पुस्तक समीक्षा: कविता में उम्मीद की परवाह का कवि, रविशंकर उपाध्याय

शैलेन्द्र कुमार शुक्ल

शैलेन्द्र कुमार शुक्ल 

“मनुष्य होने का अर्थ संवेदनशील और सजल होने से है, जो किसी भावुकता के दायरे में नहीं, बल्कि प्रतिबद्धता के रास्ते विकसित हुआ हो। भावुकता व्यक्ति को सजल नहीं दुर्बल बनाती है। मनुष्य होना दुर्बलता से मुक्ति है। यह मुक्ति वैज्ञानिक चेतना की बदौलत ही संभव है।” - रविशंकर उपाध्याय
 उम्मीद अब भी बाकी है : रविशंकर उपाध्याय : प्रकाशक : राधाकृष्ण, नई दिल्ली : मूल्य : ₹ 200 रुपये
          उम्मीद अब भी बाकी है यह सिर्फ एक कविता की पोथी नहीं, इसमे एक अधूरी ज़िंदगी के निशान है। यह निशान इतने हल्के भी नहीं कि भुला दिये जाएँ। रविशंकर उपाध्याय के जाने के बाद जब यह किताब आई , तब मैं इस किताब पर कुछ भी लिखने के काबिल खुद को नहीं पा रहा था। मैं कविताओं पर भावुकता से बचते हुये लिखना चाहता था। भावुकता के संदर्भ में उनके द्वारा याद दिलाती यह हिदायत मुझे जदा-कदा डाँटती रहती थी और मैं इस बाबत कलम छूने की हिम्मत न कर पाता। रविशंकर उपाध्याय कविता के जीवट थे, जब वह कविता नहीं लिखते थे, तब भी उनमें कविता के प्रति एक गहन लगाव लगातार दिखाई देता था। उनके बारे में सदी के महाकवि केदारनाथ सिंह कहते हैं, “रविशंकर के बारे में कहने के लिए बहुत सी बाते हैं पर मैं चाहता हूँ यह संग्रह ही लोगों से बोले बतियाए।” तो कविता पर बात हो।
          रविशंकर उपाध्याय की कविताएँ पढ़ते हुये लगता है कि वह सामञ्जस्य को चुनौती दे रही हैं, वे टकराकर सीधे आरोप नहीं मढ़तीं। उनकी कविता में जिस पक्ष पर बात होती है, उसमें वह शोषित वर्ग के साथ पूरी पक्षधरता के साथ दिखाई पड़ते हैं। उनके यहाँ कलावाद विडम्बना परक साधुवई नहीं दिखती। यहाँ साधुवई से आशय कलावादी होते हुए भी कलावादी न होने का ढोंग प्रदर्शित करना – ‘मन न रंगाए रंगाए जोगी कपड़ा’। कलावादी सधुवई का एक अनोखा पाखंड इधर हिंदी कविता में पनपा है, यह कवि अपने को कलावादी नहीं कहते लेकिन उनका शिल्प कलावाद की सधुवई प्रकट कर ही देता है। रविशंकर की कविता इस प्रकरण से मुक्त है। संग्रह की पहली कविता है ‘21वीं सदी का महाकाव्य। यह कविता उनकी कवित्व की तासीर बता देती है। यह कविता, कविता की गढ़ी गई परिभाषाओं पर प्रश्न भी उठाती है। या सवाल इतना संजीदा है कि समझना जितना कठिन है, समझना उतना जरूरी भी। माना मानव को कविता की जरूरत है लेकिन मनुष्यता को एक बड़े चरागाह में जिसने तब्दील किया और जो तब्दील हुये, कविता उन दोनों से छिनी। अब सवाल यह है कि कविता किसके लिए और जिसके लिए है, उस तक उसकी पहुँच क्यों नहीं। पहुँचे उसे जिसे पहुँचना जरूरी है, फिर वह कविता भी खोज लेंगे। आवश्यक यह है कि कविता पक्षधरता की होनी चाहिए चाटुकारिता बनाम लंपटई की नहीं। एक कवि को सामाजिक स्वस्थ्य के लिए सचेत होना चाहिए और यह कविता इस तथ्य की गवाही देती है-
भेड़ों के झुंड के साथ
हवा ने चलना शुरू किया
जंगलों से कस्बों की ओर ।

          यह क्या है? ये सीधी-सादी लगती पंक्तियाँ हैं जो दिमाग में बल देने पर कंपन करने लगती हैं। हवा का चलना लाज़मी है लेकिन यहाँ हवा रुख़ मोड़ने वाली नहीं, यह गुलाम बयार है, यह भेड़ों के झुंड के साथ चलती है। यह जंगल से तो आई है लेकिन भेड़ चाल की आदी है जो एक आदत सी बन कर रह गई है। यहाँ जंगल भी एक सोची-समझी साजिश का शिकार बन कर आया है। इसमें हितकारी और अधिकारी हित की मौजूदगी नहीं। यह जंगलों से कस्बों की  ओर जाने वाली हवा है। यह हवा एक मजबूरी है जो साज़िशों का शिकार हुई है। भारत के आदिवासी समाज पर आज क्या बीत रही है, इस पर बात करना देशद्रोह समझा जा रहा है, वहाँ की बातें, वहाँ की घटनाएँ लगातार छिपाई जा रही हैं। यह कविता इस ओर बड़ी संजीदगी से इशारा करती है। देखिये-जहां बारह साल का एक लड़का/ सूरज की रोशनी के साथ ही/ घर से निकलता है/ और उसकी वापसी/ सूरज ढलने के साथ ही होती है यह सूरज ढलने के साथ की वापसी यह पूछने पर मजबूर करती है कि आखिर सबलता का प्रतिरोध हमारे न्याय की पुरजोर गवाही क्यों नहीं देता। क्या सूरज की रोशनी में अन्याय जायज है ? यह कविता देश से सवाल करती है। 12 साल के बच्चे की उम्मीदों की हवा को भेड़ के झुंड के रूप में नीरस और मजबूर किसने किया ? क्या कविता का यह सवाल सस्ता लगता है? यह चूलें हिला देने वाला सवाल है। सोचना गर आज सुलभ होता तो इन पंक्तियों पर भी गौर किया जाता-
“उसके तन पर होती है
किसी बड़े बाबू की कमीज
और मन में भूख की तमीज
जिसे किसी अनंत गह्वर में
विशाल शिलाखंड के नीचे
धकेल दिया गया हो”             
यह बारह साल की उम्र वाले बच्चे का भारत बड़ी आँख से ओझल किया जा रहा है। उसकी भूख अपनी तमीज भूल जाए इसके लिए उसे प्रताड़ित किया जा रहा है, उसे अपनी बड़ी-बड़ी अय्याशियों के शिलाखंडों से अनंत गह्वर में दबा दिया गया है । और जिसने दबाया है उसके साथ सत्ता है, उसके पास शक्ति है। यह वर्ग अपने लिए जघन्य कृत्य करता जा रहा है। यह कविता व्यवस्था की पड़ताल करती है और कवि अपनी पक्षधरता के साथ, उन आदिवासी बच्चों के साथ खड़ा दिखता है, जिनका जंगल, गाँव, और रोजगार छीना जा चुका है, उन्हें हाल-बेहाल दयनीय हालात में छोड़ दिया गया है। यह देश की जनता है। यह सोचने की उन्हें फुर्सत ही नहीं-
कस्बे की नालियाँ और कूड़ाघर ही
बन चुके हैं उसके कर्मक्षेत्र
जहां वह दिन भर तलाशता है
अपनी खोई हुई रोटी
और नन्ही-नन्ही अंगुलियों से
सड़क की पटरियों पर लिखता है
21वीं सदी का महाकाव्य।”                                                            

रविशंकर जिसे 21वीं सदी का महाकाव्य कहते हैं, वह सिर्फ कलम-कागज को मोहताज नहीं, यह आंखिन देखी संवेदना को साधने की लड़ाई है। कवित्व में पक्षधरता को स्वीकारने में सच की लड़ाई है। यह बताने की भी जरूरत है कि यहाँ कवि होने का मतलब भावुकता के राग अलापना नहीं, नन्ही-नन्ही अंगुलियों में लालित्य के शाब्दिक पद-बंध बांधना नहीं है कवित्व। मंचों पर इनकी गरीबी पर संवेदना की भीख रस-छंद-अलंकार के माध्यम से मांगना भी नहीं है कविता का काम। कविता एक कवि का पक्षधर होना है। इस पक्षधरता में एक आदिम उम्मीद है, इस पक्षधरता से इतिहास का पहिया विचारों की गति में घूमता है। कविता से भले ही कोई प्रबल क्रांति नहीं होती लेकिन कविता जंग खाये दिमागों में झनझनी पैदा कर देती है।
          इस संग्रह में एक बहुत ही संवेदनशील कविता है कछार में सोई वह। यह कविता समाज की विकृत होती मानसिकता की सड़ांध को आईना दिखाती है। बदलाव जिस भेड़-चाल में हुआ है उसका खामियाजा समाज को गैरजिम्मेदार बना कर बर्बरता की ओर धकेल देता है। समृद्ध वर्ग अपनी ऐयाशी में लगातार ज़िम्मेदारी से भागता है और निम्न वर्ग उसका दंश झेल कर कराहता रह जाता है। पूंजीवादी दौर में समाज सामंतवाद की केंचुल का भी शिकार हो जाता है क्योंकि भारतीय समाज में पूंजीवाद के अनुकूल देशव्यापी संसाधन नहीं हैं और सामंतवाद के पास अब बाजार और उसके मुआफिक मूल्य नहीं रहे। इन दोनों के मेल से एक साजिश तैयार की गई है जिस व्यवस्था का भारतीय समाज लगातार शिकार होता जाता है। यहाँ भ्रांतियाँ भी अपराध करने में गुरेज नहीं करतीं। यहाँ स्त्री सामंती जंजीरों में बंधी रहती है और पुरुष पूंजीवादी दिमाग से सतत खुरचाल चला करता है। इस कविता में एक वकील साहब की बहू का दृश्य सामने है जिसे उसके पति ने छोड़ दिया है, उसके पास कोई दूसरा अवलंब नहीं है, वह पुरुष प्रधान समाज की आश्रित है, उसका अब कोई सैयाँ-गोसइयाँ नहीं है, वह पागल हो चुकी है, उसका घर निकाला भी हो चुका है, वह गाँव से मांगते खाते भिखारिन बनी शहर में दर-ब-दर मारी-मारी फिरती है। उसका पति किसी मल्टीप्लेक्स वाली मचलती युवती की बाँहों में डूब गया है। कवि लिखता है -
वह अब किसी की बहू नहीं रही
न ही किसी की पत्नी।
वह तो बन चुकी है
मुहल्ले के छोटे-छोटे बच्चों का खिलौना
और कुछ नौजवान शराबी लफंगों के लिए
अपने ही जिस्म की देन-दात्री।

यह है भारतीय स्त्री की चरम परिणति जिसे सामंती मूल्यों ने धकेल कर बेहद क्रूरता से उसका शोषण किया है। एक दूसरी स्त्री है जो मल्टीप्लेक्स वाली है जिसे पूंजीवादी ताकतों ने अपने भोग के लिए खरीदी हुई वस्तु बना रखा है। बूढ़ी होने पर इसका भी वही हश्र हो सकता है। समाज की विकृत्यों में देश की आधी आबादी कितनी प्रताड़ित और अमानवीय समझी जाती है यह कविता इसकी गवाही देती है। व्यवस्था की ठगी हुई संस्कृति लगातार जार-जार होती जाती है किसी को कोई परवाह नहीं-“वह रोज-ब-रोज किसी-न-किसी
बड़े महासागर से गुजरती है
जहां होते हैं
मुहल्ले के कुत्ते
उसके प्रतिद्वंदी
जो उसके द्वारा इकट्ठे किए गए
रोटी के टुकड़ों को चाहते है झपटना

आज की संस्कृति सामंती-पूंजीवाद की रखैल बन कर रह गई है। उसे जैसे चाहे व्याख्यायित कर व्यवस्था अपना हित साधती है। इसका काम है लफंगे और धर्मधुरंधर पैदा करना। यह समाज को चेतना-शून्य बनाने के लिए लगातार प्रयासरत है। संस्कृति की दुहाई देकर उच्च-वर्ग सदैव निम्न-वर्ग को शोषित करता है। संस्कृति के सारे आडंबर वर्चस्व की बर्बरता में एक गांठ बन कर भारतीय स्त्री के ऊपर थोप दिये गए हैं। इससे उबरना जितना मुश्किल काम है उतना ही जरूरी भी। इसकी कसक रविशंकर की कविताओं में लगातार दिखाई देती है। स्त्री संस्कृति के ठहराव में एक ठगी हुई हुई विधा बन कर रह गई, इस गहरी खाई को चेतना के बल महसूस किया जाना जरूरी है –
“हमारी देह के इतर नहीं बना कभी हमारा भूगोल
इतिहास के हर पन्ने पर
लिखी गई युद्ध की विभीषिका के लिए
हमें ही ठहराया गया जिम्मेदार
नैतिकता की हर परिभाषा को
गढ़ने के लिए बनाया गया हमें आधार
मगर हम नहीं बन पाये खुद आधार
तुम्हारी कठपुतलियाँ बन नाचते रहे !”

यह है देश की आधी आबादी का सच, जिसे धार्मिकता के आवरण में तरह-तरह के जामे-पैजामे पहनाए जाते रहे। ओहारों में ढकी देश की सुंदरता का खूब बखान वर्चस्व की संस्कृति के अंतर्गत हुआ। दरअसल यह बखान सिर्फ एक साजिश थी, एक छलवा था, शोषण का इमोशनल हथियार था। स्त्री के सौंदर्य में इतने नख-शिख और नायिका भेद के ग्रन्थों का अंबार इसी ओर इशारा करता है। आज तक की हिंदी कविता का रोमांटिसिज़्म इस संक्रामण का शिकार है। यह स्त्री सौंदर्य की पुरुषवादी मानसिकता के निमित्त ही दिखाई पड़ता है। यह एक बड़ा सवाल है, जिसे उठाया जाना जरूरी है। रविशंकर कविता में इस पर संवाद करते नजर आते हैं-
अब हमें नहीं है जरूरत
किसी ईश्वर के प्रार्थना की
हमारे होंठों, कदमों और हमारे भूगोल को
नहीं है चाहत तुम्हारी
किसी व्याख्या की।

स्त्री मुक्ति जिस विमर्श का हिस्सा बन कर उभरी वह भी अधकचरी बौद्धिकता के सामंतों की लाभवंत साज़िशों का शिकार होती गई। इन्होंने भारतीय समाजिकता को समाजशास्त्रीय तर्कों से न परख कर एक क्रांति के चलताऊ रूप पर ज़ोर-शोर से बोलना शुरू किया। इसी का यह परिणाम निकला जो विसंगतियों को वैचारिकता के धरातल पर छांट नहीं सका। इस संक्रमण को अपनी बौद्धिक ताकत समझता पुरुषवादी समाज अपने दिमाग के जर्जर किवाड़ बजाता रहा और अपनी जरूरत भर की प्रगतिशीलता के ढ़ोल बजा कर उत्सव मानता रहा। लेकिन विचारों को यथार्थ का मुँह नहीं देखने दिया। ये लोग मुक्ति की बात करते हैं। मुक्ति कविता से इसका हवाला लीजिये-
“ये लोग नारी मुक्ति के आकांक्षी थे
जैसे किसान के खूँटे और पगहे से
गाय की मुक्ति का आकांक्षी होता है
कसाई !”

रविशंकर उपाध्याय की कविता में अभी बहुत चिंतन की जगह थी। वह एक पूरी कविता थे जो अधूरी रह गई। लेकिन जो भी है, वह अधूरा विस्तार पा रहा है। उसे भुलाया नहीं जाना चाहिए। उनकी छोटी कवितायें एक शानदार धार लिए हुये हैं। जो अक्सर वक्त-बे-वक्त याद आ ही जाती है। इन कविताओं में जीवन के विचारात्मक अनुभव बोलते हैं। उनमें गहराई अधिक है। जैसे एक कविता है आदमी और मच्छर। यह कविता एक सूक्त वाक्य है-
मच्छर आदमी का खून चूसता है
पेट भर
आदमी कितना भी खून चूसे
उसका पेट नहीं भरता।

यह आज के पूंजीवादी समाज की बर्बरता का एक मुहावरा है। कविता में मुहावरा देना और उस मुहावरे की पहुँच को पहचाना कवि की चेतना का द्योतक है। आदमी की प्रवृत्ति जो इन दिनों बदली है उसमें सामंती-पूंजीवाद की एक भरी-पूरी झलक देखी जा सकती है। यह एक राजनीतिक मुहावरे को समझने और उसकी पड़ताल करने के लिए जरूरी समय है। हम अपने समय को पहचानें अपने वर्तमान से रू-ब-रू हों, यह मनुष्य होने के लिए जरूरी है। रविशंकर उपाध्याय का यह कविता संग्रह इसी सचेतना का परिणाम है। इस संग्रह की कविताएँ हमें समय से संवाद करने के लिए प्रेरित करती हैं। उन्होंने अपने समय को पहचाना है, यह समय अधर में लटके त्रिशंकु की तरह है-
यह विचारधारा से मुक्ति का समय है
या परंपरा और आधुनिकता के बीच
लटकने का समय है
या बंधन और मुक्ति के बीच
लटकने का समय है
यह गाँव और शहर के बीच
लटकने का समय है
अब तो ईश्वर भी लटक रहा है
कभी पकड़ने तो कभी छोड़ देने के बीच

यह समय अपने लिए
अपनों को भूल जाने का समय है

अपने समय पर अचूक नजर जमाये रविशंकर की कविताएँ पढ़ना शातिर दौर को पहचानना है। कवि को एक सचेतक होना चाहिए और वह थे। यह संग्रह उनके जाने के बाद छपा, उनकी यह धरोहर उनके चाहने वालों के पास स्मृति के रूप में मौजूद है और रहेगी। उनकी कविताओं पर अभी और बात होनी है लेकिन अभी इतना ही। उनकी एक कविता पथिक को याद करते हुये-
“तुम्हारे कंपन में प्रवेश करना ही
मेरा धर्म है
तुम्हारी थकान में चलते जाना
मेरा कर्म।”                                                  

लेखक परिचय: रविशंकर उपाध्याय (12 जनवरी, 1985 - 19 मई, 2014)

रविशंकर उपाध्याय का जन्म ग्राम अकोढ़ी, जिला कैमूर (बिहार) के एक मध्यवर्गीय किसान परिवार में हुआ। इन्होंने प्रारम्भिक और माध्यमिक शिक्षा गाँव से प्राप्त की और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक और परास्नातक हुये। यहीं से कुँवर नारायण की कविताओं पर शोध किया और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में 'अखिल भारतीय युवा कवि संगम’ का सफल आयोजनकर्ता रहे।

अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ एवं आलेख प्रकाशित। का.हि.वि.वि. के हिन्दी विभाग की पत्रिका 'सम्भावना’ के आरम्भिक तीन अंकों का सम्पादन तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की सृजनशीलता पर केन्द्रित 'संवेद’ पत्रिका के फरवरी, 2013 अंक का अतिथि सम्पादन। निधन के बाद 'उम्मीद अब भी बाकी है' (कविता संग्रह) राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित।

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