हिन्दी लेखिकाओं के साहित्य में नारी (कहानी के संदर्भ में)

दीपिका अरोड़ा

दीपिका अरोड़ा

असिस्टेंट प्रोफेसर (मास्टर तारा सिंह मेमोरियल काॅलेज फाॅर विमेन लुधियाना)

’स्त्री को अबला कहना उसका अपमान है, यदि शक्ति का अभिप्राय पाशविक शक्ति से है, तो सचमुच पुरुष की अपेक्षा कम शक्तिशाली है, यदि शक्ति का मतलब नैतिक शक्ति से है, तो स्त्री पुरुष से कहीं अधिक शक्तिमान है।’-महात्मा गांधी

वर्तमान सामाजिक संदर्भ में, स्त्री की स्थिति अंतर्विरोध से भरी हुई है। परम्परा से तो नारी को शक्ति का रुप कहा जाता है, पर बोलचाल में उसे अबला भी कहा जाता है। आज भी हमारे समाज में और साहित्य में स्त्री के प्रति यही अंतविरोधी रवैया मौजूद है। समाज में मानव के दो रुप स्त्री और पुरुष हैं। दोनों प्रबल, दोनों महासबल। फिर उसका एक रुप अबला कैसे हो गया? वह ’शक्ति’ अबला कैसे हो गई? क्यों उस जीवन के हर मोड़ पर पुरुष का साथ चाहिए। जो वृक्ष थी बेल कैसे हो गई?

साहित्य के किसी कालखण्ड में ऐसा नहीं हुआ कि नारी का विषय अछूता रहा हो क्योंकि साहित्य समाज का दर्पण है, वह जीवन को चित्रित करता है। समय के साथ-साथ नारी की अस्मिता का सवाल साहित्य में उठाया गया है। नारी हमेशा से ही साहित्य का केन्द्र बिन्दु रही है। परन्तु फिर भी अपनी हाहाकार और मौन में स्त्री उतनी ही गुमनाम है, जैसे कोई बेनाम वस्तु। कवयित्री ’अनामिका’ स्त्री की पीड़ा को उजागर करते हुए कहती है कि
पढ़ा गया हमको जैसे पढ़ा जाता है कागज़
बच्चों की फटी कापियों का चना जोर गरम
के लिफाफा बनाने से पहले।

प्रस्तुत शोध पत्र नारी जीवन से संबंधित है, इसलिए हिन्दी साहित्य के संदर्भ में नारी स्थिति पर विचार-विमर्श पूर्व विभिन्न कालों अथवा युगों में नारी जीवन की स्थिति पर विचार करना उपयोगी होगा।

प्राचीनकाल से आधुनिक काल तक (वर्तमान) भारत में स्त्रियों की स्थिति परिवर्तनशील रही है। हिन्दू संस्कृति में नारी को मातृत्व के रुप में, पत्नी के रुप में, बेटी के रुप में, गौरव गरिमा प्राप्त थी। ’सम्पूर्ण विदेवों के वामांग में माता पार्वती जी शंकर जी के लक्ष्मी जी विष्णु भगवान के और उत्पादियत्री ब्रह्यणी जी ब्रह्य जी के पास निरन्तर रहकर संहार स्थिति और उत्पत्ति में सदा उपस्थित रहती है।’1

हिन्दु परिवारके सबसे पुराने काल वैदिक युग में स्त्रियों का स्थान गौण नहींथा। उनकी दशा अत्यन्त उच्च थी। उन्हें शिक्षा का अधिकार प्राप्त था। नारी शिक्षा प्राचीनकाल से लेकर 200 ई0पू0 तक अबाध गति से चलती रही। इसके पश्चात् समाज में स्.िियों का भी स्तर गिरता गया।

उतरवैदिक काल में स्त्रियों पर सामाजिक, धार्मिक नियन्त्रण लगा दिए गए। पति की सेवा का ही अपने जीवन का अहम कर्तव्य मानने वाली स्त्री को पतिव्रता नारी कहा गया। परम्परागत नारी का वर्णन करते हुए राधाकृष्णन ने लिखा है, ’शताब्दियों से चली आ रही परम्पराओं ने भारतीय नारी को विश्व की सर्वाधिक निःस्वार्थी, सर्वाधिक धैर्यवान नारी बना दिया है, कष्ट उठाना ही जिसका आत्मगौरव है।’2

बौद्व युग में स्त्रियाँ शिक्षित थी, वह अध्यापन का कार्य करती थीं जिस कारण उन्हें उपाध्याय कहा जाता था।
मध्यकाल में स्त्रियों की दशा फिर से दयनीय हो गई। इस काल में कन्या जन्म के अशुभ माने जाने के भी संकेत मिलते है।

आधुनिक काल और नारी की स्थिति:
आधुनिक काल में नारी को तमाम संवैधानिक अधिकार प्रदान करने उपरान्त भी नारी स्वतन्त्र नहीं है वह वहीं की वहीं खड़ी है। राजनीति, विज्ञान में नारी को ऊँचा उठाने की कोशिशें जारी है पर क्या यथार्थ में ऐसा हो रहा है। भले ही वर्तमान समय में महिला शक्ति का वर्चस्व कायम है और अनेक मेधावी महिलाएँ जैसे - सोनिया गाँधी, प्रतिभा पाटिल, मीरा कुमार, सुमित्रा-महाजन इत्यादि अपनी एक अलग पहचान बन चुकी है परन्तु विडम्बना भी यहीं है कि इतने शीर्ष पदों पर पहुँँच कर भी नारी अपनी नारी जाति को ऊँचा नहीं उठा पाई।

आज भी उसकी स्थिति राजनीति की तरह है, होता कुछ है और दिखाई कुछ ओर ही देता है। परिवार समाज, सामंती वृति और पितृसतात्मक सामाजिक संरचनाओं के चलते आज की आजाद नारी की संपूर्ण आज़ादी फिलहाल स्वप्न ही है। चाहे हो लोकतांत्रिकता या चाहे हो वैज्ञानिकता पर नारीकी बदली नहीं है दुनिया।

फिर भी नारी थकी नहीं है, पीछे हटी नहीं  है, वह जीवन के हर मोड़ पर अपनी अलग पहचान बनाती आ रही है। माँ, पत्नी, बेटी हर रुप में अपना कर्तव्य निभा रही है, उसने अपने अस्तित्व से सम्पूर्ण नारी जाति को ऊँचा उठाया है। वह अटल है, स्थिर है, अपनी जिम्मेदारियों को लेकर, वह एक हिमखण्ड से निकलती धारा है जो नदी से सिचिंत कर पृथ्वी को हरा-भरा बना रही है, वह उस उल्का पिण्ड के समान कभी दिशाविहीन नहीं हुई। उसका संघर्ष पीढ़ी दर पीढ़ी हरेक युग में जारी है, अंत में इतना ही कहना चाहूंगी कि वह एक धागे की बात रखने के लिए मोम समान अपना रोम-रोम जला रही है।

आज केे समय में नारी अपने जीवन की कुंठाओं, दुःखों का इतिहास अपनी ही जुबानी बताने को तत्पर है। अब उसे यह घोषित करना पड़ रहा है कि उसकी अनुभुतियों का इस समाज में कोई स्थान नहीं है। महादेवी वर्मा जी ने नारी की कारुणिक दयनीय स्थिति पर लिखा है कि:
विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होगा
मैं नीर भरी दुःख की बदली
महिला लेखिकाएँ और हिन्दी साहित्य

महिला लेखिकाओं द्वारा लिखित कहानियों की पहली अनुगूँज राजेन्द्र बाला घोष (बंग महिला) की ’कुम्भ में छोटी बहू’ और ’दुलाई वाली’ कहानी से सुनाई देती है। इस उपरान्त प्रेमचन्द युग में लेखिकाओं का कहानी लेखन हमारे समक्ष प्रस्तुत होता है। जिन्होनें सामाजिक संदर्भों को केन्द्र रखकर कहानी की रचना की। कृष्णा सोबती एक विख्यात लेखिका है जिन्होनें लम्बी कहानी ’मित्रों मरजानी’, ’बादलों के घेरे’ ’सिक्का बदल गया’ इत्यादि बहुमूल्य कहानियाँ लिखी। ’मित्रों’ के रुप में हिन्दी कहानियों में पहली बार ऐसे नारी पात्र की सृष्टि हुई, जिसमें देह धर्म के उफनते ज्वार के सहज स्वीकार की सम्पूर्ण साहसिकता है।’3 कहानी ’आज़ादी शम्मोजान की’ में स्त्री की आज़ादी के दो पहलू बताए गए है। एक पहलू से तो वह सालों से आज़ाद है। ’मुन्नी ने अपनी तंग कमीज में से जरा लम्बी साँस लेकर कहा, क्या कहा आज़ादी? लोगों को आज मिल रही है आजादी। आज़ादी तो हमारे पास है। हम सा आजाद कौन होगा, शम्मोजान,4 स्त्री आजाद है अपने जिस्म के साथ खिलवाड़ करने के लिए। कोई भी कभी भी आ कर मन बहला सकता है। उस पर कोई रोक-टोक नी। ’सामने वाले कमरे से मुन्नीजान निकल आई बोली, कहो बहन क्या हो रहा है, आज तो पूरा बाजार सजा है। शम्मोजान ने कहा आज आजादी का दिन है मुन्नी। दिन नही, रात कहो रात मुन्नी ऐसे चीखकर कहा मानो कही पड़ी हुई दरारों से फूटकर उसकी आवाज़ बाहर निकल आना चाहती हो।’5 दूसरे पहलू में स्त्री आज भी परिस्थितियों के आगे मजबूर है। कहने को वह आजाद स्त्री है। उषा प्रियवंदा नयी कहानी के दौर की बहुचर्चित कहानीकार है। ’वापसी’ कहानी से वह अधिक चर्चा मेें आयी थी। ’जिन्दगी और गुलाब के फूल’, ’कितना बड़ा झूठ’ में स्त्री की कुण्ठा, उपभोगवादी संस्कृति से रु-ब-रु करवाया गया है। ’कितना बड़ा झूठ’ की किरण नौकरीपेशा आधुनिक स्त्री है। उसके मन में पति, बच्चों से मिलने की इच्छा नहीं है। वह चाहती है, मैक्स का स्पर्श। दैहिक सुख।’6 इस पर टिप्पणी करते हुए मधुरिम ने कहा है - ’कहानियों का मूल स्वर आवेग के स्वीकार का स्वर है। इसलिए सेक्स और दूसरी संस्कारगत वर्जनाओं को वे बड़ी निर्ममता से तोड़ती भी दिखाई देती है और चूंकि वे अपने ढंग से जीने के आग्रह को रेखांकित करती है, कुल मिलाकर उनमें ’स्व’ की खोज और प्रतिष्ठा की कहानियाँ अधिक है।’7

दीप्ति खण्डेवाल की कहानी ’शेष-अशेष‘ की शची का पति अपने चौधरी होने के कारण अंहकार में पत्नी को प्रथम रात्रि ही उसकी औकात से परीचित कराने के प्रयास में जुट जाता है। पति की मारपीट से मातृत्व से वंचित हो जाने के कारण शची को बांझ मानकर घर से निकाल दिया जाता है।’8 इस कहानी में पति के अहम और समाज में फैली अनपढ़ता तथा औरत का मातृत्व से वंचित हो जाने पर उसका मूल्य ना समझने की पीड़ा को बड़े मार्मिक ढंग से दर्शाया गया है।

अचला नागर की एक अन्य लेखिका जो कि अपनी पहचान साहित्य में बना चुकी है। इन्होनें स्त्री की नौकरी के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करना पड़ता है, अपनी कहानी ’सिफारिश’ के माध्यम से हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है। ’सिफारिश’ की गुड्डी चार नौकरियाँ छोड़ चुकी है। किन्तु अगली नौकरी के लिए सिफारिया चाहिए। ’एक जोड़ी सुर्ख आँखें मेरी आँखों से मिलती है और फिर से एक हौल-सा मन में गड़बड़ाने लगता है और देर बाद माँ के पहनाए गए जिरह-बख्तर में आजाद होने के बाद मैं सामने झूलते हुए सफलता के उस रेश्मी परिधान को देखती हूँ।’9 ये सिर्फ केवल गुड्डी की समस्या नहीं बल्कि समाज में फैला एक पाप है। अब स्त्रियाँ घर पर शोषण सहन करने के साथ बाहर भी इस पाप से बची नहीं है। कार्यकारी स्त्री को नौकरी के लिए भी शोषण सहन करना पड़ता है।

चित्रा मुद्गल हिन्दी साहित्य में नौकरीपेशा स्त्रियों के जीवन का यथार्थ वर्णन करने वाली एक अन्य लेखिका हमारे सामने है। साथ ही इन्होंने अपनी कहानियों ’भूख’, ’लपटें’ इत्यादि में स्त्रियों वेश्याओं, धन्धा करने वाली औरतें, अस्तित्व और अस्मिता की लड़ाई लड़ती हुई स्त्रियों की मुख्य पात्र बनाया है।

मधु कांकरिया की कहानियाँ पाठक की सोच को नयी दिशा प्रदान करने वाली है। इनकी कहानियों में स्त्रियां कहीं कोमल तो कहीं अपनी अस्मिता को खोजती प्रतीत होती है। ’बीतते हुए’ में मणिदीपा और इन्द्रजीत के प्रेम के बीज बोने, नष्ट होने और पुनः अंकुरित होने के बारे में दिखाया गया है।

प्रभा खेतान भी इस विद्या की सुप्रसिद्ध लेखिका है। प्रभा खेतान की कहानी ’डाक्टर’ की पात्र विवाहिता डाक्टर से प्रेम करने लगती है। फिर सोचती है कि लोग क्या सोचेंगे। लेखिका के शब्दों में ’मैं’ क्या लगती थी डाॅक्टर साहब की। मैं क्यों ऐसे उसके साथ चली गई। प्रियतम, मिस्ट्रेस, शायद आधी पत्नी इस रिश्ते को नाम नहींदे पाऊंगी। भला प्रेमिका की भूमिका भी कोई भूमिका हुई, प्रेम तो सभी करते है।’10 स्त्री जो कुछ अपने पिता, पति, पुत्र की इच्छा से करे वहीं समाज को स्वीकार्य है। यद्यपि वह किसी विवाहिता से प्रेम करती है। सिर्फ उसे ही दोषी माना जाता है।

इन कहानीकारों के अतिरिक्त अंगूठी कहानी में लेखिका ने नारी जीवन की विषम स्थितियों द्वारा वर्तमान सामाजिक परिवेश को जटिलताओं को उजागर किया गया है। कृष्णा अग्निहोत्री की कहानी ’बिटिया’ एक मां की मार्मिक कथा है। संतान प्राप्त करने के लिए मां बनने के लिए नारी को कितने कष्ट सहन करने पड़ते है। ’बंतो’ कहानी में नमिता सिंह ने भारतीय नारी की असहाय और दयनीय स्थिति का वर्णन किया है। शराबी बाप के कारण लड़की के विवाह की चिन्ता माँ को होने के कारण उसे ऐसे ही बिना विवाह किए किसी को सौंप दिया जाता है। ’बन्तो ये बलवीरा ही अब तेरा मरद ऐ। तू उसकी बीरबानी से। जो बेटी ... आज से तेरा लिलार इसके साथ ही बंध गया।’11

इन कहानीकारों की कहानियां देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि कहानी की यी पहचान महिला लेखिकाओं की ही देन है। महिला कहानीकारों ने नारी के आत्मसंघर्ष, नारी अस्मिता, दर्द के ताप से पिघलती नारी की व्यथा का चित्रण किया है। नारी-विमर्श पर बात करे तो नारी जो कि समाज की आधारशीला है, किसी भी विचार से उसका दमन होता है। पहले नारी केवल घर की चार दीवारी तक सीमित थी पर आज की नारी उन जंजीरों से बाहर निकल रही है। आज का स्त्री लेखन परिवार के ईद-गिर्द घूमती रहने वाली स्त्री समस्याओं तक ही सीमित नहीं है। आज का नारी विमर्श अपनी समग्रता में आर्थिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श बन गया है। आज की हिन्दी लेखिकाएँ सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य को सामने रखते हुए उपभोक्तावादी एवं भौतिकवादी संस्कृति का पर्दाफाश करने में सक्षम निकली है।

संदर्भ सूची

1. द्विवेदी चक्रपाणि दत्त, ’हिन्दू संस्कृति एवं नारी’, कला प्रकाशन, 2013, पृ0 188
2. नारी की स्थिति युग के अनुरुप परिवर्तित होती रही shodhganga. inflibnet.gc.in
3. तिवारी रामचन्द्र, ’हिन्दी का गद्य साहित्य’ विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी 2015 पृ0 422
4. गुप्ता रमणिका, ’आधुनिक महिला लेखन’ नवचेतन प्रकाशन दिल्ली, 2012, पृ0 166
5. पृष्ठ 166 वही
6. समकालीन हिन्दी कहानियाँ: स्त्री जीवन vimisahitya.wordpress.com
7. तिवारी रामचन्द्र, ’हिन्दी का गद्य साहित्य’ विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी 2015 पृ0 423
8. इन्दु वरिन्द्र डाॅ0, साठोत्तरी कहानी में परिवार’ संजय प्रकाशन, नई दिल्ली।
9. समकालीन हिन्दी कहानियां: स्त्री जीवन
10. वही
11. सिंह कुवरपाल, ’कर्फ़्यू तथा अन्य कहानियाँ, शिल्पायन प्रकाशक, दिल्ली, 2011

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