पाश्चात्य आलोचना के अमर शिल्पी: मैथ्यू आर्नल्ड

डॉ. योगेश राव

योगेश राव

    मैथ्यू आर्नल्ड को उन्नीसवीं शताब्दी का मूर्धन्य आलोचक, यथार्थवादी काव्यचिंतक तथा प्रथम कोटि का कवि माना गया है। वस्तुतः इनका समय सन् 1822 से 1888 ई० है।  आर्नल्ड का शिक्षण विंचेस्टर, रग्बी और बेलिअल कालेज, ऑक्सफोर्ड में हुआ तथा यहीं से वे सन् 1884 में आनर्स के साथ स्नातक और दूसरे वर्ष ही फेलो ऑफ़ आरिअल के लिए निर्वाचित हुए। कई वर्षो तक ऑक्सफोर्ड में काव्य के आचार्य होने के साथ-साथ उन्हें एक बेहतरीन शिक्षाशास्त्री होने का गौरव भी प्राप्त है।  सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर कई बार यूरोप के विभिन्न देशों में वहाँ की शिक्षा पद्धति का अध्ययन करने के लिए भेजे गये और उन्होंने शिक्षा सम्बन्धी विवरण प्रस्तुत करते हुए आंग्ल शिक्षा पद्धति की सीमाओं का स्पष्ट रूप से संकेत किया। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि इंग्लैंड के शासन ने आर्नल्ड के विचारों को मान्यता भी प्रदान की। यद्यपि आर्नल्ड ने लगभग चालीस पुस्तकें लिखी है पर आलोचना की दृष्टि सेएसेज इन क्रिटिसिज्म’, ‘ऑन द स्टडी ऑफ़ सेल्टिक कल्चर’, ‘लिटरेचर एंड ड्रामाऔरकल्चर एंड अनार्कीविशेष उल्लेखनीय हैं। ये बड़े शिष्ट, सुसंस्कृत व्यवहार वाले मृदुभाषी विद्वान् थे। ऑक्सफ़ोर्ड के वातावरण से ये बहुत प्रभावित थे। अपने प्रारंभिक जीवन में ये काव्य रचना में प्रवृत्त रहे  और बाद में आलोचना में संलग्न रहे फिर भी काव्य रचना कुछ न कुछ बाद में भी चलती रही। ये पद्य और गद्य दोनों ही रचनाओं में जीवन के आलोचक रहे। आर्नल्ड के लेखन में सुरुचि और गाम्भीर्य बराबर मिलता है।

     मैथ्यू आर्नल्ड को महान् आधुनिक आलोचक कहा गया है। आधुनिक अंग्रेजी आलोचना का प्रारम्भ मैथ्यू आर्नल्ड से ही होता है। सामान्यतया उनके साहित्यिक जीवन का आरंभ काव्य-रचना से हुआ परन्तु स्वभाव एवं कर्म दोनों ही दृष्टियों से वह पहले आलोचक थे, बाद में कवि। ऑक्सफ़ोर्ड में प्रोफेसर ऑफ़ पोइट्री का पद मिलना बड़े सम्मान और गौरव की बात थी। आर्नल्ड ने आलोचना का काम पेशे के रूप में किया। आर्नल्ड स्वयं कवि होने के कारण उन्हें काव्य की अन्तर्निहित विशेषताओं की पहचान थी जिनकी सहायता से वे अपनी  काव्य-विषयक अवधारणाएँ प्रस्तुत ही नहीं, संशोधित एवं परिमार्जित कर सकते थे। आर्नल्ड ने काव्य को मनुष्य से अविच्छिन्न रूप से अनस्यूत माना।  इस वैज्ञानिक युग में जब सत्य को भौतिक रूप से समझने के प्रयत्न किये जा रहे हैं तब आर्नल्ड ने सबका ध्यान इस ओर आकृष्ट किया उनका मानना था कि -More and more mankind will discover that we have to turn to poetry to interpret life for us, to console  us, to sustain us, without poetry our science will appear incomplete and most of what now passes with us for religion and philosophy will be replaced by poetry.” 1 अर्थात - जैसे-जैसे हम नवीन शोधों की तरफ अग्रसर होंगे, वैसे-वैसे हमें काव्य के समीप जीवन की यथार्थता को समझने के लिए जाना होगा। हमें काव्य से ही शांति और शक्ति प्राप्त होगी। इतना ही नहीं काव्य के बिना विज्ञान अपूर्ण है और भविष्य में काव्य दर्शन एवं धर्म का भी जो कुछ ग्राह्य है, उसे ग्रहण कर लेगा।

     यद्यपि विज्ञान से जीवन पद्धति में ऐसा परिवर्तन आने लगा जिससे भावुकता कुंठित होने लगी। परिणामस्वरूप काव्य के प्रति आकर्षण कम होने लगा। चारों ओर  कोलाहल जैसा सुनाई पड़ने लगा कि काव्य का युग समाप्त हो गया है, अब तो विज्ञान का युग है। टॉमस लव पीकॉक, ने काव्य की निष्प्रयोजनता प्रमाणित करने के लिए एक पुस्तिका ही लिख डाली जिसमें उन्होंने कहा कि ज्ञान और तर्क के युग में काव्य केवल बर्बरता का अवशेष है। इसके उत्तर में प्रसिद्ध रोमेन्टिक कवि शैली कोदि डिफेन्स ऑफ़ पोएट्रीनामक प्रसिद्ध निबंध लिखना पड़ा। तात्पर्य यह है कि विज्ञान ने एक साथ काव्य, धर्म तथा संस्कृति के मूलोच्छेद का उपक्रम किया। इस सन्दर्भ में आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा का कथन है-  “जो लोग काव्य, धर्म तथा संस्कृति के स्थापित मूल्यों के पक्षधर थे उन्होंने विज्ञान के प्रत्याख्यान का वीणा उठाया। मैथ्यू आर्नल्ड इस श्रेणी के विचारकों में अल्पतम हैं।2

     आर्नल्ड ने प्रत्येक क्षेत्र में पूर्णता को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया। उनके अनुसार संस्कृति पूर्णता का दूसरा नाम है और काव्य संस्कृति का अन्यतम साधन है। इस विषय को उन्होंनेकल्चर एंड एनार्कीनामक विस्तृत लेख में भलीभांति  स्पष्ट किया। प्रसिद्ध समीक्षक विजयपाल सिंह आर्नल्ड का मूल्यांकन करते हुए लिखते हैं- “ आर्नल्ड ने काव्य में रोमेन्टिक (स्वच्छंदतावादी) मान्यताओं का खण्डन किया और प्राचीन क्लासिकल (अभिजात्यवादी) सिद्धांतों की पुनः स्थापना पर बल दिया। उन्होंने पुरातन यूनानी उपलब्धियों को अनुकरणीय बताया। और उन्हें अपनाने का आग्रह किया। यूनान के काव्यशास्त्रियों में अरस्तू उनके आदर्श थे और होमर के महाकाव्य तथा नाटककारों के दु:खान्तक (ट्रेजैडी) उनके साहित्यिक प्रतिमान के निर्धारक आर्नल्ड को यूनानी साहित्यिक आदर्शों का उद्धारक कहा जा सकता है। इस प्रकार आर्नल्ड एक ऐसी सीमा रेखा पर खड़े दिखाई पड़ते हैं जो प्राचीन और नवीन का, परम्परा और आधुनिकता का मिलन बिंदु है। उन्होंने आलोचना की जिस पद्धति का विकास किया वह बाद के आलोचकों द्वारा ग्रहण किया गया।3

     आर्नल्ड काव्य में सरलता, स्वाभाविकता आदि अभिजात गुणों के समर्थक थे जिनका प्रयोग उन्होंने काव्य में ही नहीं अपितु आलोचना में भी किया। आर्नल्ड ने कोई ग्रन्थ आलोचना के सन्दर्भ में नहीं लिखा। अरस्तू या कोलरिज के सामान कोई मौलिक उद्भावना भी नहीं की। उनके विचार भाषणों के लिए या पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखित छोटे-बड़े प्रकीर्ण निबंधों में व्यक्त हुए हैं। उनके महत्व को रेखांकित करते हुए आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा पुनः लिखते हैं- “ मौलिक उद्भावना की दृष्टि से उनका महत्व भले ही न हो परन्तु आलोचना की स्वायत्तता स्थापित करने का श्रेय आर्नल्ड को अवश्य दिया जायेगा।4

     आर्नल्ड ने उत्तम  साहित्य की रचना के लिए यह आवश्यक माना कि लेखक किसी महान् कृत्य का चयन कर, उसे उपयुक्त शैली में प्रस्तुत करे जिससे की वह आनन्द कर सके और उसका आनन्द सम्पूर्ण कृति के विविध अंगों की अंगीय
(Organic Unity) से उत्पन्न होना चाहिए। अतः वह अरस्तू के समान कार्य (Action) एवं कथानक (Plot) को सर्वोपरि महत्व देते हैं। अरस्तू मूलतः यथार्थवादी चिंतक थे। अतः उन्होंने कलाजन्य ज्ञान या अभिज्ञान को ही आनन्द का मूल आधार माना है। आर्नल्ड इसी धारणा को और अधिक विकसित करते हुए लिखते हैं- “अतः हम किसी भी यथार्थ चित्रण के रोचक होने की आशा कर सकते है परन्तु यदि वह काव्यात्मक हो तो इससे भी अधिक की माँग की जा सकती है। वह मनोरंजन करे इतना ही पर्याप्त नहीं, उससे यह भी अपेक्षा की जायेगी कि की वह पाठक को स्फूर्ति और आनन्द दे,... उसमें मोहकता हो और मन को आह्लाद से भर दे।5  इस प्रकार आर्नल्ड यहाँ कविता से मानव-ज्ञान की अभिवृद्धि के साथ-साथ मानव के आनन्द की भी वृद्धि को आवश्यक मानते हैं। आगे चलकर वे शिलर के इस कथन के आधार पर कि- “सम्पूर्ण कला आनन्द के चरणों में समर्पित है। मानव को कैसे सुखी बनाया जाये- इससे महत्तर एवं गम्भीर समस्या और कोई नहीं हैं। उपयुक्त कला वही है जो परमानन्द की सृष्टि करे।6   यहाँ शिलर का  अनुमोदन करते हुए आर्नल्ड ने भी कला और काव्य का लक्ष्य अंततः मानव-जाति को सुखी करके उसके परम आनन्द में अभिवृद्धि करना माना है। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि आर्नल्ड के दृष्टिकोण के अनुसार काव्य का लक्ष्य केवल व्यक्ति विशेष का मनोरंजन करना नहीं अपितु समस्त मानवता का हित साधन करते हुए उसे आनन्द प्रदान करना है।

     कला और काव्य का लक्ष्य स्पष्ट करने के साथ-साथ आर्नल्ड कार्य-व्यापार अर्थात मानव के कार्य व्यापार को ही काव्य का सर्वाधिक उत्कृष्ट विषय मानते हैं। और यह कार्य-व्यापार उत्कृष्ट कोटि के होने चाहिए। निकृष्ट कोटि के कार्य-व्यापार को वह काव्य का विषय नहीं मानते। वे कहते हैं – “सभी राष्ट्रों में और सभी युगों में काव्य के शाश्वत विषय क्या रहे हैं? कार्य-व्यापार; या मानव के कार्य व्यापार ; उनमें स्वतः ही रोचकता का गुण होता है किन्तु फिर भी कवि उन्हें एक ऐसी रोचक शैली में प्रस्तुत करता है जिससे की उनका सम्प्रेषण सभी पाठकों तक हो सके। यदि कोई कवि समझता है कि कार्य या महान् कार्य में क्या रखा है- यह तो केवल उसकी अपनी काव्य शक्ति का वैशिष्ट्य है कि वह तुच्छ से तुच्छ कार्य को भी  महान् कृति का रूप दे सकता है। तो ऐसा सोचना ही आर्नल्ड की दृष्टि में विवेक-शून्यता का प्रमाण है। जब रचना का आधारभूत कार्य ही शक्तिहीन और प्रभाव-शून्य होगा तो फिर कवि कितनी ही कला की करामात दिखाये वह अपनी रचना में आनन्द का संचार नहीं कर सकता। अतः सर्वप्रथम तो कवि को उत्कृष्ट कार्य-व्यापार का चयन कर लेना चाहिए और सबसे उत्कृष्ट कार्य व्यापार कौन से होते है? निश्चय ही वे जो मानव के सहज संस्कारों को सबसे अधिक आन्दोलित करे- उन मूलवर्ती भावनाओं को आन्दोलित करें जिनका अस्तित्व जाति-मानव में स्थायी रूप में होता है और जो काल निरपेक्ष होती है। ये भावनाएं स्थायी और परिवर्तनशील होती है और इनके अनुरंजन के साधन भी स्थायी और अपरिवर्तनशील रहते है।7

     अस्तु, आर्नल्ड के विचार से विषय की प्राचीनता या अर्वाचीनता का काव्य की दृष्टि से विशेष महत्व नहीं है- महत्व उसकी रागात्मकता का जो की मानव-जाति की शाश्वत वासनाओं पर आधारित होती है और अंत में आर्नल्ड का स्पष्ट निर्णय है- “एक सहस्र वर्ष प्राचीन महान् कार्य भी आज के किसी लघुतर कार्य की अपेक्षा अधिक रोचक होगा, भले ही इस लघुतर कार्य के चित्रण में अत्यंत सूक्ष्म काव्य कौशल का प्रयोग किया गया हो और भले ही वह अपनी आधुनिक अभिव्यंजना परिचित आचार-व्यवहार एवं समसामयिक संदर्भों के कारण हमारे क्षणिक भावों और रुचियों को अपनी ओर आकर्षित करने की अधिक क्षमता से युक्त हो। फिर भी वे उनके आधार पर आशा नहीं कर सकते कि उनकी काव्य-कृति से पूर्ण परितोष प्राप्त होगा, अपितु इसका परिणाम उनकी आशाओं के विपरीत भी हो सकता है। काव्य कृतियों का सम्बन्ध हमारी शाश्वत भावनाओं के साम्राज्य से है- यदि वे इन्हें आकर्षित करती हैं तो और सब अपेक्षाएँ स्वतः ही शान्त और मौन हो जाती हैं। 8  उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मैथ्यू आर्नल्ड के अनुसार काव्य का लक्ष्य है- सर्वसामान्य को आनन्द प्रदान करना। कहना न होगा कि आर्नल्ड कि यह स्थापना भारतीय रस-सिद्धांत के सर्वथा अनुरूप है, जिसके अनुसार काव्य का लक्ष्य रस या आनन्द प्रदान करना है और इस आनन्द कि उपलब्धि के लिए ऐसे स्थायी भावों का चित्रण किया जाता है जो मनुष्य कि जन्मजात वासनाओं पर आधारित होते हैं और साथ ही उसकी व्यंजना के लिए कवि को विशेष प्रकार की परिस्थितियों एवं कार्य व्यापारों का चित्रण करना पड़ता है।


     आर्नल्ड उस काव्य का विरोध करते हैं - जिसमें केवल पीड़ा का ही चित्रण हो और उस पीड़ा को दूर करने कि कोई क्रिया दिखाई गई हो। वे कहते हैं - “जिन स्थितियों में निरन्तर मानसिक पीड़ा ही प्रस्तुत की जाती है, किसी घटना आशा या प्रतिशोध द्वारा उस पीड़ा से छुटकारा पाने का प्रयत्न नहीं दिखाया जाता, जिनमें सब कुछ सहा भर जाता है, कुछ किया नहीं जाता, अर्थात जिनमें पीड़ा को दूर करने की क्रिया नहीं होती उनके वास्तविक प्रस्तुतीकरण से काव्यानन्द कि उपलब्धि नहीं होती हैं। जब ऐसी स्थितियाँ वास्तविक जीवन में आती हैं तो वे विक्षोभ उत्पन्न करती हैं। काव्य में उनके कारण विक्षोभ ही होता है, काव्य कि वास्तविक अनुभूति नहीं होती।9 अरस्तू ने भी यही बात कही थी कि- “सब कुछ कार्य पर निर्भर करता है, योग्य विषय चुन लो उसकी स्थितिजन्य अनुभूतियों को आयत्त करो। यदि ऐसा किया गया तो शेष सब अपने आप पूरा हो जायेगा।10

     मैथ्यू आर्नल्ड केवल कवि एवं काव्य-चिन्तक ही न थे अपितु वे अपने युग की सांस्कृतिक परम्परा एवं सामाजिक चेतना के भी सजग प्रहरी थे। अतः यह स्वाभाविक था कि उन्होंने कला और काव्य का चिन्तन अपने युग कि सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थितियों के सन्दर्भ में किया। इस सम्बन्ध में गहराई से विश्लेषित करने के अनन्तर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं  कि समकालीन समाज में जिस सीमा तक विज्ञान एवं यांत्रिकी की प्रगति हुई है, उसी सीमा तक जीवन में संतुलन आ गया है। इसका कारण यह है कि विज्ञान के विकास के फलस्वरूप एक ओर तो लोगों के दृष्टिकोण में भारी परिवर्तन आया और दूसरी ओर भौतिक साधनों एवं सुख-सुविधाओं में अभिवृद्धि हुई किन्तु भौतिक समृद्धि का लाभ समाज के सभी लोगों को समान रूप से प्राप्त नहीं हुआ। समाज तीन वर्गों में बँट गया- उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग एवं निम्न वर्ग। जहाँ उच्च वर्ग आध्यात्मिकता से विमुख होकर घोर भौतिकवादी हो गया तो मध्यम वर्ग अपनी अतृप्त इच्छाओं एवं कुंठाओं को लेकर क्षुद्र हो गया एवं निम्न वर्ग में पाशविकता आ गई। विभिन्न वैज्ञानिकों ने भौतिकवादी दृष्टिकोण से जो नयी स्थापनाएँ कि उनके प्रभाव से परम्परागत धार्मिक, दार्शनिक एवं नैतिक मान्यताएँ ध्वस्त हो गयीं। फलस्वरूप सांस्कृतिक मूल्यों का ह्रास हो गया। इसी को सांस्कृतिक विघटन या समकालीन अराजकता का नाम दिया गया है। उच्च सांस्कृतिक मूल्यों के भाव में मनुष्य का पशुता की ओर अग्रसर होना अत्यंत घातक स्थिति के उत्पन्न होने का संकेत दे रही है। अतः यह आवश्यक है कि आज के समाज में पुन: सांस्कृतिक एवं नैतिक मूल्यों कि स्थापना की जाये। पहले यह कार्य धर्म और दर्शन के द्वारा संपन्न होता था किन्तु आधुनिक युग में इन दोनों पर से ही मनुष्य कि आस्था खण्डित हो गयी है। ऐसी स्थिति में कविता ही एक ऐसा माध्यम है, जिसके द्वारा सांस्कृतिक मूल्यों की पुन: प्रतिष्ठा की जा सकती है। किन्तु इस लक्ष्य कि पूर्ति भी प्रत्येक प्रकार कि कला या कविता नहीं कर सकती, अपितु वे रचनाएँ कर सकती हैं, जिनमें ऐसे महान् कार्यों का चित्रण हुआ हो जो कि मानवता के शाश्वत मूल्यों से अभिभूत करने वाले हों और साथ ही वे सशक्त, प्रभावशाली एवं आह्लादकारी भी हों। इन गुणों से युक्त रचना ही अपने युग की सांस्कृतिक विघटन का निराकरण कर सकती है।


     काव्य की इस महती भूमिका के कारण ही आर्नल्ड काव्य को जीवन कि व्याख्या घोषित करते है- Poetry is at bottom a criticism of life. उनकी इस घोषणा की अनुगूँज साहित्य के क्षेत्र में सर्वत्र सुनायी पड़ती है। आर्नल्ड का आलोचना से तात्पर्य सामान्य आलोचना या निन्दा से नहीं है, अपितु वे इस शब्द का प्रयोग एक विशेष अर्थ में करते हैं। इस सन्दर्भ में वे कहते हैं- “कविता जीवन की आलोचना तो अवश्य है किन्तु वह आलोचना अपने विशेष काव्य-सत्य एवं काव्य सौन्दर्य के विशेष नियमों पर आधारित होती है। दूसरे शब्दों में, काव्यगत आलोचना काव्यगत तत्त्वों और मूल्यों पर आधारित होती है और उसकी शैली भी विशिष्ट होती है।11  उत्कृष्ट शैली की परिभाषा देते हुए वे कहते हैंयह शैली काव्य में तब आती है, जब काव्यात्मक मनोवृत्ति वाला उच्चादर्श व्यक्ति किसी गम्भीर विषय का सरलता और स्वच्छता के साथ निरूपण करता है।वह काव्य शैली में अर्थगाम्भीर्य, कसावट, शुद्धता, स्पष्टता एवं संगीत्मकता को अनिवार्य गुण मानते हैं और दूसरी ओर गद्यशैली के सम्बन्ध में उसका मत है कि उसमें नियमितता
(Regularity), एकरूपता (Uniformity), सटीकता (Precision), एवं संतुलन (Balance) होने चाहिए। इस प्रकार आर्नल्ड की दृष्टि में रचनात्मक साहित्य जीवन की आलोचना है और आलोचक का कर्तव्य है कि वह विश्व के सर्वोच्च ज्ञान एवं सर्वोत्तम विचारों से परिचित हो, उन्हें सोचे समझे तथा सर्वत्र उनका प्रसार करे जिससे कि सच्ची और नवीन भावनाओं की धारा प्रवाहित हो सके- A disinterested endeavor to learn and propagate the best that is known and thought in the world and thus to establish a current of fresh and true ideas.

     आर्नल्ड के मतानुसार, आलोचक में मुख्यतः तीन गुण होने चाहिए - (1) आलोचक वस्तुओं को अपने निरपेक्ष रूप में देखे और उन्हें समझकर उनका वास्तविक अध्ययन करे। (2) आलोचक में एक मिशनरी स्पिरिट होना चाहिए और जो कुछ उसने अपने प्रगाढ़ अध्ययन और मनन से प्राप्त किया है, उसे वह हस्तान्तरित करे, जिसके अनुसार विश्व में परिवर्तन आ सके। (3) आलोचक का दायित्व लेखकों के प्रति यह है कि वह एक ऐसे वातावरण का निर्माण करे, जिसमें लेखक साहित्य की सर्जना कर सके।
 आर्नल्ड को उन्नीसवीं शताब्दी का सबसे बड़ा समीक्षक घोषित करते हुए स्कॉट जेम्स ने लिखा - For half a century Arnold’s position in this country was comparable with that of the venerable Greek in respect of wide influence he exercised, the mark he  impressed upon criticism and the blind faith which he was trusted by his rotaries. अर्थातइस देश में आर्नल्ड की स्थिति लगभग 50 वर्षों तक वैसी ही रही जैसे किसी समय यूनान के महान् चिन्तक अरस्तू की थी। उन्होंने अपने युग की समीक्षा को उस गहराई से प्रभावित किया जैसे कभी अरस्तू ने किया था। इसलिए उनके अनुयायी उनके विचारों को अन्धविश्वास की सीमा तक स्वीकार करते थे।12

     समग्रतः, आर्नल्ड अंग्रेजी आलोचना साहित्य के प्रकाश स्तम्भ हैं, जिन्होंने निर्भीक होकर आलोचना का मार्ग प्रशस्त किया। स्टॉक जेम्स ने आर्नल्ड की विशेषताओं का निम्नलिखित सन्दर्भ में बहुत समीचीन आकलन किया है- “हममें से कौन उस आलोचक को श्रद्धांजलि अर्पित नहीं करेगा जिसके सम्बन्ध में सच्चाई से यह कहा जा सकता की उसने जीव यंत्र के दांते से अपने को मुक्त किया, उसने ज्ञान के लिए ज्ञान का अनुवर्तन किया, उसने माधुर्य और आलोक के लिए विचारों में अभिरुचि ली, उसने उत्तम विचारों के प्रसार तथा जीवन में विनियोग के लिए निरन्तर प्रयास किया, उसने जो नूतन ज्ञान प्राप्त किया था उसे संसार में संचारित किया और बिम्ब के विचार-प्रवाह के केन्द्र में सदा रहने की चेष्टा करते हुए उसने क्षेत्रीयता की भ्रांतियों को दूर रखा।13

     निष्कर्षतः आर्नल्ड का साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान है। वे अंग्रेजी साहित्य के अरस्तू हैं। पाश्चात्य आलोचना के इतिहास में उनका स्थान अमर है और कीर्ति अक्षय।

सन्दर्भ:
1. Selected Essay, The Study of Poetry, Page 47
2. पाश्चात्य काव्यशास्त्र- आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा, पृष्ठ- 147
3. पाश्चात्य काव्यशास्त्र- डॉ. विजयपाल सिंह, पृष्ठ- 98
4. पाश्चात्य काव्यशास्त्र- आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा, पृष्ठ- 149
5. भारतीय एवं पाश्चात्य काव्य-सिद्धान्त- डॉ. गणपतिचन्द्र गुप्त, पृष्ठ- 204
6. भारतीय एवं पाश्चात्य काव्य-सिद्धान्त- डॉ. गणपतिचन्द्र गुप्त, पृष्ठ- 205
7. भारतीय एवं पाश्चात्य काव्य-सिद्धान्त- डॉ. गणपतिचन्द्र गुप्त, पृष्ठ- 206-207
8.  पाश्चात्य काव्य-शास्त्र की परम्परा- स. डॉ. सावित्री सिन्हा, पृष्ठ- 195
9. पाश्चात्य काव्यशास्त्र- डॉ. विजयपाल सिंह, पृष्ठ- 102
10. पाश्चात्य काव्यशास्त्र- डॉ. विजयपाल सिंह, पृष्ठ- 102
11. भारतीय एवं पाश्चात्य काव्य-सिद्धान्त- डॉ. गणपतिचन्द्र गुप्त, पृष्ठ- 210 
12. भारतीय एवं पाश्चात्य काव्य-सिद्धान्त- डॉ. गणपतिचन्द्र गुप्त, पृष्ठ- 201 

13. पाश्चात्य काव्यशास्त्र- डॉ. विजयपाल सिंह, पृष्ठ- 109

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