शोध: भूमण्डलीकरण और हिन्दी साहित्य

रवीन्द्र कुमार

रवीन्द्र कुमार

अनुसन्धित्सु, हिन्दी विभाग, लवली प्रोफैश्नल यूनिवर्सिटी, फगवाड़ा, पंजाब




मानव एक सामाजिक प्राणी है और मानव जाति के कारण ही सामाजिकता का अस्तित्व विद्यमान है। समस्त संसार में मानव ही एक ऐसा प्राणी है जिसमें बुद्धि, विवेक, ज्ञान, जिज्ञासु प्रवृति इत्यादि गुण विद्यमान हैं जो उसे संसार में सर्वश्रेष्ठ बनाते हैं और पशु प्रवृति से उसकी विभिन्नता का अंश रखते हैं। साधारणत: मनुष्य की इस दशा हेतु केवल भाषा की नि:स्वार्थ सेवा का सराहनीय कार्य ही रहा है जिसने मनुष्य के विचारों एवं भावों को एक मजबूत एवं स्थिर आधार दिया। भाषा के बिना मनुष्य निरा पशु है। भाषा के कारण ही मनुष्य में बुद्धि एवं विवेक का विकास होना संभव हुआ है और मनुष्य का समाज में अस्तित्व कायम हुआ। भाषा तथा समाज के संबंध में डॉ. मुकेश अग्रवाल कहते हैं कि 'भाषा और समाज अभिन्न रूप से जुड़े हैं। समाज भाषा के बिना अस्तित्वहीन हो जाएगा और समाज न होने पर भाषा की आवश्यकता ही नही रहेगी।'
संसार में विभिन्न प्रकार की भाषाएँ, बोलियाँ एवं उपभाषाएँ बोली जाती हैं जिससे संसार के लोगों में रहन सहन, संस्कार, सभ्यता इत्यादि में अंतर पाया जाता हैं। किन्तु भाषा का केवल एक ही मंतव्य है कि वह मनुष्य को उसकी जिज्ञासु प्रवृति के तहत विकासशील होने में अग्रणी रहने को मजबूर बनाए रखती है। पाषाण युग से आधुनिकता तक के सफर में भाषा का अहम योगदान रहा है जो इसने अपना उत्तरदायित्व समझ के निभाया है। मनुष्य के विकास के साथ-साथ भाषा में भी समयानुसार वांछित परिवर्तन आये हैं तथा भविष्य में भी जारी रहने की संभावना से हम कदाचित् इन्कार भी नही कर सकते।

समस्त संसार को ज्ञातव्य है कि परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। विकास अथवा विनाश शब्दों में अप्रत्यक्ष रूप से परिवर्तन होने की प्रक्रिया ही विद्यमान है। इस शाश्वत नियम के तहत ही समाज में मनुष्य अपनी जिज्ञासु प्रवृति की तृप्ति हेतु कार्य करता आ रहा है और कदाचित् निश्चित रूप से करता भी रहे जिससे परिवर्तन अस्तित्व में आता है। भारतीय समाज में बीसवीं सदी के 80 के दशक में भूमण्डलीकरण नामक एक ऐसा परिवर्तन आया। इस परिवर्तन से भारतीय समाज में एक ऐसा अभूतपूर्व बदलाव आया कि उसने समाज के प्रत्येक हिस्से पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का आगमन हुआ। प्रत्येक देश संसार के अन्य देशों से व्यापार एवं बाज़ार के संबंध में समझोते करने लगा। इलेक्ट्रानिक उपकरणों के माध्यमों से सूचना एवं तकनीकि प्रसारण में अभूतपूर्व विकास हुआ। कम्प्यूटर ने तो इसमें ओर भी तेजी ला खड़ी कर दी। जिससे समाज के कुछ हिस्सों पर तो अच्छा प्रभाव पड़ा। किन्तु कुछ सामाजिक मूल्यों, सभ्यता के कुछ अंशों तथा संस्कृति के अनेक हिस्सों पर उसने करारी चोट की। फिल्में, भाषा, खाना-पीना, रहन-सहन, यातायात, साहित्य, वेशभूषा इत्यादि सबकुछ खिचड़ी के स्वरूप में भारतीय लोगों के सम्मुख प्रस्तुत होने लगा जिससे पढ़े लिखे वर्ग के साथ-साथ अनपढ़ वर्ग को भी काफी परेशानी, असुविधा तथा न चाहते हुए भी नयेपन का सामना करना पड़ा। जिसका असर आज तक भारतीय समाज तथा उसका प्रत्येक भाग भुगत रहा है। हिन्दी साहित्य भी इस से अछूता नही रहा। अप्रत्यक्ष रूप से सूचना प्रौद्योगिकी ने हिन्दी भाषा का भी विश्व स्तर तक प्रचार प्रसार किया। भाषा में शब्दावली संबंधी कई प्रकार के बदलाव आये, जिससे साहित्य भी प्रभावित हुआ क्योंकि इससे हिन्दी भाषा के साथ-साथ विद्वानों तथा लेखकों के विचारों में बदलाव आ गया था। हिन्दी भाषा ने अपने रूप में विभिन्न अन्य भाषाओं का समावेश न चाहते हुए भी करवा लिया था। सोचने, समझने, लिखने के स्तर इत्यादि में विशेष बदलाव आ गये थे। काव्य का तो प्रारम्भिक ढांचा ही बदल गया था। छन्द, लय इत्यादि तो उनमें से कहीं गायब ही हो गये थे। खुली कविताएँ ही चलने लगी थी, उनका स्तर भी बिल्कुल बाजारी हो गया था और बदस्तूर आज भी वैसा ही जारी है।

भूमण्डलीकरण के कारण हिन्दी साहित्य पर जो असर पड़ा उसका अंतर जानने हेतु हमें पुरातन हिन्दी साहित्य तथा भूमण्डलीकरण के दौर के साथ-साथ आधुनिक दौर के साहित्य पर भी नजर डालते हुए उनके तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से समझना पड़ेगा। साहित्यकार सदैव ही अपने अनुभव, विवेक एवं कल्पना का समावेश करवा आदर्शवादिता का सहारे लेते हुए सामाजिक तानेबाने का चित्रण करता है। 'साहित्य समाज की बिखरी हुई इकाइयों को एक स्थान पर केन्द्रित कर देता है। अपने अनुभव और लोक-दर्शनके आधार पर साहित्यकार अपनी रचना में किसी भी ऐसी बात को नही छोड़ता जो समाज के हित के लिए आवश्यक हो। सत्य तो यह है कि साहित्य में समाज के सौन्दर्य की भाँति ही उसकी कुरूपता का भी सुन्दर रूप में चित्रण किया जाता है।'  यदि समाज में किसी भी प्रकार का कोई भी परिवर्तन अथवा बदलाव आता है तो साहित्यकार उसी प्रकार अपनी लेखनी चलाने को बाध्य है। भारतेन्दु युग में या उससे भी पहले आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल इत्यादि में धर्म, चरित्र, प्रेम, सौदर्यात्मकता, भक्ति, अलंकार इत्यादि का साहित्य से प्रगाढ़ संबंध था। साथ ही साथ भाषा के स्तर पर भी विशेष ध्यान दिया जाता था। जिस कारण उनकी रचनाएँ आधुनिक काल तक पहुँचते ग्रन्थों की कोटि में स्वीकार की जाने लगी हैं तथा लेखनी चलाना सीखने हेतु वह रचनाएँ आज भी प्रासंगिक है। आदिकाल, भक्तिकाल एवं रीतिकाल की अधिकांश रचनाएँ पद्यात्मक रूप में थी। रीतिकाल में वातावरण के अनुसार साहित्य की गहराई में थोड़ा अंतर पाया जाता है। किन्तु छन्दों, अलंकारों, भावार्थों इत्यादि का अच्छा प्रयोगात्मक विवरण देखने को मिलता है। 'साहित्य में बहुत दिनों तक यह परिपाटी रही कि कविगण अपने काव्य का आरम्भ अपने देवता की स्तुति से करते थे। लेकिन अब वह परिपाटी समाप्त हो गई है। हिन्दी में राष्ट्रवादी कवि मैथिलीशरण गुप्त इस परिपाटी के अन्तिम उदाहरण थे। अब कोई भी कवि अपने ग्रन्थ का आरम्भ देव स्तुति से नही करता'।  साहित्यिक कार्यों के संदर्भ में इस प्रकार की देव स्तुति भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग रही है। साहित्यिक कार्यों में ही क्या, लगभग प्रत्येक कार्य के शुभारम्भ में इसका चलन रहा है। किन्तु ऐसा लगता है कि भौतिकवाद की आग सब कुछ खत्म करने पर अमादा है। लेखन कला के दायरे में बहुत बड़ा विस्तार हुआ है। आधुनिकीकरण तथा वैश्वीकरण ने समकालीन लेखकों की मानसिकता पर भी प्रभाव डाला है जिस कारण आधुनिक रचनाओं में खुलापन है। खुली कविताएँ, छोटी कहानियाँ, लय-मुक्त दोहे, उपन्यासों में आ रही कमी, शब्दों में हलकापन यह सभी आधुनिकीकरण की वजह से है।

रचनाओं में अपनी जी-जान लगा देने की प्रक्रिया आज लगभग समाप्त ही है जो कि पुरातन साहित्य से बिल्कुल ही विरोधाभास रखती है। मैथिलीशरण गुप्त जी द्वारा रचित ‘साकेत’ हिन्दी साहित्य की अमर रचना कदाचित् दुबारा नही मिलेगी, लिखी जाने पर भी आशंका है। जिसके लिए मरणासन्न होने पर भी मैथिलीशरण गुप्त जी ने प्रभु से जीवन दान मांग कर उसे पूरा किया। ऐसी रचनाएँ लेखकों के जिगर का टुकड़ा रही हैं।

निश्चित रूप से भूमण्डलीकरण से समाज के प्रत्येक हिस्से में इतने बदलाव आये कि सारी दुनिया ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की धारणा पर खरी उतरती नजर आने लगी। क्या व्यापार, क्या सूचना, क्या तकनीकि जानकारी सभी प्रकार के सामाजिक कार्य के एक हो जाने से पूरा पृथ्वी मंडल एक गाँव बन आपस में सिमट गया। साहित्य के मूल रूप में विघ्न पड़ने का केवल यही एक कारण रहा क्योंकि इस परिवर्तन से साहित्यकार अथवा लेखक की सोच प्रभावित हो गयी। जिस सोच से पुरातन साहित्यकार अपनी लेखनी चलाते थे, कदाचित् वह कहीं समाप्त ही हो गई थी। सामाजिक कल्याण का आदर्श ले चलने वाले लेखक या साहित्यकार भूमण्डलीकरण की चकाचौंध से अपनी प्रसिद्धि को सर्वोपरि रखने लगे। मातृभाषा या राष्ट्रीय भाषा में विदेशी शब्दावली का इस्तेमाल करने लगे। यद्यपि भाषा और साहित्य का आपसी अटूट संबंध है। भाषा के बिना साहित्य का अस्तित्व ही नही है 'जिस प्रकार हमारे महर्षियों ने जीव जगत का अनुसंधान करके प्रत्येक प्राणी में शरीर और आत्मा का प्रतिपादन किया है, उसी प्रकार साहित्यकारों ने  साहित्य के भी शरीर और आत्मा का निरूपण किया है। साहित्य की आत्मा है उसकी भाव व्यंजना अर्थात अर्थ और शरीर है उसकी शब्द रचना अर्थात भाषा।'  किन्तु भूमण्डलीकरण नामक नयेपन के कारण साहित्यकार की सोच तथा भाषा के बदलाव ने तो साहित्य को एक नये मुकाम पर ला खड़ा कर दिया। जिससे पाठकों के दिलो-दिमाग पर भी असर पड़ना स्वाभाविक था। आज से तकरीबन 120 साल पहले चन्द्रकांता जैसे उपन्यासों को पढ़ने हेतु जिन लोगों ने हिन्दी सीखने जैसे कार्य किये थे और वह भी उस समय जब कि समकालीन सरकारों तथा बहुसंख्य लोगों को हिन्दी सीखने पर मनाही थी तथा अंग्रेजी भाषा का बोलबाला था। भाषा के प्रति वही ललक, वही जज्बा, वही जोश आज कहीं भी देखने में नही मिलता। अगर सत्य कहा जाये तो जिस प्रकार बाधाओं के बाद भी जब लोग हिन्दी सीख सकते हैं तो आज तो हिन्दी पर रोक की बजाए उसे बढ़ावा ही दिया जा रहा है किन्तु फिर भी लोगों में इसके प्रति उदारता ही है। आधुनिकता के कारण भाषा में अब वह वजन नही रह गया है जो साहित्य में गंभीरता, सौन्दर्य जीवन के निकट एवं औजस लाये। वजन तो दूर आज इसमें इतनी गिरावट आ गई है कि आज वार्तालाप एवं संवाद हेतु भी लोग बिल्कुल भद्दे एवं चलताऊ शब्दों का इस्तेमाल करने लगे हैं और यह प्रक्रिया इस स्तर तक पहुँच चुकी है कि अब खुद लोगों को भी इसका अहसास होने लगा है। इस संबंध में डॉ. हेमलता श्रीवास्तव कहती हैं कि 'भाषा में मर्यादा की अब कोई सीमारेखा नही रह गई है। आम बोलचाल से लेकर सोशल मीडिया और यहाँ तक कि फिल्म व साहित्य में भी चलताऊ शब्दों की बेजा घुसपैठ समाज को अंधी गली पर ले जा रही है। वयस्कों के साथ किशोरों यहाँ तक कि बच्चों की जुबान पर भी इन शब्दों का इस्तेमाल बढ़ रहा है।'  इस प्रकार की छिछोरी भाषा से साहित्य में भी हल्कापन आ रहा है। आज सभी प्रकार के लेखकों में मानव कल्याण हेेतु याथार्थ के साथ-साथ आदर्शवाद का अभाव है, जिससे कोई सारांश निकलता हो, अप्रत्यक्ष रूप से कोई शिक्षा मिलती हो। इस प्रकार के अभाव के कारण आज मानव बाहर से खुशहाल अंदर से कंकाल बनता जा रहा है। जो कि ‘साहित्य’ शब्द हेतु सिवाय धब्बे के कुछ भी नही है।

प्रश्न यह पैदा होता है कि आज भाषा या साहित्य के प्रति ऐसा क्यों नही हो रहा है। आज से 250 साल पहले जब भारत पर अंग्रेजों ने भारत पर अपना आधिपत्य सथापित किया था तो उन्होंनें अंग्रेजी भाषा को अपनी सुविधा हेतु जन साधारण पर लागू करवाने की कोशिश की थी ताकि अपने सामराज्य को फैलाने हेतु अंग्रेजी भाषी लोग मिल सके। उनका मकसद अंग्रेजी भाषा के प्रसार प्रचार का नही था और न ही उसमें कोई साहित्यिक रचनाएँ लिखवाने का। किन्तु उस समय भी हिन्दी भाषा प्रेमिओं ने हिन्दी भाषा को बचाने हेतु अंग्रेजों से पूरी टक्कर ली थी। डॉ. रामविलास शर्मा ने ‘भारत की भाषा समस्या’ शीर्षक नामक अपनी पुस्तक में इस संबंध में वर्णन किया है कि 'यदि राजस्थान में 19 वीं सदी में हिन्दी राजभाषा के रूप में काम आती थी और उसका व्यवहार हिन्दुस्तान के लोग ही नहीं अंग्रेज भी करते थे तो कोई कारण नही कि 20 वीं सदी के अन्तिम चरण में अंग्रेजी प्रेमी भारतवासी अपना अंग्रेजी मोह त्यागकर हिन्दी का उपयोग न कर सके।'  सन् 1917 में महात्मा गांधी जी ने दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार प्रसार हेतु अपने पुत्र देवदास गांधी तथा स्वामी सत्यदेव को भेजा। उन्होंने वहाँ जाकर सराहनीय कार्य किया। हालांकि इस कार्य के लिए उन्हें अनेक मुसीबतों का सामना भी करना पड़ा था। किन्तु प्रश्न भारतीय सांस्कृतिक गौरव तथा भाषा बचाने का था। प्रसिद्ध सामाजिक विश्लेषक प्रभु जोशी मानते हैं कि भूमण्डलीकरण का सबसे बड़ा औज़ार भाषा है। भाषा के आधार पर ही इसका प्रचार प्रसार नियत है। यह तो हम सब जानते हैं कि भारत एक विभिन्न भाषाई देश है। यहाँ मध्यम वर्ग काफी बड़ी मात्रा में अपना जीवन बरस कर रहा है। जिस कारण यहाँ का बाज़ार भी बहुत बड़ा है। जो सारी दुनिया के व्यापारी वर्ग को लालायित करता है। वह यहाँ पर तब ही कामयाब हो सकते हैं जब सभी लोग एक ही भाषा के अंतर्गत कार्य-व्यवहार करें। इसी के तहत सोची समझी रणनीति के आधार पर अंग्रेजी भाषा का प्रचार प्रसार किया जा रहा है। जो हिन्दी भाषा के साथ-साथ भारतीय साहित्य संस्कृति इत्यादि के लिए भी खतरनाक साबित हो सकती है।

पुरातन से आधुनिक साहित्य की गुणवत्ता पर यथार्थता के केंद्र बिन्दू पर चर्चा करें तो कुछ आचम्भित करने वाले मुद्दे सामने आते हैं कि जिस प्रकार पुराने साहित्यकार या लेखक लोगों को बाँध कर बैठाने का मादा रखते थे। वह जिस प्रकार की सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक अथवा राजनैतिक समस्याओं पर अपनी लेखनी चलाते थे जिस कारण लोगों में यह भावना जागृत होती थी कि वह उन्हीं की कहानी है या वह स्वयं को उस कहानी का एक हिस्सा मानने लगते थे, वह बात आज ढूँढने पर भी कहीं नजर नही आती। आज हिन्दी के तुलसीदास, सूरदास, केशव जैसे कवि कहाँ गये जिन्होने धर्म के नाम पर इतनी सशक्त रचनाएँ दी कि हिन्दी साहित्य को अमर कर गये। तुलसी के राम भारतीय समाज के लिए मर्यादा पुरूषोत्तम के रूप में रहे हैं जिससे लोगों ने मर्यादा सीखी। सूरदास के कृष्ण आज भी वृन्दावन में अठखेलियाँ करते हैं। महाभारत के युद्ध में श्री कृष्ण जी द्वारा अर्जुन को दिए गये ज्ञान को आज भी सारी दुनिया प्रणाम करती है एवं उसके नक्शेकदम पर चलते हुए कर्म को ही तरजीह देती है। चूंकि हमें निश्चित भी नही हैं कि यह सारा कुछ घटित भी हुआ था अथवा नही। किन्तु फिर भी हम उन्हें दिल से मानने को बाध्य हैं क्योंकि यह सारा कार्य दिल से किया गया था और वह भी मानवीय कल्याण हेतु था। इन कार्यों के पीछे नफा नुक्सान, प्रसिद्धि जैसी किसी भी निम्न प्रवृति का कोई स्थान नही था। जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा जैसे छायावादी कवि जिन्होंनें कल्पनाओं को ऐसी उड़ान दी कि प्रेम, स्नेह, वियोग इत्यादि की गहराइयों का ज्ञान हुआ। चर्चित उपन्यासों अथवा कहानियों पर पहले फिल्में भी बनती रही हैं किन्तु आधुनिक युग में यह कार्य लगभग समाप्त ही हो गया है। पहले फिल्मों की गिनती भी कहीं न कहीं साहित्यिक कोटि में होती थी और प्रेरणा से ओतप्रोत भी होती थी। किन्तु आज तो नंगेज दिखा पैसे बटोरते हुए बिजनेस करने के अलावा कोई दुसरा रास्ता है ही नही। त्योहारों पर गीत अथवा नाच या देशभक्ति पर तो फिल्में बननी जैसे बंद ही हो गयी हैं।

आचम्भित होने के अलावा कोई ओर चारा बचता ही नही है कि आज क्यों नही ऐसा काव्य अथवा कहानी, नाटक या निबंध लिखा जा रहा जो हमें सोचने के लिए मजबूर कर दे अथवा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की याद दिला सके, जिनके निबंधों ने धूम मचा कर रख दी थी। आज क्यूं नही ऐसी रचनाएँ मानवीय मस्तिष्क को बांधने पर, सोचने पर मजबूर करती। क्या आज का लेखक स्वयं को उस स्तर तक नही ले जा पाता। यदि नही तो यह भाषा तथा साहित्य दोनों के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है तथा भावी पीढ़ियों के लिए तो यह उनको भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति से तोड़ने वाली बात होगी। जिसका बीज आज हम बो रहे हैं। सोचने वाली बात है कि बाजारीकरण में ऐसा क्या था, क्या है जिसनें मानवीय नैतिकता, मानवीय व्यवहार, मानवीय सोच के साथ-साथ अखण्ड भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति को भी घायल कर दिया। हिन्दी भाषा के नाम का सहारा लेकर हम आगे तो बढ़ रहे है। साथ ही साथ भाषा का भी प्रसार फैलता जा रहा है। किन्तु अपनी छाप नही छोड़ पा रही है जो कदाचित् भावी पीढ़ियों हेतु नितांत आवश्यक है। वह उन्हें ढूंढने से भी नही मिल पायेंगें। भूमण्डलीकरण ने मानव को भावहीन बना उसे साहित्य की अपेक्षा बाजार की ओर धकेल दिया है जिससे उसका व्यवसायकरण हो गया है। आज बाजार एवं विज्ञापनों की आड़ में शेखी, प्रसिद्धि, मुनाफा, स्पर्धा, बाहरी दिखावा जैसे गुण प्रमुख हो गये हैं और दया, धर्म, सहनशीलता, करूणा, धैर्य इत्यादि मानवीय मूल्य गौण हो गये हैं।

सामाजिक मुद्दे आज भी लगभग वहीं हैं। जो लगभग एक सदी पूर्व थे। बल्कि आज उनमें बढ़ोतरी ही हुई है। यदि मुंशी प्रेमचन्द समकालीन मुद्दे उठाकर उनके माध्यम से पूरे समाज में एक जागृति की लहर पैदा कर सकते हैं तो आज यह कार्य क्यूं नही हो सकता। क्या आज हम यह समझें कि हिन्दी भाषा केवल दिखावे की भाषा रह गई है। आज लेखक एक विशेष प्रकार के मुद्दे उठाता है। भाषा के इस्तेमाल में अंग्रेजी तड़का लगाता है। यह सब भूमण्डलीकरण का ही असर है। वैश्वीकरण से राजनैतिक स्तर पर तो हम कदाचित् यह मान सकते हैं कि हम विकास की दौड़ मे हैं। बढ़ती दुनिया के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रहे हैं। किन्तु नैतिकता, साहित्यिक, अथवा सांस्कृतिक स्तर पर तो हम मानसिक रूप से गुलाम ही हैं। वैश्वीकरण की वजह से मास-मीडिया ने साहित्य पर एक विशेष प्रकार का असर डाला। अब यहाँ पर ‘मास मीडिया’ शब्द को ही लीजिए। हिन्दी भाषा में ‘मास’ शब्द का अर्थ है भीड़ या जनता और ‘मीडिया’ शब्द का अर्थ है माध्यम। इसलिए मास मीडिया का अर्थ है जनता का माध्यम। किन्तु आधुनिकता की वजह से ‘जनता का माध्यम’ शब्द के स्थान पर अंग्रजी भाषा का शब्द ‘मास मीडिया’ शब्द ही इस्तेमाल किया जा रहा है। इस मास मीडिया के तहत भी ‘इन्टरनेट’ शब्द अंग्रेजी भाषा का है। जबकि हिन्दी में ‘अन्तर्जाल’ शब्द का बहुत कम इस्तेमाल हो रहा है। निश्चित रूप से वैश्वीकरण की वजह से अन्तर्जाल पर हिन्दी साहित्य से संबंधित विभिन्न रूप और उनसे संबंधित सामग्री भी प्रचुर मात्रा में मिल रही है। किन्तु इसने हिन्दी भाषा की गुणवत्ता पर प्रश्न चिह्न लगा दिया है।

इस बात से कदापि इन्कार नहीं किया जा सकता कि वैश्वीकरण ने विश्व स्तर पर विचारों, घटनाओं एवं सूचनाओं हेतु एक मंच तैयार कर दिया है जिससे सामाजिक परिस्थितियों में अनचाहा बदलाव आया जिससे साहित्य भी उसी ओर मुड़ गया। साहित्य का कोई भी रूप गद्य अथवा पद्य हो। साहित्य पर इसका धीरे-धीरे असर होता हुआ आज मुख्य मुद्दा ही बदलता जा रहा है। विभिन्न कवियों ने अपनी लेखनी के दौरान उस समय की विभिन्न परिस्थितियों पर अपनी रचनाओं में उनका विशेष उल्लेख किया।
'आज मैं आया। थका-माँदा
एक किलो आलू का भाव दस पैसा घटाने में
पूरी झिकझिक के बाद भी नाकामयाब
हर बार चार आना और महँगा आलू
दुनिया की आधी आज़ादी की तरह खरीदे'
'मैं तुम्हारे बारे में बहुत नही सोच सकता
मुझे दवाओं के पैसे चुकाने हैं दूध का हिसाब करना है'
इस प्रकार की रचनाएँ स्वयं सिद्ध करती हैं कि साहित्य को जो रूप छायावादी विचारधारा से प्रभावित था कदाचित् वह आज खत्म हो चुका है।
' वो तोड़ती पत्थर
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर
      वह तोड़ती पत्थर.....
           कोई न छायादार
     पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार
          श्याम तन, भरा बँधा यौवन
          नत नयन प्रिय, कर्म रत मन
          गुरु हथौड़ा हाथ
           करती बार-बार प्रहार........'
निराला जी की इन पंक्तियों में तथा लीलाधर जगूड़ी की काव्य पंक्तियों में जो अंतर दृष्टव्य है वह यह है कि निराला जी की रचना में गरीबी, मेहनत एवं शोषण दिखाई पड़ता है जब्कि जगूड़ी की रचना में मँहगाई, जीवन यापन की चिन्ता, भविष्य की चिन्ता के लक्षण नजर आते हैं। हालांकि दोनों रचनाएँ लगभग समान दिखाई पड़ती हैं। यह अंतर वैश्वीकरण की उपलब्धि है। भारत में वैश्वीकरण से अमीर एवं गरीब, दलित, शोषित वर्ग के दरमियान खाई ज्यादा बड़ी हुई है। गरीबों के कारण बाज़ार है जिसका फायदा अमीर उठा रहा है और अंग्रेजी भाषा के कारण गरीब अमीर से कट रहा है। प्रेमचन्द, जैनेन्द्र, यशपाल महादेवी वर्मा इत्यादि लेखकों ने गरीबी की गहराइयों की तह तक जाकर उनकी भावनाओं, उनकी सोच, उनके कार्यों इत्यादि को महसूस कर, उसे भोगकर अपनी लेखनी में उतारा। बिना किसी विज्ञापनों के वह रचनाएँ विश्व प्रसिद्ध हुई। आज भी लोग इन रचनाओं को बड़े चाव से पढ़ते हैं। आज भाषा के कारण अमीरी और गरीबी में गहरा अंतर है तो अन्र्तात्मा को झंकोर देने वाली रचनाओं की उम्मीद कहाँ से की जा सकती है। आज किताबों में तो शब्दावली प्रचुर मात्रा में है। किन्तु लोगों के दिलो-दिमाग में नही है। किसी भी रचना को संवेदनशील और प्रभावशाली बनाने हेतु छवि, प्रतीक, बिम्ब इत्यादि जैसे न तो शब्द मिलते हैं और न ही इनसे संबंधित इनके अर्थ। सौन्दर्यात्मकता जैसे भावों एवं गुणों का तो बंटाधार ही हो गया है। इस प्रकार की त्रासदी के लिए केवल भूमण्डलीकरण ही जिम्मेदार है।

इस बात से कदापि इन्कार नही किया जा सकता कि अन्तर्जाल के कारण हिन्दी भाषा का प्रचार प्रसार आज विश्व स्तर पर हो रहा है। भाषा के प्रसार से साहित्य भी पनप रहा है। किन्तु साहित्य का जो स्तर इतनी समृद्ध भाषा के अनुरूप होना चाहिए, कदाचित् वह नही है। आज कोई भी लेखक इतनी गहराई में नही जाता जितनी इस भाषा के साहित्यिक दृष्टि के अनुरूप लेखक को जाना चाहिए। हालांकि मुद्दे तो आज भी बहुत से हैं जिन पर कार्य होना चाहिए। किन्तु प्रश्न यह खड़ा होता है कि आज के लेखक का ध्यान, उसकी एकाग्रता, मुद्यदों के प्रति उसकी उदासीनता, विषय के प्रति उसकी गहराई आज किधर है ? आज रचनाएँ तो धड़ाधड़ छप रही हैं। किन्तु उनमें दिलों दिमाग में छाप छोड़ने की गहराई कदाचित् गायब है। कम्प्यूटर ने इसके प्रचार प्रसार में कोई कसर नही छोड़ी है। हजारों वैब साइट हिन्दी में कार्य कर रही हैं। प्रतिदिन ब्लॉग छप रहे हैं। इन सभी को देखकर एक बात सामने आती है कि जिस प्रकार मनुष्य की प्रवृति है कि वह प्रत्येक कार्य को आसान बनाना चहाता है। इसी प्रवृति के तहत उसने भाषा में भी बदलाव किये हैं। अपनी सुविधा के अनुसार वह उसे साधारण से भी नीचे ले जा रहा है। उसे तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहा है। एक प्रकार से उसकी गरिमा को ही खत्म करने को आतुर है। जिससे साहित्य की शैली एवं उसकी गहराई पर प्रश्न चिह्न लग रहा है।

आज अखबारों, रेडियो एवं टी.वी. के विभिन्न चैनलों के माध्यम से प्रतिदिन हजारों विज्ञापनों की दौड़ अथक चल रही है। जिनमें से लगभग 90 फीसदी हिन्दी भाषा के माध्यम से हैं। 'गाँवों, शहरों, नगरों, महानगरों की सीधी, सपाट, सरल जीवन शैली से लेकर व्यस्ततम, तीव्र, गतिपूर्ण एवं याँत्रिक जीवन में प्रवेश करके स्थान-स्थान पर विज्ञापनों की वैविध्यपूर्ण दुनिया को देखा जा सकता है।'  विज्ञापनों के अलावा सूचनाएँ, प्रपत्र, पत्रिकाएँ इत्यादि हिन्दी भाषा में धड़ल्ले से परोसी जा रही हैं। किन्तु ध्यान से अवलोकन करने पर यह बात सामने आती है कि वैश्वीकरण के कारण हिन्दी भाषा को एक बाजार तो प्राप्त हुआ है। किन्तु वह केवल विज्ञापनों तक ही सीमित रह गया है और हिन्दी  केवल विज्ञापनों की भाषा बन कर रह गई है। इसमें विचार विमर्श की गुजांइश किंचित मात्र ही है। विचार विमर्श, अध्ययन एवं संवाद साहित्य की जीवन रेखाएँ है। नौजवान वर्ग वैश्वीकरण से सारी दुनिया की घटनाओं से स्वयं को पल-पल अवगत करवा रहा है। जिससे नई प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। मोबाइल ने विचार विमर्श, अध्ययन एवं संवाद की सारी सम्भावनाओं को दरकिनार कर दिया है। जिससे भाषा एवं साहित्य की जीवन रेखा टूटती हुई नजर आ रही है। विज्ञापनों में भी उपभोक्ता की सुविधा के ध्यानहित अंग्रेजी प्लेट में हिन्दी व्यंजन परोसा जा रहा है। क्योंकि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के उत्पादों की क्रय-विक्रय प्रक्रिया का मात्र यही रस्ता शेष रह जाता है। जिससे सारा वातावरण प्रभावित होता है। सही अर्थों में एक साकारात्मक सोच प्रभावित होती है। जो साहित्यिक विचारधारा एवं सोच को पनपने ही नही देती। अनेक वैब साईट पर जितने भी लेख प्रकाशित होते हैं उन सभी में सैकड़ों की तादात में विज्ञापनों की लड़ी चलती रहती है जो लेख के गहन अध्ययन में एक अवरोधक का कार्य करती है जिससे पाठक विश्लेषण अथवा अलोचना करने की प्रक्रिया से तो स्वर्था दूर ही रहता है। सही अर्थों में तो भौतिकवाद के इस बदलाव से व्यक्ति ने स्वयं को इस कदर तक व्यस्त कर लिया है कि वह किताबों का अध्ययन ही नही कर पाता और न ही अध्ययन का वातावरण का जन्म हो पाता है।

विगत 30-35 सालों से हिन्दी के कार्य-क्षेत्र में जो फैलाव अथवा विस्तार आया है। उसे देखकर तो यह लगता है कि हिन्दी भाषा का भूमण्डलीकरण हो गया है। इस बात से इन्कार भी नही किया जा सकता कि वैश्वीकरण के कारण हिन्दी पूरे विश्व में अपनी जगह बना पाई है। विदेशों में अनेक संस्थानों में हिन्दी पढ़ाई जाती है। हिन्दी बोली जाती है। विदेशों में हिन्दी की पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं। 'हम देख सकते हैं कि इधर हिन्दी पत्रकारिता  का स्वरूप बहुत बदल गया है। अनेक पत्रिकाएँ यद्यपि बंद हुई हैं परंतु अनेक नई पत्रिकाएँ नए रूपाकार में शुरू भी हुई हैं। आज हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में हिन्दी और हिंदीत्तर राज्यों का अंतर मिटता जा रहा है। हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का पाठक वर्ग तो संपूर्ण देश में है ही, उनका प्रकाशन भी देशभर में हो रहा है। डिजिटल टेकनीक और बहुरंगे चित्रों के प्रकाशन की सुविधा ने हिन्दी पत्रकारिता जगत को आमूल परिवर्तित कर दिया है।'

हिन्दी के कुछ दिग्गज संस्कृतनिष्ठ हिन्दी में लिखित रचना को ही हिन्दी साहित्य का एक अंश मानते है। वह आज की हिन्दी को छिछोरी भाषा की संज्ञा से अभिभूत करते हैं। इसमें लिखित रचनाओं को वह साहित्यिक रचना मानते ही नही। किन्तु आज की पीढ़ी ने इसे अपना लिया है। उनकी साहित्यिक रचनाएँ भी, उनके शीर्षक भी, उनकी समस्याएँ भी आधुनिकता की वजह से बदल गई हैं। आज युवा वर्ग एक दूसरे पर अपना प्रभाव जमाने हेतु टूटी फूटी हिन्दी भाषा का इस्तेमाल करता है। वार्तालाप के दौरान पंजाबी, अंग्रेजी अथवा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं का हिन्दी भाषा में प्रयोग करता है। जिससे हिन्दी भाषा का स्वरूप प्रतिदिन बिगड़ता जा रहा है। विद्यालयों में बच्चों की वर्तनी पर कोई खास ध्यान नही दिया जा रहा। ‘मैने यह कार्य किया है’ कहने की बजाए ‘मैंने यह कार्य करा है’ इत्यादि जैसे वाक्यों का चलन बढ़ता जा रहा है जिससे व्याकरण पर भी प्रश्न खड़ा हो रहा है जो कि खुद भाषा को नियंत्रण करने का कार्य करती है। गलतियों में सुधार की बजाए उसी उसी रूप में बढ़ावा मिल रहा है। जिससे हमारी विचारधारा में भी परिवर्तन आ रहा है। कुछ हद तक पत्रकारिता एवं शोध-पत्रिकाओं ने हिन्दी के मानक रूप को एक वाहक के रूप में बचाकर रखा हुआ है। इस संबंध में सूद जी कहते हैं कि 'भाषा के संबंध में एक रोचक तथ्य यह भी है कि भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान का साधन मात्र ही नही है अपितु वह हमारे सोचने, समझने और तर्क-वितर्क का भी माध्यम है।'  इसलिए भाषा से केवल विचारों के आदान प्रदान का ही संबंध नही रह जाता। उससे हमारी सोच, हमारी मानसिकता भी जुड़ी हुई होती है जिससे हमारी विचारधारा प्रभावित होती है और विचारधारा प्रभावित होने से समाज में उसका असर गहराई तक जाता है।

भूमंडलीकरण से हम सूचनाओं के स्तर पर तो पूरे विश्व में एक दूसरे के नजदीक आ रहे हैं, परस्पर सहयोगी हो रहे हैं। किन्तु सामाजिक स्तर पर दृष्टिपात करने से परिवार टूटते नजर आ रहे हैं। पारिवारिक सदस्यों का आपसी मेल-मिलाप कम हो गया है। लोग सामूहिक परिवार की बजाए एकल परिवार की परम्परा की ओर अग्रसर हुए जा रहे हैं। भारतीय परम्पराओं को तोड़ते हुए पश्चिम संस्कृति पर न्योछावर होने को आतुर हैं। विडम्बना देखिए कि साहित्यिक रचनाएँ भी उसी के अंतर्गत लिखी जा रही हैं। 'कहते, 'अंग्रेजी बोलो, अंग्रेजी ढंग के कपड़े पहनो, छुरी-काँटे से खाओ, मगर बिलकुल अंग्रेज न बनो।'  तात्पर्य यह कि विकास की आड़ में भारतीय भाषा, साहित्य एवं संस्कृति पर करारी चोट हुई है।

लोगों की विचारधारा धीरे-धीरे इस ओर भी अग्रसर हो रही है कि पश्चिम में रोजगार, शिक्षा एवं जीवन यापन के पुख्ता आसार हैं, प्रबंध है बनिस्बत भारत के। जिस कारण सम्पूर्ण भारतवर्ष से प्रतिदिन सैकड़ों, हजारों लोग विदेशी उड़ाने भर रहे हैं। जिन लोगों का हिन्दी भाषा अथवा साहित्य से लगाव है। उनके कारण विदेशों में तो हिन्दी भाषा अपना अच्छा प्रभाव जमा रही है। किन्तु भारत के कुछ राज्यों में इसका धीरे-धीरे पतन हो रहा है। पंजाब जैसे राज्यों में तो स्कूल स्तर पर हिन्दी को खत्म ही कर दिया है जो कि भावी दृष्टि से पंजाब वासियों के लिए विनाशकारी साबित होगा। पंजाब के लोग हिन्दी भाषा से अनभिज्ञ ही रहेंगे। आज पंजाब राज्य में से हिन्दी साहित्य की रचना जैसे कार्यों का होना दुर्लभ कार्य प्रतीत होता है। किन्तु वैश्वीकरण से सबसे ज्यादा लोग विदेशों में जा रहे है। पंजाब में लोगों को पंजाबी भाषा की आड़ में भाषाई स्तर पर मानसिक पंगु बनाया जा रहा है। भारत में साठ फीसदी आबादी नौजवान के रूप में है जिन पर सारा दारोमदार है और विडम्बना देखिए कि भूमण्डलीकरण की चपेट में वही वर्ग सबसे ज्यादा है। अब किस प्रकार आस की जा सकती है कि पूर्वजों की चलाई लड़ी को वह बरकरार रख सकेंगे। आज जितने भी लोग हिन्दी साहित्य की सेवा में संलग्न हैं। वह सभी लगभग 70 की उम्र को पार कर चुके है। चिंतित होने का विषय है कि उनके बाद हिन्दी भाषा एवं साहित्य का क्या अंजाम होगा। चुनिन्दा नौजवान लोग ही है जो उनके नक्शे कदम पर चल रहे हैं।

विभिन्न चिंतक, आलोचक एवं लेखक आज इस बात पर एक मंच पर हैं कि वह सरकार एवं नौजवान वर्ग का ध्यान इस और आकर्षित करें कि हिन्दी भाषा एवं साहित्य भारतीय संस्कृति का एक अहम हिस्सा है। भारत बहुभाषी देश है। हिन्दी के अतिरक्ति ब्रज भाषा, अवधी, भोजपुरी इत्यादि उपभाषाओं में भी धीरे धीरे साहित्य रचना होने लगी है अथवा हो रही है और प्रत्येक के लक्षणों एवं कर्मों में भारतीय संस्कृति निहित है। भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के साथ-साथ हिन्दी भाषा एवं साहित्य को पतन की ओर ले जाने के लिए मुख्य एवं संकलित रूप में केवल भूमण्डलीकरण को ही जिम्मेदार नही ठहराया जा सकता। निष्पक्षता को साथ लें तो हम खुद भी इसके लिए उतने ही जिम्मेदार हैं। हम सख्त मेहनत एवं भ्रमण से परहेज करने लगें हैं। मोबाईल, कम्प्यूटर, इन्टरनेट सहित अपने ए.सी. कमरों में बैठ कर केवल पुरानी रचनाओं से नकल का सहारा ले रचनाओं को एक नया रूप देने लगे हैं। जिसमें एक प्रकार का नकलीपन एवं हल्कापन सा आ गया है। जिससे एक तरह का झूठ और फरेब ही उभर रहा है। अपनी रचनाओं से हमारा आत्मिक लगाव रहा ही नही है। हम केवल दिखावे एवं प्रसिद्धि की ओर अग्रसर हो रहे हैं। भौतिकवाद की चमक ने हमारी मन की शान्ति को खत्म कर मृगतृष्णा की ओर धकेल दिया है जिसकी प्राप्ति हेतु हम अपनी भाषा, साहित्य, संस्कृति, मूल्य इत्यादि को कुचलते हुए आगे बढ़ते तो जा रहे हैं किन्तु हमारे हाथ कुछ नही लग रहा है, बल्कि सत्य तो यह है कि जो हमारे पास था हम उसे भी खो बैठे हैं। यदि हमें भावी पीढ़ियों हेतु कुछ देना है तो हमें सर्वप्रथम हमें अपनी भाषा को बचाना होगा। अपने बच्चों को मानक हिन्दी की शिक्षा देनी होगी। अच्छी रचनाएँ पढ़ने की ओर ललायित करना होगा। भाषाओं के प्रति पैदा हुए मानसिक द्वन्द्व को दूर करना होगा। क्योंकि भाषा है तो साहित्य है। साहित्य है तो समाज है और यदि समाज है तो मानव है।

पादटिप्पणियाँ:
 अग्रवाल डॉ. मुकेश, हिन्दी साहित्य और संस्कृति, के.एल.पचौरी प्रकाशन, गाजियाबाद, 2010, पृष्ठ-135
   गुप्त सुरेश चंद्र, कृष्ण चंद्र विद्यालंकार, आधुनिक हिन्दी निबन्ध, भारती साहित्य मन्दिर, दिल्ली, 1957, पृष्ठ-29
  दिनकर रामधारी सिंह, साहित्य और समाज, लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली, 2007
   प्रेमी नत्थूराम, साहित्य परिचय, हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर कार्यालय, बम्बई, 1950, पृष्ठ-01
   25.10.2017 के दैनिक भास्कर के ‘मधुरिमा’ मैगजीन में ‘भाषा की टूटती मर्यादा’ आलेख की कुछ पंक्तियाँ
   शर्मा डॉ. रामविलास, भारत की भाषा समस्या, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2003, पृष्ठ-13
  लीलाधर जगूड़ी, भय भी शक्ति देता है, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2007, पृष्ठ-10
  लीलाधर जगूड़ी, भय भी शक्ति देता है, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2007, पृष्ठ-11
  निराला सूर्यकांत त्रिपाठी, अनामिका, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016
  सूद, डॉ. हरमोहन लाल, हिन्दी भाषा प्रयोजनमूलकता एवं आयाम, वागीश प्रकाशन, जालंधर,2010, पृष्ठ-176
  सूद, डॉ. हरमोहन लाल, हिन्दी भाषा प्रयोजनमूलकता एवं आयाम, वागीश प्रकाशन, जालंधर,2010, पृष्ठ-11
  बिस्मिल्लाह अब्दुल, रावी लिखता है, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2010, पृष्ठ-11

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