अहिंसा की शक्ति: दृढ़ संकल्प और सच्चा व्रत

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


भौतिकवादी मनुष्य पैदा नहीं होता, वह हो जाता है। यदि हम प्रारब्ध में विश्वास करते हैं तो यह कहा जा सकता है कि प्रारब्ध ज़रूर अपना प्रभाव दिखाता है लेकिन मनुष्य भौतिकवादी संसार में जन्म के साथ भौतिकवादी पैदा हुआ या होता रहा है इसके कोई प्रमाण नहीं हैं। इसलिए किसी को भौतिकवादी होने के जन्मजात गुण कि व्याख्या हम नहीं पाते। मनुष्य तो इसी धरा पर भौतिकता से परिचित होता है और धीरे-धीरे आध्यात्मिक शक्तियों से विरक्त और भौतिकवादी संसार से आसक्ति बढ़ाता चला जाता है। ऐसी आसक्ति जो मिथ्या है उस पर उसका विश्वास हो जाता है। विडंबना यही है कि मिथ्या में उसका बढ़ता विश्वास उसे ऐसी विषय-वस्तु से दृढ़ता बढ़ा देता है जो अहिंसक की जगह हिंसक बनती चली जाती हैं। वस्तुतः दृढ़ संकल्प और व्रत आत्मविकास के साधन माने गए हैं। संकल्प के साथ दृढ़ता और दृढ़ता के साथ संकल्प का होना आवश्यक है। यह कार्य एक व्रती व्यक्ति ही कर सकता है। परन्तु इसमें आंतरिक पवित्रता और उसकी सुचिता का भी अहम योगदान होता है। यदि नकारात्मकता के साथ नकारात्मक उद्देश्य के लिए कोई संकल्प लेता है तो उसका यह अर्थ नहीं होता है कि उसे शास्त्र या प्रकृति या मनुष्य जाति स्वीकार करे। इसलिए पूर्व आलेख में यह प्रतिपादन प्रस्तुत किया गया है की सकारात्मकता अहिंसा की ताकत है। यदि सकारात्मक उद्देश्य के लिए दृढ़ संकल्प हों, और उसके लिए सच्चा व्रत हो तो भौतिकता से प्रभावित मनुष्य भी अपने मार्ग वह खोजने लगता है जिससे समष्टि का भला हो सकता है।

आत्मविकास के साधन

आत्मविकास के लिए आत्म को जानना आवश्यक है। इसके लिए सच में सही मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है। अब सही मार्गदर्शक के अभाव में न व्यक्ति आत्म से परिचित हो पाता है और न ही अपना खुद का आत्मविकास कर पाता है। अमूमन आत्मविकास के लिए कुछ संकल्प और व्रत होने चाहिए अन्यथा व्यक्ति दिग्भ्रमित होता है। न ही वह खुद को जान पाता है और न ही खुद के आत्म का विस्तार कर पाता है। मेरी दृष्टि से यदि आत्मविकास करने हैं तो निम्न गुणों को आत्मसात करना चाहिए-
1. संकल्प
2. सम्यक दृष्टि व दृढ़ता
3. निर्भयता
4. आध्यात्मिकता
5. श्रद्धा, निष्ठा व विनम्रता
6. सदाचरण
7. संयम-नियम
8. दया एवं करुणा
9. त्याग व सेवा-सुश्रुषा
10. सद्भाव, समदर्शिता व न्यायप्रियता
11. अनन्य प्रेम व त्याग
12. अहिंसा
13. योग
14. सकारात्मकता
15. सोद्देश्यपूर्ण लक्ष्य
16. सफल होने के लिए सतत प्रयास
17. विजेता होने का भाव
18. सफलता पश्चात् आत्मावलोकन,
19. यथार्थवादी, मूल्यनिष्ठ किन्तु व्यवहारिक आचरण का वरण
20. सबकी गरिमा का सामान स्वागत

 आत्मविकास के ये पैमाने यदि मनुष्य आचरण में लाता है तो उस पर भौतिकता प्रभाव नगण्य होता है। मनुष्य ऐसा नहीं है कि उसका भौतिकवादी संसार से सामना होगा ही नहीं। उसका सामना होगा ही। किन्तु यदि एक आदर्श मनुष्य की कोटि में वह मनुष्य ही माना जाता है जिसपर विसंगतियों में भी काम, क्रोध, मद, लोभ, तृष्णा और आसक्ति अपना प्रभाव नहीं जमा पाते।

 एक व्यक्ति में जिन मूल्यों की प्रतिष्ठा देखी गई है वस्तुतः वे अभी भी प्रत्येक व्यक्ति से दूर हैं। यदि कुछ लोगों ने आत्मसात किया तो उनकी संख्या नगण्य है। जिन्होंने आत्मसात किया उन्हीं में से कुछेक हमारे बीच उदाहरण के तौर पर याद किये जाते हैं। वे इसलिए याद किये जाते हैं क्योंकि उनके संकल्प और व्रत सच्चे थे। उन सबने उसे निभाया। उनके मन-वचन-कर्म में एकरूपता थी। वे स्वयं के प्रति ईमानदार और निष्ठावान थे। इसलिए उनका नाम मिसाल के तौर पर हमारी स्मृतियों में आते हैं। मैं यहाँ उनका नाम लेना या नाम गिनाना मात्र औपचारिकता मानता हूँ। उन नामों पर विचार करने का अर्थ सिर्फ़ इस अर्थ में है कि हम स्वयं क्यों नहीं हो पाए उनके जैसे? उनके जैसे कैसे बन सकते हैं? दृढ़ इरादे सौर सच्चे संकल्प ही इसके एकमात्र विकल्प हैं। अपनी निजी जीवनचर्या में आत्मविकास के प्रति हमारा सकारात्मक रूचि रखना हमारे जीवन के उत्कृष्टता को प्रदर्शित करने का सूत्र है। इसलिए हम संकल्प और सच्चे व्रती बन कर कुछ नए अध्याय बन सकते हैं।

वस्तुतः ऐसा व्रत और संकल्प लेने वाला सच में भयभीत नहीं होता। उससे हिंसा नहीं होती। उसका मार्ग प्रेम के नियम और त्याग की प्रतिमूर्ति की तरह होता है। उससे लोगों को पीड़ा नहीं पहुँचती। यह एक ईश्वरीय गुण है। इस गुण का आत्मसातीकरण की प्रक्रिया बहुत कठिन है। इसलिए वह सबका प्रिय बन जाता है। इसलिए उसमें निरपेक्षता के भाव झलकते हैं। अहिंसक होना निरपेक्षता की एक बड़ी कसौटी है। दूसरी कसौटी है प्रेम का वरन और उसका त्याग के साथ आचरण में बर्ताव। इसलिए एक संकल्पित और सच्चे व्रती को सत्य का अनुगामी कहा जाता है।


गीता में संकल्प के स्रोत

हृदय की दुर्बलता संकल्प शक्ति को कमजोर करती है। गीता में अर्जुन का युद्ध से अपने आपको अलग करने की कोशिश इसका एक बड़ा प्रमाण है। वहीं एकलव्य ने हृदय में स्थापित गुरू शक्ति से धनुष विद्या की निपुणता के साथ यह दर्शाता है कि संकल्प से सिद्धि संभव है। हृदय की दुर्बलता का सीधा अर्थ है संकल्प शक्ति का अभाव। संकल्प शक्ति के क्षीण होने से नपुन्शकता का ही गुण परिलक्षित होगा। इच्छा-शक्ति का अभाव मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है। क्योंकि यह संकल्प आने ही नहीं देता। इच्छा-शक्ति के जागरण से मनुष्य में प्रत्यक्ष या परोक्ष संकल्प शक्ति जागृत हो जाती है। संकल्प बल जागृत होने से अनेक सूर्य की प्रदीप्ति एक साथ प्रकाशित होकर अंतर्मन को उद्वेलित कर देती हैं। उपनिषद में कहा गया है- उत्तिष्ठ जाग्रत। इसका अर्थ यही है की सृष्टि में रुकने के लिए कोई बिम्ब नहीं हैं। यदि हैं भी तो विचार के लिए हैं।
क्लैव्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।।2.3।।

अर्थात, हे अर्जुन! तू नपुंसकता को प्राप्त मत हो, यह तुझे शोभा नहीं देता है, हे शत्रुओं के दमनकर्ता! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्याग कर युद्ध के लिए खड़ा हो (2.3) भगवान श्रीकृष्ण इसी अध्याय में फिर एक बार कहते हैं-
 दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥2.56

भावार्थ-दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसका मन विचलित नहीं होता है, सुखों की प्राप्ति की इच्छा नहीं रखता है, जो आसक्ति, भय तथा क्रोध से मुक्त हैं, ऐसा स्थिर मन वाला मुनि कहा जाता है। (2.56)

इन संकल्पों को और ऐसे कई संकल्पों को गीता में भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा स्वयं प्रतिपादित किया गया है। मनुष्य इच्छाशक्ति के अभाव में छोटे से छोटे लक्ष्य का भेदन नहीं कर पाता जबकि बड़े से बड़े लक्ष्य को संकल्प और व्रत से वह चाहे तो हासिल कर लेता है। यह इच्छाशक्ति ही व्रत और संकल्प की एक ताकत है। और निर्भय व्यक्ति ही किसी व्रत को संकल्पबद्ध होकर पूर्ण कर पाता है। डरने वाले तो व्रत कर ही नहीं सकते। क्योंकि डर या भय से हमेशा उसे कोई न कोई आशंका घेरे रहती है जबकि निर्भय होकर व्यक्ति उसी को प्राप्त कर लेता है जो असंभव था। परन्तु इन व्रत और संकल्प में बहुत ही निष्ठा और स्वयं के प्रति ईमानदारी होनी आवश्यक है। यदि सत्य के साथ व्रत का अनुपालन होता है तो कष्ट हो सकते हैं लेकिन संकल्प सिद्ध होते हैं। यह ताकत, यह शक्ति ही अहिंसक शक्ति है। इसमें प्रेम की अहिंसक शक्ति है। प्रेम की अहिंसक शक्ति में व्यक्ति बिना किसी के आत्म को चोट पहुंचाए लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।

चित की शांति हेतु संकल्प और सच्चा व्रत  


विडंवना यह है की व्रत और संकल्प के नियम अनुपालन व्रती करते ही नहीं। यह संकल्प ढिंढोरा पीटने से नहीं सिद्ध होते। अपितु यदि सच्चे मन से, श्रद्धा से व्रत लिया गया और उसे नियम और संयम से अनुपालन किया गया तो उसका प्रभाव अवश्य होगा। व्रत के लिए सच्चे मन की और सच्ची इच्छा शक्ति की आवश्यकता होती है जो प्रायः लोग नहीं समझते। यदि सच्ची इच्छाशक्ति से सच्चे मन से, मनोयोग से व्रत किया गया तो मनोनुकूल सिद्धि अवश्य प्राप्त होती है। इसकी विराटता से अपरिचित लोग भौतिकवादी समय में अधुनातन प्रविधियों को आजमाते हैं क्योंकि भौतिकता का प्रभाव तात्कालिक ज्यादा होता है। ऐसे में, संकल्प में भी आध्यात्मिकता का होना आवश्यक है। ईश्वर के प्रति निष्ठा आवश्यक है। अपने लक्ष्य के प्रति विश्वास आवश्यक है। अपनी दृढ़ता पर विश्वास आवश्यक है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम संकल्प और सच्चे व्रत के अर्थ-गाम्भीर्य को समझें क्योंकि यह एक ऐसा विकल्प है जिसमें स्थायी शान्ति प्राप्त करने की कोशिश है। अहिंसक होना आसान नहीं। यह तो व्रत ही है। इसमें अनुराग और आत्म-उत्कर्ष के लिए ही व्यक्ति प्रयास करता है। चित के शांति के लिए और इस प्रकृति की शांति के लिए यह विकल्प है और इसी विकल्प से ही सच्चे प्रेम को प्रकट किया जा सकता है। प्रेम हिंसा से नहीं प्राप्त होते। प्रेम को प्रकट करने का माध्यम ही व्रत है। इसमें स्वयं को कष्ट देकर, स्वयं को आत्मानुशासित होकर अपने अनन्यता का प्रकटीकरण होता है। ऐसा तो प्रेम का ही एक रूप है। यह प्रेम त्याग और समर्पण के लिए अपने अभीष्ट के प्रति एक प्रतिक्रिया होती है। इससे सुन्दर मिसाल अहिंसक होने की हो ही नहीं सकती। व्यक्ति-मनुष्य इसकी शक्ति को अन्य उपक्रमों से प्राप्त करने का यदि प्रयास करते हैं तो उससे उन्हें वे लक्ष्य तो येन-केन-प्रकारेण प्राप्त हो जाते हैं लेकिन आत्म-संतोष उससे नहीं मिलता। इसलिए सच्चे व्रती और संकल्प के आग्रही को कभी भी अपनी निष्ठा पर संदेह किये बिना सतत अपने ऊपर विश्वास करते हुए अपनी इच्छा-शक्ति को प्रबल बनाए रखना चाहिए। सम्पूर्ण जगत में अपने ऊपर किया गया अविश्वास ही किसी भी असफलता का कारण बना है इसलिए यदि सहृदय किसी संकल्प व व्रत को जीवन में लेकर चलने का बीड़ा उठाया है तो उसके पूर्णता और पूर्ण सफलता के लिए भी अदम्य इच्छा-शक्ति आवश्यक है। यदि यह संकल्प और सच्चा व्रत इस पृथ्वी पर हम सबने आत्मसात किया होता तो मानवीय विकास की पराकाष्ठा आज कुछ और देखने को मिलती। हमें तो हमारी भौतिकता ने अमानवीय और अप्राकृतिक बना दिया इसलिए हिंसा के शोर में आज सभी परेशान हैं। अतिक्रमण है। अशांति है। अप्रसन्नता है। इसे हमें बचाना है और प्रकृति और आध्यात्मिक शक्ति के साथ। संभव है मनुष्य की शायद यह संकल्प और सच्चे व्रत की कोशिश नए मानवीय समाज को गढ़े। 

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।