा रहे हैं। '' बाद में इसको विष्ठा के लिए समझना आम प्रचलन हो गया। भारत में अभी भी स्त्रियों के लिए सफर करना एक सज़ा है क्योंकि कोई निवृत्त होने की जगह नहीं मिलती। पाँचों महाद्वीपों की सैर कर चुकी हूँ। केवल भारत और पकिस्तान इस मामले में प्राचीन हैं।

विदेश में नारियों की सुरक्षा के लिए क़ानून और पुलिस बहुत सक्रीय है। पत्नी दमन या प्रताड़ना पर सख्त कार्यवाही यानि जेल तक की, तुरंत कार्यवाही है। मगर भारत में न्याय मिलते उम्र गुजर जाती है। पुरुष मज़ाक बनाते हैं ऐसी शिकायतों का। एक बार रात को पुलिस को फोन करना पड़ा तो उधर वाले ने गन्दी गन्दी बातें छेड़ दीं। स्त्री कंठ का मज़ा ले रहा था ड्यूटी का सिपाही। दो नौकरों का मामूली झगड़ा लाठी बल्लम तक पहुँच गया था। मोहल्ले के लोगों ने सलटाया। घर में आग लगी। 100 नंबर पर किसी ने फोन ही नहीं उठाया। साठ वर्षीया घरवाली गेट पर से कूदी जान बचाने के लिए तो गेट के भाले जाँघों में घुस गए। दस फुट ऊपर की कूद से सर फट गया। घर माल आदि गया सो गया, जीवन भर का कष्ट आन पड़ा।

इस विषय पर लिखने का कोई अंत नहीं है। अच्छा बुरा सब जगह होता है। मगर हमारे पुरुष वर्ग के समान निष्क्रिय, अयोग्य, बेरहम, खोखला, कृतघ्न अन्य कहीं नहीं देखा। इसके चलते अच्छी स्त्रियों की दशा वैसी ही बनी रहेगी भारत में। आगे आनेवाली पीढ़ी अपने पुत्रों को उच्चता के भ्रम से दूर रखे और स्त्री को बराबरी दे तभी कुछ उद्धार होगा।

★सुमन :- आपके प्रिय रचनाकार कौन कौन हैं। 
◆◆कादम्बरी मेहरा :- यहाँ बैठे रचनाकारों के विषय में ज्ञान कम ही मिल पाता है। हिंदी के पाठकों की कमी होने से यहाँ की लाइब्रेरीज ने हिंदी पुस्तकों का अनुदान बंद कर दिया है। अब नई किताबें बहुत कम आ रही हैं। भारतीय उच्चायोग की सेवाएँ भी नगण्य हैं। मैंने पहले भी कहा है कि सामान्य गृहणी के लिए समय निकालकर दूरस्थ उच्चायोग में जाना और किताबें लाना, फिर समय से वापिस करना बहुत कठिन है। अतः आजकल इंटरनेट का ही सहारा रह गया है।

युवा कहानीकारों में विवेक मिश्र, पंकज सुबीर, मनीषा कुलश्रेष्ठ, और किरण सिंह ने मुझे प्रभावित किया है। प्रवासी कथाकारों में युवा तो कोई भी नहीं नज़र आया मगर जो लोग लिख रहे हैं वह पिछले बीस या पच्चीस वर्ष या उससे भी कम समय के कोष्ठक में आते हैं। इला प्रसाद, सुदर्शन प्रियदर्शिनी, सुधा ढींगरा, अनिल प्रभा कुमार, और सुषम बेदी ने कहानी लेखन के क्षेत्र में नए मानदंड स्थापित किये हैं। विषय वस्तु का चयन भी बहुत नवीन है। सूरज में गर्मी कम क्यूँ है, या सुषम बेदी की स्विमिंग पूल वाली कहानी स्त्री लेखन को विस्तृत आयाम देती हैं। सूक्ष्म भावनाओं का निरूपण करने में सुदर्शन प्रियदर्शिनी का जवाब नहीं। उनको मैं राजी सेठ के समकक्ष रख सकती हूँ। यदि प्रौढ़ लेखन की बात करूँ तो मुझे सुधा अरोरा, सूर्यबाला, राजी सेठ, ममता कालिया, निर्मला जैन, और चित्रा मुद्गल बहुत पसंद हैं। लंदन में लेखिकाएँ कम हैं, मगर जो लिख रही हैं वह उच्च स्तर का है। उषा वर्मा, शैल अग्रवाल, दिव्या माथुर, उषा राजे सक्सेना दिल से लिखती हैं और सामयिक भी। अभी हाल में इस श्रेणी में वंदना शर्मा, अरुण सबरवाल, जया वर्मा और ज़किया ज़ुबैरी ने भी सुन्दर कहानियाँ प्रस्तुत की हैं और अपना सोपान कायम किया है। स्वर्गीया नीना पाल अपनी कहानियों, कविताओं और उपन्यासों की अमूल्य धरोहर छोड़ गयी हैं। इसी तरह श्रीमती पुष्प भार्गव भी अच्छा लिखते लिखते अचानक ज़िन्दगी को धोखा दे गईं। पुरुषों में, श्री प्राण शर्मा, स्व. गौतम सचदेव, स्व. वेद मोहला, पद्मेश गुप्त, तेजेन्द्र शर्मा, महेंद्र दवेसर, ने कई कहानियाँ ऊँचे स्तर की लिखी हैं और हिंदी जगत में अपना अविस्मरणीय स्थान बनाया है।

 मैंने कई बार कहा है कि भारत की पत्रिकाएँ विदेश बैठे हिंदी लेखकों को बारी-बारी से छापें क्योंकि इनका लेखन समय का दस्तावेज है। उसके खो जाने से भारत का आधुनिक इतिहास खो जाएगा। जैसे आज हम रोमानी लोगों का इतिहास नहीं जमा कर पाए हैं या जैसे गिरमिटियों के दस्तावेज़ गुम हो गए। अंग्रेजों को देखती हूँ। अपनी झाड़ियों तक को संभालकर रखते हैं। मेरे घर के पास एक बंगले के बगीचे का आकार इतना बड़ा है कि उसमे दो घर और बनाये जा सकते हैं। मगर वह यूँ ही पड़ा है। इसका कारण एक बहुत पुराना देवदार का वृक्ष है जो 300 वर्षों से खड़ा है। कौंसिल इसको कटाने की अनुमति नहीं देती। हर साल अंग्रेज पर्यटक भारत और अन्य उपनिवेशीय देशों में जाते हैं और अपने राज्य काल के उपकरण, गहने, अन्यान्य वस्तुएँ ढूँढकर संग्रह करते हैं। वापिस लाते हैं ताकि वह सुरक्षित रहें। हम हिंदी के लेखक इनसे भी गए गुज़रे हैं भारत के पटल पर।

हिंदी किताबों पर रॉयल्टी देने का कोई क़ानून नहीं है। लेखक यदि मर जाता है तो उसकी पुस्तक भी मर जाती है। ऐसा हमारे ही देश में अंग्रेजी की किताबों के साथ नहीं हो रहा। नेहरू जी की किताबें मरी नहीं हैं। पर कौन जानता है श्री गौतम सचदेव को? या नीना पाल को या पुष्पा भार्गव को? क्या आप इनको अपने संग्रह में स्थान देंगी? यह समय पर अपने हस्ताक्षर छोड़कर गए हैं। क्या कोई अंक दिवंगत लेखकों के नाम निकलेगा कभी।

★सुमन :-- वर्तमान समय में कहानी लेखन के भविष्य पर कोई टिप्पणी? 
◆◆कादम्बरी मेहरा :- कहानी कहना और सुनना एक शाश्वत विधा है। जब तक मनुष्य की यह प्रकृति बनी रहेगी, कहानी लेखन चलता रहेगा। मुझे यह बड़े गर्व की बात लगी कि कहानी कहने सुनाने के इतिहास में भारत अग्रणी है। हमारे पंचतंत्र, हितोपदेश, रामायण, महाभारत आदि अनेक ग्रंथों की कथाएँ भारतीय मूल के वनजारे मध्य एशिया में लेकर गए। इनके प्रसार का इतिहास ईसा से 1,000 वर्ष पहले तक का निर्धारित हो चुका है। यह अनेकों उद्योगों व कारणों से स्थल मार्ग से, अनेक जोखिम उठाकर पश्चिमी देशों में जाते थे और धन कमाकर लाते थे। रस्ते में रात्रि जागरण करके यह अपने डेरों को सुरक्षित करते थे। मरुस्थल की तपिश से बचने के लिए भी यह रात को जागते थे और सफर तय करते थे।

जागरण के लिए यह कहानियाँ कहते और सुनते जाते थे। उस काल में राजा आदि भी कहानियों से मनोरंजन करते थे। अतः इनको राज्याश्रय भी दिया जाता था। अनेक कालांतर में वहीं  बस गए और जिप्सी कहलाये। इनको रोमानी समुदाय कहा जाता है। मध्य एशिया और दक्षिणी पूर्वी यूरोप में इन्होने गन्ने की खेती ईसापूर्व तीसरी शताब्दी में शुरू की। इनके कारण मध्य एशिया और पूर्वी यूरोप के साहित्य भारतीय कहानियों से भरे पड़े हैं। समय समय पर यूरोपीय लेखकों ने अपने समाज के अनुसार नाम व स्थान आदि बदलकर इन कथाओं का उपयोग किया। डेकामेरॉन, और चौसर की पिलग्रिम्स की कथाएँ इनमे प्रमुख हैं। यदि भारत का कथा साहित्य तीन हज़ार वर्ष तक जीवित रहने की कुव्वत रखता है तो इसका भविष्य अजर अमर है। यहाँ के लेखकों की जो कहानियाँ दिव्या माथुर ने अनूदित करवाकर छापी हैं वह सभी अँगरेज मित्रों ने सराही। भारत में अभी भी कहानी पढ़ना एक प्रचलित व्यसन है। रमणिका गुप्ता की अखिल भारतीय महिला लेखकों का हिंदी अनुवाद करवाना इस प्रचलन का साक्षी है। 'हाशिये उलाँघती औरत' इस शताब्दी की एक अनमोल उपलब्धि है।

यह सही है कि चलचित्रों और टेलीविज़न के आने से कहानी कहने सुनाने का चलन गौण हो गया है मगर माध्यम बदल जाने से कहानी की लोकप्रियता कहीं से भी कम नहीं ही है। पत्तल के बजाय आज मानव प्लेट में खाता है तो भी खाता तो भोजन ही है न। टीवी के लिए भी तो कहानी ही चाहिए। सो सदा लिखी जाएगी।

★सुमन :- अब तक की साहित्य यात्रा आपको कितना संतुष्ट करती है? आपकी अन्य रुचियाँ क्या हैं? 
◆◆कादम्बरी मेहरा :- जब तक है जान, जान-ए-जहाँ, मैं नाचूंगी। मेरा भी यही है। लिखने को अभी बहुत है। इसलिए कह सकती हूँ कि अभी कुछ संतोषप्रद नहीं लगता। वैसे मेरी सभी कहानियों को सराहा गया है। अनेकों नामी पत्रिकाओं में छापी भी गयी हैं मगर सफर अभी बाकी है। मुझे किसी को सीढ़ी बनाकर ऊपर उठना नहीं आता। अक्सर लोग कई तरह से बिक जाते हैं। फिर चाहे जैसा लिखें पत्रिकाएँ उनको छापती ही हैं। मैं वह नहीं कर सकती।

जो कुछ मेरे भाग्य में है मिल जाएगा। हर कदम पर भगवान् को धन्यवाद देती हूँ। भारत इतना जाना आना भी अब नहीं हो पाता। और जाकर भी क्या प्राप्त होता है। अंग्रेजी को महत्त्व देनेवाले आयोजन देखकर मेरी आंतें कुलबुलाती हैं। खैर भारत खुद तय करे कि कहाँ जाना है। इस खेद का कारण केवल हिंदी की उपेक्षा ही नहीं है वरन अंग्रेजी की तोड़ मरोड़ भी है।

यहाँ बसनेवाले लेखकों से मैं कुछ अलग पड़ जाती हूँ। जो लोग एकल हैं वह अपने समय को चाहे जैसे इस्तेमाल कर सकते हैं। परन्तु मुझ जैसी गृहस्थ नारियों की प्राथमिकता परिवार पालन है। मुझे अपने परिवार पर बेहद नाज़ है। मैं तीन बच्चों की माँ हूँ। मेरा बेटा डॉक्टर है। दोनों बेटियाँ दन्त चिकित्सक हैं। सात नाती पोतियाँ हैं। अभी मेरे नाती और बड़ी पोती को अपनी सेकेंडरी की कक्षा में उच्चतम अंक मिले।

उनको कुछ बनाकर खिलाना आदि मेरा शौक है। सबकी पसंद का मुझे ज्ञान है। पकाने के अलावा मेरा काम बगीचे की देखभाल रहा है। पिछले तीन साल में शारीरिक व्याधियों के कारण मेरी क्षमताएँ कम हो चली हैं वरना तो पूरे एक एक करके बगीचे को मैंने ही सजा कर रखा। वनस्पतियों का ज्ञान भी अर्जित किया। क्यारियाँ आदि खोदना मेरा ही काम था। भारत के फूल यहाँ उगाना मेरा ख़ास शौक है। इस विषय पर मेरे कई लेख हैं जो श्री राकेश पांडेय ने अपनी पत्रिका प्रवासी संसार में छापे हैं। इसी सिलसिले में मैंने देखा कि अंग्रेजों ने कैसे हमारी वनस्पतियों का दोहन करके अरबों का व्यापार किया और पूरा लंदन शहर चाय के पैसे से बनाया गया। शक्कर के व्यापार का कारण बने उपनिवेश जिन्हें हमारे लोगों ने जोता बोया और नए देशों का अभ्युदय हुआ। मेरा लिखा इतिहास प्राचीन काल तक हमारी कथा कहता है। अभी तक मैंने शक्कर, चाय, नील, रोमानी समुदाय, भारत के फूल आदि पर लेख लिखे हैं। यह सभी छापे जा चुके हैं। शोधपरक निबंध काफी लम्बे हो जाते हैं परन्तु फिर भी लोग उनको पढ़ना ज्यादा पसंद करते हैं। यह इतिहास हिंदी भाषा में उपलब्ध नहीं हैं। छिट पुट लेख मिलते अवश्य हैं मगर वह किसी अंग्रेजी लेखन का अनुवाद मात्र थे।

 जब तक बना मैंने स्वयं डिज़ाइन करके स्वेटर बुने। साड़ियों पर कढ़ाई की। हर गर्मी की छुट्टियों में दो तीन साड़ियाँ काढ़ लेना हम बहनो के लिए आम बात थी। केवल मैं ही नहीं मेरी सब बहने (चार) सर्वगुण संपन्न रहीं। मुझसे भी अधिक। सबने शिक्षा ली, नौकरियाँ की। गृहस्थी संभाली और अपने बच्चों को सुयोग्य बनाया। यदि कोई आधुनिका कहे कि नौकरी और ससुराल एक साथ नहीं निभ सकते तो मैं बता दूँ हम बहनो ने अपने सास ससुर को भी रखा। परिवार की हरेक पेचीदा स्थिति से जूझे हैं हम। शायद ईश्वर ने हमें इसीलिए इतना सक्षम बनाया मानसिक बल दिया। अपनी सभी उपलब्धियों का श्रेय हम बहन भाई अपने माता पिता को देते हैं और भगवान् को सहस्त्र धन्यवाद कि अंत भले का भला।

★सुमन :-  आज के भारत के हालात पर कोई टिप्पणी? 
◆◆कादम्बरी मेहरा :- क्या होगा कह-सुन कर? भारत अपनी गति से चलता जाएगा। हम सब काल का चबेना हैं। कुछ मुख में कुछ गोद। मोदी जी के काल में हिंदी भाषा बोलने का रिवाज़ बढ़ा है मगर हमारी 70+की पीढ़ी अभी भी अंग्रेजों का राग अलाप रही है। दक्षिण भारत की भाषाओं को मुद्दा बनाकर राजनितिक उट्ठा पटक में जुटे हैं। ऐसे ही एक व्यक्ति को मैंने साफ़ शब्दों में झाड़ पिलाई और कहा कि मत भूलो मोदी जी की विजय का कारण जन मन तक पहुँचना था और यह हिंदी बोलने से संभव हुआ। काश यह संवृत्ति बनी रहे।

मुझे अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई कृत्रिम लगती है। अंग्रेजी माध्यम भारत की अस्मिता का पोषक नहीं हो सकता। यह अभी भी छिछली उच्चता को जन्म देता है। यह बाज़ारवाद का सहायक अवश्य है मगर बाज़ारवाद नौकरियों के लिए है। धन, कमाना हो जाता है मगर विचार शीलता, राष्ट्रवाद, सहभावना, पारिवारिक प्रेम आदि का विकास नहीं हो पता। यह शिक्षा एकमुखी है। इसमें वसुधैव कुटुंबकम का अन्तर्भाव नहीं है। मंडल कमीशन के बाद से अभिभावकों ने अपने बच्चों को निम्न स्तर से बचाने के लिए उन्हें अंग्रेजी के स्कूलों में डाला और उसके बाद से सिर्फ अंग्रेजी मध्यम वाले स्कूल खुले जो वास्तव में व्यापारिक संस्थाएँ हैं। उनका आंतरिक प्रशासन कितना व्यवस्थित है यह संदेहास्पद है। पैसा निचोड़ने की ज़िद में निवेश कम करते हैं और अध्यापक गण अनुभवी या नैतिक रूप से विश्वस्तरीय नहीं हैं। दिल्ली के एक प्रसिद्ध अंग्रेजी स्कूल में अध्यापक ने खुद मेरे भतीजे से कहा कि यदि वह चार लड़के ट्यूशन के लिए ला दे तो वह 70 प्रतिशत अंक उसे दे देगा। नौवीं कक्षा तक आतंरिक परीक्षाओं में यह बच्चा सदा 70 प्रतिशत लाता रहा। दसवीं की परीक्षा में केवल 30% अंक आये तब हज़ारों की ट्यूशन खरच करके, जैसे तैसे सेकेंडरी का इम्तिहान पास कर पाया और उसके बाद दो लाख की घूस देकर दिल्ली के एक बेकार से कॉलेज में दाखिला मिला। कहने के लिए वह बी ए पास है मगर हमें पता है कि उस डिग्री की कीमत क्या पड़ी।

ऐसे बालक बीकेडी, यानि 'बाप का धंधा'  के लायक ही बन पाते हैं। यदि शुरू से उसे अपना पाठ समझ आता तो यह रोना नहीं होता। जहाँ धन का प्राचुर्य है वहाँ झेल सकता है इंसान मगर जहाँ नहीं है वहाँ क्या? वणिकप्रवृत्ति वसूलने को गुण मानती है। सो विवाह में झूठ आदि बोलकर दहेज लेकर अपनी भरपाई कर ली जाती है। बिना संविधान के क़ानून। भुगतना स्त्रियों को पड़ता है। जड़ से देखो तो अपराध किसका। भाषा न आने का। ऐसे हज़ारों लड़के धक्के खा रहे हैं। पिटने के बाद कोई शरीफ नहीं रह जाता। इसलिए यह फेलियर धकिया कर रास्ता बनाते हैं। यही धक्कम धक्का आज भारत का मूल चरित्र है। एक परिवार में दो भाई एक ही धंधे में सहज फिट नहीं हो पाते अतः उनमे प्रतिस्पर्धा, मन मुटाव, ईर्ष्या द्वेष पनपता है। और अब तो बहन भाई भी झगड़ने लगे है। सो भारत की परिवार व्यवस्था का संहारक कौन? अंग्रेजी घटिया पढ़ाई।

चलो सबकी जज मैं ही क्यों बनूँ। एक सुन्दर बात सुनाकर ख़तम करती हूँ। मेरी पोती माही चार बरस की स्कूल पढ़ने गयी। स्कूल यहाँ लंदन का। माही केवल घर पर हिंदी सुनती है। बच्चे चूंकि वापिस हिंदी में उत्तर नहीं देते इसलिए बड़े लोग अंग्रेजी में उनसे बातें करते हैं। पहले दिन आई तो मैंने पूछा माही कोई नई दोस्त बनाई। और लडकियाँ कैसी लगीं। माही ने बताया कि लडकियाँ तो बहुत थीं मगर उसकी दोस्ती सिर्फ ईमान से हुई है। मैंने पूछा क्यों। माही ने सहज कहा क्योंकि ईमान उसी के जैसी है। वी आर सेम सेम। मैंने हँसकर पूछा क्या वह तेरे जैसी गोरी गोरी है? माही खिलखिला पड़ी। बोली, "नो, शी इस लाइक हर मॉम एंड डैड।"

"तो फिर सेम सेम क्या बना।"

माही ने एक मिनट सोचा और बोली, "बिकॉज़ शी स्पीक्स सेम सेम एट होम।"

ईमान घर में हिंदी बोलती है। नन्हीं माही की अस्मिता उसकी भाषा ने दी है। उसने अपने जैसी छांट ली।

* क्षेत्रीय शब्द
  • खिलवाड़ी - खेलने की प्रवृत्ति का आधिक्य (बनारसी बोली)
  • कुज्झे - नन्हा मटका ( दही के छोटे डिब्बे)
  • घाते (घलुआ, खरीदारी के साथ मुफ़्त उपहार)

5 comments :

  1. एक स्पष्ट और इमांदार साक्षात्कार. कादंबरी एक सधी हुई कहानीकार है. अतः ज़ाहिर है उनके साक्षात्कार में किस्सागोई का होना ज़रूरी है. रुचिकर अंदाज़ दिया गया साक्षात्कार पाठक को अंत तक बांधे रहता है. कादंबरी ने अपने स्वयं के जीवन के बरक्स बड़ी कुशलता के साथ सामाजिक एवं पारिवारिक विद्रूपताओं को उजागर करते हुए स्त्री मन की पड़ताल की है. स्त्री मन हर युग मे एक सा रहा है परिवार के प्रति उसकी चिंता कभी खत्म नहीं होती है. वे बगैर स्त्री विमर्श का हल्ला किए स्त्री विमर्श अपनी कहानियों में बुनती है. यह प्रभावशाली साक्षात्कार न केवल उनके जीवन के तमाम पहलुओं को उजागर करता है बल्कि प्रवासी जीवन के भिन्न-भिन्न पहलुओं से भी पाठक को परिचित कराता है.

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  2. sudershen PriyadershiniJanuary 2, 2018 at 2:33 PM

    Sudershen Priyadershini
    bahut sunder saakshatkaar, andr se nikla huya aur bataata huya ki koi bhi vakya anubhav ke baahar ka nhi. pdh kar lga jaise poore jeevan ka saakshtaar kar liya. badhai dono ko : saadhuvad with blessings of New Year.

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  3. बहुत सचाई और ईमानदारी से लिया और दिया गया साक्षात्कार, एक पूरा कालखंड अनायास ही चित्रित हो गया |आप सब को बधाई |

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  4. कादंबरी जी एक सुघड़ कहानीकार और कमाल की क़िस्साग़ो हैं। कहन का अंदाज़ बिंदास, बेबाकी भरा पर सरल और सादा है ; जिससे पाठक सम्मोहित होकर उनके कहे को पूरा पढ़ जाता है, चाहे वह साक्षत्कार हो या कहानी या फिर कोई परिचर्चा। इस साक्षात्कार के साथ भी यही हुआ। मैं सम्मोहित हुई पढ़ती चली गई। सुमन जी ने प्रश्न भी बहुत अच्छे पूछे हैं और उत्तर तो लाजवाब हैं ही। सुमन जी और कादंबरी जी दोनों को बेहतरीन साक्षात्कार के लिए बधाई!!!

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  5. साक्षात्कार बहुत पढ़े-सुने थे किन्तु ऐसा साफ़-बेबाक कहन पहली बार देखा| शुरू किया तो पढ़ती चली गई| लगा कि खुद से बात कर रही हूँ और खुद को पढ़ रही हूँ| लगा ही नहीं कि पहली बार उनके बारे में पढ़ रही हूँ| सुमन जी के छोटे छोटे प्रश्नों के उत्तर देते हुए कादम्बरी जी ने एक चित्र चित्रित कर दिया, जैसे किसी उपन्यास का कोई भाग पढ़ रहे हैं| आप दोनों को बधाई|

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