भाषा और लोक संस्कृति का अन्तःसम्बन्ध

मृदुल कीर्ति

- मृदुल कीर्ति


वार्ता के इस विषय के तीन प्रश्नायित आयाम हैं - भाषा क्या है? संस्कृति क्या है? और लोक संस्कृति से इन दोनों का अन्तः सम्बन्ध क्या है?

भाषा व्यक्तायां वाची --भाषा जो बोल कर व्यक्त की जाती हैं। अतः 'भाष्यते यथा सा भाषा' जिसे वाणी से बोल कर व्यक्त किया जाता है वह भाषा है। इस प्रकार अन्तर्निहित विचार और अस्तित्व को व्यक्त करने का जो माध्यम है, वही भाषा है। परा ज्ञान के अनुसार पृथ्वी और अनंतलोकों तक विचारों की तरंगों का पसारा है और विचारों की आयु भी अनंत है, क्योंकि इसकी जड़ें भूमा तक हैं, जहाँ से आदि मन निःसृत हुआ, जिसे हम अन्तःकरण अथवा मन कहते है-जो सूक्ष्मातिसूक्ष्म है। उसी आदि मन में ही संस्कृति और संस्कार के बीज समाहित हैं। ब्रह्म विषयक ज्ञान के अनुसार गर्भ से ही इनका विकास और सिंचन होता है, जिसे हम जगत में बोली जाने वाली भाषा से बोल कर व्यक्त करते हैं। अतः छान्दोग्य उपनिषद के अनुसार, भाषा वह है जिसके द्वारा अश्रुत-श्रुत हो जाता है, अमत मत हो जाता है और अविज्ञात विशेष रूप से ज्ञात हो जाता है -
येनाश्रुतं श्रुतं, भवत्य मतं मतम, विज्ञातं विज्ञात मिति। (छान्दोग्य उपनिषद - प्रथम खंड - 3)

वस्तुतः भाषा स्वयं में ही मुखरित संस्कृति है, जो अन्तर्निहित संस्कृति के अव्यक्त रूप को व्यक्त करती है और समाज में अधिष्ठित होती हुई संस्कृति को जीवंत भी रखती है। युगों-युगों की सभ्यता और संस्कृति को संचित और संचरित करती हुई आगामी पीढ़ी तक भाषा ही तो ले जाती है।

इस तरह अस्तित्व को और अंतश्चेतना को व्यक्त करने का पहला चरण मुखर होना और दूसरा चरण लिखित भाषा है। अति आरंभिक काल में तो हम श्रुति परंपरा के ही वाहक रहे हैं, इसी लिए वेदों को श्रुति कहा गया है। तदन्तर ऋषियों के चेतनाकाश की अनुभूतियाँ तत्कालीन संस्कृत भाषा में वृक्षों की छाल, ताम्र पत्र आदि में फिर ग्रंथों में लिपिबद्ध हुए। वही भाषा जब लिपि में आती है तो साहित्य बनता है। जिस भाषा की लिपि नहीं होती उसे बोली कहते हैं। भाषा यदि लिपि बद्ध न होती तो अति पुरातन संस्कृतियों, सभ्यताओं और घटनाओं का ज्ञान, गौरवमयी इतिहास, समय के उतार चढ़ाव के स्वर्णिम और कलुषित पृष्ठ हम न पढ़ पाते और न ही लाभान्वित हो पाते। अतः किसी भी संस्कृति और सभ्यता के बीज भाषा के गर्भ में समाहित हैं। स्थापत्य, वास्तु, मंदिरों, और ऐतिहासिक विशाल राज्यों के अवशेष और पत्थरों की भी अपनी लिपि और उकेरी हुई मौन भाषा है जिसे पुरातत्व वेत्ताओं के अध्ययन से हम जान पाते हैं। यहाँ कहना होगा -पत्थर भी संस्कृति, सभ्यता और मान्यताओं को जीवंत और मुखरित करते हैं। सच कहें तो यह प्रकृति की वर्तुलाकार यात्रा है, जो सृजन, स्थिति और प्रलय के चारों ओर परिक्रमायित है।

संस्कृति क्या है?
धर्म, दर्शन, इतिहास, भाषा, वेशभूषा और कला -ये संस्कृति के छः लक्षण हैं।
"को धर्मो दर्शनम, किम वा पुरावृत्तम च किम दृशम; भाषा, भूषा, कलश्चैव संस्कृते षड लक्षणम"।

इस प्रकार मनुष्य की सर्वविधि अभ्युदय की कामना का भाव हमारी संस्कृति का बीज मन्त्र है।
संस्क्रीयते - जो सुसंकृत करे वही संस्कृति है।

लोक संस्कृति से अन्तः सम्बन्ध -
यहाँ ध्यान देने की बात है कि आगे की वार्ता में -संस्कृति, संस्कार, सभ्यता और भाषा चारों की वैचारिक और भाषाई यात्रा लोक संस्कृति तक कैसे जाती है? भाषा और लोक संस्कृति के अन्तः सम्बन्ध की बात करें तो पहले हमें बीज-अर्थात सांस्कृतिक ग्रंथों की बात करनी होगी केवल पत्तों की बात से हम तथ्य तक नहीं जा सकते।

हमारे आर्ष ग्रंथों, प्रवर मनीषियों, तात्विक विचारकों ने, पूर्वजों ने, विचार और कर्म क्षेत्र में जो कुछ भी श्रेष्ठ किया है, उसी धरोहर का नाम संस्कृति है। जो मूर्त और अमूर्त दोनों तरह से अस्तित्वान है।

चारों वेदों के ज्ञान को यदि एक शब्द में कहें तो, वह शब्द 'मनुर्भव' है। चूंकि विचार संक्रमित करते हैं, अतः वैचारिक संक्रमण की यह यात्रा कालांतर में लोक संस्कृतियों तक पहुँची तो ग्रामीण अंचल में यही मनुर्भव - भलो मनई हुए जा। भलो मानुस बन। भलो करम कर - में रूपांतरित होकर जनमानस की भाषा में नैतिक सन्देश बना। बात वही है किन्तु भाषा लोक संस्कृति की यात्रा करके मनुष्य का मनई और मानुस हो गया। लेकिन गुणवत्ता और छिपी नैतिकता से लोक संस्कृति ने समझौता नहीं किया है।

कुछ अप्रिय होने पर - जौ भले मानुस को काम नाय हतो। जौ नीको काम नाय हतो। जैसी लोक भाषा में संस्कृति उतर कर सिद्धांत से व्यवहार के लोक जीवन में उतरी। ऐसे और दृष्टांत भी देखते हैं।

उपनिषदों के 'मा गृधा' को लोक संस्कृति ने 'लालच बुरी बला है' बना दिया जिसे जातक कथाओं से भी सिखाया गया।
'कस्य स्विद धनं' का ही लोक भाषा रूपांतरण है - 'तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मोरा'। गीता का निष्काम कर्म का सन्देश लोक संस्कृति में 'नेकी कर कुएँ में डाल' के रूप में प्रवाहित है। 'नेक नियत मंजिल आसान' को 'असतो मा सद गमय' का लोक-संस्करण समझा जा सकता है।

समय के परिवर्तन के साथ भाषायी परिवर्तन तो हुए लेकिन सांस्कृतिक ग्रंथों के कालजयी सूक्तों, सन्दर्भों और जीवन मूल्यों को अंतस से थामे हुए, भाषा के तद्भव और तत्सम को अपनाते हुए, लोक संस्कृति की भाषा से अन्तःसम्बन्ध भी बनाये रखा। यथा -
सत्यं वद, धर्मं चर, ऋतस्य गोपा न दाभाय, सत्यमेव जयते,(मुण्डकोपनिषद ) भद्रं मनः, मा निन्दत, मनुर्भव, आयुष्मान भव, सौभाग्यवती भव, अहिंसा परमो धर्मा, ऊनेन हीयते आदि जैसे सूक्त लोक संस्कृति के संस्कार कृत वाक्य बन गए। जिन्हें कभी लोकोक्तियों में तो कभी मुहावरों के रूप में नैतिकता को उभारने और स्मृति में लाने के लिए बोलना लोक संस्कृति का स्वभाव हो गया। स्वभाव में जो भी घटित होता है वह विचार तल के साक्षी भाव होते हैं। इसके लिए कभी ग्रन्थ नहीं खोले गए, ये तो जन मानस के चिंतन का स्वभाव और अभिन्न भाग हैं जो स्वभाववश ही मुखरित होता है और अनायास ही आगामी पीढ़ी को हस्तांतरित हो जाते हैं। इसीलिये कहा जाता है ज्ञान का पढ़ाई से अधिक सम्बन्ध आंतरिक अनुभूतियों से हैं। कबीर पढ़े लिखे नहीं थे किन्तु वे आध्यात्मिक दार्शनिक थे।

 ऋतस्य गोपा न दभाय = साँच को आंच नहीं
सत्यम वद, धर्मं चर = साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप
ऊनेन हीयते = संगति ही गुन ऊपजे, संगत ही गुन जाय
कृण्वन्तो विश्वमार्यम = सब जग लागे आपुनो
सत्यमेव जयते नानृतम = सत्य की जय, असत्य की नहीं
मनः सत्येम शुद्धति = सत से शुद्ध होइ मन जाको
मामेकं शरणं ब्रज = हरि शरणम् या भगवान् तेरो ही सहारो है।
आदि के सूक्त - लोक भाषा में, सच बोलो, धर्म करो, साँच को आँच नहीं, सत्य की जय हो, अधर्म का नाश हो, जीते रहो, पाँव लागूँ, निंदा नहीं करो, दूधो नहाओ पूतों फलो, के आशीष वचन की लोक भाषा के रूप में संस्कृति का यह अन्तः सम्बन्ध ही तो है।

नीति परक संदेशों से भी इतर लोक संस्कृति जनकल्याण और जन स्वास्थ्य के लिए भी सजग है जो ऋषि चरक के स्वास्थ्य सूक्त -
हित भुक, मित भुक, ऋतु भुक जैसे सूक्त को लोक संस्कृति की भाषा में ग्राह्य और सुगम बनाया। यही तो लोकसंस्कृति का मूल संस्कृति से अन्तः सम्बन्ध है। यही तो संस्कृति और भाषा का लोक संस्कृति में रूपांतरण है।
वर्ष के बारह महीनों का अद्भुत स्वास्थ्य परक सन्देश देखें -

चैते गुड़ बैसाखे तेल, जेठे पन्थ असाढ़े बेल।
सावन साग न भादों दही, क्वार करेला न कातिक मही।।

अगहन जीरा पूसे धना, माघे मिश्री फागुन चना।
ई बारह जो देय बचाय, वहि घर बैद कबौं न जाय।।

लोकोक्तियों में जनहित के स्वास्थ्य परक, नीति परक और नैतिकता के सन्देश के सन्निहित बीज, संस्कृति की ही देन और लोक संस्कृति की ग्राह्यता का परिणाम है। विभिन्न प्रांतों की लोक भाषाओं में मूल संस्कृति का ही पसारा है।

एक कहावत है --कोस-कोस पर पानी बदले बीस कोस पर बानी। किन्तु ध्यान दें प्यास और पानी से मिली तृप्ति का सम्बन्ध तो चिरंतन है और एक सा ही है, लोक भाषा में कुछ कहें किन्तु पानी, प्यास और तृप्ति का सम्बन्ध पूरी सृष्टि में, हर जीवधारी के लिए एक सा है। अतः कह सकते हैं कि - एक तरह से संस्कृति समाज का अदृश्य संविधान ही है जो अंतस को अदृश्य रूप से सचेत रखता है। जो संचयी होता हुआ भी परिवर्तनों को आत्मसात कर ही प्रगतिशील होता है। सृष्टि में सदा से ही शुभ-अशुभ विचारों की सत्ता रही है किन्तु संस्कृति केवल शाश्वत और कल्याणकारी, अभ्युदय और निःश्रेयस की ओर ले जाने वाली संस्कृति का ही संवहन करती है जैसे-पर द्रव्य लौष्ठवत, मा निंदत, आत्मा अनिभृष्टाः, मातृवत परदारेषु, आत्मवत सर्वभूतेषु आदि। ये वैचारिक अलख जो अन्तर्निहित है उसका शंखनाद संस्कृति करती है और लोक संस्कृति में उसका भाषा रूपांतरण होता है, भाव रूपांतरण नहीं।

जो भाषा, परम्पराओं, मान्यताओं, विचारों, आचरण, स्थापत्य, वास्तु, मूर्तियों में मूर्त और अमूर्त रूप में व्यक्ति से लेकर समस्त समाज में परिलक्षित होती है, यही संस्कृति है। यह कहना त्रुटिपूर्ण न होगा कि अदृश्य रूप में 'संस्कृति मनुष्य के भाव, विभाव, अनुभाव, प्रभाव और स्वभाव को रचती है और सभ्य आचरण से सभ्यता से प्रगट करती हैं। मूर्त, दृश्य रूप में इन्हीं भावों को स्थापत्य कला, वास्तु, आध्यात्मिकता के मंदिर, लोक संस्कृति, लोक कथाएं, प्रथाओं को उकेरे हुए चित्रों और पारम्परिक परिधानों,आभूषणों का चित्रांकन, उस युग में प्रयुक्त वस्तुओं, आदि से युग विशेष की पूरी जीवन शैली का विवरण मिल जाता है।

पत्थर बोलते हैं - पुरातत्ववेत्ताओं ने पुरातन अवशेषों के आधार पर उस युग की संस्कृति, सभ्यता और जीवन पद्धति का विश्लेषण किया है। बाबड़ी से पानी की व्यवस्था, बर्तनों के आकार प्रकार, मिले हुए सिक्कों से उस युग की विनिमय शैली, उकेरे हुए चित्रों से उस युग की जीवन पद्धति का अध्ययन करने के सूत्र संग्रहित किये अर्थात पत्थर भी बोलकर युग को मुखरित करते हैं।

अतः कह सकते हैं - संस्कृति एक विराट पसारे का नाम है। संस्कृति -शब्द में समग्रता को समेटने का प्रयास भर है, पूर्णता नहीं, क्योंकि वह उससे भी बहुत परे है, जिसे एक शब्द में समाहित नहीं किया जा सकता। संस्कृति में दृश्य जगत और अदृश्य की भावनाओं, विचारों तथा मान्यताओं के गहरे समीकरण समाहित हैं। इन सबसे भी कहीं परे भारतीय संस्कृति में तो पाँच तत्वों की भी संस्कृति है। जैसे - पुरवाई चले और बदली छाये तो मन मोर से लेकर जंगल के मोर और कवित्त हृदय स्पंदित भी होकर कालीदास महाकाव्य 'मेघदूत' लिख देते हैं। पुरवा बयार चले पुरानी चोट भी दुखती है और प्रिय जन दूर हैं तो बयार से सन्देश भेजने का भावनात्मक जुड़ाव भी हमारी संस्कृति का प्रकृति से जुड़ाव का परिचायक है।

बहे पुरवा पवनिया, संदेसा लेके जाओ मितवा।
कुम्हार के चाक से बने एक घड़े का आकार और उस पर उभरी कला कृति से लेकर तिरुपति, पद्मनाभ और कोणार्क मंदिरों के स्थापत्य और वास्तु सब संस्कृति को ही मुखरित करते हैं।

संस्कृति में युग के आचार- विचार, जीवन शैली, पर्व, त्योहार, धर्म, जलवायु, गीत, संगीत, कला, मुहावरों, लोकोक्तियों आदि सबका समावेश है। घरों की बनावट, स्थापत्य, वास्तु, मूर्त कलात्मक अंकन प्रकृति की पूजा, पेड़ पौधों से भी जुड़ी संस्कृति, जीवन दायिनी नदियों में गंगा माहात्म्य का पक्ष भी है जो विश्व में एक अनूठी संस्कृति है। यहाँ एक दुखता हुआ पक्ष भी है जिसे अनकहा करने का साहस नहीं है। इस सांस्कृतिक जीवनदायिनी धरोहरों का सदुपयोग और संरक्षण, भौतिकता प्रधान मनोवृति के कारण पूरी निष्ठा से नहीं हो रहा। सब कुछ दयनीय स्थिति में है, जिसके प्रति युद्ध स्तर पर सजग होने की आवश्यकता है।

लोक संस्कृति - जनमानस के अंतस में जमी वे मान्यताएँ हैं जिनको पीढ़ी दर पीढ़ी जाने अनजाने लोकोक्तियों और परम्पराओं के संवहन के रूप में निरंतरता मिलती है। वस्तुतः संस्कृतिनिष्ठ परम्पराएँ और संस्कार अन्तर्निहित गुणात्मक सत्ता है, सभ्यता जिसका व्यवहारिक परिशीलन है। संस्कृति और संस्कार ही वे आंतरिक गुण हैं जो सभ्य आचरण के रूप में किसी व्यक्ति, जाति समाज और राष्ट्र का निर्माण करते हैं। अंततः यह कोई औपचारिक प्रथाओं का परिशीलन मात्र नहीं, इनमें राष्ट्र का स्पंदन है जिसे साक्षात् देखना है तो भारत के गणतंत्र दिवस की झाँकियों में देखों। कितनी लोक संस्कृतियों का संवहन है, जैसे विभिन्न पुष्पों का गुलदस्ता हो। अनेकत्व में एकत्व की अद्भुत संस्कृति समेटे,सभ्यता और भाषा का देश भारतवर्ष है, जिसमें अखंड राष्ट्रीयता ध्वनित होती है।

संस्कृति हमारी शिराओं में बहती हैं, यह वायु और जल की तरह आकारहीन है किन्तु जिस पात्र में डालो पानी का वही आकार होता हो जाता है, वैसे ही संस्कृति में समायी शाश्वती किसी भी लोक संस्कृति परिणत हो जाती है।

वस्तुतः सामूहिक रूप से स्वीकृति मान्यताओं का नाम लोक संस्कृति है। भाषा, सामाजिक, धार्मिक, परिधान, खान-पान, रीति-रिवाज और पर्व की सामूहिक मान्यता का नाम ही लोक संस्कृति है। लोक संस्कृति की जड़ें इतनी गहरी हैं जितनी मानवता है। इनमें आंशिक परिवर्तन भले ही होते रहे हों किन्तु मूल तात्विक स्तोत्र यथावत ही हैं।

कटु सत्य तो यह है गाँव, देहातों और आंचलिक क्षेत्रों ने ही भाषा को बचा रखा है वरना शहरी लोगों को तो राम-राम कहते भी लाज आती है। व्यक्ति और समाज में निहित आंतरिक संस्कार ही संस्कृति है और उनका व्यवहृत स्वरूप ही सभ्यता है।
 भाषा और संस्कृति का लोक संस्कृति पर प्रभाव यदि देखना है तो मणिपुर की संस्कृति पर रुकने की चाह होती है। विशुद्ध भारतीयता की सोंधी सुगंध आती है। राज्य का नाम -मणिपुर, भाषा विष्णुप्रिया, माटी चंदौन, परिधान भारतीय -ऊपर अंग वस्त्र और जनेऊ, नीचे धोती, वाद्य यंत्र मृदंग। आंध्र प्रदेश में देखें तो नव संवत्सर को युगादि अर्थात युग का आदि बोलते हैं और इस दिन विशेष चटनी बनती है जिसमें गुड़, नीम और अन्य कई चीजें होती हैं। गुड़ और नीम का सांकेतिक अर्थ है कि जीवन में सुख-दुःख दोनों आते हैं।

अतः सार है -
विचार और संस्कार संक्रमित करते हैं। देश छूट जाते हैं किन्तु अंतस में संस्कृति के रूप में देश बसा रहता है उसी आधार पर वह स्वयं अपना परिवेश जहाँ भी रहें, बना ही लेते हैं। इसका ज्वलंत उदाहरण इस पल मॉरीशस में हम स्वयं देख रहे हैं, राम-रामायण अंतस में लेकर आये तो अयोध्या यहीं बना लिया। गंगा के रूप में भावगंगा का सरोवर बना लिया। नमन है मॉरीशस वासियों को जो संस्कृति से पोषित हैं। किसी ने ऋषि दयानन्द कृत 'सत्यार्थ प्राकाश' की एक प्रति यहाँ छोड़ी थी। उस एक ग्रन्थ ने यहाँ आर्य समाज स्थापित किये। यह संस्कृति और साहित्य की शक्ति और लोक संस्कृति में परिणत होने के ज्वलंत प्रमाण है। ये भौगोलिक विभाजन संस्कृति की शक्ति के आगे शक्तिहीन हैं। एक प्रबल, सत्य और सशक्त विचार क्रांति के लिए पर्याप्त हैं। अतः प्रार्थना का मूल है --
सरहदें देह की हैं बिना देह का मन, जिसे चाहता है वहीं पर रहेगा
कि तन एक पिंजरा जहाँ चाहे रख लो, ये मन का पखेरू तो उड़ कर रहेगा।

एक सबल तथ्य और है --
विश्व हिन्दी सम्मेलन का यह मंच मूलतः हिंदी के उन्नयन और संवर्धन के लिए है। सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़े रहकर हिंदी के विकास का एक सशक्त और सार्थक पक्ष सांस्कृतिक ग्रंथों का जन भाषा में अनुवाद है, जिसका अपना ही गहन महत्त्व है। भगवद्गीता और योग दर्शन आज अनुवाद के कारण ही वैश्विक चिंतन का केंद्र है। बाल्मीकि की रामायण संस्कृत में होने के कारण जनप्रिय नहीं है, तुलसी की रामायण जनभाषा में होने के कारण जन मानस में है। कथ्य विषय वही जनप्रिय होता है जो जनभाषा में हो, सरल हो, सरस हो तब ही सार्थक और ग्राह्य है।

सरस इसलिए कहा क्योंकि - आत्मा रसो वै सः, काव्य में रस है। सामवेद भी स्तुति परक है। इसी बिंदु को और उजागर करूँ तो ईश्वरीय अनुकम्पा से मैंने 15 सांस्कृतिक ग्रंथों का विभिन्न छंदों में काव्यानुवाद किया है। सामवेद, ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तरीय और श्वेताश्वर। श्रीमद्भगवद्गीता ब्रज भाषा में, अष्टावक्र गीता, शंकराचार्य स्तुति स्रोत साहित्य, अथर्ववेद का प्राण सूक्त, वैदिक यज्ञ, पतञ्जलि योग दर्शन, शंकरचार्य का ब्रह्मवाद 'विवेक चूड़ामणि' आदि। इनके प्रसाद कण के स्वरूप
शांति मन्त्र: ऊँ पूर्णमद पूर्णमिदं पूर्णात पूर्ण मुदच्यते, पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्ण मेवा वशिष्यते
ईशावास्यं इदं सर्वं यत् किञ्च जगत्यां जगत। तेन त्यक्तेन भुञ्जिथाः मा गृधः कस्य स्विद् धनम्।
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि। यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितं।
योगश्चित्तवृत्ति निरोधः।

अंत में कह सकती हूँ कि भाषा, संस्कृति और लोक संस्कृति का अन्तः सम्बन्ध गर्भनाल के सम्बन्ध की तरह प्रगाढ़ है, जो टूटा है किन्तु टूटा नहीं है। यह अटूट अन्तः सम्बन्ध सृष्टि के आदि से आज तक प्रवाहित, संवाहित और समाहित है। यह व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के जीवन की मानसिकता को संचालित और सिंचन कर उसे पल्ल्वित-पुष्पित कर, पीयूष वत चिर प्रवाहित सरिता है। अतः प्रार्थित हूँ --
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः। (यजुर्वेद 25/14)
हमें सब ओर से शुभ विचार प्राप्त हों।

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