सामाजिक सन्दर्भों में रामचरितमानस का मूल्यांकन

डॉ. योगेश राव

योगेश राव



 भारतीय लोक जीवन में बहुत प्राचीन काल से ही सम्मान पाती चली आयी ‘राम की पावन कथा’ को लेकर गोस्वामी तुलसीदास ने– ‘न भूतो न भविष्यत’– के कथन को चरितार्थ करने वाले अपने महान् काव्यग्रन्थ रामचरित मानस की रचना की। नानापुराणनिगमागम में बिखरी भारतीय संस्कृति और रीति-नीति इस एक ही काव्य-ग्रन्थ में आ विराजती है। रामकथा को आधार बनाकर भारतीय परम्परा में जितनी भी रचनाएँ हुई हैं, तुलसीदास का ‘रामचरितमानस’ उन सब में ‘नवल विधु’ सिद्ध हुआ है। इस महान् ग्रन्थ में तत्कालीन धर्म, राजनीति, सामाजिक आदर्श सभी कुछ साकार हो उठा है। उस युग की छोटी–से छोटी भावना भी इस काव्य में स्थान पाती है। संक्षेप में, रामचरित मानस भक्ति और धर्म का प्रतिपादक महान् ग्रन्थ होने के साथ ही एक उच्चकोटि का महाकाव्य भी है।

 ‘रामचरितमानस’ भारतीय संस्कृति का ऐसा ‘नवविमलविधु’ है, जो कभी घटता नहीं, निरंतर बढ़ता ही रहेगा तथा जो कभी अस्त भी होने वाला नहीं। ‘सिया–राममय सब जग–जानी’ की मान्यता रखने वाले गोस्वामी तुलसीदास ने, इस काव्य में राम के चरित्र का गुणगान कुछ इस प्रकार से किया है कि भारत की आदर्श समझी जाने वाली समस्त लोकमान्यताएँ तथा समग्र भारतीय संस्कृति राम के व्यक्तित्व में समाहित हो गई हैं। रामचरितमानस भारतीय संस्कृति का जीता–जागता स्वरूप बन गया है। परम्परागत कोई भी लोक-मर्यादा या धार्मिक-मर्यादा ऐसी नहीं है, जिसे रामचरितमानस में स्थान न मिला हो। यह काव्यरत्न ‘नानापुराणनिगमागम’ में जो कुछ भी विस्तार से प्रतिपादित है, उन सब का साररूप है।

 गोस्वामी तुलसीदास ने इस काव्य की रचना ‘स्वान्तः सुखाय’ की थी पर यह रचना भारतीय जनजीवन में सांस्कृतिक चेतना फैलाने का बहुत बड़ा माध्यम बनी। तुलसी का ‘स्वान्तः सुखाय’ प्रयत्न ‘जन–जन हिताय’ बन गया। इस का एक मात्र कारण यही है कि न तो लौकिक जीवन का और न ही धार्मिक तथा आध्यात्मिक जीवन का कोई अंश बाकी बचा जिसे रामचरितमानस में स्थान न मिला हो। इस दृष्टि से ‘रामचरितमानस’ को भारतीय संस्कृति का द्योतक प्रतिनिधि ग्रन्थ और तुलसी को भारतीयता का प्रतिनिधि कवि कहना कोई अत्युक्ति नहीं। ‘रामचरितमानस’ से उद्घाटित होने वाले भारतीय संस्कृति के विविध पक्षों का वस्तुपरक विवेचन इस प्रकार किया जा सकता है –

 ‘रामचरितमानस’ की रचना इतिहास के जिस काल में हुई, उस समय पारम्परिक भारतीय धर्म विखराव के पथ पर अग्रसर था। प्राचीन भारतीय वैदिक धर्म का विकास अपने काल में ही कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड के परस्पर विपरीतगामी पथों पर चल पड़ा था। इसी बीच बौद्ध और जैन धर्म पारम्परिक आस्तिक धर्म के विरोध में नास्तिक धर्मो के रूप में उद्भूत हुए। दोनों में डटकर संघर्ष चला। यह संघर्ष अभी चल ही रहा था कि पुराणों की अवतारवादी भावनाओं ने स्वयं वैदिक धर्म में भी दरारें डालनी प्रारम्भ कर दीं। फलतः एक ही वैदिक धर्म-शैव, शाक्त तथा वैष्णव आदि विविध सम्प्रदायगत धर्मो में विभाजित हो गया। एक ही मूल से उद्भूत होते हुए भी इन धर्मो और सम्प्रदायों के अनुयायी अपनी मान्यताओं को लेकर आये-दिन लड़ते रहते थे। वैदिक धर्म के विरोध में उठ खड़े हुए जैन और बौद्ध धर्म भी बिखराव के मार्ग पर अग्रसर हो तंत्र और योग की विकृतियों में भटकते जा रहे थे। भारतीय धर्म अलग-अलग खेमों में बँटा परस्पर उलझ रहा था कि इस्लाम धर्म के प्रबल आवेग ने उसे तहस-नहस करना प्रारम्भ किया। धर्म की ऐसी ही जटिल परिस्थिति में गोस्वामी तुलसीदास जैसे महान् आत्मा का प्रदुर्भाव हुआ। इस समय भारतीय धर्म को समन्वित कर एक पर्व पर लाने की आवश्यकता थी। यह कार्य गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ के माध्यम से करने का स्तुत्य प्रयास किया।

 ‘रामचरितमानस’ अलग-अलग धाराओं में बहते भारतीय हिन्दू धर्म को एक ही धारा का रूप देने का सफल प्रयास है। तुलसी ने ‘राम’ के ऐसे धर्म-सम्मत रूप की कल्पना प्रस्तुत की, जिसे वैष्णव, शैव और शाक्त सभी मान्यता दे सकें। अपनी इसी कल्पना द्वारा उन्होंने कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड को भी एक जगह ला बैठाया। तुलसी के राम परब्रह्म के अवतार हैं। वे स्वयं अपने ही अन्य रूप शिव के उपासक है। शिव भी राम के बहुत बड़े भक्त हैं। उधर पार्वती और सीता परब्रह्म के भिन्न-भिन्न स्वरूप शिव और राम की शक्तियाँ हैं। तुलसी ने राम के ही चरित्र के इर्द-गिर्द तमाम पौराणिक देवी-देवताओं को भी ला बैठाया। चाहे गणेश हों, चाहे कार्तिकेय, चाहे दुर्गा सभी देवी-देवता परब्रह्म के अंश हैं। परब्रह्म की तीन मूर्तियाँ हैं – ब्रह्मा, विष्णु, महेश। राम विष्णु के अवतार हैं। विष्णु ब्रह्मा का पालक रूप है, ब्रह्मा सर्जक तथा महेश संहारक रूप हैं।

 अस्तु! ‘रामचरितमानस’ समस्त वैदिक या ब्राह्मण धर्म सम्बन्धी मान्यताओं को अपने भीतर समाहित कर लेने वाला काव्य ग्रन्थ हैं। परम्परा की कोई ऐसी धार्मिक मान्यता नहीं हैं। जो रामचरित मानस में स्थान न पा सकी हो। ‘रामचरितमानस’ तुलसी के परम्परा-ज्ञान और दीर्घकालीन स्वाध्याय का सुस्वादु फल है। यदि इस काव्य को हिन्दू धर्म की संहिता कहा जाये तो कोई अत्युक्ति न होगी। अकेला रामचरितमानस ही समस्त भारतीय परम्पराओं एवं धार्मिक मान्यताओं का ज्ञान प्राप्त कराने के लिए पर्याप्त है। तुलसी का धर्म सर्वव्यापी ब्राह्मण धर्म है। वे परम वैष्णव होने के साथ ही शिव और शक्ति के भी उपासक हैं। पुराणों के अन्य देवी-देवता भी उन्हें मान्य हैं। इस रूप में तुलसीदास वास्तविक भारतीय धार्मिक आस्था के प्रतीक हैं।

 तुलसीदास भारतीय धर्म के ज्ञाता होने के साथ ही भारतीय दर्शन के भी मर्मज्ञ विद्वान् थे। परम्परा-प्रचलित सभी दार्शनिक विचारों का प्रत्याख्यान वे बहुत ही सरल एवं सुबोध भाषा- शैली में करते हैं। इनकी दार्शनिक स्थापनाओं की दृष्टि से ‘रामचरितमानस’ विशेष महत्वपूर्ण है। इसे देखते हुए तुलसी को किसी विशिष्ट दार्शनिक सम्प्रदाय से जोड़ पाना असम्भव-सा दिखता है। तटस्थ दृष्टि से देखा जाए तो तुलसी ने शंकराचार्य के ‘अद्वैतवाद’ के सहारे रामानुज के ‘विशिष्टाद्वैतवाद’ की स्थापना की है। शंकर ने ब्रह्म की मात्र ‘चित्’ सत्ता मानी थी। रामानुज ‘चित्’ और ‘अचित्’ दोनों ही सत्ता मानते हैं। तुलसी भी जगत् को ‘सियाराममय’ देखते हैं। सीता प्रकृति स्वरूपा हैं। राम ब्रह्म स्वरूप। प्रकृति ‘अचित्’ है, ब्रह्म ‘चित्’। अत: पारमार्थिक सत्ता ‘चिदचिद्विशिष्ट’ है, यह स्पष्ट प्रतीत होता है। इसी तथ्य को गोस्वामी तुलसीदास अधोलिखित दोहे में व्यक्त करते हैं-
“गिरा अर्थ जल बीचि सम, कहियत भिन्न न भिन्न।
 बंदौं सीताराम पद, जिनहिं परम प्रिय खिन्न।I”1

 इस प्रकार अद्वैत सत्ता का आभास देते हुए भी, वे भक्तों की उपासना के अनकूल दिखायी पड़ने वाले ईश्वर के रूप-प्रतिपादन पर ही बल देते हैं।

तुलसी की दार्शनिक चेतना भी समन्वय की भावना से मण्डित है। किसी दार्शनिक विचारधारा का प्रतिपादन उनका उद्देश्य ही नहीं था। उन्होंने अपनी ‘रामकथा’ में दर्शन का प्रयोग मात्र इसीलिए किया कि वे बहुत प्राचीन काल से दो भिन्न दिशाओं में प्रवाहित होती हुई ज्ञान और भक्ति की धाराओं को आपस में मिला सकें। ‘रामचरितमानस’ ज्ञान और भक्ति दो विपरीतगामी धाराओं का पुनीत संगम है। ज्ञान और भक्ति में कोई भेद नहीं, बिना एक के दूसरा अधूरा है। बिना दूसरे के के प्रथम सुस्वादु नहीं हो सकता। ‘काकभुशुण्डि’ गरूण से कहते हैं-
 “भगतिहिं ग्यानहिं नहि कुछ भेदा। उभय हरहिं भव-संभव खेदा।”2

 अंतर केवल इतना है कि ज्ञान पुरुष और भक्ति स्त्री। दोनों का संयोग कितना मधुर है। ज्ञान के समीप भक्ति के रहते हुए, दूसरी स्त्री माया उसके समीप भी नहीं फटकती।

 इस प्रकार तुलसी का प्रतिपाद्य भक्ति है। यदि वे राम-भक्ति का पद छोड़कर दार्शनिक के पद पर आसीन होते तो उन्हें निश्चित ही अद्वैतवादी कहा जाता। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल तुलसीदास के भक्ति के सम्बन्ध में लिखते हैं- “गोस्वामी जी कि भक्तिपद्धति की सबसे बड़ी विशेषता है उसकी सर्वागपूर्णता। जीवन के किसी पक्ष को सर्वथा छोड़कर वह नहीं चलती है। सब पक्षों के साथ उसका सामंजस्य है। न उनका कर्म या धर्म से विरोध है, न ज्ञान से। धर्म तो उसका नित्यलक्षण है। तुलसी की भक्ति को धर्म और ज्ञान दोनों की रसानुभूति कह सकते हैं। योग का भी उसमें समन्वय है, पर उतने ही का जितना ध्यान के लिए, चित्त को एकाग्र करने के लिए आवश्यक है।”3
 तुलसीदास एक परमस्मृति वैष्णव भक्त थे। उन्होंने श्रुतियों और स्मृतियों में प्रतिपादित भक्ति के उच्चतम मार्ग का प्रतिपादन अपने काव्य-ग्रन्थों में किया। रामचरितमानस में सर्वप्रथम उन्होंने ज्ञान और भक्ति का समन्वय स्थापित किया। ज्ञान को महत्व देते हुए भी भक्ति को श्रेष्ठ बताते हैं। ज्ञान का मार्ग कृपाण की धार है, लोकजीवन का कल्याण तो भक्ति द्वारा ही संभव है। बिना भक्ति के मोक्ष पद की प्राप्ति नहीं हो सकती।
 तुलसीदास की मोक्षदायिनी भक्ति सेवक-सेव्य की भक्ति है। उनका कथन है-
“सेवक सेव्य भाव बिनु, भव न तरिय उरगारि।
भजहु राम पद पंकज, अस सिद्धांत विचारि।I”4

 सेवक सेव्य भाव से राम के चरणों की वन्दना, अर्चना और पूजा ही उनकी भक्ति की श्रेष्ठतम मर्यादा है। सारा ‘रामचरितमानस’ उनकी इसी भाव-भक्ति से ओत-प्रोत है। भरत, हनुमान लक्ष्मण, सभी राम के चरणों की वन्दना सेवक-सेव्य भाव से करते हैं। ये ही तुलसी की भक्ति के आदर्श भी हैं। ‘रामचरितमानस’ भक्ति के साधनों तथा उसके स्वरूप का स्पष्टीकरण तुलसी ने स्वयं राम के मुख से करवाया है-
 “भगति के साधन कहौं बखानी। सुगम पन्थ मोहिं पावहिं प्रानी।I
 प्रथमहिं विप्र-चरन अति प्रीती। निज-निज धर्म निरत श्रुति रीती।I
 यहिकर फल पुनि विषय विरागा। तब मम चरन उपज अनुरागा।I
 श्रवनादिक नव भगति दृढाहीं। मम लीला रति अति मन माहीं।I
 संत चरन पंकज अति प्रेमा। मनक्रमवचन भजन दृढ़ नेमा।I
 गुरुपितु मातु-बन्धु पति देवा। सब मोहिं कहँ जानहिं दृढ़ सेवा।I
 मम गुन गावत पुलक सरीरा। गद् गद् गिरा नयन बह नीरा।I
 काम आदि मद दंभ न जाके। तात निरन्तर बस मैं ताके।I
 बचन करम मन मोरि गति , भजन करिहिं निष्काम।
 तिनके हृदय कमल महुं, करौं सदा विश्राम।I”5

 उपरोक्त पंक्तियों में तुलसीदास की भक्ति का सारा स्वरूप सामने आ गया है। यही नवधा भक्ति ‘अनुपम सुख मूला’ है। मनसा, वाचा, कर्मणा राम पदानुरक्ति ही मानव जीवन के लिए श्रेयष्कर है। रामचरितमानस का कोना-कोना तुलसी की इसी दास्य भाव की भक्ति-भावना से ध्वनित है। राम की भक्ति न करने वाले पात्र को इस काव्य में स्थान ही नहीं मिला। स्वयं राम का विरोधी रावण भी प्रकारान्तर से राम का बहुत बड़ा उपासक है। उनके हाथों से मृत्यु पाने के लिए ही वह वक्र मार्ग से उनकी भक्ति करता है।

 रामचरितमानस में भरत और हनुमान तुलसी की सेवक-सेव्य भाव या दास्य भाव की भक्ति के आदर्श हैं। इनके अतरिक्त लक्ष्मण, निषादराज, विभीषण, सुग्रीव आदि भी राम के प्रति इसी भाव की भक्ति रखते हैं। संक्षेप, में रामचरितमानस का कोना-कोना ‘सियाराममय’ हैं। तुलसी ने जो कुछ भी कहा, सब सीता और राम की भक्ति में लपेट कर। यही कारण है कि उनकी यह कृति परम्परा के भक्ति-प्रतिपादक ग्रंथो में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है।
 ‘रामचरितमानस’ धर्म और दर्शन तथा भक्ति का ही श्रेष्ठ ग्रन्थ नहीं, यह एक अद्भुत युग-चेतना मण्डित काव्य भी है। उस युग का सारा समाज, सारी राजनीति और सम्पूर्ण लोक-व्यवहार इस काव्य ग्रन्थ में प्रति-बिम्बित हो उठा है।

 मध्य-युगीन भारतीय राजनितिक अवस्था का संकेत ‘रामचरितमानस’ में जगह-जगह मिलता है। उस समय प्रजा राज्य शासक की ओर पूर्णतया उदासीन थी, इसका संकेत मंथरा के- ‘चेरि छोडि न होइब रानी’ कथन में मिलता है। रावण के कुशासन और अत्याचार में तत्कालीन मुसलमान शासकों के कुशासन और अत्याचार का संकेत मिलता है।

 राजनीतिक कुचालों का संकेत देने के अतिरिक्त तुलसी ने ‘रामचरितमानस’ में अयोध्या के राज्य शासन का चित्रण कर आदर्श राजनीति का भी निरूपण किया। उनकी स्थापनाएँ हैं- राजा ईश्वर का अंश है। उसे ईश्वर के समान ही समदर्शी और प्रजा पालक होना चाहिए। जिस राजा के राज्य में प्रजा दुःखी होती है, वह नरक का अधिकारी होता है। वही राज्य-शासन अच्छा कहा जायेगा जिसका राजा प्रजा की राय लेकर कोई कार्य करता होगा। राजा दशरथ एक आदर्श नृपति के रूप में चित्रित हैं। वे कुशल नीतिज्ञ, वीर, योद्धा, दयालु एवं प्रजापालक हैं। उनके पुत्र राम भी उन्हीं के गुणों से भूषित हैं। उनका शासन-काल ‘रामराज्य’ तो प्रजा की सुख-समृद्धि का वाचक ही बन गया है। इस प्रकार रामचरितमानस उदात्त राजनीतिक चेतना से भी मण्डित है ।

 ‘रामचरितमानस’ में तुलसी ने एक आदर्श भारतीय समाज की कल्पना की है। वे समाज में वर्णाश्रम-व्यवस्था के पक्षपाती हैं। उनका दृढ़ मन्तव्य है कि सभी व्यक्ति मनोयोग से अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए मिल-जुल कर रहें।

 रामचरितमानस का पारिवारिक चित्र तो अपने आप में एक उदाहरण है। अयोध्या में दशरथ का परिवार एक आदर्श परिवार है। इस परिवार के सभी अंग पिता-पुत्र, माताएँ, वधुएँ, पत्नियाँ आदि एक आदर्श प्रस्तुत करने वाले हैं। तुलसी ने अपने युग के विघटित समाज को देखकर ही, उसकी प्रतिक्रिया में इस आदर्श परिवार और समाज की कल्पना की है। रामचरितमानस का कोना-कोना सामाजिक आदर्शो की सुवास से सुवासित है। तुलसी पर एक आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने एक उच्च-आदर्श स्तरीय भारतीय समाज की कल्पना करते हुए भी उसमें नारी को विशेष स्थान नहीं दिया। वे शूद्र वर्ग और नारी दोनों को ही ताड़नीय बताते हैं। परन्तु यदि ध्यान से देखा जाये तो गोस्वामी जी ने अपनी ओर से कोई नवीन उद्भावना नहीं की थी। युग- धर्म को देखते हुए प्रसंगानुरूप ही उन्होंने इस तरह की भावना व्यक्त की है। यदि नारी के प्रति उनका यही दृष्टिकोण होता तो संभवतः सीता का चरित्र इतना आदर्श न होता।

 रामचरितमानस लोक-मर्यादा और रीति-नीतियों का प्रतिपादक एक श्रेष्ठ काव्य-ग्रन्थ है। तुलसी का समाज रीति-नीति का पालन करने वाला समाज है। इनका पालन न करने वाला व्यक्ति दण्डित होता है। बालि इसी कारण दण्डित हुआ, रावण का इतना बड़ा ऐश्वर्य भी रीति-नीति के अनुसार आचरण न करने के कारण ही नष्ट हुआ।
 रामचरितमानस का चप्पा-चप्पा लोक व्यवहार के उदाहरण से भरा हुआ है। गोस्वामी जी अनूठी उपमाएँ लोक-जीवन में ही अपना आधार खोजती हैं। वे जो कोई भी सामान्य बात कहते हैं उसके समर्थन के लिए लोक से ही कोई न कोई उदाहरण देते हैं। समाज के जिस अंग में उन्होंने खराबी देखी, उसकी भर्त्सना की। समाज के जिस आचरण को उचित समझा, मुक्तकंठ से उसी की प्रशंसा की। रामचरितमानस के सरल स्वाभाविक उपदेश तो पग-पग पर लोक-जीवन का मार्ग प्रशस्त करने वाले हैं। इन सभी लोक-चेतनाओं के समाहार के कारण ही तुलसी को लोकनायक की उपाधि प्राप्त हुई है। उन्होंने रामचरितमानस के माध्यम से भारतीय समाज को एक बहुत ही मूल्यवान उपदेश दिया- ‘राम की तरह आचरण करना चाहिए, रावण की तरह नहीं।’ यही कारण है कि आज भी ‘रामचरितमानस’ हिन्दू जनता का प्रतिनिधि काव्य-ग्रन्थ है।

 भारतीय महाकाव्य परम्परा में रामायण (वाल्मीकि), रघुवंशम् (कालिदास) के बाद रामचरितमानस का नाम लिया जाता है। भाव-भाषा, शैली, अभिव्यक्ति, पद्धति, छन्द, प्रयोग आदि सभी दृष्टियों से रामचरितमानस एक श्रेष्ठ महाकाव्य है। इस सम्बन्ध में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कथन उल्लेखनीय है- “रचना कौशल, प्रबन्ध-पटुता, सहृदयता इत्यादि सब गुणों का समाहार हमें रामचरितमानस में मिलता है। पहली बात जिस पर ध्यान दिया जाता है, वह है, कथा-काव्य के सब अवयवों का उचित समीकरण। कथा-काव्य या प्रबन्ध-काव्य के भीतर, इतिवृत्त, वस्तु-व्यापार वर्णन, भावव्यंजना और संवाद, ये अवयव होते हैं।”6 इन सभी का समीकृत उपयोग रामचरितमानस में मिलता है। कथा की तारतम्यता बनाये रखने के साथ ही तुलसी, पूरे काव्य में मार्मिक स्थलों की उद्भावना में भी अत्यंत सफल रहे हैं। ‘रामचरितमानस’ में अनेक ऐसे कथा स्थल हैं जो विश्वजनीन बनकर रह गए हैं- जैसे रामवनगमन, चित्रकूट-प्रसंग, आदि ऐसे स्थल हैं जिन्हें किसी भी देश या संस्कृति का व्यक्ति सुन या पढ़कर प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। किसी काव्य की इससे बड़ी सफलता क्या हो सकती है। आठ सोपानों में बँटी रामचरितमानस की कथा इतनी सुगठित है कि अनेक अवान्तर प्रसंगों का समावेश होते रहने पर भी, मूलकथा की एकतारता कहीं से भंग नहीं होती। संक्षेप में कथासंगठन की दृष्टी से ‘रामचरितमानस’ एक श्रेष्ठ महाकाव्य है। आचार्य हजारी प्रसाद के शब्दों में- “रामचरितमानस केवल विशुद्ध काव्यदृष्टि से लिखा हुआ कथा-ग्रन्थ नहीं है। उसमे भक्ति-रस की प्रधानता है। समन्वय के प्रयत्न में समझौते की जरूरत होती है। तुलसीदास को ऐसा करने को बाध्य होना पड़ा है। परन्तु जिस असामान्य दक्षता के साथ तुलसीदास ने इस बात को सँभाला है, वह अद्भुत है। रामचरितमानस के कथा-काव्य की दृष्टि से अनुपमेय होने पर भी उसके प्रवाह में बाधा पड़ी है। अगर वह विशुद्ध कविता की दृष्टि से लिखा गया होता, तो कुछ और ही हुआ होता।”7

 भाषा और शैली तथा छन्द-प्रयोग की दृष्टि से भी ‘रामचरितमानस’ एक उच्चकोटि का महाकाव्य हैं। इसकी भाषा परिष्कृत अवधी है। जहाँ तक भाषा के प्रभुत्व की बात है तुलसी हिंदी साहित्य में बेजोड़ हैं, इस विषय में मूर्धन्य आलोचक हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं- “भाषा की दृष्टि से भी तुलसीदास की तुलना हिंदी के किसी अन्य कवि से नहीं की जा सकती। उनकी भाषा में एक प्रकार की समन्वय की चेष्टा है। वह जितना लौकिक है, उतना ही शास्त्रीय। उसमें संस्कृत का मिश्रण बड़ी चतुरता से किया गया है। उसमें एक ऐसा लचीलापन है जो कम कवियों की भाषा में मिलता है। जहाँ जैसा अवसर आया वह वैसी ही हो जाती है।”8 हिंदी की परम्परा-प्रचलित लगभग सभी शैलियों– चारण कवियों की छप्पय पद्धति, संत कवियों की साखी और पद पद्धति तथा सूफी कवियों की दोहा-चौपाई पद्धित का प्रयोग तुलसीदास ने रामचरितमानस में एकत्र ही प्रस्तुत कर दिया है। रामचरित मानस लोकपद्धित का काव्य होते हुए संस्कृत काव्यों की गरिमा से मण्डित हो गया है। यह तुलसी की भाषा एवं शैली-प्रयोग पटुता का ही चमत्कार कहा जायेगा। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कथन है- “सारांश यह कि हिंदी काव्य की सब प्रकार की रचना शैली के ऊपर गोस्वामी जी ने अपना ऊँचा आसन प्रतिष्ठित किया है। यह उच्चता किसी को प्राप्त नहीं।”9

 रचना की विविध शैलियों को अपनाने के अतरिक्त तुलसी ने ‘रामचरितमानस’ में काव्यगत विविध रसों, अलंकारों आदि का भी सफलतापूर्वक प्रयोग किया है। ‘रामचरितमानस’ का अंगीरस शान्त रस है, पर अन्य रसों – श्रृंगार, वीर, हास्य, रौद्र, वीभत्स, भयानक, करुण, अद्भुत आदि का प्रयोग भी इसमें सफलतापूर्वक हुआ है। सुन्दर मार्मिक स्थलों की उद्भावना में तुलसी अत्यन्त सफल रहे हैं – जनक की वाटिका में राम और सीता का परस्पर दर्शन, रामवनगमन, दशरथमरण, भरत की आत्मग्लानि, युद्ध, लक्ष्मण को शक्ति लगना आदि अनेक ऐसे मार्मिक स्थल हैं। जिन्हें पढ़ने या सुनने वाला द्रवित हुए बिना नहीं रह पाता। संक्षेप में काव्यगत रसों की उद्भावना की दृष्टि से भी ‘रामचरितमानस’ एक सफल महाकाव्य है।

 परम्परा-प्रचलित लगभग सभी शास्त्रीय अलंकारों का प्रयोग रामचरितमानस में हुआ है। सुन्दर-सुन्दर ऊपमाएँ, अनूठी उत्प्रेक्षाएँ तथा प्रभावकारी दृष्टान्त रामचरितमानस के स्थल-स्थल पर बिखरे मिल जायेंगे। इसकी अन्योक्तियाँ और लोकोत्तियाँ तो अपने-आप में सर्वथा अनूठी हैं। अलंकारों के अतरिक्त काव्य के सभी गुणों - ओज, प्रसाद, माधुर्य तथा सभी रीतियों का प्रयोग भी इस काव्य में सफलतापूर्वक हुआ है।

 रामचरितमानस में अवधी और ब्रज दो लोक-जीवन की बोलियों का प्रयोग हुआ है। अवधी तो इस काव्य में अपने विकास के चरम शिखर पर पहुँच गयी है। इस काव्य के बाद अवधी में फिर कोई सफल काव्य-रचना नहीं हो सकी। संस्कृत के तत्सम शब्दों से युक्त कर, तुलसी ने अवधी को एक शास्त्रीय भाषा का परम विकसित रूप प्रदान किया। इस सन्दर्भ में मुक्तिबोध अपने आलेख ‘मध्ययुगीन भक्ति-आन्दोलन का एक पहलू’ में लिखते हैं- “जहाँ तक ‘रामचरितमानस’ की काव्यगत सफलता का प्रश्न है, हम उनके सम्मुख हम केवल इसलिए नतमस्तक नहीं हैं कि उसमें श्रेष्ठ कला के दर्शन होते हैं, बल्कि इसलिए कि उसमें उक्त मानव-चरित्र के, भव्य और मनोहर व्यक्तित्व-सत्ता के, भी दर्शन होते हैं। तुलसीदास की ‘रामायण’ पढ़ते हुए, हम एक अत्यंत महान् व्यक्तित्व की छाया में रहकर अपने मन और हृदय का आप-ही-आप विस्तार करने लगते हैं।”10

 उपयुक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि ‘रामचरितमानस’ भारतीय साहित्य, परम्परा का एक श्रेष्ठ महाकाव्य है। क्या भाषा, क्या भाव, क्या अलंकार प्रयोग, क्या छन्द:- प्रयोग और कथा-संगठन शास्त्रीयता, सभी दृष्टियों से ‘रामचरितमानस’ एक महाकाव्य की गरिमा से मण्डित है।

सन्दर्भ:–
1. रामचरितमानस (बालकाण्ड) : तुलसीदास, पृष्ठ-47, गीताप्रेस गोरखपुर- 273005
2. रामचरितमानस (उत्तरकाण्ड) : तुलसीदास, पृष्ठ-658, गीताप्रेस गोरखपुर- 273005
3. हिन्दी साहित्य का इतिहास: आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पृष्ठ-115, प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली-110002
4. रामचरितमानस (उत्तरकाण्ड) : तुलसीदास, पृष्ठ-662, गीताप्रेस गोरखपुर- 273005
5. रामचरितमानस (अरण्यकाण्ड) : तुलसीदास, पृष्ठ-416, गीताप्रेस गोरखपुर- 273005
6. हिन्दी साहित्य का इतिहास: आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पृष्ठ-116, प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली-110002, संस्करण- 2007
7. हिन्दी साहित्य: उद्भव और विकास- हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ-132, राजकमल प्रकाशन- नई दिल्ली-110002, छठा संस्करण- 1990
8. हिन्दी साहित्य: उद्भव और विकास- हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ-133, राजकमल प्रकाशन- नई दिल्ली-110002, छठा संस्करण- 1990
9. हिन्दी साहित्य का इतिहास: आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पृष्ठ-113, प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली-110002, संस्करण- 2007
10. निबन्धों की दुनिया: मुक्तिबोध- सम्पादक- कृष्णदत्त शर्मा, पृष्ठ- 51, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली-110002, प्रथम संस्करण- 2007

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