जीवन का अनुषांगिक पहलू है अहिंसा

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


अहिंसा की सभ्यता जीवन के उन अनुषांगिक पहलुओं से जुड़ी हुई है जिनसे एक सभ्य मनुष्यता का जन्म होता है। अहिंसा का मार्ग व्यक्ति समाज एवं राष्ट्र के लिए आवश्यक है। पृथ्वी पर रहने वाले प्रत्येक जीव के लिए और वनस्पतियों के लिए भी वांछनीय है। किन्तु अहिंसा मार्ग का बहुत अलग है, जिसे कि अहिंसक भी अपने आचरण में लाते हुए, बहुत साधना से समझ पाते हैं। अहिंसक–तथाकथित अहिंसक, जो समझते हैं कि वे अहिंसा को समझते हैं। उनको भी पता नहीं कि अहिंसा-मार्ग का क्या अर्थ है। अहिंसा का क्या अर्थ है, वस्तुतः यह जानने की कोशिश हमारे यहाँ हुई है। परन्तु अहिंसा-मार्गी आम इंसान क्यों नहीं बन पाता इसकी अगर पड़ताल करें तो यह पायेंगे कि अहिंसक होने का दम्भ भरने वाले भी लोग नियम-संयम को ठीक से नहीं बरतते। वे उन अहिंसक जीवन शैली को नहीं अपना पाते जो एक व्यक्ति-मनुष्य के लिए आसान है।
प्रायः भ्रान्ति और असमंजस में रहने वाले अहिंसा का अर्थ अपने हिसाब से लगाते हैं। परन्तु अहिंसा का यह अर्थ नहीं है कि तुम किसी को मत मारो। क्योंकि अगर अहिंसा का यह मतलब है कि तुम किसी को मत मारो, तब तो अहिंसा का यह मतलब हुआ यह उसकी अन्य हिंसा की अज्ञानता बनी रह सकती है। इसलिए अहिंसा की विस्तीर्णता को समझने की आवश्यकता हैवह इस तरह कि हिंसा का संबंध किसी को मारने से नहीं, हिंसा का संबंध मारने की पागल अवस्था से है। हिंसा तो एक पागल अवस्था का परिणाम है। तमाम मनोवैज्ञानिकों ने हिंसा को उसके मानसिक अवसाद की वजह बताया है। आत्महत्या करने वाला व्यक्ति तो खुद को मारता है, तो क्या खुद पर की गई हिंसा, हिंसा नहीं होती? वह तो सबसे बड़ी हिंसा है। यह किसी व्यक्ति के मानसिक अवसाद की पराकाष्ठा है। ऐसा व्यक्ति अहिंसक नहीं बल्कि हिंसक की ही श्रेणी में आता है। हिटलर एक बड़ा हिंसक व्यक्ति का उदाहरण है। वह खुद के लिए भी हिंसक था और अपने समय के तमाम वजहों को जनते हुए भी हिंसक था। यह मानसिक विकृति ही तो कही जायेगी। हिंसा का इन्हीं अर्थों में विरोध किया जाता रहा है।
अहिंसा का अर्थ हम प्राय: हिंसा के विलोमार्थी शब्द के रूप में लेते हैं, जिसका आशय जीव हत्या न करना और मांसाहार से दूर रहना भी है। मांसाहार प्राणी-हत्या के बगैर संभव नहीं है। इसीलिए दोनों ही हिंसा की श्रेणी में आते हैं। तो अहिंसा को क्या यूँ सीमित दायरे में बांधा जा सकता है? इसीलिए अहिंसा का क्षेत्र व्यापक अद्भुत है और जिसका संक्षेप में अर्थ है-समस्त हिंसक वृत्तियों का त्याग, अहिंसा की कोटि में आएगा। इसलिए कैसी हैं ये हिंसक वृत्तियां, इन्हें भी जानना-समझना अनिवार्य है। दूसरों को सताना, दुःख  पहुँचाना निश्चित रूप से हिंसा है। किन्तु क्या स्वयं को सताना हिंसा नहीं है, जिसमें हम आत्महत्या जैसे दुराग्रह भी शामिल है। सामान्य सामाजिक अध्ययन तीन तरह के व्यक्तियों को रेखांकित किये। परपीड़क, यानी ऐसे लोग जो दूसरों को पीड़ा देकर सुख का अनुभव करते हैं। स्वपीड़क, यानी आत्मपीड़ा देने वाला, ऐसे लोग दूसरों को न सताकर स्वयं को दुःख देकर सुख का अनुभव किया करते हैं। जैन धर्म में इसका बड़ा उदाहरण मिलता है। अत्यधिक व्रत उपवास आदि से लेकर आत्महत्या तक करने से ऐसे लोग नहीं चूकते। जो इन दोनों वृत्तियों का अतिक्रमण कर चुका वह किस कोटि में आएगा इसे आप भली प्रकार समझ सकते हैं। कड़वे वचनों द्वारा हिंसा एक खतरनाक हिंसा है। इसीलिए अहिंसा जैसी अवधारणा के जानकार इसकी बहुत सूक्ष्मता से परीक्षण और विमर्श करते हैं। ऐसा प्रायः होता है कि हम अहिंसा समझते हुए भी हिंसा होने से रोक नहीं पाते। कई जगह तो भ्रम की भी स्थिति होती है। गीता पढ़ते हुए ऐसे बहुत से सवाल हमारे मन में आते हैं परन्तु जो हम समझते हैं क्या वही सत्य है या जो सत्य है उसकी समझ हि हमारी समझ का हिस्सा नहीं बन पाती। गीता का ही यह श्लोक देखें-
अहिंसासत्यमक्रोधः त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दयाभूतॆष्वलोलुप्त्वंस् मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥16/2

दैवी सम्पद के पुरुषोचित कर्म गीता में अहिंसक जीवन के उदाहरण बने।  
अहिंसा समता तुष्टिः तपो दानं यशॊयशः।
भवन्ति भावा भूतानां मत्तएव पृथग्विधाः ॥10/5

गीता में आत्मा का उत्कर्ष ही अहिंसा कहा गया। आत्मा का हनन ही हिंसा रही है।
देवद्विजगुरुप्राज्ञ पूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्फ़्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥17/14

इस प्रकार हम गीता का भी हिंसा और अहिंसा के सदर्भ में उसकी समीक्षा कर सकते हैं। अहिंसा का मार्ग क्या है और हिंसा का मूल क्या है, गीता में इसके विशेष आग्रह और उसके प्रति संशय, सब का हम पूर्ण साक्षात्कार कर सकते हैं। अहिंसा का अर्थ केवल मानव के प्रति ही अहिंसा का भाव नहीं, अपितु संपूर्ण प्राणी जगत के प्रति मैत्री, करुणा, दया, क्षमा और अहिंसा का भाव रखना है। छोटे से छोटे जीव को भी कष्ट न हो, यह आत्मीय-भाव ही अहिंसा का अनुपम रूप है। इसी को महर्षि व्यास ने 'आत्मवत् सर्वभूतेषु' कहा। मनुष्य प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है, परंतु उसके अहंकार ने, उसकी महत्वकांक्षी जीवनचर्या ने उसे उस आत्मीय अहिंसा को वह स्वरूप नहीं पाने दिया। अहिंसा मानसिक पवित्रता है। दार्शनिक परिभाषा में चित्त का स्थिर और विकार मुक्त होना अहिंसा है। जीव का अपने साम्यभाव में रहना अहिंसा है। उसका क्रोध, मान-अपमान, मोह-माया, लोभ से रहित पवित्र सद्-विचार और सद्-संकल्प अहिंसा है। उसके व्यापक क्षेत्र में सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह आदि सभी सदगुण समादृत हैं, इसलिए अहिंसा को परम धर्म कहा गया है। जैन परम्परा हमें बताती है कि हिंसा के वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए— हिंस्य, हिंसक, हिंसा एवं हिंसा का फल इन चार बातों का जानना अत्यावश्यक है। दु:ख भोगना भी हिंसा है। परन्तु मारना और मरना हिंसा की श्रेणी में आता है। इसलिए हिंसा का स्वर बहुत ही हिंसक है और उसके स्वरूप तो अब आतंकवाद और उग्रवाद का रूप ले रहे हैं।  
  व्यक्ति को इस मामूली किन्तु महत्त्वपूर्ण बारीकियों को समझने की आवश्यकता है। अहिंसा मार्गी बनने के लिए इसी कारण अच्छे संसर्ग की आवश्यकता होती है। अच्छे वातावरण की जो प्राणियों के समस्त गरिमा को समझते हों। अच्छे और बुरे को समझते हों। कभी-कभी हमारे कड़वे वचन शारीरिक हिंसा से ज्यादा हिंसक होकर चोट पहुंचाते हैं कि जीवन भर नहीं भूलते। महाभारत के कुछ प्रसंगों को याद करें। द्रौपदी का दुर्योधन को अंधे का पुत्र अंधा कहना ही महाभारत का कारण बन गया। या उसके बाद भरी सभा में दुर्योधन द्वारा द्रोपदी का चीर हरण करवाना और उसी क्षण द्रोपदी द्वारा प्रतिज्ञा लिया जाना ही महाभारत का कारण बना। ये हिंसा को जन्म लेने के आवश्यक सूत्र हैं। ऐसे कई प्रसंग हमारे पास राज घरानों से लेकर लोक और गुरु-परम्परा में थे जिसकी जड़ें हिंसा की भूमि में दबी हमें मिलती हैं। इन सूत्रों की पड़ताल और उसके बरक्स उसी अनुपात में हिंसा न होने देने की कसौटी पर खुद इंसान को तोलना ही तो अहिंसा के प्रति आग्रह हो सकता है। स्वामी महावीर कहते थे कि मन में किया गया किसी के प्रति बुरा विचार भी हिंसा है। नकारात्मक विचारधारा भी हिंसा की जननी है। इसीलिए हम पहले विचार करते हैं। ऐसा विचार जो नियम और संयम से बाहर आता हो। चूंकि विचार ही मनुष्य के लिए दर्पण होते हैं अतः हम एक स्वस्थ जीवन की तरफ तभी बढ़ सकते हैं, जब हमारा मन शुद्ध, मन में शुचिता हो कि किसी के प्रति हमारे मन में बुरा विचार न उठे। इसे ही तो सच्ची अहिंसा कहते हैं।


अहिंसा की सभ्यता समझना कठिन हो सकती है लेकिन अहिंसा को यदि धीरे-धीरे हम समझना चाहेंगे तो कोई ऐसी भी बात नहीं की अहिंसा हमारे समझ से बाहर हो और आचरण से दूर हो। इसलिए अहिंसक होने की पहली शर्त है अपने ऊपर विश्वास और किसी भी दशा में अहिंसा को अपने जीवन का हिस्सा बनने देना। अधिकांश आबादी यदि हिंसा से प्रभावित है तो इसका एक मात्र कारण है कि हम या तो हिंसा को अपने आचरण का हिस्सा बना रखे हैं या तो हमारी सोच और विचार ही हिंसक सभ्यता के बस में होता गया। हम किसी भी कार्य को बिना सोचे करेंगे। किसी लोभ-मोह के बस में होकर करेंगे तो वह हिंसक होने की जगह अहिंसक नहीं होगा इसलिए उन शर्तों को समझना आवश्यक है जिससे हम अधिकतम अहिंसक हो सकते हैं।

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