साम्य और वैषम्य के सन्दर्भ में भारत तथा यूरोप

 “East is East and West is West”1                                                                           - किपलिंग

          “हमें पश्चिमी सभ्यता को इतिहास के संदर्भ में देखना चाहिए, क्योंकि इतिहास ने उसे पाला-पोसा है। इसके विपरीत भारतीय संस्कृति के संदर्भ में हमें इतिहास को देखना चाहिए क्योंकि उसने इतिहास को अस्वीकृत करके अपना अस्तित्व बनाया है|”2
                                                                                                                 - निर्मल वर्मा

          प्रत्येक सभ्यता और संस्कृति की अपनी एक ख़ास पहचान होती है और यही ख़ास पहचान ही उसे अन्य सभ्यताओं से समानता और विपरितता को बताती है।भारत और यूरोप सभ्यता और संस्कृति को दो अलग जमीन हैं जो कुछ जगहों पर साझेदारी करते हुए भी अनेक स्थानों पर प्रतिध्रुव का निर्माण करते हैं। दोनों के साहचर्य और विपयर्य को देखने से पहले संक्षिप्त रूप में दोनों संस्कृतियों के आधार पक्ष को निगाह डालना उचित होगा।
(1)     भारतीय संस्कृति के आधार पक्ष -
(क)     सत्य, ऋत, सनातन धर्म।
(ख)    अनन्तता, वैविध्य, विविध धर्म।
(ग)     अनन्त पथ, अनन्त यज्ञ, अनन्त लीला या माया।
(घ)     त्रिविध श्रद्धा (सात्विक, राजसिक, तामसिक)।
(ङ)     विवेक, तर्कणा, आप्तवचन।
(च)     कर्मफल, कर्त्तव्य कर्म, स्वधर्म।
(छ)    अधिभूत, अधिदैव, अध्यात्म-वस्तु सत्त के तीन पक्ष।
(2)     यूरोपीय चित्त परंपरा के मुख्य आधार-
(क)     सत्य-दूत (चिन्तक, मैसेंजर प्रभुपुत्र-विशेश आदि) जिसके माध्यम से ही द ट्रुथ, द गुड, द ब्यूटी का सही समझ संभव है।
(ख)    मैटर यानी यह सब विश्व ।
(ग)     स्पिरिचुअलिटी, जो सत्य-दूत की शरण में जाने पर ही प्राप्त होना संभव है।
(घ)     फेथ, जो स्पिरिचुअलिटी का सच्चा लक्षण है।
(ङ)     लाजिक और रेशनेलिटी।
(च)     फेट या डेस्टिनी।
(छ)    मेटाफिज़िक्स, जो इन सबका नियामक है।3

          उपरोक्त आधारभूत विशेषताओं पर ही दोनों सभ्यताएँ टिकी हैं। यूरोपीय सभ्यता में ग्रीक काल बेहद महत्त्वपूर्ण रहा है। भारतीय संस्कृति से समानता ग्रीक काल में ज़्यादा देखने को मिलती है।

          भारतीय दार्शनिक की भाँति यूनानी दार्शनिक मानते थे कि विश्व की तमाम वस्तुएँ अग्नि, जल, पृथ्वी और वायु से बनी हैं।4 प्रो. ई.आर. डॉड्स ने `ह्यूमैनिज़्म एंड टेकनीक इन ग्रीक स्टडीज़’ (1936) में लिखा है कि “यूनानी संस्कृति जिस पृष्ठभूमि में उद्भूत हुई, वह पौर्वात्य ही थी और यदि कुछ पुराने विद्वानों को अपवाद रूप में मान लें तो यूनानी संस्कृति पौर्वात्य पृष्ठभूमि से कभी भी पूरी तरह अलग नहीं रही।’’5 यूनानी संस्कृति की महत्त्वपूर्ण विशेषता थी ‘समग्रग्राहिणी दृष्टि’ जिसके सहारे वे इतिहास की चक्राकार व्याख्या स्वीकार करते थे। समस्त इतिहास में सतत् परिवर्धनशील उन्नति और क्रमिक विकास देखने वाला दृष्टिकोण उन लोगों का नहीं था। यूनानी दर्शन की मान्यता थी कि एक ऐतिहासिक चक्र की समाप्ति पर दूसरे चक्र का उदय होता है। यूनानी दर्शन के बारें में प्रचलित धारणा है की उसका जुड़ाव मानव-जीवन की मूल्य-चेतना से न होकर मानसिक व्यायाम से ज्यादा था। “यूनानी दर्शन की विचार-शैली अपने में स्वायत्त थी, वह मनुष्य के लौकिक जीवन को निर्देशित करने का दावा नहीं करती थी..... इसके विपरीत भारतीय परंपरा में सांख्य, बौद्ध और वेदान्त दर्शनों में जिज्ञासा का ध्येय केवल शास्त्र-रचना नहीं, परम पुरूषार्थ की प्राप्ति है।’’6 यूनानी समाज में जातिप्रथा के भी चिह्न मिलते हैं। रामविलास शर्मा ने रिपब्लिक (गणतन्त्र) के विषय में लिखते हैं कि, “यह एक ऐसी पुस्तक है जिसमें आदर्श समाज-व्यवस्था कायम करने के लिए जातिप्रथा को आधार बताया गया”7 आगे वे दोनों संस्कृतियों में इस समानता को भी रेखांकित करते हैं कि, “भारत में अभिजात जन अपने कुल का संबंध जैसे किसी देवता या पुराण कथाओं के वीर पुरुष से जोड़ते हैं, वैसे ही यूनान के अभिजात जन भी अपने वंश का संबंध किसी महापुरुष से जोड़ लेते थे।’’8

          यूनानियों के प्रथम शिष्य रोमवासी थे। यूनानी दार्शनिकों द्वारा जहाँ स्वतंत्र विचार-क्षमता को प्रोत्साहन दिया गया तो वहीं रोमवासियों द्वारा काम करने का संकल्प पैदा किया गया। लेकिन सचाई यह भी है कि यूनानी दार्शनिकों की ख़ूबी ‘समग्रतावादी दृष्टिकोण’ पीछे खण्डित होती चली गई और आधुनिक काल तक आते-आते स्पष्ट खाँचा दिखाई देने लगा। “यह सही है कि ये मनीषी और लेखक (आधुनिक यूरोप के बुद्धिजीवी) यूनान और रोमन राज्यों के ‘नागरिक’ थे, किन्तु यह उनके व्यक्तित्व का नगण्य पक्ष था। महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि वे अपने चिन्तन और सृजनपूर्ण में एक ऐसे व्यापक सभ्यताबोध का प्रतिपादन करते थे, जो उन्हें अपनी अखंडित विश्व -दृष्टि के भाषा-संकेतों, प्रतीकों और मिथक-बिम्बों से प्राप्त हुई थी। जिस क्षण यूरोप में सभ्यता-बोध की यह समग्रता खंडित हुई, उस क्षण मनुष्य के भीतर की अर्थव्यवस्था भी छिन्न-भिन्न हो गई, गोएटे शायद यूरोप के अंतिम मनीषी थे जिन्होंने अपने भीतर मनुष्य के सम्पूर्णता बोध को बचाना चाहा, किन्तु वह प्रथम साक्षी भी थे, जिन्होंने यूरोपीय सभ्यता को अपनी आँखों से विश्रृखलित होते भी देखा था। ... मनुष्य को भी एक आर्थिक प्राणी, एक धार्मिक प्राणी, एक राजनीतिक प्राणी जैसे अलग-अलग कटघरों में विभाजित कर दिया।’’9

          दरअसल पश्चिम में संस्कृति (कल्चर) की अवधारणा ही भारत से भिन्न है। पश्चिम में संस्कृति प्रकृति के समानान्तर चलने वाली व्यवस्था है जो अपने आप में स्वायत्त है जिसका प्रकृति पर नियंत्रण भी है। जबकि भारत में प्रकृति और संस्कृति का एक अन्तरसंबंध है। निर्मल वर्मा लिखते हैं, “यूरोपीय परंपरा में संस्कृति मनुष्य को प्रकृति से स्वतंत्र बनाती है ताकि वह अपने कर्तृव्य में प्रकृति की ही तरह शाश्वत हो सके। गैर-यूरोपीय परम्पराओं में, विशेषकर भारतीय परंपरा में प्रकृति स्वयं मनुष्य के कर्तृव्य में दाखिल होकर उसे दैनिक शक्ति प्रदान करती है। एक में मनुष्य स्वयं अपनी सृजनात्मक शक्ति का स्त्रोत है, दूसरे में ‘मनुष्य’ केवल एक माध्यम है, जिसका अवलम्बन लेकर एक गैर-मानवीय शक्ति अपने को विभिन्न कलाओं में सृजित करती है।”10 यानी यूरोप में मनुष्य ही संस्कृति का आत्मसजगकर्ता  है जबकि भारत में इस प्रकार के कर्ता की अवधारणा ही नहीं है। कर्ता की जगह कर्म की प्रधानता है जो प्रकृति या ईश्वर सापेक्ष है। इसीलिए आनंद कुमार स्वामी कहते हैं, “यदि हम कलाकार से पूछें कि उसने अपने चित्र किसके लिए बनाये हैं, यदि वह सच्चे अर्थ में कलाकार है, तो उसका निर्भीक, एकटूक उत्तर होना चाहिए-ईश्वर  के लिए।”11

          संस्कृति की यूरोपीय अवधारणा उसी के द्विक पद्धति परंपरा की मुखर अभिव्यक्ति है जहाँ ‘या तो वह या तो यह’ के रूप में चीज़ों को परखा एवं समझा जाता है लेकिन भारतीय परंपरा इससे परे जाकर सहअस्तित्वकी बात करती है जिसे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने विरूद्धों का सामंजस्यकहा है। कुबेरनाथ राय इसको स्पष्ट करते हुए लिखते हैं, “ऊपर से परस्पर विरोधी दिखाई जाने वाले तत्त्व परस्पर सहयोगी रूप में रचनात्मक सन्तुलन (Creative Balance) में बैठाए गये हैं। आधुनिक बुद्धिवाद पश्चिमी मानसिकता की ऊष्मज वृत्ति से पैदा हुआ है और इस सहयोगिकता और सामंजस्य के मर्म को लब्ध नहीं कर पाता।’’12 द्विक पद्धति में भी एक तत्त्व के संधान करने वाली भारतीय ख़ासियत की तरफ इशारा करते हुए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, “अद्वैत द्वैत का विरोधी नहीं। यह धर्म के तीन डगों में से अंतिम डग है। प्रथम डग या पग-निक्षेप है मात्र द्वैत। द्वैत-भाव की सही उपलब्धि कर लेने के बाद मनुष्य आंशिक अद्वैत (द्वैताद्वैत) की स्थिति में आ जाता है। तीसरे पग-निक्षेप में वह विश्व  के साथ एकाकार-अनुभव में चला जाता है और यह अद्वैत का तीसरा और चरम पग-निक्षेप। ये तीनों एक दूसरे को काटते नहीं, बल्कि पूर्णतर बनाते हैं।’’13 अर्थात् द्वन्द्व, आगे चलकर युग्म में तब्दील होकर सम्पूर्णता की ओर अग्रसर होता है।

          ज्ञान के स्वरूप को भी लेकर भारत और यूरोप में अंतर मिलता है। डॉ. गोविन्द चन्द्र पांडे दोनों परम्पराओं के ‘ज्ञानके अर्थ को जाहिर करते हुए लिखते हैं, “भारतीय परम्परा में ज्ञानी का मुख्य अर्थ आत्म-ज्ञानी रहा है और उसकी मानस प्रतिमा रही है, अन्तर्दृष्टि-सम्पन्न योगी की, जिसका मूर्त रूप मोहनजोदड़ों की योगी-प्रतिमा को लेकर सारनाथ की बुद्ध-प्रतिमा तक देखा जा सकती है। ....यद्यपि आत्मज्ञान का संकेत सभी परम्पराओं में मिलता है, उसका इतना महत्त्व-स्वीकार कि सामान्य जनता ज्ञान का मुख्य अर्थ आत्मज्ञान समझे, न कि व्यावहारिक ज्ञान, यह भारतीय परंपरा की एक विलक्षणता है। डेल्फ़ी के मंदिर पर लिखा हुआ था कि, ‘अपने को जानो’ और सुकरात में आत्मज्ञान का आदर्श भी चरितार्थ था, किन्तु प्लेटो और अरस्तू की प्रसिद्ध यूनानी परम्परा में ज्ञान का अर्थ ठहरा मनुष्य के सामाजिक स्वरूप का तार्किक ज्ञान। बुद्धिगम्य अतीन्द्रिय तत्त्व का ज्ञान आदर्श रूप में स्वीकृत होते हुए भी उसकी सहेतुकता के अभ्युपगम से उसका फलितार्थ शुद्ध गणित विद्या में या द्वन्द्वात्मक तर्क में ही माना गया। यूनानी फ़िलोसोफ़िया और थिरोरिया का यूनानी रहस्य परम्परा से सार्थक सम्बन्ध नहीं बना, सम्बन्ध बना विज्ञान और राजनीति से। ज्ञान की बौद्धिकता के समर्थन ने पश्चिम में ज्ञान को अन्ततः सम्बन्ध ज्ञान के रूप में अवधारित किया। ..... पश्चिमी परम्परा के प्राचीन एवं मध्यकालीन, दोनों ही युगों में ज्ञान की कल्पना विषय-प्रधान थी, आत्म-प्रधान या आत्म-रूप नहीं।’’14 यहाँ यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि भारतीय परंपरा में आत्म-रूप पर प्रमुखता से बल देना, ‘बाह्य-जगतसे सम्बन्ध-विच्छेद कर लेना नहीं है। दरअसल भारतीय परंपरा चेतना और भौतिक तत्त्व की संगति की बात करती है। अप्प दीपो भवका नाद देने वाले महात्मा बुद्ध भी जब कहते हैं कि,
          को नु हासो किमानंदो निच्चं पज्जलिते सति।
          अंधकारेन ओनद्धा पदीपं न गवेसथ।।15
(यह हंसना कैसा? यह कैसा आनंद? जब सदैव ही हर ओर आग लगी है। संसार उसमें जल रहा है, तब अंधकार में घिरे तुम प्रकाश को क्यों नहीं खोजते?)

          तब वे भौतिक जगत में फैली विषमताओं की आग के ही अंधकार की ओर इशारा करते हैं और समाधान के रूप  में ख़ुद को खोजने पर बल देते हैं। जबकि पश्चिमी मानस चेतना और भौतिक तत्त्व या आध्यात्मिक और भौतिक के बीच कोई संगति नहीं देख पाता। पश्चिमी मानस की इस प्रकार की सोच के पीछे सम्भवतः ईसाई धर्म की वह धारणा है जिसके अनुसार परमसत्ता बाकी सब कुछ से अलग है। इस धारणा में भी भारतीय मानस अलग है। भारतीय परंपरा मानती है कि अंशी-अंशसंबंध के कारण सृष्टि की प्रत्येक वस्तु में ‘दैवीयता’ है जिसे निर्मल वर्मा अपने निबन्धों में पुरजोर ढंग से उठाते हैं। जबकि ईसाई धर्म इस सृष्टि को पवित्र नहीं मानता। आॅगस्टीनकी दृष्टि में इस संसार का निर्माता ‘कैन’ (हत्यारा) और उसका सरदार ‘डेविल’ (शैतान) है।’’16 जयशंकर प्रसाद अपने प्रसिद्ध निबंध ‘काव्य और कलामें इस अंतर को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि, “भारतीय उपनिषदों का प्राचीन ब्रह्मवाद इस मूर्त विश्व को ब्रह्म से अलग निष्कृट स्थिति में नहीं मानता। वह विश्व  को ब्रह्म का स्वरूप बताता है। ...कला के ईसाई आलोचक हेवेल ने संभवतः इसीलिए कहा है कि-  The Hindu draws no distinction between what is sacred and profane पूर्व, भारत से पश्चिम का यह मौलिक भेद है। यही कारण है कि पश्चिम स्वर्गीय साम्राज्य की घोषणा करते हुए भी अधिकतर भौतिक या Materialistic बना हुआ है और भारत मूर्तिपूजा और पंच-महायज्ञों के क्रिया-कांड में भी आध्यात्म-भाव से अनुप्राणित है।’’17 जाहिर है कि पश्चिम इस संसार को कुलषित और निम्न कोटि का मानता है जबकि पवित्र ईश्वर का स्वर्ग इससे परे और उच्चकोटि का है।

          दार्शनिक यशदेव शल्य ने एक दूसरे भेद जगत् और मनुष्य के संबंध-को लेकर लिखते हैं, “पाश्चात्य संस्कृति में सामान्य रूप से जगत को मनुष्य के लिए प्रतिरोधक और शत्रुरुप देखा गया है और इसी कारण मनुष्य की प्रकृति पर विजय तथा अस्तित्व के लिए संघर्ष ये उस संस्कृति के लिए मूल्य हैं; दूसरी ओर भारत में जगत और मनुष्य को लेकर दो प्रकार की विचारधाराएँ हैं; ‘विरोधमूलक और सामरस्यमूलक। यह दिखाते हुए, कि जैन और बौद्ध दर्शन में यह प्रकृति-विरोध  अपना ही अहंकार है जो अवाच्छनीय और निवारणीय है”,शल्य जी इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि भारतीय विचारधारा मुख्यतः सामरस्यमूलक ही है। हाँलाकि दोनों के यहाँ ईश्वरअगोचर है। एक के लिए ईश्वर उससे दूर है इसलिए अगोचर है एवं दूसरे के लिए ईश्वर उससे अंदर मौजूद है इसलिए अगोचर है। इसी कारण, ईसाई धर्म के अनुसार ईश्वरीय बोध प्राप्त करने के लिए बेहद जरूरी है पैगम्बर के वचनों में पूर्णतया विश्वास रखना जबकि भारतीय धार्मिक परम्पराएँ खुद में ही ईश्वरीयबोध को तलाशने की बात करती हैं जो निरन्तर शोधनात्मक प्रवृत्ति पर टिकी है।

          सौन्दर्यबोध और नैतिकता को लेकर भी दोनों के यहाँ अंतर है। पश्चिमी संस्कृति में यह धारणा है कि जो खूबसूरत’ (ख़ासकर गोरे रंग जो स्वयं के सांस्कृतिक रूप से निर्मित विचार हैं) है वह ‘अच्छाहै और ‘सच्चाभी। आधुनिक समय में इसी विचार को पकड़कर बड़े-बड़े सौन्दर्य-प्रतियोगिताएँ करायीं जाती है जिसे ‘ब्यूटी विथ ब्रेनकहकर सराहा जाता है। इसी तरह जो ‘बदसूरतहै वह ‘बुराऔर ‘गलतभी (और शायद राजनीतिक रूप से विध्वंसकारी भी)। राजीव मल्होत्रा के दर्शाया है कि “किस तरह ‘काले सौन्दर्यशास्त्रको प्रायः बुराई और तर्कहीनता से जोड़ कर रखा गया तथा कैसे इस सोच ने गोरे के मन में यह धारणा पुष्ट की कि ‘गोरेलोग ही अच्छाई और सच्चाई के रक्षक हैं।’’18 पश्चिमी सौन्दर्यबोध के विपरीत भारतीय दृष्टिकोण ‘सत्यमें ही सुन्दरता है अच्छाई देखती है। संस्कृत के पद ‘सत्यं-शिवम्-सुन्दरम्इसी बात की तस्दीक करते हैं इसीलिए ‘सत्यपहले प्रयोग में है उसी से शिवम (अच्छाई) और सुन्दरम (सौन्दर्य) जुड़कर श्रेष्ठ हैं लेकिन वे भिन्न भी हो सकते हैं और अपेक्षाकृत स्वतंत्र रूप से कार्य भी कर सकते हैं।“सत्य की उपस्थिति के लिए न तो सौन्दर्य और न ही अच्छाई की उपस्थिति अनिवार्य है और न ही सौन्दर्य की कमी असत्य अथवा चरित्रहीनता की ओर संकेत करती है।’’19 नैतिकता को लेकर दोनों दृष्टिकोणों में अन्तर दिखाई देता है। भारतीय दृष्टिकोण में नैतिकता जहाँ ‘सन्दर्भयुक्तहै वहीं पश्चिम में ‘सन्दर्भमुक्त। ए.के. रामानुजम अपने निबंध ‘क्या चिंतन का कोई भारतीय तरीका है?’में दोनों संस्कृतियों के नैतिकता संबंधी दृष्टिकोण के विषय में लिखते हैं, “मुझे ऐसा लगता है कि संस्कृतियां में कुल मिलाकर कुछ ख़ास तरह की प्रवृत्तियाँ होती हैं (इसके पीछे कुछ ख़ास तरह के पेचीदा कारण हो सकते हैं)। इनमें आदर्शीकृत करने की प्रवृत्ति होती है। ये या तो संदर्भ-मुक्त या संदर्भ-संवेद्य नियमों के आधार पर ही सोचते हैं। यह सच है कि ये जिन नियमों के बारे में सोचते हैं, वे उनके व्यवहार का मार्गदर्शन करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, लेकिन फिर भी वास्तविक व्यवहार ज़्यादा पेचीदा हो सकता है। भारत जैसी संस्कृतियों में संदर्भ-संवेद्य नियमों को वरीयता देने लायक़ सूत्रीकरण माना जाता है। ... सभी समाजों में संदर्भ-संवेद्य व्यवहार और नियम होते हैं। लेकिन यह मुमकिन है कि वहाँ प्रभुत्वशाली आदर्श यह न हो कि ‘संदर्भ-संवेद्यव्यवहार और नियम अपनाया जाये। इसकी बजाय वहाँ ‘संदर्भ-मुक्तहोने पर ज़ोर दिया जा सकता है। प्रोटेस्टेंट क्रिश्चियैनिटी सार्वभौमिक और अनूठे-दोनों की ही कल्पना मिलती है। यह इस बात पर ज़ोर देती है कि हर सदस्य समूह के दूसरे सदस्यों के बराबर है और उन्हीं की तरह है। किसी व्यक्ति का जन्म-स्थान, वर्ग, लिंग, उम्र, हैसियत और ओहदा आदि चाहे जो भी हो - एक इंसान सबसे पहले एक इंसान होता है। तकनीक की अपनी एक ख़ास संरचना होती है और इसके कई भागों में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता है। इसी तरह, पुनर्जागरण के बाद सार्विक नियमों (और तथ्यों) ने एक ऐसी स्थिति हासिल करने की कोशिश की, जिसमें इन्हें हर तरह के संदर्भों में लागू किया जा सके। इन दोनों (अर्थात् तकनीक और पुनर्जागरण के बाद के सार्विक नियमों) ने मिलकर ‘संदर्भ-मुक्तहोने के प्रति झुकाव और पूर्वाग्रह को बढ़ावा दिया।’’20 स्पष्ट है नैतिकता की पश्चिमी अवधारणा जो कि सन्दर्भों से मुक्त है, एक उचित कार्य की कसौटी के रूप में परिस्थितियों की परवाह किये बिना सभी कालखण्डों एवं स्थानों पर लागू किया जा सकता है जो उसके सार्वभौमिकता के दावे और पुख़्ता करता है जबकि भारतीय अवधारणा ‘संदर्भ-संवेदीहोने के कारण आचरण में जड़ एवं निरंकुश आदर्शों के दावे को नकारती है। विजयदेव नारायण साही ने भी अपनी पुस्तक ‘छठवाँ दशकमें एक जगह नैतिकता और शक्ति के संबंध को लेकर गाँधी और ट्राट्स्की के हवाले से इसको रेखांकित करते हैं कि जहाँ भारत में नैतिकता में शक्ति का विलयन मिलता है वहीं पश्चिम में शक्ति में नैतिकता का विलयन मिलता है।

          पश्चिमी चिन्तन की एक और ख़ूबी है, वह है ‘कन्सेप्ट’ (अवधारणा) जो सृष्टि-जगत को विचारों के बाहुपाश में जकड़ती है जबकि भारतीय चिन्तन का मानना है कि हर चीज़ को अवधारणा में नहीं बाँध सकते। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी अपने निबंध ‘भारतीय संस्कृति की देनमें लिखते हैं, “संसार के सभी महान् तत्त्व इसी प्रकार मानव-चित्त में  अस्पष्ट रूप से आभासित होते हैं। उनका आभासित होना ही उनकी सत्ता का प्रमाण है। मनुष्य की श्रेष्ठतर मान्यताएँ केवल अनुभूत होकर ही अपनी महिमा सूचित करती हैं उनको स्पष्ट और सुव्यवस्थित परिभाषा में बाँधना सब समय सम्भव नहीं होता।’’21

          मनुष्य तथा मनुष्येतर सत्ताओं के संबंध दूसरे शब्दों में कहे तो ‘आत्म्और ‘अन्यके संबंध को लेकर दोनों परम्पराओं में अंतर मिलता है। “मनुष्य के आत्मबोध में ‘अन्यअनिवार्य रूप से समाहित है ..... इसके अभाव में मनुष्य का ‘मैंअपने में एक आत्म-छलना है, मनुष्य के बारे में यह अन्तर्दृष्टि भारतीय परंपरा की एक अनुपम देन रही है।’’22 जबकि “यूरोपीय बुद्धिजीवियों और चिन्तकों के लिए स्वयं को समझना दूसरे को समझने से अविच्छन्न रूप से जुड़ा है।’’23 जहाँ भारत अपने आत्म में अन्य के अस्तित्व को स्वीकार करता है जिसके मूल में वेदान्त है वहीं यूरोप कभी अन्य को आत्मा का अंश नहीं स्वीकार सका, यद्यपि यहूदी-इसाई पंथ कहता है कि अपने पड़ोसी से उतना प्रेम करो जितना तुम स्वयं से करते हो अर्थात् वह पड़ोसी ‘अन्यहै और उसकी ‘अन्यतामें ही समझो, आत्म के अंश के रूप में नहीं जबकि भारतीय परंपरा इस सिद्धांत को एक कदम और आगे ले जाते हुए बताती है कि तुम्हारे सामने कोई दूसरा है ही नहीं, क्योंकि प्रत्यक्ष रूप से जो ‘अन्यदिख रहा है वह तुम्हारा ही प्रतिरूप है, तुम्हारे ही आत्म का विस्तार है। सामाजिक गठन के मूल में भी दोनों जगहों में अंतर मिलता है। रवीन्द्रनाथ टैगोर लिखते हैं कि “हमारी सभ्यता के मूल में समाज है और यूरोपीय सभ्यता के मूल में राष्ट्रनीति है।”24 टैगोर इस राष्ट्रनीति (नेशन) को भारतीय समाज के स्वभाव के अनुकूल नहीं पाते हैं इसी कारण वे लिखते हैं, “हमारा इतिहास, हमारा धर्म, हमारा समाज, हमारा घर-कुछ भी नेशन-गठन की प्रधानता को स्वीकार नहीं करता। यूरोप में ‘स्वाधीनताको जो स्थान दिया जाता है, हम लोग ‘मुक्तिको वही स्थान देते हैं। आत्मा की स्वाधीनता के अतिरिक्त अन्य प्रकार की स्वाधीनता के माहात्म्य को हम लोग नहीं मानते। ...... सामाजिक महत्त्व से भी मनुष्य माहात्म्य प्राप्त कर सकता है, राष्ट्रनीतिक-महत्त्व से भी कर सकता है। परन्तु हम यदि यह सोचें कि यूरोपीय ढंग पर ‘नेशनको गढ़ बैठना ही सभ्यता की एकमात्र प्रकृति एवं मनुष्यत्व का एकमात्र लक्ष्य है, तो हम गलत सोचेंगे।’’25 भारतीय परंपरा में सामाजिकता को ज़्यादा तरजीह दिया गया है क्योंकि समाज के प्रत्येक व्यक्ति का समाज के प्रति कुछ दायित्व होता है जिसका निर्वहन करते हुए वह सृष्टि से अपने संबंध को जोड़ता है। अज्ञेय इसको स्पष्ट करते हुए लिखते हैं, “समाज से अभिप्राय है वह परिवृत्ति जिसके साथ व्यक्ति किसी प्रकार अपनापा महसूस करे। वह मानव-समाज का एक अंश भी हो सकता है, और मानव-समाज की परिधि से बाहर बढ़कर पशु-पक्षियों (जीव-मात्र) की ओर घेर सकती हैं; बल्कि (चरमावस्था में) मानव समाज को छोड़कर पशु-पक्षियों और पेड़-पत्रों तक ही रह जा सकता है। समाज की इयत्ता अंततोगत्वा समाजत्व की भावना पर ही आश्रित है।”26 जबकि राष्ट्रनीति (नेशन) में दायित्व से ज्यादा अधिकार की भावना बलवती होती है। निर्मल वर्मा लिखते हैं “एक अपनी परंपरा में निहित अपने दायित्वों को पूरा करते हुए मोक्ष की तलाश करती है और दूसरी इतिहास द्वारा प्रदत्त और पोषित स्वातन्त्र्य का दावा करते हुए शक्ति पाने का प्रयास।”27

          यूरोपीय समाज के बारे में बनवारी लाल ने यहाँ तक दावा किया है कि “यूरोप आन्तरिक औपनिवेशिकरण से ही बना है।’’28 यूरोपीय इतिहास में होने वाले फ्रांसीसी-जर्मन प्रतिद्वंदिता, अंग्रेज़ी-फ्रांसीसी प्रतिद्वंदिता, उपनिवेश बसाने वालों के बीच जंग, प्रतिस्पर्धी यूरोपीय विरासतें एवं वैभव के दावे साथ ही फ्रांस व इंग्लैण्ड द्वारा यूरोप की सांस्कृतिक उपलब्धियों (यूनान व इटली के कलाकृतियाँ) से अपने म्यूजियम को सजाने की प्रवृत्ति को देखते हुए उनके दावे सचाई के क़रीब जान पड़ते हैं।

                       समय की अवधारणा को लेकर भी भारत और पाश्चात्य जगत में अंतर मिलता है। भारतीय परंपराओं में समय की चक्रीय-व्याख्या मिलती है जो प्रकृति से लयबद्ध है जबकि पाश्चात्य परंपरा में समय की रैखीय व्याख्या मिलती है। “समय का विभाजन भी आनुक्रमिक ढंग से किया जाता है, जो एक सीधी लकीर में अतीत से वर्तमान और वर्तमान से भविष्य की ओर ‘प्रगतिकरता है। जीवन-मूल्यों का निर्धारण भी समय के एक रैखिक कालबोध द्वारा होता है।’’29 इस एक रैखिक कालबोध ने ही ‘तर्ककी भाषा ईज़ाद की जिसमें गैर-मानवीय संसार से अलगाव है। “पश्चिमी मनुष्य द्वारा विकसित ‘तर्कणा’ की भाषा आज तक इस विशाल, जीवन्त, रहस्यपूर्ण, गैर-मानवीय संसार से सम्प्रेषण करने का कोई भी रास्ता सुझाने में निष्फल रही है।’’30 जबकि भारतीय परंपरा में मनुष्य और मनुष्येतर संसार के बीच अलगाव को ‘मिथकीयसम्बन्धों के कारण पनपने नहीं दिया। क्योंकि उसके लिए “जीवन एक रूप से दूसरे के बीच पुनर्जन्मों और कायान्तरों की एक अटूट श्रृंखला है, जहाँ हर जीव के भीतर दूसरे के रहस्योद्घाटन की कुंजी अवस्थित है। पौराणिक मिथकों की इन्हीं कुंजियों के सहारे हर हिन्दु मनुष्य और प्रकृति, मानवीय और गैर-मानवीय संसारों की बीच के सम्बन्धों के रहस्य को खोलने की कोषिश करता है। प्रकृति रहस्यपूर्ण है, जैसा कि हर ‘अन्य’ सत्ता होती है। लेकिन उससे आतंकित होने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि वह मनुष्य का एक अंश भी है- मानवीय प्रकृति, उसका स्व-भाव।’’31

          भारतीय एवं पश्चिमी दुनिया में जो सांस्कृतिक विशिष्टता है वह उनके साहित्य में भी दिखती है। निर्मल वर्मा महाभारत एवं इलियड का विश्लेषण  करते हुए उसकी विशिष्टता को दिखाते हुए लिखते हैं, “युद्ध की विभीषिका इलियड में उतनी ही भयानक और हृदयद्रावक है जितनी हम महाभारत में देखते हैं ....... दोनों ही महाकाव्यों में प्रतिहिंसा और विजय पाने की लालसा एक जैसी बलवती और विनाशकारी है, किन्तु ट्राय के मैदान में सैनिकों के वध के ब्यौरे जितनी बारीक सूक्ष्मता और क्रूर जीवन्तता के साथ होमर देता है उतना महाभारत का कवि लेखक नहीं .... पश्चिमी महाकाव्य में एक तरह की ठंडी वस्तुपरकता है, जहाँ खून में सने सैनिक के शव उसी तरह धूल में लोटते हैं, जैसे किसी भीषण आँधी में पेड़ों के धड़ गिरते हैं। भारतीय महाकाव्य में भी युद्ध की भूमिका कम महत्त्वपूर्ण नहीं है, किन्तु वहाँ कुरूक्षेत्र सिर्फ लड़ाई का मैदान नहीं है, वह धर्मक्षेत्र भी है; नीति और न्याय के परिप्रेक्ष्य में ही महाभारत अपनी काव्यात्मक गरिमा अर्जित करता है। पश्चिम के महाकाव्य में नायक के प्राकृतिक संवेग - अचिलीस का क्रोध, पैरिस की कामुक वासना अधिक मुखर होकर आती है, किन्तु धर्म और अधर्म को लेकर जो नैतिक शंकाएँ उठती हैं, स्वयं युद्ध के औचित्य को लेकर जो पीड़ायुक्त बहसें और आत्म-मन्थन होता है, उसका लेथ-मात्र भी ग्रीक महाकाव्य में दिखाई नहीं देता। क्यों? ऐसा क्यों है? दोनों महाकाव्य हमें अभिभूत करते हैं, क्योंकि वे जीवन के किसी अनुभव से - वह चाहे कितना ही भयावह, कटु और जघन्य क्यों न हो, आँखें नहीं चुराते।’’32 इस क्यों का उत्तर वे दोनों परम्पराओं में मनुष्य की अवधारणा में देखते हैं, "अन्तर सिर्फ दो काव्य-कृतियों का नहीं है, बल्कि दो सांस्कृतिक परम्पराओं के बीच है, जिसमें मनुष्य की अवधारणा ही एक दूसरे से भिन्न है। मनुष्य का ‘मनुष्यत्व’ क्या है, यह सिर्फ़ एक दार्शनिक प्रश्न नहीं रहता, बल्कि उसकी मूल प्रेरक-शक्तियाँ, Motive forces की ओर संकेत करता है, जो किसी महाकाव्य के नायकों-इलियड में अगॅमिमनान,महाभारत में अर्जुन, वाल्मीकि रामायण में राम के निर्णयों को संचालित करती है।’’33 लेकिन निर्मल वर्मा यह भी जोर देकर स्थापित करते हैं कि बेशक अलग-अलग संस्कृतियों में मनुष्य की छवि, उसका चेहरा अलग-अलग होगा लेकिन एक स्तर के बाद उसकी अपील सार्वभौमिक होती है। “हर उत्कृष्ट कलाकृति अपने चरम क्षणों में अपनी संस्कृति की सीमाओं को भेदकर मानव प्रकृति के ऐसे अँधेरे, अज्ञात और आदिम कोनों को उजागर करती है जहाँ मनुष्य मात्र मनुष्य है - प्रेम, मृत्यु,ईर्ष्या वासना और बलिदान की अनुभूतियों से लिथड़ा हुआ-महज पूर्व और पश्चिम का प्राणी नहीं।’’34

          भारत और यूरोप की भिन्नता की चर्चा करते हुए यह कदापि जरूरी नहीं है कि दोनों को एक-दूसरे के ख़िलाफ़ में समझा जाए| हमें तो दोनों के उज्ज्वल अंशों को ग्रहण करना होगा, क्योंकि कोई भी संस्कृति अपने आप में सम्पूर्ण का दर्जा नहीं रखतीं। यह भी आवश्यक नहीं कि लोगों की विभिन्न मेधाओं को एक समान स्तर पर ला खड़ा कर दें, एक जीवन पद्धति के स्थान पर दूसरा रख दें बल्कि प्रत्येक से उसका अंश प्राप्त करना चाहिए। क्योंकि “पूर्व और पश्चिम में आधारभूत अंतर नहीं है। हममें से प्रत्येक पूर्वीय भी है और पश्चिमी भी। पूर्व और पश्चिम दो ऐतिहासिक या भौगोलिक धारणाएं नहीं है? वे हर युग में हर मानव में अन्तर्हित दो संभावनाएं है, मानवीय चेतना के दो परिचालन हैं। मनुष्य के स्वभाव में, उसकी वैज्ञानिकता और धार्मिक प्रवृत्तियों के बीच, तनातनी है। यह तनाव या हलचल विपत्ति नहीं, संभावना है।’’35 इसी संभावना में ही बेहतर विश्व का भविष्य निहित है |


संदर्भ ग्रंथ सूची
1.      उद्धृत, आदि, अन्त और आरम्भ, पृ. 63
2.      धुंध से उठती धुन, निर्मल वर्मा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2000, पृ. 14
3.      भारत का स्वधर्म, धर्मपाल, वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर, 1994, पृ. 83
4.      ‘थलेस की धारणा थी कि सृष्टि एक आदि तत्त्व से हुई है और वह जल है। अनक्सिमॅनॅस ने वायु को संसार का मूल माना। हेराक्लितुस अग्नि को मूल तत्त्व मानते थे। अनक्सिमंदॅर ने आकाश को संसार का मूल रचनातत्त्व माना। पिथागोरस के आत्मा संबंधी विचार भारत से मेल खाते हैं। पाँचवी सदी ई.पू. में लॅउकिप्पुस और देमोक्रितुस ने परमाणुवाद का विकास किया जो भारत के परमाणुवाद से भी साम्य रखता है।पाश्चात्य   दर्शन और सामाजिक अन्तर्विरोध, रामविलास शर्मा। इस पुस्तक के प्रथम अध्याय में सविस्तार यूनानी और भारतीय दर्शन के साम्य को दर्शाया गया है।
5.      उद्धृत, प्राच्य धर्म और पाश्चात्य    विचार, पृ. 169। फारिंगटन के अनुसार 600 से 400 ई.पू. का समय यूनानी दर्शन के इतिहास में सबसे महत्त्वपूर्ण है तो कहना होगा कि उसे महत्त्वपूर्ण बनाने में भारत का योगदान उल्लेखनीय है।’, पाश्चात्य दर्शन और सामाजिक अन्तर्विरोध, पृ. 26। क्वाण्टम भौतिकी के अग्रणी वैज्ञानिक जाॅन व्हीलर लिखते हैं, ’’मैं यह सोचता हूँ कि कोई इसका पता अवश्य लगायेगा कि आखिर किस तरह से भारतीय चिंतन यूनान तक पहुँचा और फिर वहाँ से इसने हमारे समय के दर्शनषास्त्र तक राह बनाई।’, विभिन्नता, पृ. 150।
6.      आदि, अन्त और आरम्भ, पृ. 48। भौतिक विज्ञानी रोड्डम नरसिम्हा भारतीय व यूनानी दर्शन के अंतर को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं, ’’यूनानी दृष्टिकोण में विचारक स्वयंसिद्ध पद्धति एवं प्रतिरूप (माॅडलों) बनाने का तरीका अपना लेते हैं (अर्थात् स्वयंसिद्ध या माॅडल तार्किक अनुमान - अंतिम प्रमेय या परिणाम), जबकि भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार दृष्य में पुनः पुनः उभरने वाले स्वरूप की जिज्ञासा तथा उसके अनुरूप नियम-प्रणाली बनाने की प्रक्रिया द्वारा दिया जाता है (अर्थात् निरीक्षण - नियम प्रणाली - सर्वमान्य परिणाम)। भारतीय बौद्धिक दृष्टिकोण पश्चिम के स्वयंसिद्धता एवं माॅडलों पर आधारित सिद्धान्तों के प्रति गठन सन्देहों को उजागर करता है और अपनी विधि की उपयोगिता को दर्शाता  है। ... सिद्धान्तों का सत्यापनकरना भारतीय दृष्टिकोण का एक प्रमुख हिस्सा रहा है। पश्चिम का प्रतिरूप (Model) बनाने की संस्कृति जड़ एवं अन्तःसंघर्षों से ग्रस्त है जिसके परिणामस्वरूप दावे और प्रति-दावे निर्मित होते रहते हैं।विभिन्नता, पृ. 148।
7.      पाश्चात्य दर्शन और सामाजिक अन्तर्विरोध, पृ. 69।
8.      वही, पृ. 58।
9.      भारत और यूरोप: प्रतिश्रुति के क्षेत्र, पृ. 16।
10.    भारत और यूरोप: प्रतिश्रुत के क्षेत्र, पृ. 101।
11.    वही।
12.    चिन्मय भारत, पृ 96।
13.    वही।
14.  भारतीय परंपरा के मूल स्वर, डाॅ. गोविन्द चन्द्र पांडे, नेशनल पब्लिषिंग हाउस,                                                   नयी दिल्ली, 1993, पृ. 27-28।
15.    अहा! ज़िंदगी पत्रिका, संपा. आलोक श्रीवास्तव, वर्ष - 9, अंक-9, मई 2013, जयपुर।
16.    प्राच्य धर्म और पाश्चात्य विचार, पृ. 87।
17.    काव्य और कला तथा अन्य निबन्ध, जयषंकर प्रसाद, प्रसाद मंदिर, गोवर्द्धनसराय, वाराणसी, 1983, पृ. 63।
18.   विभिन्नता, पृ. 233। इस पुस्तक में राजीव मल्होत्रा तफ़सील से भारतीय और पश्चिमी संस्कृति के अंतर को तथ्यपरक ढंग से रखते हैं।
19.    वही।
20.   प्रतिमान, समाज विज्ञान और मानविकी की पूर्व-समीक्षित अर्द्धवार्षिक पत्रिका, प्रवेषांक: जनवरी-जून, 2013, वर्ष-1, खण्ड-1, अंक-1, पृ. 454, 463
21.    हजारीप्रसाद द्विवेदी ग्रन्थावली, भाग-9, पृ. 200।
22.    आदि, अन्त और आरम्भ, पृ. 79।
23.    भारत और यूरोप: प्रतिश्रुति के क्षेत्र, पृ. 78।
24.    प्राच्य और पाश्चात्य   , पृ. 14।
25.    वही, पृ. 12, 14।
26.    अज्ञेय: प्रतिनिधि निबंध, संकलन: कृष्णदत्त पालीवाल, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत, 2014, पृ. 17।
27.    भारत और यूरोप: प्रतिश्रुति के क्षेत्र, पृ. 61।
28.    समास-14, पृ. 12।
29.    मेरे साक्षात्कार, निर्मल वर्मा, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, 2010, पृ. 145।
30.    भारत और यूरोप: प्रतिश्रुति के क्षेत्र, पृ. 79।
31.    वही।
32.    आदि, अन्त और आरम्भ, पृ. 66।
33.    वही, पृ. 68।
34.    वही, पृ. 73।
35.    पूर्व और पश्चिम, पृ. 135।

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