समन्वयवादी नागरीदास


बृज किशोर वशिष्ट

एसोशिएट प्रोफेसर, मोतीलाल नेहरू कॉलेज (सांध्य), दिल्ली विश्वविद्यालय
 सार: हिंदी साहित्य में कई नागरीदास नामक कवि हुए हैं। कृष्णगढ़ (अजमेर के निकट) के राजा सावंत सिंह जिन्होंने कृष्ण भक्ति में लीन होकर अपना नाम नागरीदास रख लिया था। वे रीतिकालीन भक्त कवि हैं। प्रस्तुत लेख इन्हीं नागरीदास के जीवन और काव्य पर परिचयात्मक टिप्पणी है। नागरीदास ने सन् 1723 से सन् 1762 तक काव्य सृष्टि की। इनके काव्य की सबसे बड़ी विशेषता समन्वयवादी दृष्टिकोण है। भक्त कवि होते हुए भी ये शृंगार के अनुपम चित्र गढ़ते हैं। ब्रजभाषा में साहित्य रचते हुए फारसी का विलक्षण प्रयोग करते हैं। इतना ही नहीं वल्लभ संप्रदाय में दीक्षित होने पर भी वे सखी संप्रदाय की युगलोपासना से प्रभावित दिखाई देते हैं। विषयों का उनमें इतना विस्तार है कि शायद ही उनके किसी समकालीन कवि में इतना वैविध्य होगा। उनकी 73 छोटी-बड़ी पुस्तकें हैं। नागरीदास के काव्य में बहुत विरोधाभासी मतों का समन्वय दिखाई देता है। वे राजा होते हुए भी वैरागी हैं। उत्कृष्ट कवि होने के साथ-साथ चित्रकला से विशेष प्रेम करते हैं। कृष्ण भक्ति के निम्बार्क संप्रदाय से प्रभावित हैं लेकिन दूसरी और वल्लभ संप्रदाय में दीक्षा लेते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने इतिहास ग्रंथ में इनका उल्लेख किया है।  
      कृष्ण भक्ति में 'नागरी' शब्द का विशेष महत्त्व है। नागरी यानी राधा। राधा-कृष्ण का प्रेम समस्त कृष्ण काव्य के लिए आधार सामग्री का काम करता है। राधा अनन्य सौन्दर्य से युक्त है। वह लौकिक जगत में विद्यमान अलौकिक नायिका है। आदर्श प्रेमिका है। राधा के इन गुणों से प्रभावित होकर अनेक भक्त कवियों ने राधा-कृष्ण की युगल मूर्ति की उपासना की। इनमें से कुछ ने तो अपने मूल नाम का त्याग करके अपना नाम 'नागरीदास' रख लिया। यही कारण है कि कृष्ण भक्तिधारा में कई नागरीदास नाम्नी कवियों को देखा जा सकता है। मध्ययुगीन साहित्य में चार नागरीदास विशेष उल्लेखनीय हैं। प्रमुख साहित्येतिहासकारों ने अपने इतिहास ग्रंथों में इनका संक्षिप्त वर्णन किया है।

      पहले, ‘आचार्य नागरीदास, श्री स्वामी हरिदासजी की शिष्य परंपरा में, विहारिनिदास के शिष्य, एक प्रसिद्ध महात्मा और कवि। इनका असल नाम शुक्लांबरधर था। इनके पिता का नाम कमलापति था। यह संवत् 1600 में माघ शुक्ल 5 को पैदा हुए थे। इनका देहावसान 70 वर्ष की वय में संवत् 1670 में वैशाखसुदी 9 को हुआ।1 मिश्रबंधुओं ने भी अपने प्रसिद्ध इतिहास ग्रंथ में इन्हें प्रामाणिक मानकर इनका संक्षिप्त जीवनवृत्त दिया है।2

      दूसरे, नेही नागरीदास, ओरछा के पास पलेहरा गाँव के रहने वाले थे। ये हितहरिवंश के ज्येष्ठ पुत्र वनचंद्र के शिष्य थे। इनका जन्म संवत् 1600 के आस-पास माना जाता है। इनके नाम में नेहीजुड़ जाने के कारण इनको अन्य नागरीदास नामक कवियों से सहज ही अलग किया जा सकता है। स्वामी चतुर्भुजदास की कथा वार्ता सुनकर ये इतने प्रभावित हुए कि घर-बार छोड़कर उनके साथ वृंदावन चले आए। यह घटना 1554 ई॰ के आस-पास की है। इसी से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि ईसा की सोलहवीं शती के उत्तरार्द्ध में वे लेखन कार्य में संलग्न थे।3 रतिभानु सिंह नाहर ने इनके कृतित्व पर विचार करते हुए लिखा है, ‘‘इन्होंने सिद्धांत दोहावली’, ‘पदावलीतथा रसपदावलीकी रचना की थी। सिद्धांत दोहावलीका बहुत ही सांप्रदायिक महत्त्व है जिसमें इन्होंने हितहरिवंश की प्रेमलक्षणा भक्ति का मर्म प्रकाशित किया है।’’4

      तीसरे, विप्रनागरीदास का संबंध अलवर से है। ये चरणदास के 52 शिष्यों में  से एक थे। इन्होंने भागवत का अनुवाद किया था। यह सामान्य श्रेणी के कवि थे। मिश्रबंधु विनोद के अनुसार इनका रचनाकाल संवत् 1790 के आस-पास ठहरता है।5

      चौथे, नागरीदास अजमेर के निकट कृष्णगढ़ के राजा थे। इनका वास्तविक नाम सावंत सिंह था। इनका जन्म संवत् 1756 (सन् 1699) को रूपनगर में और मृत्यु संवत् 1821 (सन्1764) में वृंदावन में हुई। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रीतिकालीन कवियों पर चर्चा करते हुए अपने इतिहास ग्रंथ में लिखा कि, ‘‘यद्यपि इस नाम से कई भक्त कवि ब्रज में हो गए पर उनमें सबसे प्रसिद्ध कृष्णगढ़ नरेश महाराजा सावंत सिंह हैं।’’6 सभी साहित्येतिहासकारों ने अपने इतिहास ग्रंथ में इनका उल्लेख अवश्य किया है। इनका जीवन हृदय-परिवर्तन का अनुपम उदाहरण है।

      नागरीदास का जीवन बहुत दिलचस्प है। उनचास वर्ष की अवस्था में पिता के देहांत के बाद कृष्णगढ़ राज्य की गद्दी पर बैठे। 21वर्ष की अवस्था में भानगढ़ के राजा यशवंत सिंह की पुत्री से इनका विवाह हो चुका था। कृष्ण के अनन्य भक्त थे। अपनी सौतेली माँ की दासी 'बनी-ठनी' से प्रेम हो गया। उनका प्रेम इतना गहरा था कि वे बनी-ठनी को राधा मानकर प्रेम करने लगे। इसलिए उन्होंने अपना नाम नागरीदास रख लिया, जिसका अर्थ होता है राधा का दास। गृहक्लेश से ऊबकर इन्होंने संवत् 1813 (सन् 1756) में राजपाट त्याग दिया। सन् 1762 ईस्वी के लगभग नागरीदास बनी-ठनी के साथ वृंदावन आ गए और जीवन पर्यंत वहीं रहे। फिर लौटकर कृष्णगढ़ नहीं गए। आज भी वृंदावन में यमुना किनारे नागरीदास और बनी-ठनी की समाधियाँ मौजूद हैं।  इन्होंने छोटे-बड़े मिलाकर सत्तर से अधिक ग्रंथों की रचना की। यही इस लेख के अभीष्ट नागरीदास हैं।

      नागरीदास ने सन् 1723 से सन् 1762 तक काव्य सृष्टि की। इनके काव्य की सबसे बड़ी विशेषता समन्वयवादी दृष्टिकोण है। भक्त कवि होते हुए भी ये शृंगार के अनुपम चित्र गढ़ते हैं। ब्रजभाषा में साहित्य रचते हुए फारसी का विलक्षण प्रयोग करते हैं। इतना ही नहीं वल्लभ संप्रदाय में दीक्षित होने पर भी वे सखी संप्रदाय की युगलोपासना से प्रभावित दिखाई देते हैं। विषयों का उनमें इतना विस्तार है कि शायद ही उनके किसी समकालीन कवि में इतना वैविध्य होगा।

      नागरीदास के व्यक्तित्व निर्माण के पीछे समकालीन परिस्थितियों का विशेष योगदान है। उत्तर मध्यकाल में शृंगार के प्राधान्य के कारण कृष्ण भक्तिधारा क्षीण हो गई तथापि इस समय के कवि अपने पूर्ववर्ती कवियों के अनुगामी बने रहे। ऐसे समय में नागरीदास ने परंपरा का अनुसरण करने के साथ-साथ अपने काव्य में मौलिकता को भी स्थान दिया और कथ्य एवं शिल्प के स्तर पर नए प्रयोग किए। उदाहरणार्थ उनकी उन रचनाओं को देखा जा सकता है जिनमें उन्होंने सूफी संदर्भों  का प्रचुरता से प्रयोग किया है। इनके यहाँ आशिक है, माशूक है और इश्क है। इश्क के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए इन्होंने कहा है-
      सब मज़हब सब इल्म अरु, सबैं ऐस के स्वाद।                                        अरे इस्क के असर बिन, ए सबही बरबाद।।7

      नागरीदास के काव्य का आधार प्रेम है। भक्ति का आधार भी प्रेम ही है। वे पुष्टिमार्ग को मानने वाले थे। इसमें भक्ति को अर्जित करने के लिए लोक और वेद दोनों प्रकार के प्रलोभनों को त्यागना पड़ता है। उन फलों की आकांक्षा छोड़नी पड़ती है जो लोक का अनुसरण करने से प्राप्त होते हैं तथा जिनकी प्राप्ति वैदिक कर्मों के संपादन के द्वारा कही गई है। यह तभी हो सकता है जबकि साधक अपने को भगवान के चरणों में समर्पित कर दे।8  पुष्टिमार्ग में पुष्टिका अर्थ है भगवदनुग्रह। रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, "भगवान का अनुग्रह ही जीव का असली पोषण या पुष्टि है जिससे उसके हृदय में भक्ति का संचार होता है। हृदय पर प्रभाव उत्पन्न हुए बिना, धर्मस्वरूप भगवान की विभूति में हृदय लगे बिना, अंतः प्रकृति को वह पुष्टता प्राप्त नहीं हो सकती जिसके बल से कल्याण पथ की ओर मनुष्य चला चल सकता है। जिसमें भक्ति दिखाई पड़े उसके संबंध में समझ लेना चाहिए कि उसे भगवान का अनुग्रह अर्थात पोषण प्राप्त है। 'पुष्टिमार्ग' स्त्री-पुरुष, द्विज-शूद्र सबके लिए खुला है। मनुष्यमात्र इसके अधिकारी हैं"9 वैसे तो सभी संप्रदायों में भगवदनुग्रह को आवश्यक माना गया है किंतु वल्लभाचार्य द्वारा प्रतिपादित पुष्टिमार्ग  में इस पर विशेष बल दिया जाता है। नागरीदास ने वल्लभ संप्रदाय में गोस्वामी रणछोड़ लाल से दीक्षा ली। यहाँ पर यह संकेत करना महत्त्वपूर्ण होगा कि वे कृष्ण भक्ति के अन्य संप्रदायों के प्रभाव से अपने आप को एकदम अलग नहीं कर पाए इसलिए कई विद्वानों ने उन्हें निम्बार्क संप्रदाय के अंतर्गत आने वाले सखी संप्रदाय से प्रभावित माना है। बच्चन सिंह के अनुसार, "नागरीदास यद्यपि वल्लभ कुल में दीक्षित थे फिर भी सखी संप्रदाय से प्रभावित थे। .....वस्तुतः सखी संप्रदाय निम्बार्क मत का एक अवांतर भेद है फिर भी अपनी विशेषताओं के कारण उक्त मत से यह कई  दृष्टियों से अलग हो गया। सखी संप्रदाय में रसरूप 'युगल उपासना' को स्वीकृत किया गया है। राधा कृष्ण की ललित लीलाओं का सखी रूप में दर्शन करना इस संप्रदाय का अंग हो गया है।"10  इसका कारण यह है कि सखी संप्रदाय में रस-रूप की युगलोपासना को मान्यता प्राप्त है और वह नागरीदास के यहाँ प्रचुरता से उपलब्ध है। जुगल रस माधुरीसे एक उदाहरण दृष्टव्य है-
      हरि राधा वृंदा बिपुन, नित बिहार रस एक।
      बिछुरत नाहीं पलक हूँ, बीतत कलप अनेक।।11

      कृष्णगढ़ राज्य के राजा निम्बार्क संप्रदाय के समर्थक थे। उनका कृष्णगढ़ के निकट सलेमाबाद की निम्बार्क पीठ से संबंध था। इस पीठ की स्थापना हरिव्यास के बारह प्रमुख शिष्यों में से एक परशुराम ने की थी। यह पीठ वृंदावन के बाहर स्थित निम्बार्क संप्रदाय की प्रमुख पीठों में से एक मानी जाती है। "निम्बार्क संप्रदाय के भक्ति सिद्धांत इस प्रकार हैं- शिव ब्रह्मा जिनकी वंदना करते हैं वे श्रीकृष्ण चरण ही जीव के एकमात्र शरण हैं। भक्त जिस भाव से भगवान की उपासना करता है भगवान उसे उसी रूप में मिलते हैं। भगवान दया करने वाले एवं कृपालु हैं। इस संप्रदाय में कृष्ण ही उपास्य, भजनीय, सेव्य और पूज्य हैं। उनके अतिरिक्त किसी और की भक्ति या सेवा पूजा व्यर्थ है। राधा को भी इष्ट देवी के रूप में स्वीकार किया गया है। राधा को स्वकीया के रूप में स्वीकार करके उनकी समस्त लीलाओं में स्वकीयात्व का आरोप किया गया है। इस संप्रदाय के उपास्य राधायुक्त कृष्ण हैं।"12

यहाँ यह बात ध्यातव्य है कि निम्बार्क और मध्वाचार्य ने कृष्णोपासना को महत्त्व देते हुए उसमें राधा तत्त्व का समावेश बहुत पहले ही कर दिया था किंतु वल्लभ ने अपनी कुछ नवीन उद्भावनाओं द्वारा इस तत्त्व को और भी शास्त्रेक्त बना दिया और साथ ही लोकरुचि से भी समरसता स्थापित करने की व्यवस्था कर दी।13 वल्लभाचार्य का जन्म 1479 ई॰ में और मृत्यु सन् 1530 में हुई। वल्लभाचार्य के संप्रदाय के समस्त सिद्धांतों को नागरीदास ने अपने काव्य में आत्मसात कर लिया था। वल्लभ मत के अनुसार श्रीकृष्ण परब्रह्म हैं। नागरीदास ने कहा है-
      अष्ट सिद्ध जाकों कहत, करामात सब जक्ति।
      बादीगर के खेल सो, बिना कृष्ण की भक्ति।।14

      नागरीदास के यहाँ आप सभी कृष्ण भक्ति संप्रदायों के मतों के विभिन्न चित्र देख सकते हैं। यह उनकी समन्वय भावना का श्रेष्ठ उदाहरण है। वे सबको साथ लेकर चलने के पक्षधर हैं।

      नागरीदास की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता रीति और भक्ति का समन्वय है। इनकी कविता में मानवीय प्रेम को अभिव्यक्त करने वाला शृंगार भी पर्याप्त मात्रा में उपस्थित है। ये कोरे वैरागी भक्त कवि न होकर प्रेम की पीर को पहचानने वाले शृंगारी भक्त कवि हैं। इनका काल शृंगारिक प्रवृत्तियों के उत्कर्ष का समय है इसलिए शृंगार वर्णन उस काल के काव्य में स्वाभाविक रूप से होगा ही। भक्ति भी चाहे क्षीण रूप में ही सही उस समय विद्यमान थी। दोनों प्रवृत्तियों का अपने काव्य में समन्वय करने वाले कवि रीतिकाल में बहुत कम रहे हैं।  इस दृष्टि से नागरीदास की गणना उत्कृष्ट कवियों में की जा सकती है। एक तरफ उनके काव्य में शृंगार के सघन चित्र हैं-
      उभरे वाके कुचनि पर, दीठ परी है पेठि।
      मनौं परेवा सिंस तरु, रहे बराबर बेठि।।15

      तो दूसरी तरफ भक्ति की अबाध धारा बहती दिखाई देती है। शृंगार वर्णन सांसारिक बंधनों के चरमोत्कर्ष का बयान होता है। अगर कोई शृंगारिक कवि सांसारिक बंधनों और देह की क्षणभंगुरता का वर्णन करे तो आश्चर्यजनक सुखद प्रतीति होती है। नागरीदास के यहाँ इस तरह के चित्र बिखरे पड़े हैं-
      चली जात है आयु जगत में।
      कहत टेरि कें घरी घरी घरीयाल में।
      समें चूकि बेकाम न फिरि पछिताइये।
      ब्रज नागर नंदलाल सु निस दिन गाइये।16

राधा-कृष्ण की लीला के संयोग शृंगार के वर्णन में कृष्ण भक्त कवि निपुण हैं। रामचंद्र शुक्ल ने कृष्णोपासक भक्तों पर विचार करते हुए लिखा है कि, ‘‘गोपियों का प्रेम दाम्पत्य प्रेम के रूप में होने के कारण अभिलषित सानिध्य भी स्त्री-पुरुष समागम के रूप में, आलिंगन के रूप में ही वर्णन किया गया है।’’17 यह कथन अधिकांश कृष्ण भक्त कवियों के विषय में तथ्यपरक हो सकता है लेकिन नागरीदास के विषय में यह आंशिक सत्य ही है। नागरीदास कई स्थलों पर हमें कबीर के निकट दिखाई देते हैं। ऐसे स्थलों पर वे कृष्ण भक्ति के सिद्धांतों में समाते नहीं हैं। तुलनात्मक उदाहरण दृष्टव्य है-
      इस्क चिमन महबूब का, जहाँ न जावें कोइ।
      जावें सो जीवे नहीं, जीवें सु बौरा होइ।।18
      कबीर बिरह भुवंगम तनि बसै, मंत्र न लागै कोइ।
      राम बिवोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होइ।।19

      स्पष्ट है कि नागरीदास भक्ति की किसी विशिष्ट पद्धति के अनुगामी नहीं थे। उन्होंने सगुण भक्त कवि होते हुए भी निर्गुण संत काव्य से भी प्रभाव को ग्रहण किया है और ऐसा करते समय उनकी कविता में किसी तरह कर हिचकिचाहट हमें दिखाई नहीं देती।

      सजग कवि होने के साथ-साथ नागरीदास नागरिक के रूप में भी सजग दिखाई देते हैं। अपने समय की कुरीतियों पर भी उनके काव्य में टिप्पणियाँ देखी जा सकती हैं। समाज में धन-बल के बढ़ते वर्चस्व पर विचार करते हुए वे लिखते हैं-
सोई प्रतापी सोई कुलीन। जो गृह में धन करि नहि हीन।।
जो बलिष्ट अति परबल हर्ता। जानत ताहि न्याय को कर्ता।।20

      नागरीदास ने दैनिक जीवन के विविध प्रसंगों को अपने काव्य में स्थान दिया है। उनके काव्य में नैतिक उपदेश के साथ-साथ मनुष्य के बदलते स्वरूप पर कटाक्ष भी मिलते हैं। माता-पिता की सेवा न करना, समय पर सोना-उठना, आपसी जलन, पारिवारिक कलह आदि विषयों का उन्होंने सजीव वर्णन किया है। यहाँ तक कि नागरीदास पर्यावरण के प्रति भी सजग हैं। रीतिकाल का यह कवि जब घटते पेड़-पौधों के पर अपनी चिंता ज़ाहिर करता है तो प्रतीत होता है कि वह अपने समय से आगे का कवि था-
      अंब कंदवादिक नहिं होत। मिटि गये भले द्रुमनि के गोत।।
      मुंजा कैर जवासा रास। रहि गये थोहर बंबुल फरास।।21

      यहाँ यह स्मरणीय है कि नागरीदास ने अपनी यह चिंता सन् 1738 में व्यक्त की है।
कवि के साथ-साथ नागरीदास चित्रकला प्रेमी भी हैं। भारतीय चित्रकला में 'किशनगढ़ शैली' का विशेष स्थान है। नागरीदास के शासन काल में कृष्णगढ़ राज्य में चित्रकला अपने उत्कर्ष पर पहुँची। उनके प्रश्रय में उस समय के प्रसिद्ध चित्रकार निहालचंद ने किशनगढ़ शैली को विकसित किया नागरीदास की प्रेरणा से निहालचंद ने 'बनी-ठनी' का चित्र बनाया जिसे भारत की मोनालिसा के नाम से संबोधित किया जाता है। भक्ति, शृंगार और चित्रकला की ऐसी अनुपम मिसाल अन्यत्र दुर्लभ है। 'किशनगढ़ राज्य का इतिहास' पुस्तक में मोहनलाल गुप्ता नें लिखा है, "महाराजा सावंत सिंह श्री कृष्ण भक्त तथा चित्रकला का ज्ञाता था और कलाप्रेमी नागरीदास के नाम से प्रसिद्ध हुआ। नागरीदास के कारण ही किशनगढ़ के चित्रों को नई पहचान मिली। सावंत सिंह के समय में निहालचंद बड़ा चित्रकार हुआ जिसने बनी-ठनी के चित्र को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति दिलवाई। सावंत सिंह ने ही निहालचंद को कृष्ण और राधा के चित्र बनाने के लिए प्रेरित किया। किशनगढ़ की चित्रकला की उत्पत्ति और विकास का श्रेय कवि नागरीदास को जाता है। उनकी साहित्यिक अभिरुचि और कलाप्रेम ने चित्रकला के ऐसे दुर्लभ उदाहरण प्रस्तुत किए जो भविष्य में संसार की चित्रकला का मार्ग प्रशस्त करते रहेंगे।"22

      आत्मनिंदा करने की क्षमता बड़प्पन की निशानी होती है। प्रत्येक बड़े कवि ने आत्मनिंदा के द्वारा अपने व्यक्तित्व की खामियों को रेखांकित किया है। तुलसी, सूर, कबीर आदि भक्त कवियों में तो इस प्रवृत्ति को आसानी से देखा जा सकता है। नागरीदास की गणना भी इसी परंपरा में की जा सकती है। अपने अवगुणों की तरफ ध्यान आकर्षित करते हुए कवि नागरीदास ने लिखा है-
      देखो मो ओगुँन इहैं, हौं ओगुननि जिहाज।
      ओगुन बरनत और के, मोहि न आवत लाज।।23

      नागरीदास के भाषा विषयक प्रयोग विशेष उल्लेखनीय हैं। वह ब्रज मंडल में निवास करने वाले कृष्ण भक्त कवि हैं। इस नाते उनके काव्य की भाषा ब्रज हो यह तो स्वाभाविक ही था लेकिन अपनी कविता में वे मात्र ब्रज तक की सीमित नहीं रहते। जैसा कि हम ऊपर उल्लेख कर आए हैं उनके काव्य में अरबी-फारसी के शब्दों की भरमार है। इतना ही नहीं एकाध स्थल पर उन्होंने एक ही पद में कई भाषाओं का प्रयोग किया है। चार भाषाओं से युक्त उनका एक सवैया दृष्टव्य है-
      नागर मैन सरोवर मीनकि पंकज की पंखियां अनियारी                 (ब्रज)
      स्यामे मोटे हिरणी बतावियो जूवो तमें सहू सोच बिचारी          (गुजराती)
      गोया ममोले या खज्जन खासे तारीफ करें क्या जुबान हमारी           (उर्दू)
      बीजी न मींढ लागै काहि ओपमा कान्ह जीरी आंख्यां कामणगारी24 (राजस्थानी)

निष्कर्ष :     संक्षेप में, नागरीदास की कविता में जो भक्ति भावना प्रकट हुई है, उसमें मानवीय प्रेम को चित्रित करने वाला शृंगार भी पर्याप्त मात्रा में है। वह जीवन से थके कोई वैरागी भक्त कवि मात्र नहीं हैं, अपितु वे प्रेम के मार्ग पर चलने वाले शृंगारी भक्त कवि हैं। कथ्य एवं भाषा के स्तर पर उन्होंने अनेक प्रयोग किए हैं। जिनका अध्ययन पूरी तरह से नहीं हो सका है। नागरीदास बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनके काव्य को गहराई से समझने के लिए उसको विविध दृष्टिकोणों से अध्ययन की आवश्यकता है।

संदर्भ :
1. सरोज सर्वेक्षण, किशोरीलाल गुप्त, हिंदुस्तानी अकादमी, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 1961, पृष्ठ 380
2. मिश्रबंधु विनोद (खंड 1-2), दुलारेलाल भार्गव, लखनऊ, संस्करण 1972, पृष्ठ 201
3. हिन्दी साहित्य का इतिहास, सं- नगेन्द्र, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, द्वितीय संस्करण 1976, पृष्ठ 238
4. भक्ति आंदोलन का अध्ययन, रतिभानु सिंह नाहर, किताब महल प्राइवेट लिमिटेड, इलाहाबाद, पृष्ठ 347
5. मिश्रबंधु विनोद (खंड 1-2), पृष्ठ 370
6. हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, नागरीप्रचारिणी सभा, वाराणसी, 32वाँ संस्करण, पृष्ठ 191
7. नागरीदास ग्रंथावली, सं- फैयाज अली खाँ, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, संस्करण 1974, पृष्ठ 115
8. सूरदास, रामचंद्र शुक्ल, चिंतन प्रकाशन, कानपुर, संस्करण 2003, पृष्ठ 59-60
9. वही, पृष्ठ 59
10. रीतिकालीन कवियों की प्रेम व्यंजना, बच्चन सिंह, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, प्रथम संस्करण 2015 वि., पृष्ठ 442
11. नागरीदास ग्रंथावली, पृष्ठ 141
12. रसखान: काव्य तथा भक्ति भावना, माज़दा असद, पृष्ठ 333
13. भक्ति आंदोलन का अध्ययन, रतिभानु सिंह नाहर, पृष्ठ 173
14. नागरीदास ग्रंथावली, पृष्ठ 204
15. वही, पृष्ठ 126
16. वही, पृष्ठ 71
17. सूरदास, रामचंद्र शुक्ल, पृष्ठ 46
18. नागरीदास ग्रंथावली, पृष्ठ 115
19. कबीर ग्रंथावली, सं- माताप्रसाद गुप्त, साहित्य भवन, इलाहाबाद, सं. 1997, पृष्ठ 15
20. नागरीदास ग्रंथावली, पृष्ठ 193
21. वही, पृष्ठ 195
22. किशनगढ़ राज्य का इतिहास, गुप्ता, मोहनलाल, सुभदा प्रकाशन, जोधपुर, पृष्ठ 235
23. नागरीदास ग्रंथावली, पृष्ठ 192
24. वही, पृष्ठ 47
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