हिन्द स्वराज और गांधी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


महात्मा गाँधी ने सुप्रसिद्ध किताब ‘हिन्द स्वराज’ 1909 में रची। उन्होंने यह छोटी-सी किताब गुजराती भाषा में लिखी। इस किताब को जब गोपालकृष्ण गोखले ने पढ़ा तो इसके मजमून को उन्होंने कच्चा कहा और आशा प्रकट की कि भारत लौटने पर गाँधी इसे खुद रद्द कर देंगे। यद्यपि जनवरी, 1921 में मोहनदास करमचंद गांधी ने ‘यंग इंडिया’ के गुजराती अनुवाद में लिखा कि मेरी राय में यह किताब ऐसी है कि यह बालक के हाथ में भी दी जा सकती है। यह द्वेष-धर्म की जगह प्रेम-धर्म सिखाती है। हिंसा की जगह आत्म-बलिदान को रखती है। पशुबल से टक्कर लेने के लिए आत्मबल को खड़ा करती है। इसकी अनेक आवृत्तियाँ हो चुकी हैं और जिन्हें इसे पढ़ने की परवाह है, उनसे इसे पढ़ने की मैं जरूर सिफारिश करूँगा। इसमें से मैंने सिर्फ एक ही शब्द, और वह एक महिला मित्र की इच्छा को मानकर, रद्द किया है। इसके सिवा और कोई फेरबदल मैंने इसमें नहीं किया है। गाँधीजी गोपालकृष्ण गोखले को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे।

यह पूरे विमर्श में माना जा चुका है कि हिन्द स्वराज ‘आधुनिक सभ्यता’ की सख्त टीका है। गांधी जी ने इसके बारे में स्वयं जब पुनः उसकी भूमिका लिखनी शुरू की तो कहा- इसमें मेरी जो मान्यता प्रगट की गई है, वह आज पहले से ज्यादा मजबूत बनी है। मुझे लगा है कि अगर हिंदुस्तान ‘आधुनिक सभ्यता’ का त्याग करेगा, तो उससे उसे लाभ ही होगा। गोखले इस प्रकार अपने अनुमान में सही नहीं उतरते हैं। 1909 हिंद स्वराज की शताब्दी थी, इस कालजयी कृति के बारे में हिन्दुस्तान और दुनिया भर में चर्चाएँ हुईं लेकिन जहाँ तक इसके प्रासंगिकता का सवाल है तो मेरी दृष्टि से जब तक सभ्यता रहेगी इस पुस्तक पर विमर्श होता रहेगा। गांधी जी ने बहुत ही साफगोई से कहा है - हिन्द स्वराज, द्वेषधर्म की जगह प्रेमधर्म सिखाती है, हिंसा की जगह आत्मबल को रखती है, पशुबल से टक्कर लेने के लिए आत्मबल को खड़ा करती है। पुस्तक में बताए गए कार्यक्रम के एक हिस्से का अमल हो रहा है अहिंसा का। अहिंसा का अमल हो तो एक ही दिन में स्वराज मिल जाय। हिन्दुस्तान अगर प्रेम के सिद्धान्त को धर्म के एक सक्रिय अंश को स्वीकार करे, तो स्वराज स्वर्ग से धरती पर उतरेगा। यह एक ऐसी कल्पना है जो वैयक्तिक स्वराज से सामूहिक स्वराज की जरूरत है तो ऐसे में इस पुस्तक को भला कौन नकार सकता है। वैसे अगर इतिहास का हम अवलोकन करें तो यह पता चलता है कि यूरोपीय इतिहास के घटनाचक्र, परिभाषित राज्य की अवधारणा ने भारत को स्वतंत्रता संग्राम में लाभ कम एवं हानि ज्यादा पहुँचाई है।

प्रो. आनन्द कुमार ने अपने एक साक्षात्कार में कहा है - गांधी का समाज संगठन शास्त्र हिन्द स्वराज में बीज रूप में प्रकट किया गया है। गांधी की समाज दृष्टि के निर्माण में पोरबंदर और काठियावाड़ में बिताया बचपन, इंग्लैंड में प्राप्त शिक्षा-दीक्षा और दक्षिण अफ्रीका में मिले खट्टे-मीठे अनुभवों का योगदान था। उनकी बातों में एक रंगभेदी राज्य में कुली और गिरमिटिया के रूप में अपमान के अंतहीन सिलसिले में अस्तित्व रक्षा की लम्बी लड़ाइयों की यातना का भी सच था। इसीलिए जाने माने गांधी चिंतक राजीव बोरा कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि हमने स्वराज का नाम तो लिया, लेकिन उसका स्वरूप हम नहीं समझे हैं। मैंने उसे जैसा समझा वैसा यहाँ बताने की कोशिश की है. मेरा मन गवाही देता है कि ऐसा स्वराज पाने के लिए मेरा यह शरीर समर्पित है।’ जब गांधीजी ‘हिन्द स्वराज’ के मार्ग पर चले तब कायर हो चुके, हारे हुए और मृत-प्राय भारत ने वह कर दिखाया, जो मानव इतिहास में कभी नहीं हुआ। भारतीयों के मन में स्वराज की लौ जगायी और तब क्या हुआ वह इतिहास हम सब जानते हैं। अगर हमें फिर से उठना है और अपनी असलियत, अपनी अस्मिता को प्राप्त करना है, तो ‘हिंद स्वराज’ को हमें फिर से समझने की जरूरत है।’ राजीव बोरा ने हिंद स्वराज के मर्म को समझा है और वह इसकी व्याख्या में उन तर्कों को प्रकट करते हैं जो आज की पीढ़ी के लिए, जो हिंद स्वराज को जानना चाहते हैं निःसंदेह एक उनके लिए दृष्टि है। वे एक संवाद में कहते हैं, ‘आज देश के चार आधारभूत तंत्र अर्थात् राज्यतंत्र, अर्थतंत्र, समाजतंत्र और धर्मतंत्र। ये चारों के चार जब प्रजा के जीवन को सरल और सुखमय बनाने के बजाय उसे कठिन और कष्टमय बनाने लगें, समस्याओं को समाधान करने के बदले उन्हें उलझाने लगें, देश की प्राकृतिक संपदा तथा प्रजा के साधन, श्रम और कौशल का मूल्य बढ़ाने के बजाय दिन-ब-दिन घटाने ही लगें और विदेशी साधन-शक्ति और मुद्रा का मूल्य घटाने के बदले उसे ही बढ़ाने लगें, धार्मिक, पांथिक, सांप्रदायिक, नस्लीय, जातीय, प्रादेशिक, भाषाई, मतवादी और वैचारिक भिन्नता में अभिन्नता के स्थान पर भेदभाव पैदा करने लगें, जिनकी रक्षा करने का दायित्व सर्वोपरि है उन्हीं शोषित, अशक्त, गरीब और मूक को ही अपना भक्ष्य बनाने लगें, ऐसे राजतंत्र और अर्थतंत्र के स्थान पर जो केवल सबलों को ही अपना लगे ऐसे राज्यतंत्र और अर्थतंत्र की सेवा को ही राष्ट्र सेवा कहा जाने लगे, स्वाधीनता और आत्मनिर्भरता के स्थान पर पराधीनता तथा परनिर्भरता बढ़ाने वालों का मान-सम्मान-स्वागत होने लगे, अंधेरे से प्रकाश की ओर जाने के बदले प्रकाश से अंधकार और घोर अंधकार की तरफ देश को धकेले जाने को जोर-जबरदस्ती से प्रगति बताया जाने लगे, अंग्रेजी पढ़े-लिखों ने और समर्थों ने शोषण के लिए स्वदेश और भक्ति के लिए विदेश उठा लिया हो, तथा इस स्थिति को भुगतती प्रजा जब स्पष्ट रास्ता न दिखने पर झुंझलाने लगे, आपस में ही लड़ने और बिखरने लगे, आत्मनाश के आर्थिक, राजनीतिक तथा बौद्धिक तंत्र में अपनी शिरकत को ही देश की प्रगति या परिवर्तन समझने और बताने लगे, राष्ट्रीय भावना मंद पड़ने लगे और स्वदेशी की तुलना में विदेशी का प्रेम बढ़ने लगे, तब, दिशा खोजने के लिए फिर से मूलभूत सिद्धांतों और दृष्टि को उठाना ही एक मात्र रास्ता बच जाता है, जो हमें एक समग्र जीवन-दृष्टि दे, ताकि सभ्यता के सच्चे दर्शन के आधार पर अपने दायित्व के सूत्र हाथ लग सकें और विनाश से बचाव का मार्ग दिखे। मूलभूत सिद्धांत और दृष्टि का अर्थ है जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नैतिक -अनैतिक के विवेक की दृष्टि, जिससे व्यक्ति अपना सही नैतिक कर्तव्य अदा कर सके। गांधीजी ने ‘हिंद स्वराज’ में इसे ही सभ्यता कहा है और जो इसमें परिवर्तन करते हैं, उनकी गांधीजी ने कड़े शब्दों में आलोचना की है।’ इस लिहाज से हिन्द स्वराज के गाम्भीर्य और समकालीन समय में उसकी अर्थवत्ता का जहाँ तक प्रश्न है, वस्तुतः उसके बहुत से आयामों से विवेचन हैं। पुस्तक की अगर सच में अर्थवत्ता का वर्णन करना हो तो गांधीजी ने जिन प्रश्नों को लेकर पुस्तक लिखी, कहना गलत न होगा कि हिन्दी स्वराज की उम्र तब तक है जब तक मनुष्य जैसी प्रजाति इस पृथ्वी पर रहेगी क्योंकि पुस्तक में ‘सस्टनेबल फ्युचर’ का निरूपण है। वह कैसे है, इसे हम आगे जानेंगे लेकिन उससे पहले मनुष्य के कुछ सोपान की बहस जरूरी है। संस्कृतिविद् सच्चिदानन्द सिंह के आलेख ‘मनुष्य की नियति और संस्कृति’ का अवलोकन हम कर लें। वे लिखते हैं इसी आलेख में कि, "मानव द्वारा संसार को दिया जाने वाला रूपाकार तीन आयामों का होता है -
-उसका भौतिक संसार कैसा बना है, इसका विस्तार क्या है और इसके साथ वह कैसे जुड़ा है। इसी से दर्शन और विज्ञान का जन्म होता है।
-उसका सौन्दर्यबोध इसे किस रूप में देखता है और ग्रहण करता है। इसी से कलाओं और साहित्य का जन्म होता है।
-इस संसार से और फिर अपने प्रजाति के अन्य व्यक्तियों से उसका क्या नैतिक सम्बन्ध है। इससे नैतिक आदर्शों और धर्म का जन्म होता है।" 

आगे श्री सिन्हा लिखते हैं कि, "इन तीनों आयामों से उसकी सर्जनात्मक शक्ति एक सर्वांग संसार का निर्माण करती है जो समय के साथ विस्तार पाया जाता है। मनुष्य की चेतना से दर्शन, विज्ञान, सौन्दर्यबोध और नैतिक विवेक एक दूसरे से बिल्कुल अलग नहीं होते। अलग हो भी नहीं सकते क्योंकि ये सभी संसार को समग्रता में ग्रहण करने की उसकी आकांक्षा की तो अभिव्यक्ति है’ लेकिन मनुष्य के चतुरता की भी दाद देनी पड़ेगी। जो मनुष्य का स्वरूप पाकर मनुष्यभक्षी हो या मनुष्य के गरिमा का भक्षण करता हो वह मनुष्य तो कम से कम नहीं कहलाएगा। चतुर मनुष्यों ने तकनीकी को जो ईजाद किया वह तो उसकी काबिलियत है, वह ऐसा ही सोचेगा लेकिन मुनष्य ने मनुष्यों को किस तरह श्रम और श्रम से जीवनचर्या चलाने हेतु आप के साधन को छीना इसे वह क्या उसके साथ जोड़कर देखता है या देख पाया? कदाचित् देखता, महसूसता तो शायद वही कहता जो उसकी समग्रता के संसार निर्माण में खोट नहीं पैदा करती। गांधीजी ने वास्तव में भारत की प्राच्य संस्कृति के पुनस्र्थापना में इन विक्रितियों का शमन देखा था इसलिए उन्होंने ऐसी तकनीक का विरोध किया जो मनुष्य का निवाला छीनती हो। हिन्द स्वराज को लिखकर गांधी मनुष्य का आदर्श मॉडल उपर्युक्त तीनों आयामों से और उससे भी उत्कृष्ट मनुष्य के निर्माण करने की इच्छा रखते हैं। 

सच्चिदानंद सिन्हा की बातों को अंग्रेज पढ़ेंगे तो वह भी लगभग ऐसे ही मनुष्य की बात करेंगे। वे कहेंगे कि क्या हम अंग्रेज मनुष्य नहीं, जो हिन्द स्वराज लिखकर ‘हमें’ चिन्हित किया गया है? किन्तु गांधीजी ने कहा है उस किताब में कि इसे हम अंग्रेजों के विरोध में ‘वैरभाव से नहीं’, बल्कि ‘प्रेम के नियम’ पर आधारित ‘अहिंसक भाव’ से रख रहे हैं तथा हमें सिर्फ़ और सिर्फ़ ‘अंग्रेजी सभ्यता’ से शिकायत है। यदि वह अपनी सभ्यता को त्यागकर; जो निश्चित रूप से मनुष्यता के खि़लाफ़ काम करने पर आमादा हैं। हम उन्हें उसी तरह से स्वागत करेंगे जैसा भारत अपनी परम्परा में दीर्घकाल से करते आया है वह बहुत निर्भीकता से कहते हैं कि, "मैंने आधुनिक सभ्यता की घोर निन्दा किया है, क्योंकि मेरी मान्यता है कि इसका प्रेरक तत्व अनिष्टकारी है।" ध्यान रहे कि यह पत्र गांधीजी ने तब लिखा जब गांधीजी को एक तीखी आलोचना वाली चिट्ठी डब्ल्यू. जे. वायबर्ग ने 3 मई, 1910 को लिखकर यह समझाने का प्रयास किया था कि हिन्द स्वराज में उठाए गए सवाल मुझे रास नहीं आते हैं। पूर्व में व्यक्त संदर्भ की यदि हम गहराई में जाएं जिस पर काफी विवाद हैं तो वायबर्ग के ही शब्दों में यह उद्धृत है, "आप अपनी पुस्तक में इस सबसे कहीं अधिक महत्वपूर्ण जिस सामान्य सिद्धांत को लेकर चले हैं, मेरा ख्याल है, उसके विषय में निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ कि आप गलती पर हैं।" पत्र के समापन में वायबर्ग ने लिखा, "हम आपकी प्रशंसा करते हैं, परन्तु सार्वजनिक कर्तव्य के नाते मैं आपके उद्देश्य और आपके तरीकों का पूरी ताकत से विरोध करता रहूँगा।" अब वायबर्ग के बारे में बिना किसी टिप्पणी के मैं गांधीजी के उस ‘संदेश’ को उद्धृत करना चाहूँगा जो उन्होंने ‘आर्यन पाथ’ अंग्रेजी मासिक के लिए 1938 में लिखा था। गांधीजी ने अपने विचार प्रकट करते हुए लिखा, "यह पुस्तक अगर आज मुझे फिर से लिखनी हो, तो कहीं-कहीं उसकी भाषा बदलूंगा। लेकिन इसे लिखने के बाद जो तीस साल मैंने अनेक आंधियों में बिताए हैं, उनमें मुझे इस पुस्तक में बताए हुए विचारों में फेरबदल करने का कुछ भी कारण नहीं मिला।" गांधीजी ने आज़ादी मिलने के बाद पं. जवाहरलाल नेहरू से इस संदर्भ में वार्ता की। पुस्तक को अपने मन के स्वराज यानी रामराज्य में सहयोगी पुस्तक कहते हुए नेहरू को उसे लागू करने का सुझाव दिया। नेहरू का प्रत्युत्तर क्या था और उसके एवज में नेहरू क्या रूख लिए इस बात से हम सभी वाकिफ हैं। कहते हैं कि नेहरू ने कहा कि हमें उसकी धुंधली सी तस्वीर मिल रही है और फिर उस पर गांधीजी से कोई चर्चा नहीं की। परिणाम? गांधीजी ने हिन्दी स्वराज में जो ‘फ्यूचर मॉडल’, ‘देसज कल्चर’ और ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट मॉडल’ दिया था उसे हमने संवैधानिक ढंग से आचरण में लाने का प्रयास नहीं किया, उसका हस्र आप देख लीजिए। देख लीजिए कि चालाक मनुष्य ने अपने नाश के लिए कितने उपाय-तौर- तरीके-फार्मूले ईज़ाद कर लिए। देख लीजिए उसे बागानों की जगह शहर की तंग ज़िदगी ने कैसा पागल बना दिया। वह उन तमाम चकाचौंध में एक अदद मनुष्य बनने से रह रिलेशनशिप की अवधारणा ही समाप्त हो चली। सम्बन्धों का विच्छेद होने लगा। शहरी संस्कृति में बगल में रहने वाले से कोई मतलब नहीं रहता, यानी प्रेम और सरोकार समाप्त हो चला अपनी ज़िंदगी अपने तलक। यदि उससे कुछ इतर तो पूँजी की तरफ ध्यान रह गया मनुष्य का। ‘सेल्फ’ हावी हुआ किन्तु कितना विद्रूप...? नाते- रिश्ते की परम्परा मिट चली। आदर भाव समाप्त हो चले। लोगों का प्यार अब ‘प्रॉफिट’ पर आधारित हो गया। परिवार जैसी अवधारणा समाप्त हो चली। आपस में इतनी द्वेष की आधिक्यता हो गयी है कि सभी भयभीत हैं। आप जानते हैं, संस्कृत में एक श्लोक है-विनाशकाले विपरीत बुद्धिः। 

गांधीजी इन्हीं विद्रूपताओं को हटाकर प्रेम, दया और करूणा का संचार करने का यत्न करते हैं। हिन्द स्वराज जोड़ने की पुस्तक है तोड़ने की नहीं। हरेक तरह के टेंशन से फ्री करने का अद्भुत फार्मूला है-देसज संस्कृति। इस संस्कृति में अनुराग, प्रेम, करूणा, दया और अहिंसा की किरण प्रकीर्णित होती है। लोगों के बीच मधुर सम्बन्ध की स्थापना होती है। वे सभी सम्बन्ध इस संस्कृति में आज भी विद्यमान हैं और न भी हों कहीं, तो देसज संस्कृति में वे अनुशासन आज भी विद्यमान हैं जो मनुष्य और मनुष्य के बीच रिश्ते कायम करने के लिए पर्याप्त हैं। हिन्दी स्वराज में गांधीजी ने यह स्पष्ट किया कि जहाँ बिगाड़ करने वाली संस्कृति अभी तक नहीं पहुँची है वहाँ पर अब भी वे ही चमक विद्यमान हैं जो भारत अपनी प्राच्य परम्परा से लेकर चलता रहा है। वहाँ अब भी प्रेम की प्रचुरता है जहाँ गन्दी हवाओं से बचे रहे लोग। इसी कारण कहा जाता है कि मार्क्स का अपना महत्व लेकिन गांधी, गांधी जीवन जीने की पद्धति का वास्तविक विश्लेषण है। हमें यहाँ यह जानना जरूरी है कि 1909 के बाद हिन्द स्वराज की अहम भूमिका क्या रही और आज जब हम 21वीं सदी में विचरण कर रहे हैं तो हिन्द स्वराज में उठाए गए सवाल कितने अहम हैं? हिन्द स्वराज पुस्तक 21वीं सदी में जी रहे लोगों के बीच क्या संदेश दे रही है? उसमें ईज़ाद तजुर्बे क्या आज भी हमारे किसी काम के हैं अथवा हम यूँ ही ढोल पीट रहे हैं? प्रथमतः हम ‘देसज-सभ्यता’ की बात करें तो यही गांधीयन दृष्टि से एक बड़ा प्रश्न है क्योंकि मैट्रोपोलिटन सिटी और ग्लैमर की शहरी संस्कृति के बरक्स जब हम इसे खड़ा करते हैं तो शहरी-सभ्य जमात यह कहती है कि ये अभी भी गॅंवार लोग हैं, जीना नहीं आया, फूहड़पन इनमें कितना है ... आदि-आदि। देसज संस्कृति में रह रही आबादी के प्रति कटाक्ष है यह। ग्राम्य सहज-जीवन इन शहरी लोगों को बिल्कुल नहीं सुहाता। इन्हें घिन आती है - देसज संस्कृति से। लेकिन यह एक बड़ी सच्चाई है कि इन्हें पुरवा बयार मयस्सर नहीं है। धूल, धूम्र और अधीरता में गुजर-बसर करने वाली यह शहरी आबादी 100 वर्ष की आयु कदापि नहीं पा सकती क्योंकि इतनी तरह की बीमारियाँ इनके जीवन का अंग बन गयी हैं जो सहजता से अलग नहीं हो सकतीं। शहर पश्चिमी सभ्यता की देन नहीं हैं, लेकिन शहर पश्चिमी सभ्यता से दूषित हुए हैं। इण्डस्ट्रियलाइजेशन और अब उपभोगवादी संस्कृति ने शहर की फिजा ही बदल डाली है। लेन-देन की संस्कृति घाटे में काम नहीं करती। पीछे हमने रिलेशनशिप की बातचीत की, वह तो बिल्कुल नहीं है यहाँ और है तो बस बाज़ार का सम्बन्ध है। मनुष्य ‘टूल्स’ बन गए हैं बाज़ार के। बाज़ार में तो मनुष्य, मनुष्य रहा नहीं वह ‘ग्राहक’ है। शहर का ‘ग्राहक’ अब बोल रहा है कि कितने फूहड़ लोग हैं यह। देसज-संस्कृति ने इसे भी सहजता से सुना, लेकिन इस व्यंग्य ने उन्हें अपनी मानसिकता को बदलने के लिए प्रेरित किया, यह गलत हुआ है। देसज-संस्कृति में जी रहे ग्रामीण, आदिवासी और हॉसिये की जनता को भ्रमित, विचलित और पृथक करने की शहरी साजिश चल रही है। हिन्द स्वराज इस साजिश को रोकने वाली पुस्तक है। कोई भी हिन्द स्वराज को पढ़ेगा उसको यह समझ में आ जाएगी बात। 1909 में गांधीजी ने जब हिन्द स्वराज लिखी तो एक बड़ी बात लिखी थी कि "हो सकता है शहरीजन इसे स्वीकार न करें"। उन्होंने लिखा, "बड़े शहर खड़े करना बेकार का झंझट है। उनमें लोग सुखी नहीं होंगे। उनमें धूर्तों की टोलियाँ और वेश्याओं की गलियाँ पैदा होंगी, गरीब अमीरों से लूटे जाएंगे।" यह कितना सच साबित हुआ है, आप स्वयं विचार कर लीजिए। एक प्रश्न यह भी है, शहर को रिकगनिशन कौन दे रहा है? निःसन्देह अपका ज़वाब होगा-शहर को रिकगनिशन ‘कार्पोरेट’, ‘मीडिया’ और ‘फिल्म जगत’ दे रहा है। इस शहरी-सभ्यता को समृद्धि और विस्तीर्णता देने में इन तीनों का बड़ा योगदान है किन्तु सोचिए कि ये तीनों खुद कितना नैतिक हैं-आम इन्सान के प्रति। बाजार ने भी सबसे ज्यादा यूज किया तो महिलाओं को। जेण्डर बहस भी बाज़ार कराता है। बाज़ार ने इन्हीं बहस को जारी रखते हुए महिलाओं को सबसे ज्यादा यूज किया, इससे शायद कोई इन्कार करे। गांधीजी अगर आज कुछ कहते तो यही कहते कि महिलाओं की बदस्तूर शोषण करती बाज़ार उन्हें वस्तु के रूप में परिभाषित कर चुकी है और ऐसे में इस शहरी सभ्यता के पोषक फिल्म जगत, मीडिया और कार्पोरेट महिलाओं के लिए अभिशाप हैं। 

द्वितीय, हम लोकतंत्र की बात करें। चौराहे पर खड़े लोकतंत्र का सौंदर्यबोध किसी से छुपा नहीं है। लोकतंत्र की जगह गांधीजी ‘प्रजातंत्र’ कहते थे। प्रजातंत्र का मतलब शासन और शासक की डोर प्रजा के हाँथ होगी। लोकतंत्र में भी प्रजातंत्र की संकल्पना भले हो लेकिन जो लोकतंत्र की मूल प्रतिज्ञा है उसे लोकतंत्र के नेतृत्वकर्ता निर्वहन नहीं कर सके हैं। गांधीजी ने संसद में खोट देखी थी और उसे ‘वेश्या’ जैसे शब्द से पुकारा। उन्होंने उसे ‘बांझ’ कहा। ‘दुनिया की बातूनी’ कहा। आज का लोकतंत्र तो इसी संसद के मुठियों में बन्द है। गांधी ने इंग्लैण्ड की उस निर्मम, अकर्मण्य और स्वार्थी संसद की धूर्तचाल को देखकर यह लिखा था। सन् 1947 में जब हमने आज़ादी पायी तो हम उसी संसद के अधीन लोकतंत्र का सपना देखे। परिणाम क्या रहा? परिणाम हमारे सामने है। सन् 1947 के बाद से अब तक के इतिहास को देख लिया जाए। गांधी की वह जुबान कैसे आज भी सच उगल रही है- हिन्द स्वराज के माध्यम से। संसद के मेम्बर बिक रहे हैं। खरीद-फरोख्त सरकार बचाने के लिए हो रही है। कोई बिक रहा है, कोई खरीद रहा है। आख़िर क्या कारण है कि लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने संसद मेम्बर्स से दुःख जाहिर किया और उस संसद से बिल्कुल घृणा जताया जो नैतिक नहीं है। प्रश्नोत्तर के दौरान सदन में प्रश्न पूछने के मामले हों या सरकार बचाने के मामले, संसद के लोग अपना नैतिक धर्म धारण करने की जगह उसे छोड़कर रूपये व सौदेबाजी कर रहे हैं। हिन्द स्वराज में गांधीजी ने लिखा, "सिर्फ डर के कारण संसद कुछ काम करती है। जो काम आज किया वह कल उसे रद करना पड़ता है। आज तक एक भी बड़े सवालों की जब चर्चा संसद में चलती है, तब उसके मेम्बर पैर फैलाकर लेटते हैं या बैठे-बैठे झपकियाँ लेते हैं... संसद को मैंने देखा कहा, वह भी ठीक है। उसका कोई मालिक नहीं है। उसका कोई एक मालिक नहीं हो सकता। लेकिन मेरे कहने का मतलब इतना ही नहीं है। जब कोई उसका मालिक बनता है - जैसे प्रधानमंत्री - तब भी उसकी चाल एक सरीखी नहीं रहती। जैसे बुरे हाल बेसवा के होते हैं वैसे सदा संसद के होते हैं। प्रधानमंत्री को संसद की थोड़ी परवाह रहती है। वह तो अपनी सत्ता के मद में मस्त रहता है। अपना दल (पार्टी) कैसे जीते इसी की लगन उसे रहती है। संसद सही काम कैसे करे, इसका बहुत कम विचार करता है। ... मैं हिम्मत से कहता हूँ कि उनमें शुद्ध भावना और सच्ची ईमानदारी नहीं होती।" इसे भी गांधीजी ने ‘सभ्यता दोष’ माना। गांधीजी ने बहुत ही हिम्मत से जो बातें की वह बिल्कुल राई भर इधर से उधर नहीं है। तब तो हमारे देश की संसद गठित भी नहीं हुई थी जब गांधीजी ने हिन्द स्वराज लिखी। गांधी की दूर दृष्टि यह देख रही थी कि हम उस सभ्यता से अलग कोई सभ्यता की जब सोच ही नहीं पा रहे हैं तो हमारे हिस्से में वह सुख कैसे होगा, जिसकी संकल्पना में सर्वोदय की सी संकल्पना रची-बसी होगी यानी सबका उदय, सबका विकास, सबकी उन्नति। गांधी की इस दूरदर्शिता से काई भी आश्चर्य नहीं करेगा क्योंकि ‘समुत्थान’ का नारा देने वाली संसद और सांसद वही करते रहे और कर रहे हैं जिसका ज़िक्र गांधीजी ने किया है। ऐसे में, एक प्रश्न उभरेगा जो आज के हालात से ठगे अपने आपको महसूस कर रहे होंगे, कि आखिर ऐसी संसद को हम झेल क्यों रहे हैं? हमने अपने ‘स्व-राज’ की बात की थी जिसका सामूहिक अर्थ-लोकतंत्र था और हम तो ऐसे लोकतंत्र को लेकर चल रहे हैं जो मूलतः हमारे शोषण का, नैतिक पतन का गर्भगृह है। इसमें हम पांच साल के लिए प्रतिनिधियों का चयन करते हैं। अपने देश के सम्प्रभुता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए, दूसरे अपने संतोष के लिए । लेकिन अब तो वास्तव में सम्प्रभुता का कोई मतलब ही नहीं रहा अब हम अपने संतोष के लिए ही संसद के सदस्य का चयन करते हैं वह भी मन मुआफिक नहीं-दहशत, भय के अधीन होकर। कारण यह है कि अब हमारे संसद का मेम्बर (जन-प्रतिनिधि’) के रूप में बाहुबली खड़े होते हैं, हमें उन्हें ही चुनकर संसद भेजना होता है। उन्हें चुनकर भेजना होता है जिससे हम भयाक्रांत रहते हैं। कहने के लिए स्वतंत्र देश के हम नागरिक रहे, हमारा मताधिकार है। हमारे ‘वोट’ से गवर्मेण्ट का निर्धारण होता है लेकिन हकीकत कुछ और ही है और ऐसे वातावरण के बीच लोकतंत्र बिल्कुल बँट गया है। ‘लोक’ अलग है और ‘तंत्र’ अलग। षडयंत्र में शामिल लोकतंत्र के रखवाले बन चुके हैं। गांधीजी ने तब जो कहा था वह तो अंग्रेजी हुकूमत और अंग्रेजी संसद का स्वरूप देखकर कहा था लेकिन विडम्बना यही है कि जिसे हमें पाना था या हम यूँ कहें कि जिसकी हमें प्रत्याशा थी कि आज़ादी के बाद हम अपने सपनों का भारत निर्मित करेंगे वह स्वप्न ही रह गया, उसे हम नहीं पा सके। 

तृतीय, हम शिक्षा की बात करें। शिक्षा के सन्दर्भ में गांधीजी ने हिन्द स्वराज में बहुत ही उम्दा ढंग से अपना विचार प्रकट किया। उनका यह कहना था, "सबसे पहले तो हमें धर्म की शिक्षा या नीति की शिक्षा दी जानी चाहिए।" दरअसल, शिक्षा सभी अवनति से मुक्ति का साधन है। हमारे अधिकार हमें इसीलिए नहीं मिल सके क्योंकि शिक्षा का हमें स्वरूप ही ‘क्लेरिकल’ मिला। अंग्रेज हमें बाबू बनाने की फिराक में थे और सफल हुए। यदि हम नीति और धर्म की शिक्षा लेते तो हम अपनी समझ का शासन भी निर्मित करते जिसमें न तो द्वेष होता और न ही किसी प्रकार की मानसिक गुलामी। गांधीजी ने कहा था कि, "करोड़ों लोगों को अंग्रेजी की शिक्षा देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। मैकाले ने जो शिक्षा की बुनियाद डाली, वह सचमुच गुलामी की बुनियाद थी... वे जिसे भूल गए हैं, उसी से हम अपने अज्ञान के कारण चिपके रहते हैं। ... जिस शिक्षा को अंग्रेजों ने ठुकरा दिया है, वह हमारा सिंगार बनती है, यह जानने लायक है। आपको जानना चाहिए कि अंग्रेजी की शिक्षा लेकर हमने अपने राष्ट्र को गुलाम बनाया है। अंग्रेजी शिक्षा से दंभ, राग, जुल्म वगैरा बढ़े हैं।" लेकिन दुर्भाग्य है कि हम अपने सौभाग्य का वरण ही नहीं कर पाए। नयी पीढ़ी का अंग्रेजी मोह सिर चढ़कर बोल रहा है। कान्वेंट में बच्चे भेजे जा रहे हैं और एक तरह से देखा जाए तो यह काम सबसे ज्यादा हमारे देश के आगे ले जाने वाले ठेकेदारों ने किया है। मतलब- नेता, नौकरशाह और गलत धन्धों में जुटे लोगों ने किया है। शिक्षा का यह मतलब हो गया है कि अंग्रेजी शिक्षा ही हमारे सभ्यता को परिभाषित करेगी। न हिन्दू संस्कृत व हिन्दी पढ़ने को राजी है और न मुसलमान उर्दू और अरबी, वारसी को फारसी से कोई मतलब नहीं रहा और न ही किसी को अपनी जमीनी भाषा से लगाव रहा। तकनीकी और अंग्रेजी ने पूरे ग्लोबल सोसायटी को अपना दीवाना व गुलाम बना दिया और अब देसज संस्कृति के लोग भी अंग्रेजी की ओर बढ़ चले हैं। गांधीजी ने इन सभी दीवानगी को दरकिनार करते हुए हिन्द स्वराज के माध्यम से क्या संदेश दिया है, उस पर यहाँ अमल करना जरूरी है। उनका कथन है, "हिन्दुस्तान को असली रास्ते पर लाने के लिए हमें असली रास्ते पर आना होगा।।" अब इसे जो समझे वह ज्ञानी, बाकी जो न समझे वह अनाड़ी। 

नीति और धर्म की शिक्षा तो हमें तलाशनी ही होगी नहीं तो हम केवल और केवल शिक्षित होंगे ‘सभ्य’ नहीं होंगे। सभ्य भी होंगे तो सौम्य नहीं होंगे। लोक में सौम्यता प्रकृतिक है किन्तु शिक्षा से व्यक्ति जब वास्तविक सौम्यता को ग्रहण करता है तो वह सदैव मनुष्य के कल्याण के निमित्त जीता है और मरता है क्योंकि यह शिक्षा का उस पर असर होता है। वह नीतियुक्त शिक्षा से और धर्मयुक्त शिक्षा से न्याय करता है स्वयं के प्रति और सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति। 

जब न्याय और नीति की बात हम शुरू कर दिए, तो हम देखें गांधीजी ने न्याय-प्रणाली को भी मानव का हितकारी नहीं कहा था। उन्हें जो ठग संसद में दिखे, बाज़ार में दिखे, वही ठग न्याय व्यवस्था से चिपके लोगों में दिखे यानी जज और वकीलों में। गांधीजी ने न्याय को बिकाऊ बताया और जज तथा वकीलों को उसका एजेण्ट। भारत का यह दुर्भाग्य ही माना जाएगा कि यहाँ भी न्याय बिक रही है। मामले लम्बित रखे जाते हैं। देश में झगड़े का कारोबार अपना पाँव पसार रहा है। आज भी वकील उस न्याय प्रणाली का एजेण्ट ही बनकर कार्य कर रहा है जिस प्रकार अंग्रेजी समय का वकील करता था। आज उससे भी स्थिति खराब हो गयी है। वकील खुद झगड़े खड़ा करने का रास्ता बताता है और बाद में उसी बोए झगड़े से जमकर धन उगाही करता है। गांधी की दृष्टि हॉस्पिटल और डॉक्टर के ऊपर भी उसी तरह थी, जिस प्रकार न्यायपालिका और उसके अर्गेन्स पर थीं। डॉक्टर के भी कारनामे गांधीजी की दृष्टि में कोई सेवाभावी नहीं थे यद्यपि उनका कहना था कि इन्हें ज्यादा तवज्जो दी जाती है। उन्होंने रस्किन की ‘अनटू दिस् लॉस्ट पुस्तक के उस ‘सर्वोदयी-वैचारिकी’ को ध्यान में रखकर अपने आर्ग्युमेंट भी रखे कि- वकील, नाई, किसान सबके मूल्य समान हैं। कारण प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यवसाय द्वारा अपनी आजीविका चलाने का समान अधिकार है। लेकिन इन समानता के बावजूद गांधी हिन्द स्वराज में लिखते हैं वह नोट करने लायक है, "उस (डॉक्टरी) धन्धे में परोपकार नहीं है... डॉक्टर सिर्फ़ आडम्बर दिखाकर ही लोगों से बड़ी फीस वसूल करते हैं और अपनी एक पैसे की दवाई के गई रूपये लेते हैं।" पूरे देश में ऐसी हरकतें जारी है, उसपर से आदर और सम्मान भी ऐसे नागरिकों का-तथाकथिक संभ्रांत लोगों द्वारा जारी है, आम आदमी उसके मुकाबले कुछ भी नहीं है, मुझे लगता है इसे अलग से विवेचना करने की जरूरत नहीं है क्योंकि इस कड़ी चुनौती का सामना सम्पूर्ण सहज इन्सान कर रहा है। फ़र्जी दवाओं का कारोबार यानी भ्रष्टाचार के अखाड़े बन चुके मेडिसिन-रैकेट का भण्डाफोड़ कई बार हो चुका है। फर्जी मार्केट की संरक्षा अगर देखा जाए तो डॉक्टर करने लगे हैं। गांधी इस तरह का भारत होगा, कल्पना नहीं करते होंगे लेकिन नहीं, भारत को वही सबकुछ मिला जो न अपरिहार्य था और न अपेक्षित। गांधीजी पाखण्ड से सृजित ‘सभ्यता’ को बर्दास्त नहीं करते थे, इसीलिए उन्होंने वकील, डॉक्टर, जज और मौकापरस्तों की आलोचना की। वह यह जानते थे कि इन समाज सुधारकों में सिर्फ़ छद्म भरा हुआ है। सच्ची बात है जिस सभ्यता से गांधीजी निवर्तमान में अंधेरा देखते थे वह सभ्यता समाप्त नहीं हुई। बल्कि सभ्यता की गन्दगियाँ अब बढ़ गयी हैं। हम अंग्रेजों से मुक्त हुए लेकिन उनकी विनाशक सभ्यता को आज भी अडॉप्ट करने से बाज नहीं आए। अब तो मामले ‘मेल-गे’ तक जा पहुँचे हैं। हमारे यहाँ ब्रह्मचर्य की बात होती थी और अब समलैंगिकता के पैरोकार खुलकर सामने आ चुके हैं। यह हम कहाँ से अडॉप्ट किए, सभी जानते हैं। संस्कृत में एक श्लोक है- 
वृत्तं यत्नेन संरक्षेद वित्तमाम्याति यति च अक्षीणो वित्तः क्षीणो वृत्तस्तु हतोहतः। 

आज हम श्लोक और स्लोगन आत्मसात करने की बात नहीं कर रहे हैं। यह समझा जा रहा है कि यह एक आयडिएलिस्टिक बातें हैं। लाइफ है तो एन्जवाय करो। कितना बदल गया सब। एच.आई.वी/एड्स के आंकड़े भारत में किस तरह बढ़े हैं, यह सुनकर कान खड़े हो जायेंगे। नैतिक पतन इस कदर होगा, यह कोई जानता भी न था। गांधी कलयुग का बिगड़ा रूप उन दिनों देख रहे थे शायद इसी कारण ब्रह्मचर्य पर बल देकर अपनी बात रख रहे थे। उनका मानना था कि ब्रह्मचर्य धारण करने वाला ‘अभय’, ‘अहिंसा’, और ‘सत्याग्रही’ हो सकता है लेकिन यह सम्भव न हो सका। झूठ कितने फीसदी भारत में बोलते हैं, इस पर कोई ठीक सर्वे नहीं हुआ है लेकिन आम नागरिक भी ‘प्वाइण्ट’ में ऐसी संख्या को बताएगा। ‘सत्य’ से किसी को कोई वास्ता नहीं रहा। एक-दूसरे को नीचा दिखाने की फिराक में बैठा हर व्यक्ति एक मौके की तलाश में है। सम्वादहीनता बढ़ी है, और कोई नहीं जानता कि कौन किस के लिए षडयंत्र करने पर विचार कर रहा है। 

अब हम एक ऐसे भारत की बात करें जो 90 के दशक के बाद का भारत है। इस दशक में हिन्दू और मुसलमान मन्दिर और मस्जिद में फंसकर इन्सानियत से अलग हुए, हम सबने देखा फासीवादी ताकतों का नग्न ताण्डव हमारे गंगा-जमनी सभ्यता के लिए अभिशाप बन गया। समरसता, भाईचारगी और इन्सानियत का नामों-निशां मिटा देने पर आतुर लोगों ने पर्याप्त शर्मिंदगी के काम किए। इस पर हमारे ही देश के प्रधानमंत्री अपनी विदेश यात्रा शुरू करने से पूर्व बोल उठे - मैं कौन सा मुँह लेकर भारत से बाहर जाऊँगा? संयोग से वह उसी पार्टी के आइकॉन के रूप में जाने जाते रहे एक वरिष्ठ लीडर थे। भारत की यह मिसाल कितनी घृणा की भावना मन में पैदा कर देती है। हिन्द स्वराज में गांधीजी ने अब से 100 वर्ष पूर्व इसी आशंका को व्यक्त करते हुए ‘सह-अस्तित्व’ कायम करने की अपील की थी।" इस प्रकार सह-अस्तित्व को प्रश्रय देने वाली इस पुस्तक का महत्व आज है और रहेगा। 

90 के दशक के बाद भूमण्डलीकरण के प्रभाव व मार्केट की तमाम ‘जीवन-जीने की शर्तों’ से मनुष्य अपने को अलग नहीं कर पाया है। पिछले अध्याय में इस पर चर्चा की जा चुकी है देश में दंगे कराने का ठेका हो या विकास के नाम पर प्लानिंग्स का निर्धारण, धर्म का प्रसार हो या सिविल-सोसायटी की उन्नति सबकी जिम्मेदारी मार्केट-मैकैनिक मार्केट इंजीनियरिंग के जरिए कर रहे हैं। मीडिया और नव-प्रौद्योगिकी यानी सूचना-संचार तथा तकनीकी इसके सहयोगी बन गए है। नई आधुनिक तकनीकी के प्रयोग से मन-पसंद ‘वर्ल्ड सोसायटी’ डेवलॅप करने का कान्सेप्ट विकसित हो चुका है। पानी किसे पीना है, कौन बेचेगा, कौन उसको खरीद सकता है, इसका निर्धारण मार्केट कर रही है। नदी, झरने, ताल-तलैया और नहरों पर नज़र रखने के लिए निजीतंत्र को छूट मिल चुकी है और अब प्लास्टिक ऑफ़ दी वाटर यूज करो, यह फर्मान जारी हो चुका है। कुएं से चिपकना पिछड़ेपन की निशानी है, वह भी ठीक नहीं है। इतनी प्रकार की खाद का प्रयोग खेतों में हो रहे हैं कि अन्न भी दूषित हो गया है। परिणाम- कुपोषण और तमाम तरह की बीमारियाँ आम नागरिक के जीवन को प्रभावित कर चुकी हैं। नैसर्गिक दवाइयों की जगह ब्राण्डेड कम्पनी की दवाईयों ने आम नागरिक के धन को इस प्रकार चूसा है कि सामान्य नागरिक जिसकी प्रति व्यक्ति आय बीस रूपये प्रतिदिन है वह जीवन से संघर्ष कर रहा है। गांधी जी के नैसर्गिक प्रेम को अब समझ रहे हैं लोग। स्वदेशी की अवधारणा गांधीजी के लिए इस कारण भी थी क्योंकि मनुष्य नैसर्गिक रूप से अपना इलाज भी अपने ढंग से ‘देसज सभ्यता’ में रहकर कर लेता था। उसे उन जड़ी-बूटियों से बनी औषधि का अच्छा ज्ञान था। देसज औषधि देने के लिए वैद्य को नब्ज़ समझना काफी था आज यह टैस्ट है, वह टैस्ट है। तमाम टैस्ट नहीं कराने पड़ते थे तब। 

गांधीजी ने खर्चीली और उबाऊ सभ्यता पर हमेशा एतराज जाहिर किया। स्वदेशी के लाभ यही थे कि अपनी माटी के खुशबू में अपने मन का स्व-उद्यम करके सहज जीवन यापन होता था किसी की गुलामी नहीं। अब तो गुलामी या दासता नहीं है जरूरत के अनुसार ‘यूज एण्ड थ्रो’ के पैटर्न पर सब कुछ हो रहा है। गुलाम भी यह महसूस करता था कि जिसके हम गुलाम हैं वहाँ मेरी ज़िन्दगी उसकी दासता स्वीकार करने में बरकरार रहेगी कम से कम, लेकिन ‘यूज एण्ड थ्रो’ वाली अवधारणा में मनुष्य एक यूजलेस कचरा हो जाता है जिसका बाद में कोई मतलब नहीं होता। स्व-उद्यम में कम से कम 80 वर्ष का लोहार भी कुछ मतलब की वस्तुएँ - कृषि के औजार या तकुआ/अपनी भट्टी में लोहे गरम करके बना सकता था, उसके पास भी रोजगार थे लेकिन उसको जैसे-जैसे इस वैज्ञानिक सभ्यता से आच्छादित किया। मशीनी सभ्यता ने अपना पाँव पसारा और उस लोहार के हाथ से काम छिन गए। 80 वर्ष का बूढ़ा लोहार आज बेकाम का है। उसके काम छिनने से उसके हाथ की एनर्जी भी जाती रही और अब वह डिपेंडेण्ट हो गया है। अपने किसी परिवार के कमाऊ लोगों पर अथवा गरीबी और भुखमरी का शिकार हो चुका है, बदले में काम में उसकी न हिस्सेदारी ने बीमार बना दिया है। गांधीजी ऐसी बीमार सभ्यता का एतराज करते थे और अब भी कर रहे हें। क्योंकि उनका सदैव स्वदेशी में विश्वास था। वह सदैव अपने मन का स्वराज और उसमें स्वदेशी तथा स्व-उद्यम पर बल देने वाले एक जीवित पुरुष के रूप में विद्यमान हैं। 

‘आइडेण्टिटी क्राइसिस’ आज भारत को भूत की तरह सता रही है। वह भी परमाणु अस्त्र-शस्त्र से लैस रहकर भारत को री-प्रजेण्ट करना चाहती है पर क्यों? गांधी का ‘सत्याग्रह’ आज भी ‘सबल-शस्त्र’ है और इसे अफ़्रीका में नेल्सन मण्डेला, अमरीका में मार्टिन लूथर किंग-द्वितीय समेत कई गांधी को मानने वालों ने अपने-अपने संघर्ष में प्रयोग करके सिद्ध किया है। विगत् 9/11 के बाद अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू-बुश ने भी गांधी के ‘अहिंसा’ में अपनी आस्था व्यक्त की। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से गांधी की प्रासंगिकता के बारे में अलग से विचार करने की जरूरत नहीं महसूस होती। अहिंसक सभ्यता उपयोगी साबित हुई है। नागासाकी और हिरोशिमा के बाद जब परमाणु प्रलय दुनिया को समझ में आया तब विनाशक सभ्यता की भी पहचान लोगों में ज्यादा हुई। गांधी ने तो प्रायः विज्ञान के भयानक स्वप्न दुनिया के सामने 1909 में हिन्द स्वराज के माध्यम से रखा था लेकिन समझ में मनुष्य को तब आता है जब वह अपने ईजाद किए हुए से खता है और भयानक नरसंहार को देखता है। सहज-सभ्यता में ऐसे ख़तरे गांधी की नज़र में कभी नहीं दिखते। इसलिए उन्होंने हिन्द स्वराज में सहज-सभ्यता का स्वागत किया है क्योंकि वह मानते हैं कि ‘अधिकतम का सुख’ इसी सभ्यता में है और इससे मनुष्यता को कोई ख़तरे नहीं हैं। पिछले अध्यायों में इस सन्दर्भ में पर्याप्त चर्चा की जा चुकी है। आप देखें, ‘आध्यात्मिक स्वराज’ की चाहत गांधी का सबसे बड़ा स्वप्न था लेकिन उपभोगवादी संस्कृति ने गांधी के मूल्यों को तरजीह नहीं दी। वस्तुतः आध्यात्मिक स्वराज उन्हें रास नहीं आता जो विकास की नई अवधारणा के साथ दुनिया को अपने तरीके की शक्ल देना चाहते हैं। वहाँ मूल्य जैसी कोई चीज नहीं होती वहाँ तो सिफर् और सिर्फ जीवन के उन नवोन्मेष की तैयारी होती है जिसमें सद्यः सुख उसे दीखता है। कहना गलत न होगा कि आज ड्रग्स और नशे के नये सोपान जो युवा पीढ़ी को परोसे गये हैं उसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं। भारत और भारत के बाहर युवा वर्ग की एक बड़ी तादात ड्रग्स, कोकीन, चरस, अफीम ... आदि की शिकार हो गयी है तथा उसके स्वप्न कुछ खास ख्यालात में कैद हो गए हैं। गांधीजी के ब्रह्मचर्य की बात पीछे की गयी है, आज का युवा उस ब्रह्मचर्य को सुनने से परहेज करने लगा हैं भौतिक सुख, वासना व महत्वाकांक्षा इस कदर अपनी जड़े मज़बूत कर चुकी हैं कि ‘आत्मानुशासन’ जैसी कोई चीज नाम मात्र रह गयी नयी पीढ़ी में। ड्रग्स, ट्रैफिकिंग से लेकर हिंसा तक और अब 21वीं सदी का युवा आतंकवाद तक का रास्ता बहुत ही शौक से ‘दिस इज़ माय जॉब इट्स माय च्वाइस’ कहते हुए पकड़ लिया है। गांधीजी इसे नैतिक पतन के रूप में देखते हैं। नैतिक पतन से बचाव का नुस्खा गांधी के हिन्द स्वराज में विद्यमान है। इन्द्रियों पर काबू करके गांधी इस नैतिक पतन से बचने की सलाह देते हैं। हिन्द स्वराज की प्रासंगिकता या जरूरत इसलिए भी है। 

उनका यह भी मत है कि नैतिकता का साहचर्य भी वही कर सकता है जो स्वयं के जीवन में नैतिक हो। गांधी इसकी एक भली व्याख्या अपने आत्मकथा के जरिए किए हैं। ‘माई एक्सपेरीमेण्ट विथ ट्रुथ’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भारत के साथ यह विडम्बना रही है कि नैतिक क्षरण में भारत अव्वल बनता गया। स्त्रियों के साथ रेप के प्रश्न हों या अन्य भ्रष्टाचार, दुराचार की घटनाओं में भी भारत की रेटिंग भी कोई कम न रही। पूरी तरह से हमने आत्मानुशासन को खोया। पश्चिम की नकल किया। खुलापन के नाम पर भौंडी हरकतें बढ़ीं। लम्पटबाजी में दिलचस्पी बढ़ी। स्वतंत्रता का यह मायने नहीं है। स्वतंत्रता तो स्वानुशासन में फबती है। मर्यादा में अच्छी लगती है। मर्यादाएँ टूटी हैं अब तो यह भी कहना कोई गलत नहीं लगता। परिवार भारत की एक बड़ी संस्था मानी जाती है। परिवार जैसी संस्था टूटी है। परिवार में व्यक्ति संस्कारित होता था तो मर्यादा की कीमत उसे पता होती थी लेकिन अब जब परिवार ही नहीं रहा जीवन ही ‘एकला’ हो चला तो लोगों में भावनात्मक संवेदनाएं बनेंगी इसे कैसे स्वीकार किया जाए? संवेदनाएँ तो सिमट गयीं ‘मै’ में। आत्म के विकास का अर्थ जब से ‘मैं’ में बांधा है तब से संवेदनाएं और सिमट गयी हैं। गांधी ‘आत्म’ का साक्षात्कार कराकर ‘मैं’ को समाप्त करके सेवा-सुश्रुषा और सबमें ‘परस्पर-प्रीति’ की निश्चित रूप से विकास की आकांक्षा रखते थे। लेकिन दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि ऐसी चेतना निर्मित होने से पहले दम तोड़ दी। स्वार्थ, लोभ, मोह और स्व-विस्तार में व्यक्ति, बाज़ार और व्यवस्थाएँ अपनी सारी ऊर्जा लगा चुके हैं। गांधी इसी व्यवस्था को तोड़ना चाहते थे। अपनी प्रतिरोधी चेतना के माध्यम से मनुष्य में वह इसी व्यवस्था के प्रति अनार्की तैयार करना चाहते थे। लन्दन में मिले अराजकतावादियों से हुई चर्चा और उसके बाद एक प्रतिरोधी प्रेम के नियम पर आधारित पुस्तक का सृजन उनकी इसी चेतना की परिणति है। ‘प्रेम के नियम’ के साथ ‘अहिंसा’ और ‘सत्य’ की चेतना वाली पुस्तक, की प्रासंगिकता इस कारण भी है कि गांधीजी ने इस पुस्तक के विचार को हमेशा अलग रखकर देखने की अपील की और कहा कि यह ‘प्रेम-प्रारूप’ है द्वेष वाली पुस्तक इसे न माना जाए। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इस पुस्तक की जितनी प्रशंसा हुई उतनी ही समालोचना और आलोचना भी हुई। विद्वानों ने इस पुस्तक पर तीखी प्रतिकिया 1910 में दे डाली थी जिसका एक नमूना वॉयबर्ग के पत्र से दिया गया है तथा गोखले के बारे में भी सर्वविदित है कि उन्होंने गांधीजी से ही यह अपेक्षा कर डाली थी कि गांधी एक समय इसे नष्ट कर डालेगा। इसकी अब पड़ताल करें तो फिर वहीं बात आती है कि गांधीजी ने यह जरूर कहा कि ‘अब जो मैं कह रहा हूँ उसे अन्तिम माना जाए’ लेकिन हिन्द स्वराज के बारे में नेहरूवियन सभ्यता के उद्भव के समय तक ‘कालजयी कृति’ और ‘अवधारणा’ के रूप में उनकी भावना ज्यों की त्यों हमें मिलती है, नहीं तो उसके बारे में वह नेहरू से संवाद न स्थापित करते। वे अपने रचनात्मक कार्यक्रम के बारे में संवाद नहीं स्थापित करते जो हिन्द स्वराज में स्थापित-स्वदेशी, सर्वोदय, सत्याग्रह, अहिंसा, स्वराज्य की संकल्पना का विस्तार ही एक तरह से थी। इससे यह एक प्रश्न जबरदस्त तरीके से सामने आता है कि गांधी विचारणा के अवरोधक कौन थे तथा उनके अवदान की उतनी प्रतिष्ठा क्यों नहीं हो पायी? 

भारत को 15 अगस्त, 1947 को आज़ाद कर दिया गया। भारत को सम्हालने की जिम्मेवारी गांधीजी के उत्तराधिकारी पं. जवाहरलाल नेहरू को दी गयी। अंग्रेजों से पूरी तरह लूटे गए भारत को नया जीवन देने की कोशिश किसी के लिए निःसन्देह चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी थी। नेहरू ने इस जिम्मेदारी को निभाने का और भारत को भारत बनाने का भरसक प्रयास किया किन्तु भारत गांधी के सपनों का भारत नहीं बन सका। आधुनिक भारत निर्माण की महत्वाकांक्षा गांधी और नेहरू की अलग-अलग थी। गांधी स्वदेशी, स्वावलम्बन, सर्वोदय और अहिंसक व्यवस्था वाले समाजवाद की संकल्पना के हिमायती थे यद्यपि नेहरू रूसी समाजवाद को भारत में स्थापित करना चाहते थे। नेहरू का विश्वास था कि भारत का समुचित विकास तभी हो सकता है जब हम औद्योगीकरण करके भारतीय जनता को काम देंगे। नेहरू ने जॉन गुंथर को 16 मार्च, 1938 को लिखे पत्र में सहजता से स्वीकार किया है कि, "मेरा ख्याल है कि, ‘मेरे पिताजी और गांधीजी निजी तौर पर मेरी ज़िन्दगी पर मुख्य तौर पर असर डालने वाले रहे हैं। लेकिन बाहरी असर मेरे लिए कोई मानी नहीं रखते। अपने ऊपर असर पड़ने को रोकने की मुझमें एक प्रवृत्ति है, फिर भी वे धीरे-धीरे अनजाने अपना काम करते हैं।" ... यह तय है कि मैं फासिस्ट नही हूँ और फिर भी मेरे अन्दर ज्यादातर वे विशेषताएँ हैं जो संकट और परिवर्तन के इस युग में मुझे तानाशाह बना सकती हैं।" अब नेहरू के ऊपर कौन सा तत्व प्रभावी हुआ उसे हम समझ सकते हैं। पंचवर्षीय योजनाओं में सिमटी भारत की विकासनीति ने वैकल्पिक सभ्यता को उठने नहीं दिया। पश्चिम की आधुनिक रंगों से रंगे नेहरू ने गांधी के वैकल्पिक ग्रामीण सभ्यता की गुंजाइश नहीं छोड़ी। बड़े बांधों का निर्माण, बड़ी-बड़ी इण्डस्ट्रीज को बढ़ावा और आधुनिक तरीके के डेवलपमेण्ट-मॉडल की चाहत ने वह सब कुछ किया जो न ही हिन्द स्वराज में कही उल्लिखित है और न ही गांधी ने किसी समय इसकी संस्तुति की थी। 

हिन्द स्वराज गांधी की अपनी संकल्पना थी लेकिन गांधी को अपने जीवन का ढोंग बनाने वाले भारत भर में बिखर गए, उन्होंने हिन्द स्वराज ही नहीं सम्पूर्ण गांधीयन फिलॉसफी का ठेका ले लिया। मठाधीशों की संख्या में इस कदर इजाफा हुआ कि गांधी के नाम पर बहुत से संस्थान, ट्रस्ट, आश्रम खुले। विडम्बना यही है कि गांधी के नाम पर ऐसे लोगों ने अपनी-अपनी दुकान खोली न कि गांधी के मूल्यबोध को सामाजिक जीवन का हिस्सा बनाया। नेहरूवियन सभ्यता जो गांधी के ही उन मूल्यों के बरक्स नए तरह की व्यवस्था ईजाद की उसने भी गांधी को भजाया। वोट बैंक की राजनीति ने गांधी के नाम पर खूब गाँव की जनता को भ्रमित किया किन्तु यह एक राजनीति थी। आश्रम और संस्थानों के मठाधीश ने भारी मात्रा में धन उगाही किया। हिन्द स्वराज में ‘इस स्वराज’ की न तो गांधीजी ने संकल्पना की थी और न ही उन्होंने ऐसे सेवाभावियों की संकल्पना की थी। मकरन्द परांजपे ने बहुत स्पष्ट लिखा है ‘नए गांधीवाद की जरूरत’ में कि, "मेरी पीढ़ी के लोग पाते हैं कि जो गांधी के नाम पर संस्थाएँ चलायी गयीं इनमें कुछ जगह कितना अच्छा काम हो रहा है। मगर हम गांधीजी की विचारधारा अपनाने वालों से,  जिस प्रकार का नेतृत्व चाहते हैं वह हमें नहीं मिला हैं। आज हम देखते हैं कि गांधीजी के नाम पर जो संस्थाएँ हैं, वह सुप्तावस्था में हैं।" सलमान रश्दी का मत है, "गांधी की हालत आज लूट सके तो लूट वाली है। अपने समय के आदमी अब वे नहीं रह गए हैं एक ऐसी अवधारणा बन गए हैं जिसके साथ कोई कुछ भी कर सकता है।" गांधी के विषय में ऐसी बेबाक टिप्पणी गांधी पर नहीं, लेकिन उनके तथाकथित अनुयायियों पर जरूर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है। गांधीजी तो इसकी आशंका पहले ही व्यक्त कर चुके थे। 29 मार्च, सन 1936 का ‘हरिजन बन्धु’ उठाकर देखें उसमें गांधीजी का स्पष्ट वक्तव्य, "गांधीवाद नाम की कोई वस्तु है ही नहीं, न मैं अपने पीछे कोई सम्प्रदाय छोड़कर जाना चाहता हूँ। मेरा यह दावा भी नहीं कि मैंने किसी नए तत्व या सिद्धांत का आविष्कार किया है। मैंने तो सिर्फ जो शाश्वत सत्य है, उसको अपने नित्य जीवन और प्रतिदिन के प्रश्नों पर अपने ढंग से उतारने का प्रयास मात्र किया है। मुझे दुनिया को कोई नई चीज नहीं सिखानी है। सत्य और अहिंसा अनादिकाल से चले आए हैं।"

"ऊपर जो कुछ मैंने कहा है, उसमें सारा मेरा तत्वज्ञान - यदि मेरे विचार को इतना बड़ा नाम दिया जा सकता है’तो समा जाता है। आप इसे गांधीवाद न कहें, क्योंकि उसके वाद जैसी कोई बात नहीं है" मार्टिन लूथर किंग तृतीय का कथन है कि एक आदमी की अकेली कार्रवाई भी यदि मानव आत्मा के भीतर मौजूद सत्य और शिव की धारणा को सम्बोधित कर सके तो यह बहुत सारे लोगों की सक्रियता का संचार कर सकती है।" भारत में उस आदमी को बनाने की मुहिम कम रही, (किंग तृतीय का संकेत ‘हृदय परिवर्तन हुआ मुख्यधारा के आदमी’ से है) बल्कि संस्थानों से ‘वाद’-इज़्म का चुन्दरी ओढ़ कर पाखण्ड फैलाने में ज्यादा रही। ऐसे में, भारत के वास्तविक गांधीयन फिलॉसफी पर समर्पित लोग जिन्होंने गांधी के समर्पण, परहित, अहिंसा, सत्य ... आदि से कुछ सीखा था वह भी सन्देह से देखे जाने लगे और इन्हें पृथक पहचान पाना अब मुश्किल भी है सहारा समय ने 2003 में एक ऐसी ही पड़ताल की थी भारत के कुछ गांधीवादी लोगों के साथ जिसमें डॉ. वाई.पी. आनन्द, प्रो. के.डी. गंगराडे, रामचन्द्र राही, सविता सिंह, तारा गांधी भटटाचार्य, सिद्धराज चडढ़ा, निर्मला देश पाण्डेय, बी.आर. नन्दा, सत्यपाल ग्रोवर, आचार्य राममूर्ति तथा गांधीजी के प्रपौत्र तुषार गांधी शामिल थे। इसमें सबने अपनी-अपनी राय रखी लेकिन तुषार गांधीजी का जो वक्तव्य था वह कौंध जाता है। तुषार गांधी का मानना है कि, "गांधीजी के प्रति श्रद्धा, घृणा और उनकी निन्दा करने का भाव रखने वालों की कमी नहीं है। उनकी हत्या के बाद से लगातार एक विचारधारा के लोगों ने उन्हें अपमानित करने, निन्दा का पात्र बनाने का षडयंत्र भी रचा। अर्ध सत्य को प्रचारित किया। 55 साल तक वे लोग यही करते आए और इन्हीं हाथों में आज देश की बागडोर है। दूसरी तरफ बापू का उपयोग करने वाले लोग हैं। जब जरूरत समझी अपनाया और जब समझा दरकिनार कर दिया कांग्रेस ने तो उनकी ज़िन्दगी में ही किनारा कर लिया था। यदि किसी ने गांधीजी का सबसे ज्यादा शोषण किया तो वह कांग्रेस ही है। 

एक वे लोग भी हैं जो गांधीवादी हैं, बापू के साथ चलने वाले लोग। बापू ने अपने जीवनकाल के दौरान कई बार पुराने आचरण के बाद नए आचरण को अपनाया क्योंकि समय के साथ नया प्रयोग और अनुभव सच के स्वरूप को पाने का तरीका बदल देता था। परन्तु जिस दिन उन्हें गोली लगी, गांधीवाद की वहीं चिता भी बन गयी थी। आज हालत यह है कि गांधीवादी बनने से पहले रूढ़िवादी बनना पड़ेगा।" रूढ़िवादी गांधीवादी के जमात में भला कोई क्यों शामिल हो? गांधी के सादगी वाले जीवन, जीवन मूल्यों को तो सभी थोड़ा बहुत बरतना चाहते हैं लेकिन गांधीजी के ठेकेदारों ने ऐसा घिना दिया कि गांधी के नाम पर लोग तोबा कर लेते हैं। हिन्द स्वराज के साथ जो आम लोगों का तादात्म्य नहीं बन सका, उसके सबसे ज्यादा जिम्मेदार गांधीवादी हैं। वे ‘स्वराज’ की जगह अपने मन के राज को, अपने मन के गांधीवाद को पाना व सौंपना चाहते हैं। थोपने की प्रवृत्ति में कभी वे शाकाहार, तो कभी खादी धारण करने की बात करते हैं। वे यह भी चाहते हैं कि शुद्धतावादी होना गांधीवाद है जबकि गांधी अपने जीवन में ‘स्वान्त: सुखाय’ के लिए ऐसे कर्म को धारण किए हुए थे। वह कभी जोर देकर नहीं कहे कि इसे आप नहीं कर सकते, उसके लिए वह मानते थे कि व्यक्ति स्वयं जिम्मेदार है। हिन्द स्वराज के ही भूमिका में इसको वे स्पष्ट करते हैं, इसका ज़िक्र पहले भी किया जा चुका है कि ‘आप उचित समझें तो मानें’। लेकिन उनको अनीति-मार्गी, सत्य-च्युत, अनीति की सभ्यता धारित लोग बिल्कुल पसन्द नहीं थे। आत्मानुशासी पसन्द थे जो गांधी के अनुसार अभयी और नैतिक ही होंगे।

ध्यान देने वाली बात यह है कि नारायण भाई देसाई कहते हैं ‘हिन्द स्वराज गीता सदृश है’, हम इसके मन्तव्यों को समझें कि वास्तव में शैतानी सभ्यता के ख़िलाफ हमारा यह प्रतिकार है। गीता में भी यही कहा गया है कि ‘धर्म हेतु’ तुम अपने कर्तव्य करो। शैतानी प्रवृत्तियों पर विजय के लिए और शांति की स्थापना के लिए सत्य-व्रत पर आगे बढ़ो। हिन्द स्वराज में भी गांधीजी ने कुछ ऐसे ही संदेश का पुरस्कार किया है, गांधीवादी धर्म और अधर्म की राजनीति को अपने ऐनक से देखते हैं किन्तु ‘हिन्द स्वराज के सच’ को देखने वाले जिस तरह से अपना मुख मोड़कर अन्धकार के आगोश में खोते जा रहे हैं उसकी चिंता करनी है। नन्दकिशोर आचार्यजी ने दो बातें नेहरू और गांधी के बारे में लिखी है-गांधी के बारे में वे लिखते हैं कि गांधी की यह सोच थी कि, ‘जब मैं चला जाऊंगा तो वे वही करेंगे जो मैं अभी कर रहा हूँ। तब वे मेरी ही भाषा बोलेंगे। अन्ततः उन्हें मेरी भाषा बोलनी पड़ेगी। यदि ऐसा नहीं भी होता है, तो भी मैं कम-से-कम इसी विश्वास के साथ मरना चाहता हूँ।’ जबकि जवाहर लाल नेहरू के सन्दर्भ में नन्दकिशोर आचार्य जी लिखते हैं कि, "स्वयं उन्होंने नवम्बर, 1963 में लोकसभा में दिए गए अपने एक वक्तव्य में यह स्वीकार किया कि गांधीजी के रास्ते को छोड़ना एक ‘भूल’ थी।" इस पर से दो बातें उभरकर आती हैं कि गांधीजी का विश्वास नेहरू में बहुत दिलचस्प और गहरा था जबकि दूसरी बात जो निकलती है वह यह कि नेहरू ने स्वयं स्वीकारा। तुषार गांधी का उपरोक्त कथन इससे परिपुष्ट हुआ। लोहिया ने गांधीवाद को कई भागों में बांटकर देखा और गांधीवाद के चेहरे का नकाब हटाकर उसकी व्याख्या भी की है। देशभर में निरपेक्ष समझ रखने वाले इस बात को भली प्रकार जानते हैं कि गांधीवाद के नाम पर देश में और देश के बाहर क्या-क्या हो रहा है। उनके ‘मौन’ उनकी कमजोरी नहीं है बल्कि यह उनका सत्याग्रह है। यह सत्याग्रह का अनुष्ठान इस आशा में है कि कभी नेहरू की भांति इन्हें भी अक्ल से साक्षात्कार हो ही जाएगा और वे अपने किए पर शर्मिन्दा होंगे। 

गांधी अपने ही देश में चाहे जिस रूप में देखे जायें लेकिन उनके विचार सार्वभौम हुए। विचारों में छुपे तत्वों का मूल्यांकन जगतभर में हुआ। हिन्द स्वराज लिखने के बाद जब उन्होंने इसके अंग्रेजी अनुवाद का प्रकाशन किया तभी उसको विद्वानों ने हाथों-हाथ लिया। लियो टॉलस्टॉय का एक लम्बा पत्र, वायबर्ग की टिप्पणी का ज़िक्र पूर्व में किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त गांधीजी ने जिसे भी ‘इण्डियन होमरूल’ हिन्द स्वराज की प्रति भेजी सबने इस पुस्तक के महत्व व गांधी के विचारों की भूरि-भूरि प्रशंसा की। ‘आर्यन पाथ’ में प्रकाशित विद्वानों अध्यापक साडी, कोल, डिलाइल बन्र्स, मिडकटमरी, वेरेसफर्ड, हृयूफासेट, क्लाड हूटन, जिराल्ड हर्ड, कुमारी रैथबोन आदि की भी दृष्टि से हम परिचित हैं। श्रीमती सोफिया वाड़िया जैसी प्रकाशिका ने यह सिद्ध किया कि गांधी हमारे मानने न मानने से न मरने वाला है और न मिटने वाला है क्योंकि गांधी द्वारा प्रतिपादित ‘मूल्यबोध’ गांधी का विस्तार है। वह हिन्द स्वराज के भी माध्यम से है, उनके अन्य कृतियों, पत्रों, सम्भाषणों तथा आचरण से भी है। इसे सभी दुनिया के लोग समझ चुके हैं कि गांधीजी की दृष्टि ‘सर्वजन हितार्थ सुखार्थ’ थी और ऐसी ही दृष्टियों को अमरत्व प्राप्त होता है। 21वीं सदी से पूर्व और बाद का भी मूल्यांकन भरपूर हुआ। गांधी ने प्रभावित किया। उन्होंने अपने ‘अहिंसा सिद्धान्त’, ‘सत्य-व्रत’, ‘आत्मानुशासन’, ‘पर दुःखकातरता’ व ‘सत्याग्रह’ से प्रभावित किया। बुराई का अहिंसक प्रतिरोध करके विजयश्री हासिल करने की प्रेरणा दी। सहजता, विनम्रता, सदासयता, बन्धुता और समरसता से प्रभावित किया। ‘आत्म’ का बोध कैसे हो तथा ‘अन्य’ और ‘आत्म’ की सहज अवधारणा समझायी। स्वदेशी, स्वावलम्बन, विकेन्द्रीकरण तथा ट्रस्टीशिप के माध्यम से ‘सर्वोदयी अवधारणा’ का प्रतिपादन किया। ऐसे में, गांधी का अवदान चाहे गांधीवादी भुला दें, चाहे आज की युवापीढ़ी अपने ग्लैमर के अल्हड़पन में भुला दे, शोषक अपने धन क अहंकार में भुला दे लेकिन वह न कभी धूमिल हुआ और न होगा, उस अवदान को सभी लोग स्वीकार करेंगे क्योंकि गांधीजी का तर्क नेहरू के समक्ष भी यही था कि ‘एक समय वह हमें ही मानेंगे।’ 

नेहरू न सही गांधी के ‘सत्याग्रह’ को दुनिया मानने से नहीं बच सकती। 9/11 के बाद 21वीं सदी के आतंकवाद की समस्या पर अमरीकी साम्राज़्य को गांधीजी नज़र आते हैं। बांधों से विस्थापन के बाद गांधीवादी सत्याग्रही मेधा पाटकर, पर्वत और वृक्ष के रक्षार्थ गांधीवादी सुन्दरलाल बहुगुणा का सत्याग्रह, पानी के लिए सत्याग्रह, विदेशों में चलाए जा रहे दलित सत्याग्रह, यह गांधी की तरफ वापसी है क्योंकि तापक्रम की वृद्धि, ओजोन परत में छिद्र से उपजी पर्यावरणीय समस्या, भूख, गरीबी और अकाल से भी बचाव के लिए विश्वभर में ‘गांधीयन कांसेप्ट’ को विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। क्योंकि यह सभी लोग जानते हैं कि ‘हिंसा’ का जवाब हिंसा नहीं है, पानी का विकल्प बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ नहीं हैं, वैकल्पिक ऊर्जा ही व्यापक समय तक मनुष्य का सहारा बनेगी, दलित, आदिवासी, निःशक्त, स्त्री समस्या भी हमारे परिवार की अवधारणा के साथ सह-अस्तित्व बनाकर गरिमा प्राप्त कर सकते हैं, हमारी भौतिकवादी लिप्सा से मुक्ति के साथ ही ‘आध्यात्मिक’ तथा ‘नैतिक विकास’ होगा। आपसी झगड़े बगैर बन्धुत्व और संवाद के खत्म नहीं होंगे। 

दक्षिण अफीका के पूर्व राष्टपति नेल्सन मण्डेला, म्याँमार की आंन सांग सू ची, अमरीका के मार्टिन लूथर किंग द्वितीय तथा यासर अराफात जैसे लोगों ने गांधी मार्ग को अन्ततः मनुष्यता का विकल्प बताया है। यह ‘विकल्प’ का जो सवाल है, उसके बारे में हमें स्पष्ट हो जाना चाहिए कि यह गांधी को वैयक्तिक रूप में और उनके ‘सत्य’ के लिए है। ‘सत्य’ का दर्शन है अपना और उसके बारे में पूर्व में कुछ सूत्र उद्घाटित किए जा चुके हैं। अमरीका में ओबामा भी गांधी के ‘अहिंसा’ जैसे तर्क और ‘सत्याग्रह’ जैसे आचरण से ज्यादा प्रभावित हैं। कुछेक का मानना है कि दुनिया भर में हो रहे विभिन्न विषयों पर विमर्श के बीच हिन्द स्वराज या गांधी की प्रासंगिकता पर बहस ही नहीं होनी चाहिए क्योंकि मानवता के लिए किए गए गांधी के कर्म और सदैव मानवता के लिए मार्ग प्रशस्त करती पुस्तक हिन्द स्वराज पर बहस बिल्कुल हमारे अस्तित्व पर ख़तरा है। उत्तर आधुनिकता, नव-संरचनावाद तथा मानवाधिकारवादी बहस के बीच मुझे आदित्य मुखर्जी तथा मृदुला मुखर्जी का स्मरण हो आता है। आदित्य मुखर्जी व मृदुला मुखर्जी ने अपने आलेख ‘साम्राज्यवाद और 20वीं सदी में भारतीय पूंजीवाद का विकास’ में उद्धृत किया है, "विदेशी अभिज्ञेय (पहचानने योग्य) शोषणकर्ता के खि़लाफ़ संगठित होना आसान है। विश्व पूंजीवाद के खि़लाफ़ दुनिया की सभी समाजवादी ताकतों को एकजुट कर रामराज्य स्थापित करने की बात कहना भी आसान है लेकिन घरेलू बुर्जुआ से लड़कर उनके खि़लाफ़ समाजवादी ताकतों को एकत्र करना अत्यन्त मुश्किल है। लेकिन सहज समाधान तो कोई समाधन भी तो नहीं होता, यदि उसमें वास्तविकता की कोई झलक न हो।" स्वतंत्रता बाद भारत के तथाकथित समाजवादियों की यही दौड़ रही जो सफल नहीं हो सकी क्योंकि वास्तविकता का ही वहाँ पर मूलरूप से अभाव था। गांधी आज भी उस परिप्रेक्ष्य में हिन्द स्वराज के साथ उपस्थित हैं किन्तु उनकी प्रत्येक दृष्टि तब तक समाजवाद का अंग नहीं बन सकती जबतक ‘नीति का’ सही सम्यक ज्ञान न होगा। लियो टॉलस्टॉय का कथन था कि, "जब मनुष्य के जीवन आदर्श और व्यवहार में परिवर्तन होता है तो अनिवार्यतः समाज व्यवस्था में परिवर्तन हो जाता है; किन्तु इसके विपरीत समाज व्यवस्था बदलने से न केवल मनुष्य के जीवन-आदर्श और व्यवहार में परिवर्तन नहीं होता, बल्कि लोगों का ध्यान और गलत दिशा में चले जाने के कारण उल्टे परिवर्तन होने में बाधा पहुँचती है।" किन्तु खेदजनक यही है कि लोगों को यथार्थ का भान नहीं हुआ और आज भी स्थितियों में कोई खास क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं हो पाए कितना यह हास्यास्पद है। 


मेरी दृष्टि से सम्पूर्ण बहस के आलोक में ‘हिन्द स्वराज’ समूची पुस्तक और उसमें व्यक्त विचार व्यवस्था को नए आयाम देने वाले संकल्प हैं। गांधीजी के हिन्द स्वराज की समस्त संकल्पना इस दृष्टि से अनुकरणीय है। सच तो यह है कि ऐसी संकल्पना की पुस्तक का आविर्भाव यदा-कदा ही हो पाता है यह एक जीवंत जीवन का महा-आख्यान वाली पुस्तक है। 

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