कहानी: कोको गुनगुनाती है

प्रियांकी मिश्रा

- प्रियांकी मिश्रा


"नरेश नाम है मेरा, नरेश नागपाल", पूछने पर बताया उसने। चेहरे पर लकीरें उभर कर भरी हुई, असमय मुरझाते यौवन के अवशेष, प्रौढ़ावस्था की अंतिम सीढ़ी गिनती उस औरत से मेरी यह पहली मुलाकात थी। बदरंग नाइटी और ऊपर से ओढ़ी गई उस से भी ज्यादा बदरंग चुन्नी, उसकी बदहाल जिन्दगी को बखूबी बयान कर रहे थे।
पर उसको देखकर मेरी आँखे चमक उठी थी। ऐसा लगा था मानो ईश्वर ने मेरी सुन ली हो। अपनी नौकरी के सिलसिले में विगत एक वर्ष से मैं अपने स्थायी निवास से बाहर थी। ऐसे में अपने पति की सहायता के लिए उसको बड़े मनुहार से अपने घर अपनी गाड़ी में बिठा कर ले गई थी मैं। मेरी सहेली जिसने मुझे उसका पता दिया था और जिसके यहाँ यह पूर्व में काम करती थी, इस मंतव्य की थी कि मेरा आउटहाउस देखने के पश्चात वह मेरे प्रस्ताव को ठुकरा नहीं सकेगी। इस प्रकार मेरी एक अदद काम वाली मिलने की संभावना प्रबल हो जायेगी। बहरहाल, हुआ भी कुछ ऐसा ही। अगले ही रोज, अपना संपूर्ण माल असबाब एक ऑटो रिक्शा में लदवा कर वह प्रातः काल ही मेरे घर आ गई।

ज्यादा कुछ तो था नहीं उसके पास। एक काठ की चौकी और टीन का एक पुराना बक्सा। इसके अलावा बिल्कुल एक रंग रूप के, अनाज रखने के कुछ डब्बे। हाँ, दुर्गा माँ की एक तस्वीर और तुलसी के पौधे का एक गमला, सबसे ज्यादा सहेज कर लाई थी वह। घर को नल में पाइप लगा कर धो-धो कर जब सब कुछ नियत स्थान पर रखा उसने, तो सचमुच ही वह छोटा सा कमरा मंदिर जैसा पवित्र हो गया था। उसके चेहरे की चमक तब देखते ही बनती थी। स्वाभिमान तो मानो कूट कूट कर भरा हुआ था उसमे। ऑटो वाले को पैसा देना चाहा था मैंने पर इंकार कर दिया उसने, "है भाभी, रखा है मैंने  देने के लिए" कहकर।

घर की सारी मुख्य जिम्मेदारियों, खानपान आदि की व्यवस्था समझा कर मैं  वापस अपने कार्य स्थल पर लौट गई। चिंता तो बनी हुई थी। एक नये व्यक्ति के हाथ में इतने सारे कामों का  कार्य भार देकर, मैं किसी भी तरह से निश्चिंत नहीं हो पा रही थी। हालांकि उसने मुझे बहुत आश्वस्त करने का प्रयास किया था, पर मैं उसके व्यक्तित्व को थोड़ी सी देर में ही, भली-भांति निचोड़ चुकी थी। निहायत ही हड़बड़िया, कई बार एक ही वाक्य को दुहराना, खुद से ही कुछ बड़बड़ाते रहना, भूलने की आदत, ये सारी बातें मुझे किसी भी तरह से संयत नहीं होने दे रही थी।

सहेली ने उसके जीवन से जुड़े कुछ खास पहलू मुझे बता रखे थे। ये एक पंजाबी औरत थी, तीन बच्चियों को जन्म देने के पश्चात, पति एक रोज अपनी दो बेटियों को लेकर कहीं भाग गया था। इसके साथ इसकी एक नवजात पुत्री रह गई थी। उस सदमे ने इसके मस्तिष्क पर गहरा असर डाला था और यह अर्द्ध विक्षिप्त सी हो गयी थी। सोचती हूँ, कैसी कोमल दिखती होगी उस वक्त यह भले घर की सरदारनी, और कैसे संभाला होगा उसने अपने आप को उस परिस्थिति में। शायद इसीलिए उसका व्यवहार थोड़ा असंतुलित था।

मैं जब हर शनिवार को घर लौटती, थोड़ा-थोड़ा अपने घर के तौर तरीकों से उसे वाकिफ कराती। बतौर मेरे पति, "वह एक कम्प्यूटर है, उसमें जितना फीड करोगी, उतना ही आउटपुट निकलेगा", बिल्कुल सही था। कभी-कभी मेरा धैर्य जबाब दे जाता और मैं खीझ जाती थी। पर उसमें सीखने की उत्कट इच्छा पाई मैंने। मेरा हर एक वाक्य उसके लिए ब्रह्म वाक्य था और वह बिल्कुल लकीर के फकीर की भाँति उस पर अमल करती थी।

जितनी सहानुभूति मुझे उसके लिए होती, उससे दुगुनी ममतामयी छाँव से वह मेरे लिए तत्पर रहती। शनिवार से सोमवार तक, पुनः लौट जाने तक, वह कोटि बार मुझे बोलती, "आप बहुत थक जाती होंगी, चलिए आपके पैर दबा देती हूँ।" गृह संचालन में व्यस्त होने की वजह से और उसकी थकावट देखकर मैं भी उसको कभी कुछ नहीं बोलती, पर कभी-कभी लोभ हो जाता था। ऐसे ही समय में, अपने रूखड़े हाथों से मेरा शरीर दबाती वह कुछ कुछ बतियाती जाती थी। गजब का ताकत था उन हाथों में। मेरे कण कण-कण का दर्द मानो निकलता जाता था और मुझे नींद की हल्की थपकी आने लगती थी।

इन्हीं पलों के दौरान मुझे इसके जीवन की गाथा ज्ञात हुई। अबोध बालिका थी वह जब इसकी माँ किसी अन्य पुरूष के सामीप्य में, इसे छोड़ कर भाग गई। दादी के स्नेह और लाड़ दुलार में अपनी छह बुआ और तीन चाचाओं के साथ यह भी पल गई। दादी उसे प्यार से कोको बुलाती थी। समय आने पर छह बुआओं के साथ इसकी भी शादी करवा दी गई। पर नियति को तो कुछ और ही मंजूर था। पति इसे इस कदर मजबूर छोड़ कर चला गया और फिर कभी लौट कर नहीं आया। निहायत भरे-पूरे परिवार में रहने के बाद भी जब अपनी बच्ची का और अपना हक मिलना असाध्य पाया उसने, तो निकल पड़ी जिन्दगी के कंधे से कंधा मिलाने। अपने ही घर में एक कमरा नहीं नसीब हुआ उसे।

किराये का कमरा लेकर घर घर बर्तन माँजने का काम शुरू किया। समय का पहिया घूमता रहा। बेटी बड़ी होकर जब प्रेम की पींगें बढ़ाने लगी, तो उसके पर काटने का सबसे अच्छा तरीका निकाला उसने। उसी लड़के के साथ हाथ पीले कर उसे ससमय विदा कर दिया।

"जवान लड़की थी भाभी, कैसे संभालती जमाने से," ऐसा कहती रहती  वह। जामाता को अपनी जमा पूंजी से एक ऑटो खरीद दिया। अपनी दो नवासियों का यथायोग्य सत्कार करती रही। दामाद को तो फूटी कौड़ी भी नहीं सुहाती थी वह, पर बेटी में तो उसका अपना रक्त संचरित  हो रहा था। यदा-कदा उसकी बेटी ही आकर उसका हाल चाल पूछ जाती थी। ऐसे समय में, अपनी अल्प वयसी नतनियों पर अपनी ममता उड़ेल कर अपने ऊपर तब अमृत वर्षा कर लिया करती थी वह।

मैं उसके जीवट के बारे में सोच कर दंग रह जाती। कैसे इस निष्ठुर संसार से अपनी और अपनी खूबसूरत बेटी की रक्षा की होगी उसने, उसके हौसले के आगे नतमस्तक थी मैं। कितनी बार टूटी होगी वह, पर पस्त नहीं हुई। बड़ा क्रोध आया था मुझे उसके पति पर। मेरे क्रोध को भांप गई थी वह, और बड़ी ही निस्पृहता से जबाब दिया था उसने, "उसकी गलती नहीं थी भाभी। मटका खेलता था वह,बहुत कर्ज हो गया था उस पर। इसलिए भागना पड़ा उसे।" विस्मित होकर मैं उसके इस वाक्य की प्रतिक्रिया सिर्फ मौन में ही व्यक्त कर पाई थी। ऊपर से इतना चंचल दिखने वाला मन, अंदर से गिरि की तरह अटल था, यह समझ गयी थी मैं। दोष किसी का नहीं होता, हमारे इर्द-गिर्द की परिस्थितियाँ जिम्मेदार होती हैं होने वाले घटना क्रम के लिए,ऐसा निष्कर्ष मैंने निकाला उस दिन। पति के नाम का सिन्दूर और उसी की गोल बिंदी अब भी उसके माथे पर दप-दप दमक रही थी।

ऐसे ही एक दिन लेटे-लेटे जब मैं उठकर किचन में गई, कोको खाना बनाने में मशगूल थी। पाक कला में वह निपुण थी और बहुत कम व्यय में बहुत अच्छा खाना बना कर किसी को भी मुरीद बना सकती थी। गैस पर चढ़ी हुई कढ़ाही में सब्जी चलाती हुई वह कुछ गा रही थी और आनंद के सागर में निश्चिंत गोते लगा रही थी। उसने मुझे नहीं देखा और मैंने भी उसकी लय को भंग नहीं किया। दरवाजे के पीछे खड़ी होकर मैं भी उसको काँच से एकटक निहारती रही और मेरे मन में सिर्फ यही विचार कौंधे, "कोको भी गाना गाती है।"

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