बालकृष्ण भट्ट की राष्ट्रीय चेतना

- गुड्डू कुमार

पी एचडी शोधार्थी, अ.मु.वि, अलीगढ़

बालकृष्ण भट्ट भारतेंदु मंडल के प्रतिनिधि रचनाकार थे। भारतेंदु युग के निबंधकारों में उनका स्थान सर्वोपरि है। नाटक, उपन्यास, निबंध, पुस्तक-समीक्षा, पत्रकारिता इन सभी क्षेत्रों में उनका  योगदान सराहनीय है। हिंदी भाषा की प्रचार-प्रसार के लिए वे ‘हिंदी प्रदीप’ नामक मासिक पत्र  निकलते थे। इस पत्र में सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, नैतिक आदि विषयों पर नाटक, निबंध, उपन्यास, कहानी आदि छपती थी। भट्ट जी ने हिंदी प्रदीप के अतिरिक्त कुछ अन्य पत्र-पत्रिकाओं का भी संपादन किया है। इन्हें आधुनिक काल में गद्य प्रधान कविता का जनक कहा जाता है।

भट्ट जी के समय का भारतवर्ष घोर अंधकार में डूबा था। उस समय बालविवाह, सह-भोजन का विरोध, धर्मान्धता, नये विचारों की निंदा, परिवर्तन विमुखता, राजनैतिक क्रियाशीलता का विरोध, जाति-पाँति, छुआछूत आदि का बोलबाला था। आत्मगौरव और कौमियत का अभाव था। मध्यवर्ग का उदय हो चुका था पर उनमें विकास की गति धीमी थी। भट्ट जी की रचनाओं में इन सभी समस्याओं पर कहीं सहज भाव से तो कहीं व्यंग्यात्मक तरीके के प्रकाश डाला गया है।

बालकृष्ण भट्ट
(3 जून 1844 - 20 जुलाई 1914)
भट्ट जी की राष्ट्रीयता उनके द्वारा संपादित पत्रिका ‘हिंदी प्रदीप’ के माध्यम से प्रकट होती है। अनेक प्रकार की कठिनाई झेलते हुए भी वे इस पत्र का संपादन लगातार तैंतीस वर्ष तक करते रहें। उन्होंने इस पत्र में स्व-लिखित लगभग 300 निबंधों को प्रकाशित किया था। उनके निबंधों की विषयवस्तु और शैली दोनों में वैविध्य मिलता है। विषयवस्तु की दृष्टि से उनका निबंध समकालीन  समय की सभी कुरीतियों पर चोट करता है। ब्राह्मण और संस्कृत के विद्वान होते हुए भी वे हिन्दू धर्म की सभी रूढ़ियों का विरोध करते थे। इस सन्दर्भ में बच्चन सिंह का कथन है – “इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि संस्कृत पढ़कर भी वे रूढ़ियों के परम शत्रु थे।”[1]  

भट्ट जी के ज्यादातर निबंधों में चरित्र-निर्माण, आत्मशुद्धि, स्त्री-शिक्षा, देशोद्धार आदि पर बल है। कर्तव्य परायणता, स्त्रियाँ आदि जैसे निबंधों में वे स्त्री की वर्तमान दयनीय दशा के लिए भारतीय पुरुष-वर्चस्ववादी समाज को धिक्कारते हैं। ‘स्त्रियाँ’ निबंध में उन्होंने लिखा है – “जहाँ कहीं वे पढ़ाई-लिखाई जाती हैं वहाँ स्त्रियाँ पुरुषों से ऊपर हो गई हैं। हमारे यहाँ के ग्रंथकार और धर्मशास्त्र गढ़ने वालों की कुंठित बुद्धि में न जाने क्यों यही समाया हुआ था कि स्त्रियाँ केवल दोष की खान हैं गुण इनमें कुछ है नहीं।”[2] चरित्र शोधन, आत्मत्याग, कौम, देशत्व रक्षा का उपाय आदि जैसे निबंधों में देशानुराग दिखाकर वे भारत के नव शिक्षित वर्ग को देशोद्धार के लिए उद्वेलित कर रहे थे। ‘चरित्र शोधन’ निबंध में भट्ट जी ने लिखा है – “चरित्र पालन सभ्यता का प्रधान अंग है। कौम की सच्ची तरक्की तभी कहलावेगी जब हर एक आदमी उस जाती या कौम के चरित्र संपन्न और भलमनसाहत की कसौटी में कसे हुए अपने को प्रकट कर सकते हों। भले लोगों के चले हुए मार्ग पर चलने ही का नाम कानून, व्यवस्था या मोरालिटी है।”[3]

भट्ट जी कोरे आधुनिकतावादी नहीं थे। उनमें पुरातन और आधुनिकता का समावेश था। पुरातन को यथावत स्वीकार करने की उनकी नियत नहीं थी। पुरातन की कमियों को फटकारना और उसकी खूबियों को अपनाना अपना कर्तव्य समझते थे। भारत वर्ष की वर्तमान दशा को वे भारतीय जन समुदाय के कर्मों का ही फल मानते थे। भारतवर्ष की प्राचीन संपदा की उन्नति न करना, तरह-तरह की बाह्य आक्रमणों को सहना; भारतीय जन समाज की कायरता का ही फल था  । अंग्रेज़ों के आगमन से पूर्व भारतवर्ष में एकता का अभाव था। संपूर्ण भारत छोटे-छोटे राज-रजवाड़ों में विभक्त था। उनमें एक्य होकर बाह्य आक्रमणों की सामना करने की सूझ- बुझ न थी। भारतवर्ष को एक सीमा में बांधने की बात तो दूर उनमें आपसी फुट भी कम न थी। भट्ट जी ‘वर्तंमान महादुर्भिक्षा’ निबंध में लिखते हैं – “हजार वर्ष से ऊपर हुआ मुसलामानों को यहाँ आने से पहले से हमारी दुर्गति ही होती गई पर हमारा कभी एक दिन भी न इस बात पर ध्यान गया कि देश में जातीयता और सहानुभूति बढ़ाने के क्या उपाय किये जायें जिससे हमारी बढ़ती हुई दुर्गति का रोक हो।... हम जो हैं वही रहेंगे एक नहीं हजार ऐसी आफते आया करें हम अपने कुसंस्कारों को न बदलेंगे न जानवर से आदमी बनेंगे वरना जो आज पाव भर बिगड़े हैं तो कल सेर भर बिगड़ने का हौसला बांधेंगे।”[4]

भट्ट जी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का सिर्फ निंदा ही नहीं करते बल्कि उसके औदात्य का उद्घाटन भी करते हैं। परम्परा बनाम प्रगति के संदर्भ में वे परम्परा के साथ-साथ पश्चिम के नये विचारों और साधनों का भी समर्थन करते हैं । एक तरफ वे शंकराचार्य, बुद्ध, नानक और कबीर आदि का मूल्यांकन समकालीन प्रासंगिकता की दृष्टि से करते हैं; तो दूसरी ओर यूरोप, अमेरिका जैसे विकसित देश की तरक्की को देखकर भारत की तरक्की की बात करते हैं। ‘वर्तमान महादुर्भिक्षा’ निबंध में वे लिखते हैं – “ खेती हमारे देश की बहुत गिरी दशा में है, खेतिहर जितना परिश्रम करते हैं उतना फल उसका उन्हें नहीं मिलता इसका यही कारण है कि खेती के औजार इत्यादि और खाद तथा आबपाशी का क्रम अमेरिका के खेतिहरों की अपेक्षा यहाँ बहुत घटा हुआ है। अमेरिका के किसानों को इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती जैसा यहाँ के खेतिहर करते हैं और फायदा इनसे वे लोग बहुत अधिक थोड़े ही मेहनत में उठाते हैं।”[5]

भट्ट जी सच्चे अर्थों में देश भक्त थे। भारतेंदु की तरह उनमें राजभक्ति और देशभक्ति का द्वन्द्व नहीं था। राजभक्ति और भय का अंश उनमें लेशमात्र भी न था। राजभक्ति को वे क्षणिक सुख मानते थे जबकि देशभक्ति उनका परम लक्ष्य था। राजभक्ति और देशभक्ति के बीच अंतर करते हुए उन्होंने कहा कि ‘जिस प्रकार हँसना और गाल फुलाना, बहुरी चबाना और शहनाई बजाना एक साथ संभव नहीं है ठीक उसी प्रकार राजभक्ति और देशभक्ति भी  एक साथ संभव नहीं है।’ अपने विचार से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। अपनी रचनाओं में वे धर्म और अर्थ के नाम पर होने वाले लूट का सदा विरोध करते थे। देश का धन विदेश जा रहा था। देशी विकासमान शिक्षा और कुटीर उद्योग धंधों को बंद किया जा रहा था। विकास के नाम पर देशी संस्कृति को नष्ट कर लाभ केन्द्रित संस्कृति स्थापित की जा रही थी। इन सभी समकालीन स्थितियों का बेबाक चित्रण भट्ट जी के साहित्य में है। इन विषयों पर उनकी लेखन शैली कबीर की तरह तिलमिला देने वाली थी। भट्ट जी के इस तेवर को उनके राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन से संबंध रखने वाले निबंधों में देखा जा सकता है।

भट्ट जी सांप्रदायिक एकता के सच्चे समर्थक थे। वे किसी रीति नीति में बंधे हुए नहीं थे। जो नियम उनके बुद्धि की कसौटी पर खड़ा उतरता था; उसे वे सहज स्वीकार करते थे। किसी धर्म में अच्छी बात देखकर वे मुक्तकंठ से उसका प्रशंसा करते थे। इसके विपरीत यदि कोई संप्रदाय, जाति व समाज देश के उत्थान में बाधक है, जो मनुष्य को मानवता की राह से विचलित करता है; वह उन्हें ग्राह्य नहीं था। उनकी चिंता मुल्की तरक्की और देशानुराग में था। वे सदा इस प्रयत्न में रहते थे कि देश की अस्मिता की रक्षा कैसे की जाए। इसके लिए वे अंग्रेजी हुकूमत की नई तालीम के समर्थक थे पर इस तालीम से उपजी गुलामगिरी का विरोध करते थे। ‘देशत्व रक्षा का उपाय’ निबंध में भट्ट जी लिखते हैं – “...एक ऐसे संस्कृत विश्वविद्यालय की आवश्यकता है जिससे पूर्व और पश्चिम को बहने वाली दोनों नदियों का संगम हो और दोनों नदियाँ अपने अमोघ जल से यहाँ के लोगों को आप्लावित करती रहें।... उचित है कि दोनों के बीच कोई ऐसा रास्ता निकाले जिसमें न पूर्व की अधिक सीमा दबे न पश्चिम ही को कोई शिकायत का मौका रहे।”[6]  

भाषिक दृष्टि से भी भट्ट जी संपूर्ण भारतवर्ष को एक सूत्र में पिरोने का काम किया है। उन्होंने नागरी लिपि के प्रयोग और हिंदी भाषा की प्रतिष्ठा पर बल दिया है। 19वीं शताब्दी में हिंदी भाषा और नागरी अक्षरों के शिक्षा और न्यायालय में उसके प्रयोग को लेकर उन्होंने एक आन्दोलन चला रखा था। हिंदी की जातीय भाषा अर्थात जिसे आज राष्ट्रभाषा घोषित किया गया है; इस घोषणा में भट्ट जी का योगदान सराहनीय है। उनकी भाषा को सामान्यतः दो वर्गों में बांटा जा सकता है । प्रथम वर्ग की भाषा संस्कृतनिष्ठ है जबकि द्वितीय वर्ग की भाषा में तत्कालीन उर्दू, अरबी, फारसी आदि के चलते शब्द का मिश्रण है। भट्ट जी की यह भाषा नीति अनायास नहीं है। वे हिंदी भाषा की परिधि का विस्तार करना चाहते थे इसीलिए उन्होंने हिंदी भाषा में विषय और प्रसंग के अनुरूप प्रचलित हिंदी-इतर शब्दों का भी मिश्रण किया है  । आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी  के शब्दों में – “भाषा के प्रति इस प्रकार की जागरूकता के मुख्य और क्रियात्मक रूप का कारण तो राष्ट्रीय भावना थी, किन्तु प्रतिक्रियात्मक रूप का हेतु था हिंदी की भयंकर उपेक्षा।”[7]

निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि देशानुराग का जैसा उत्साह भट्ट जी ने ‘हिंदी प्रदीप’ में दिखाया है; वैसा अन्यत्र नहीं देखा गया। वे इस पत्रिका के माध्यम से आत्मगौरव, आत्मनिर्भरता, आत्मबल, आत्मत्याग, चरित्र-निर्माण, ईमानदारी, साहस, औदार्य, सत्यनिष्ठा, कौमियत, जातीयता, परिवर्तन-प्रियता, मुल्क की तरक्की, आबादी नियंत्रण, वैज्ञानिक साधनों का प्रयोग, धार्मिक-कट्टरता का त्याग, स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह, कृषि शिक्षा, खेती के लिए नये साधनों का प्रयोग, राजनैतिक चेतना का विकास, हिंदी भाषा में नये-नये शब्दों का प्रयोग आदि विषयों के उत्थान पर बल दिया है। ‘हिंदी प्रदीप’ को प्रकाश में लाने के पीछे भट्ट जी का जो उद्देश्य था; वह इन्हीं परिवर्तनों की आकांक्षा को दर्शाता है -
                      “श्री हरी पद रज कृपा देश निज दशा सुधारन
                       हिंदी गन मन गुहा महा तम तोम निवारण
                       दीप देश नव नेह नेह भरि भरि तहँ बारन
                       प्रचलित उर्दू मुख कवलित हिंदी उद्धारन  
                      दीन प्रजा दु:ख हरन नागरी बरन प्रचारन
                      पर पद गत आरत भारत की आपद तारन
                      काव्यकला कौशल्य शिल्प विद्यादि उबारन
                       उत् तम उत्तम विषय देश भाषा संचारन
                        देश काल नियमनुसार मार्ग मग धारन
                        शत विध निज उद्देश्य शेष लौं पूरन कारन।”[8]
                  

संदर्भ


[1] हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, लेखक – बच्चन सिंह, पृ० 296
[2]बालकृष्ण भट्ट के श्रेष्ठ निबंध, संपादक- सत्यप्रकाश मिश्र, पृ० 33   
[3] बालकृष्ण भट्ट के श्रेष्ठ निबंध, संपादक- सत्यप्रकाश मिश्र, पृ० 41
[4]बालकृष्ण भट्ट के श्रेष्ठ निबंध, संपादक- सत्यप्रकाश मिश्र, पृ० 53
[5] वही, पृ० 55
[6]बालकृष्ण भट्ट के श्रेष्ठ निबंध, संपादक- सत्यप्रकाश मिश्र, पृ० 142  
[7] हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास; लेखक – हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० 212
[8] बालकृष्ण भट्ट के श्रेष्ठ निबंध; संपादक – सत्यप्रकाश मिश्र, भूमिका से

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