कहानी: बाइक की चाबी

भूमिका द्विवेदी "अश्क"
अख़बार में बड़ी बारीक़ी से नज़र गढ़ाने पर एक ही काम की चीज़ दिखी, टीचर की नौकरी के लिये एक रिक्त पद। देखने- सुनने में भले ही शानदार दिखती हो, लेकिन जया रिसेप्शनिस्ट या टाइपिस्ट जैसे ढेर सारे खाली पदों की ओर कभी नहीं देखती थी। उसे एक इज़्ज़तदार नौकरी की जबरदस्त तलाश थी। उसने आज के अख़बार में देखा कि एक नामी-गिरामी शैक्षिक-संस्थान में अदद टीचर की ज़रूरत है। इस विद्यालय की करीब बीस शाखाएँ, शहर भर में मौजूद थीं। सैलेरी भी बढ़िया बताई जा रही थी। लेकिन फिर भी जया कुछ परेशान हुई।

“रिज़्यूमे भेजना है, और बताई गई जगह पर साक्षात्कार के लिये पहुँचना है। मीरापुर जाना तो कठिन नहीं, लेकिन रिज़्यूमे में लिखूँ क्या... शैक्षणिक योग्यता, और वे भी केवल इण्टर पास?

ये तो बहुत ही कम है। वहाँ तो बीए, एमए, एमएससी, क्या पता पीएचडी भी पहुँच जाएँ। बेरोज़गारी का आलम सभी को मालूम है। फिर भला एक इण्टर पास की क्या बिसात? लेकिन पढ़ाना तो केवल आठवीं दर्ज़े तक को ही है। और जो कुछ भी अभी तक मैंने पढ़ा-लिखा है, उसमें पूरा दिल लगाया है। आठवीं तक पढ़ाने के लिये ऐसा क्या पूछ लेंगे वे लोग, जो मैं न बता सकूँ... वैसे भी एक ठो इण्टरव्यू दे देने में हर्ज़ा भी क्या है? चलो देखती हूँ...”

यही सोचते विचारते जया ने अख़बार का विज्ञापन वाला पन्ना अपने पास रख लिया और बताये गये पते पर अपना ख़ुद से बनाया हुआ रिज़्यूमे जो कि बेहद मामूली था, भेज दिया। जया को बेहद-बेहद अचरज हुआ, जब हफ़्ते भर के भीतर उसी विद्यालय में, इण्टरव्यू के लिये बुलावा आ गया। जया की कद-काठी अपने साथ के तकरीबन सभी लोगों के बीच देखने लायक थी। उसने अपनी सलीकेदार लम्बाई और अपनी गोरी चमड़ी के हिसाब से, एक बादामी रंग की, काले ज़रीदार किनारे वाली सुन्दर-सी साड़ी चुन ली। बाक़ायदा उसे सलीके से पहनकर साक्षात्कार देने के लिये वक़्त पर पहुँच गई। मीरापुर की कुछ दो-चार गलियाँ पार करके, विद्यालय के मुख्य ब्राञ्च में, ये साक्षात्कार होना तय हुआ था। कई और क़ाबिल कैण्डिडेट भी आये हुये थे। अपनी बारी आने पर जया विद्यालय के संस्थापक और निदेशक बाजपेयी जी के कमरे तक पहुँची। विद्यालय के प्रिंसिपल के साथ, पढ़ाये जाने वाले कुछ मुख्य विषयों के ज्ञानी भी पहले से वहाँ मौजूद थे।

दरवाज़े पर से ही जया ने पूछा, “मे आइ कम इन सर?”

जवाब में बाजपेयी जी ने दरवाज़े की ओर देखा, और उनके मुँह से अनायास ही निकल पड़ा, “यू आर ब्लैस्ड विद अ ग्रेसफ़ुल हाइट... प्लीज़ कम इन!”

साक्षात्कार शुरू हुआ। कुछ मामूली औपचारिक सवालों के बाद बैठे हुये विषय-विशेष के ज्ञानियों में से एक ने पूछा, “आपने संस्कृत पढ़ी है?”

“जी, थोड़ी बहुत जानती हूँ।”

“क्या पढ़ा है आपने संस्कृत में?”

“जी, बाणभट्ट और कालिदास को पढ़ा है!”

“बाणभट्ट और कालिदास दोनों बहुत बड़े और संस्कृत के अग्रणी लेखक हैं! दोनों में आप क्या अन्तर पातीं हैं?”

“आप ठीक कह रहे हैं, दोनों बहुत बड़े और अपने अपने युग के रिप्रिज़ेन्टेटिव राइटर्स हैं। लेकिन दोनों की लेखनी एक दूसरे से पूरी तरह भिन्न है। मामला चाहे विषयवस्तु का हो, तरीके का हो, या फिर शैली का हो, दोनों एकदम अलग-अलग हैं।”

“बताइये तो, कैसे अलग-अलग हैं?”

“जी हाँ, मैं बता सकती हूँ। कालिदास बड़ा सरल और सहज डिस्क्रिप्शन देते हैं जबकि बाण की व्याख्यायें दुरूह और बहुत लम्बी-चौड़ी हैं...”

संस्कृत के इस ज्ञानी को अभी भी चैन न मिला, उसने आख़िरी बार फिर जया को कोंचा,

“क्या आप उदाहरण देकर समझा सकेंगी?”

“जी ज़रूर! जब हम कालिदास के शाकुन्तलम को देखते हैं तो ख़ास कर चौथे अध्याय के वे चारों श्लोक, जो कि सभी संस्कृत प्रेमियों को बेहद भाते हैं, कितने सरलता से एक विदा होती बेटी की भावनाओं का बेहद मार्मिक चित्र खींचते हैं जबकि कादम्बरी में बाणभट्ट की वृहद और बड़ी ही लम्बी-चौड़ी व्याख्याएँ राजा शूद्रक के शौर्य और महानता को दिखाती हैं। आपने कालिदास को देखा, वे सरल और छोटे-छोटे वाक्य से और छोटे-छोटे शलोकों से अपनी बड़ी-बड़ी बातें कह जाते हैं जबकि बाण के वाक्य इतने ज़्यादा लम्बे हैं कि कई बार तो एक विराम छह-छ्ह पन्नों के बाद लगता है। ये बड़ी अनोखी बात है!”

इतने लम्बे जवाब के बाद, जया ने मेज़ पर रखा पानी का गिलास ख़ाली किया। वहाँ बैठे दिग्गज जया से संनुष्ट नज़र आ रहे थे और एक-दूसरे को देखकर मुस्किया रहे थे। पानी ख़त्म होने पर, फिर अगले ने जो कि अंग्रेजी का ज्ञानी था, उसने मोर्चा संभाला,

“हू इज़ योर फ़ेव्रेट राइटर इन इंगलिश?”

“सर, नो डाउट, वन एन्ड ओनली विलियम शेक्सपियर।”

“ओके, बट वाय?”

“जस्ट बिकौज़ औफ़ हिज़ एक्सेलेण्ट राइटिंग, रेयर इमैजिनेशन एण्ड वन्डरफ़ुल एक्स्प्रेशन्स!”

“वौट वर्क्स हैव यू रेड?”

“सर, मैकबेथ एण्ड जूलीयस सीज़र।”

“वुड यू लाइक टू कोट एनी औफ़ योर फ़ेव्रेट लाइन्स फ़्रौम दीज़ मास्टरपीसेज़...”

“यस सर, वाय नौट। ‘शी शुड हैव डाइड हियरआफ़्टर। देयर उड हैव बीन अ टाइम फ़ौर सच अ वर्ड। टुमौरो एण्ड टुमौरो एण्ड टुमौरो, क्रीप्स इन दिस पेटी पेज़ फ़्रौम डे टू डे, टू द लास्ट सिलेबल औफ़ रेकोर्डेड टाइम, एण्ड औल अवर यस्टरडेज़ हैव लाईटेड फ़ूल्स, द वे टू डस्की डेथ, आउट आउट ब्रीफ़ कैन्डल! लाइफ़ इज़ बट अ वौकिंग शैडो, अ पुअर प्लेयर, दैट स्ट्रट्स एण्ड फ़्रेट्स हिज़ आवर अपौन द स्टेज...’ फ़्रौम ऐक्ट फ़ाइव, सीन फ़ाइव एण्ड आइ थिन्क पेज टू।”

“फ़ैण्टैस्टिक... वेरी गुड... एण्ड एनी कोट फ़्रौम जूलियस सीज़र!?”

“आइ लाइक द पैथेटिक सटायर, ‘एट टू ब्रूट, देन फ़ौल सीज़र!’ सर आइ लाइक दिस वेरी मच!”

अगला कोई भी कुछ पूछे, उससे पहले ही, बाजपेयी जी, जो अब तक ख़ामोशी से इस साक्षात्कार को पड़ताल रहे थे, जया से उन्होंने पूछा, “आप ने अभी ग्रेज़्यूएशन तक नहीं किया है, अगर आपको हमारे विद्यालय में नौकरी दी जाती है, तो आप आगे पढ़ सकेंगी... कैसे पढ़ पायेंगी! इस बारे में कुछ सोचा है।”

“जी सर, मैं रात को पढ़ूंगी और दिन में नौकरी करूंगी। क्योंकि मुझे नौकरी की बेहद ज़रूरत है। मेरे पिता का देहान्त हो चुका है और घर की पूरी ज़िम्मेदारी अब मेरे ही ऊपर है!” एक सीधे वाक्य में जया ने अपनी बात स्पष्ट कर दी।

“ठीक है, आपसे फिर भेंट होती है। आपको आगे के लिये ख़बर कर दी जायेगी। अब आप जा सकती हैं!”

सबका औपचारिक अभिवादन करने के बाद जया शान्ति से घर लौट आयी। ऐसा लगता था, जैसे जया के जवाबों ने वहाँ बैठे पुरोधाओं को निराश नहीं किया था, हालांकि उन्होंने सवाल बहुत ज़्यादा पूछे ही नहीं थे।

साक्षात्कार के तीसरे ही दिन जया को विद्यालय में उपस्थित होने का फिर से हुक़्म मिला। इस बार उसे विद्यालय के प्रिंसिपल के दफ़्तर में बिठाया गया। प्रिंसिपल कुछ देर में प्रगट हुये और एक ख़ुश करने वाली ख़बर दे गये। उन्होंने एक नियुक्ति-पत्र जया को थमाया और पहली तारीख़ से विद्यालय समयानुसार आने को कहा। जया को टीचर की जगह किसी और पद ‘प्रशासनिक अधिकारी’ के लिये नियुक्ति मिली थी, जिसका अर्थ उसे उस वक़्त समझ नहीं आया।

लेकिन फिर भी, जया ने बड़ी ख़ुशी-ख़ुशी पहली तारीख़ से विद्यालय आना शुरू कर दिया। यहाँ आकर ये पता चला कि इस स्कूल का प्रशासन आम स्कूलों से ज़रा भिन्न था, और ये पद ‘प्रशासनिक अधिकारी’ इसी भिन्नता का हिस्सा था। अन्य विद्यालयों की तरह यहाँ निदेशक और संस्थापक के बाद प्रिंसिपल और टीचर तो थे ही लेकिन ये पद जिसे यहाँ ‘प्रशासनिक अधिकारी’ कहा जा रहा था, थोड़ा नया था और अन्य स्कूलों से अलहदा भी था। आम तौर पर, विद्यालयों में इस तरह के पदों को नहीं देखा जाता था। ये ‘प्रशासनिक अधिकारी’ जिन्हें उस विद्यालय की सभी ब्राञ्च में “चेकर” नाम से पुकारा जाता था, बारी-बारी से स्कूल के सभी ब्राञ्चों में जाते थे, और उस ब्राञ्च-विशेष की पढ़ाई-लिखाई का स्तर, टीचर के पढ़ाने के तरीके और बच्चों के लिये हो रही सभी शैक्षिक- साहित्यिक-खेलकूद-सांस्कृतिक गतिविधियों का सूक्ष्म निरीक्षण करते थे और अपनी विशेष सलाह और सुझाव उस स्कूल के प्रिंसिपल और वहाँ तैनात टीचरों को देते रहते थे। ये कहना ग़लत न होगा कि ये ‘प्रशासनिक अधिकारी’ इस विद्यालय- संस्थान का एक बड़ा ही अहम पद था और साथ ही प्रिंसिपल से भी एक क़दम ऊँचा था। इन चेकर्स यानी की इन ‘प्रशासनिक अधिकारियों’ का वेतनमान भी काम करने वाले सभी कर्मचारियों में सबसे ज़्यादा था।

ये ‘प्रशासनिक अधिकारी’ सुबह-सुबह आठ बजे, सीधे निदेशक यानी की बाजपेयी जी को रिपोर्ट करते थे। वहीं से संस्थान की बड़ी सी गाड़ी इन सभी चेकर्स को बाजपेयी जी द्वारा निर्देशित ब्राञ्च में पहुँचा दिया जाता था। जया को मिलाकर, ये चेकर्स, संख्या में कुल चार थे। जिनमें तीन महिलाएँ थीं, और एकमात्र पुरुष था, जिसका नाम था परिमल अवस्थी।

परिमल पर विज्ञान और गणित विषय का सारा दारोमदार था। हिन्दी और संस्कृत के लिये रूपम वर्मा और तीसरी अन्यान्य सामाजिक विषयों के लिये अर्चना द्विवेदी थीं। और चौथी यही जया मिश्रा, जो डिग्री के लिहाज से सबसे कम पढ़ी-लिखी थी, लेकिन आत्मविश्वास और ज्ञान के चलते, जिसे बाजपेयी जी ने सीधे अपनी संस्था का सबसे बड़ा पद दे दिया था। बाक़ी तीनों चेकर्स और स्टाफ़ के सभी सदस्य, ये बात अच्छी तरह जानते भी थे। और जया से स्नेह भी रखते थे। महिलाओं की जलन स्वाभाविक थी। ख़ुद जया के लिये ये न सिर्फ़ ख़ुशी का सबब था, बल्कि अचरज का विषय भी था। क्योंकि चेकर या कि प्रशासनिक अधिकारी का पद प्राय: कई साल विषय-विशेष का टीचर बनकर ही संस्था में दिया जाता रहा था। लेकिन जया के साथ ऐसा नहीं हुआ था। जया यहाँ इंग्लिश विषय की सर्वेसर्वा थी।

इन प्रशासनिक अधिकारियों के लिये स्टाफ़-रूम भी अलग से निर्धारित था, जिससे ये विद्यालय की अन्य सभी टीचरों और अन्य कर्मचारियों से दूरी बना कर रखें और तटस्थ रूप से, निर्बाध रूप से काम कर सकें। इनके लिये उठने-बैठने की अलग व्यवस्था की एक वजह ये भी थी, कि इन चारों को स्कूल की अन्य अध्यापिकायें बहला-फ़ुसला न सकें और न ही कोई भेंट- उपहार देकर अपने फ़ेवर में ही कर सकें। क्योंकि एक-एक टीचर के अध्यापन और उनकी अन्य विद्यालयीय गतिविधियों की जनमपत्री निदेशक तक पहुँचाने का ज़िम्मा इन चारों चेकर्स का ही तो था। यही उनका वास्तविक काम भी था। इसी की वे तनख्वाह भी पाते थे।

तीनों महिलाओं और परिमल में काम के लिहाज से आपसी सामंजस्य बेहतरीन होना अनिवार्य था। धीरे-धीरे, सभी आपस में मित्र हो गये थे।

रूपम करीब चालीस पार, संस्कृत की पोस्ट-ग्रेज्यूएट महिला थीं, सभी उनका बहुत आदर करते थे। वे परिमल को छोटा भाई मानतीं थी, और परिमल उनका कहा, बड़ी दीदी-सा माना करता था। वे एक आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवार की कमाऊ बड़ी दीदी थी। रूपम के जीवन का नैराश्य और कु्ंठा, उनके हाव-भाव से, बातचीत की चिड़चिड़ाहट से यदा-कदा दिख जाया करती थी। रूपम वर्मा के छोटे भाई-बहन उन्हीं की नौकरी से पढ़ पा रहे थे।

अर्चना सबसे तेज़ और चालाक औरत थी, इसकी उम्र भी चालीस के आस-पास ही थी। अर्चना ने सामाजिक-विषय से किसी प्राइवेट-संस्थान से एमए कर रखा था। उसकी दो बड़ी बहनें भी अभी अविवाहित थी, लेकिन सभी कमा-खा रहीं थीं। इन बहनों की मां गुज़र चुकीं थीं और पिता की पेन्शन से घर चलता था, इसलिये ये अपनी कमाई से ज़ेवर बनवाती थी, और स्टाफ़ में घूम-घूम कर सबको दिखाती-फिरती थी।

परिमल अभी बैचलर था, और पच्चीस-छब्बीस बरस उसकी उम्र हो रही थी। हँसमुख, ख़ुशदिल और बड़ा ही संयत व्यक्ति था। किसी टीचर को उसकी ग़लती के लिये डांटते वक़्त खु़द को बड़ा गम्भीर दिखाने का प्रयास किया करता था। लेकिन उसके लिये भी उसे थोड़ी मशक्कत करनी ही पड़ती थी। बाजपेयी जी उसके काम से काफ़ी संतुष्ट थे। बाक़ी सभी विषयों के कई चेकर आये और गये, लेकिन परिमल कुछेक वर्षों से इसी नौकरी में जमा हुआ था। क्योंकि वे अपने विषय का अच्छा जानकार था। उसने अपनी सैलेरी से एक शानदार बाइक खरीदने का तय कर रखा था।

ये बात उसने किसी रोज़ लंच के दौरान, फ़ुर्सत के कुछ चुने हुये पलों में कही थी। हालांकि परिमल एक सम्पन्न परिवार का इकलौता बेटा था, फिर भी अपनी ख़ुद की मेहनत की कमाई उसे भाती थी, वे खुद्दार और रहमदिल होने के साथ-साथ, तमीज़-तहज़ीब का ध्यान रखने वाला संकोची लड़का भी था। उसे जया पसंद थी, लेकिन काम के अनुशासन के आड़े उसने कभी कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटाई।

और जया महज सत्रह बरस की छोकरी थी, और पहली बार नौकरी के मैदान में उतरी थी। बाजपेयी जी का पिता के समान वरद-हस्त उसके सिर पर था, तभी वे इस चुनौती से भरे काम को सहजता से अन्जाम दे पा रही थी। कोई भूल-चूक होती तो परिमल और रूपम संभाल लेते।

रूपम और जया में एक ये समानता थी कि दोनों ही पितृविहीन थीं, और दोनों ही बाजपेयी जी में अपने पिता का अक़्स देखती थीं।

इस तरह दिन और महीने सुख और शांति से, लेकिन बहुत कठिन दिनचर्या के साथ बीत रहे थे। सभी को कड़ी मेहनत हर हाल में करनी ही थी। सबसे ज़्यादा कठोर परिश्रम जया के हिस्से में थी, क्योंकि उसे दिन भर नौकरी करके, रात में ख़ुद भी पढ़ना होता था।

जया को हाल ही में बीए के लिये, विश्वविद्यालय में दाख़िला मिला था। इस कारण जया अति उत्साह से भरी हुई, डटकर पढ़ाई और नौकरी में लगी हुई थी। अंग्रेजी और संस्कृत साहित्य के साथ उसने फ़्रांसीसी विषय ले रखा था। बाजपेयी जी को उसके विषय का चुनाव पंसद आया और उन्होंने उसके दाख़िले की ख़ुशी में चारों चेकर्स को मिठाई भी खिलाई। इन्हीं खुशियों के दिनों में एक दिन परिमल ने एक बड़ी दावत अपने घर पर दी। उसका घर जानसेनगंज के नज़दीक था। उसकी पार्टी की वजह जया का ऐडमिशन हर्ग़िज़ नहीं था, बल्कि ख़ुद उसी का जनमदिन था, जिसे वे हर साल धूमधाम से मनाता आ रहा था। माँ-बाप भी अपने इस इकलौते दुलारे के जन्मदिन में ख़ुद बेहद उत्साहित हो जाया करते थे।

ज़ाहिर है, इस पार्टी की हलचल विद्यालय के स्टाफ़रूम से लेकर चेकर्स के बीच में भी थी। हालांकि इस निजी पार्टी में

टीचरों को बुलावा नहीं भेजा जाता था। लेकिन ‘प्रशासनिक अधिकारियों’ को हमेशा ख़ास तौर पर निमंत्रण दिया जाता था। रूपम ने अपने छोटे भाई जैसे परिमल के लिये एक शर्ट-पैन्ट का सुन्दर-सलीकेदार, औसत क़ीमत का कपड़ा खरीद लिया था। अर्चना ने सुनहरे पट्टे की मंहगी घड़ी ली थी। बाजपेयी जी को हमेशा की तरह हज़ार रुपये का व्यवहार का लिफ़ाफ़ा देना ही था। प्रिंसिपल साहब ने अपने बेटे द्वारा लाया विलायती परफ़्यूम देने के लिये रख लिया।

अब बची जया। और वे गहरी सोच में पड़ गई। न तो उसके पास ढंग के पैसे थे, न परिमल से कोई घनिष्ठ रिश्ता। एक सहकर्मी जैसे बेहद औपचारिक संबंध के चलते वे पार्टी में जाना ही नहीं चाहती थी। वे उसकी पार्टी में न जाकर और गिफ़्ट के नाम पर कुछ भी न देकर, बाद में किसी रोज़, सिर्फ़ शुभकामनायें जता कर, बेशक़ ज़्यादा ख़ुश रहती। लेकिन जन्मदिन के ठीक दो दिन पहले बाजपेयी जी ने जया से स्नेह से पूछा भी था और आश्वासन भी दिया था कि, “बेटा तुम आओगी ना। डरना-घबराना मत! मेरा पूरा परिवार वहाँ रहेगा...”

यह विशेष निमत्रंण था, और नौकरी के बाद का पहला अनौपचारिक समारोह। उसकी नौकरी भी अभी नई ही थी। उसे हर किसी ने समझाया, कि उसे ज़रूर मौजूद होना चाहिये। क्योंकि बाजपेयी जी और प्रिंसिपल भी सपरिवार वहाँ होंगे। ना पहुँच पाने का क्या सबब और क्या बहाना बतायेगी। जाना एक तरह से कुछ ज़रूरी भी मालूम पड़ रहा था। लेकिन अफ़सोस जया ने अपने घर का किराया दो दिन पहले ही दिया था, अब उसके पास कोई ऐसा विकल्प नहीं था, जिससे वे इस आयी हुई मुसीबत से छुटकारा पा लेती।

उसने तय किया बिना कोई लाग-लपेट के जायेगी और चुपचाप बाजपेयी जी और प्रिंसिपल को औपचारिक-नमस्कार करके लौट आयेगी। और खाने-पीने की ओर तो देखेगी भी नहीं। उसने ये भी तय किया कि अगर परिमल, ख़ुद उसे रोकने या बात करने सामने आया तो शुभकामना देकर ‘देर हो रही है’, का बहाना करके वापस आ जायेगी। इस तरह पार्टी में उसका उपस्थित रहना भी हो जायेगा और गिफ़्ट का मसला भी नहीं उठ पायेगा।

जिस तरह की तैयारी अर्चना और रूपम पिछले कुछ दिनों से कर रहीं थीं जैसे, कि वे क्या विशेष पहन कर जायेंगी, कहाँ से गिफ़्ट की शानदार पैकिंग करवायेंगी, कैसे जायेंगी और कितनी देर तक रुकेंगी औए सबसे ज़रूरी कि खाने-पीने का इन्तज़ाम कैसा होगा, वगैरह-वगैरह-वगैरह...

उन लोगों के इन सारे अहम मसलों में से कुछ भी जया को विचारना नहीं था। बल्कि उसे तो ये लग रहा था कि जाकर कितना वक़्त बर्बाद होगा। उतनी देर में तो ‘किरातार्जुनियम’ के दस न सही पांच-सात बड़े श्लोकों को ढंग से याद किया जा सकता था। या फिर ‘फ़्रांसिस बेकन’ का पूरा एक निबन्ध बारीक़ी से पढ़ा जा सकता था। फ़्रांसीसी की नई-नई किताब से एक कविता रटी जा सकती थी। लेकिन जन्मदिन भी अभी ही होना था। फिर परिमल को क्या पड़ी थी कि वे पार्टी दे, और अगर दिया भी था तो क्या मतलब था कि हम लोगों के स्पेशल-न्यौता भिजवाये। बाजपेयी जी का लाड़-दुलार अपनी जगह। लेकिन विशेष रूप से आने का पूछने का भला क्या औचित्य! लेकिन अब कुछ भी हो, जाना तो एक मजबूरी बन ही गई थी और ना जाने की सभी सूरतें समाप्त हो गईं थी।

पार्टी वाली शाम, जया ने कुछ ठीक-ठाक कपड़े पहनकर बड़े अनमने मन से जानसेनगंज का रिक्शा तय किया और उसमें रुखाई से बैठ गई। बिना कोई तोहफ़ा हाथ में लिये, पार्टी में जाने में उसी बड़ी शर्मिन्दग़ी महसूस हो रही थी। जया के किराये का मकान, सिविल लाइन्स की झुग्गियों से होकर गुज़रता था। जब रिक्शा मेन-रोड पर आया तो कई सारी सड़कछाप दुकानें सजी हुई थीं। रुमाल, पेन, गुड़िया-गुड्डा, बेल्ट, टोपी न जाने क्या क्या तो बिक रहा था। जया ये सब देखती जा रही थी। लेकिन यहाँ उसे कुछ भी लेने लायक दिखा नहीं। वे अपना ध्यान गिफ़्ट से हटाने के लिये, कभी परिमल के घर के बारे में सोचने लगती, कभी अपने नये सिलेबस के बारे में। कभी चालू अर्चना के बारे में तो कभी फ़्रेंच में ज़्यादा से ज़्यादा नम्बर कैसे लाये जा सकते हैं इसकी तरकीबों के बारे में। इतने में अचानक उसकी सोच-विचार की गति में रुकावट आ गई, क्योंकि उसका रिक्शा रुक गया। निरंजन के सामने पुलिया पर जाम लगा था, जो कि आमतौर पर लग जाया करता था। जया को लगा ये बेहतरीन मौका है, यहीं से वापस चली जाऊं और बाजपेयी जी से कह दूंगी ‘बहुत जाम लगा था, इसलिये रास्ते से ही वापस लौटना पड़ा’। लेकिन फिर जाम खुलने लगा और रिक्शा आगे बढ़ने लगा।

उसे लगा, निर्णय लेने में देर न करती तो लौट सकती थी। आगे निरंजन-चौराहा पार करते ही सड़क की बायीं ओर एक लाइन से चाबी के गुच्छों की कई सारी दुकानें सजीं थीं। जगमगाते छल्ले दूर से ही ध्यान खींच रहे थे। जया ने बिना ज़्यादा सोचे-विचारे, रिक्शा रुकवाया और फ़ौरन उतर कर एक दस रुपये का सुन्दर-सा गुच्छा ख़रीद लिया।

वापस रिक्शे में बैठने के मिनट भर बाद ही परिमल का घर आ गया, जिसे परिमल ने सभी चेकर्स को स्कूल की गाड़ी से आते-जाते रास्ते में दिखाया था। जया ने चाबी का गुच्छा लेते वक़्त सोचा था कि अब कम से कम ख़ाली हाथ तो नहीं रहूँगी, लेकिन परिमल के घर आकर, उसकी चकाचौंध से भरपूर पार्टी को देखकर, उसी गुच्छे ने उसकी उलझन पहले से और ज़्यादा बढ़ा दी। आने वाले मेहमानों के हाथों में बड़े-बड़े पैकेट देखकर वो निराश होने लगी। दूर से सजे हुये गार्डेन में परिमल को देखा, जो मित्रों-परिचितों से घिरा, एक मेज़ के नज़दीक खड़ा था। उसने देखा कि कीमती मेज़पोश से ढकी हुई सुन्दर मेज़ तोहफ़ों से पटी पड़ी है। उसका दिल और भी मायूस हो गया। उसने गुच्छे को अपनी मुठ्ठी में कसके भींच लिया। जैसे कि उसे डर लग रहा था कि कहीं कोई उसका ये तुच्छ सा टुकड़ा देख न ले। भले ही जया एक पढ़ी-लिखी, आत्मविश्वास से भरी हुई और अपने घर का खर्च ख़ुद उठाने वाली लड़की थी, लेकिन फिर भी उसकी उम्र अभी परिपक्व नहीं थी। बाप के असमय-इन्तक़ाल ने उसके मन में और भी ज़्यादा असुरक्षा का भाव भर दिया था। इस स्थिति से बाहर निकलने के लिये ही वे हाड़-तोड़ मेहनत कर रही थी। लेकिन फिर भी उसके भीतर कहीं एक बेरहम-डर बैठा था कि एक तो वे अकेली है, और ऊपर से आर्थिक रूप से बेहद अस्थिर। जया अगर रूपम या अर्चना की उम्र की होती तो ये परिपक्व आयु उसे हर डर से ख़ुद ही उबार लेती लेकिन ऐसा होने में कम से कम दस-पन्द्रह बरस अभी और लगने थे।

जया अपने मन का हर डर छुपाये गार्डेन के किनारे पेड़-पत्तियों की ओट में, जहाँ थोड़ा-सा अंधेरा था वहीं खड़ी थी। चली तो आयी थी यहाँ, लेकिन बढ़कर परिमल के सामने जाने की हिम्मत जुटा नहीं पा रही थी। उसने दूर से देखा, बाजपेयी जी

और प्रिंसिपल साहब हाथों में गिलास लिये एक दूसरे से बातें कर रहे थे। सभी व्यस्त और ख़ुश नज़र आ रहे थे। इसी वक़्त परिमल की निगाह संयोग से जया पर पड़ गयी। परिमल अपने मित्रों को छोड़कर जया के करीब ख़ुद चला आया।

“अरे जया। आप आ गईं! आईये आईये! अन्दर चलिये! यहाँ क्यों खड़ी हैं...”

जया हड़बड़ा गई, “नहीं! कुछ नहीं... बस ऐसे ही...”

“मैं आपकी ही राह देख रहा था... देर कर दी आपने!”

परिमल ने शिक़ायती लहजा अपनाया तो जया ने औरों के बारे में पूछा, “अर्चना दीदी और रूपम दीदी?”

“हाँ हाँ वे सब लोग आ गये हैं। उन्हें आये काफ़ी देर हुई! आईये मैं आपको अपने माता-पिता से मिलवाता हूँ...”

जया ने थोड़ी गम्भीरता से परिमल को रोका और कहा, “परिमल जी आना ज़रूरी था, इसलिये मैं आ गई। लेकिन मुझे वापस जल्दी पहुँचना है, क्योंकि मेरी माँ घर पर अकेली हैं।

मैं अंकल-आण्टी से फिर कभी ज़रूर मिल लूंगी... अभी तो आपको जन्मदिन खूब-खूब शुभ हो, यही कहना था...” इतना कहते-कहते उसने सहमते हुये अपनी बंधी हुई मुठ्ठी परिमल के सामने खोल दी, और आगे बोली, “वो आप कह रहे थे न कि आप को बहुत शानदार बाइक ख़रीदनी है, लीजिये उस मंहगी बाइक की चाबी इस दस रुपये के गुच्छे में लगा लीजियेगा...”

इतना कहकर जया चुपचाप पलटी, और गार्डेन के बाहर, दरवाज़े पर खड़े रिक्शे में बैठ गई। उसका रिक्शा तेज़ गति से बढ़ चला। परिमल खड़ा ये सब देखता रहा और उस झिलमिलाते चाबी के गुच्छे के तिलिस्म में उलझ गया। उसे देखते-देखते उसकी आंखें छलछला आयीं। भले ही परिमल शुद्ध रूप से विज्ञान का विद्यार्थी रहा हो, भले ही आर्कमिडीज़ और न्यूटन के कितने ही सिद्धांत उसके बुद्धि-पटल पर छाये हों, और भले ही उसने कितने भी पाइथागोरस, केपलर और कौपरनिकस के जटिल समीकरणों में अपना जीवन तिरोहित किया हो, फिर भी था तो वे एक इन्सान ही। और इन्सानी-शरीर में मौजूद रहने वाला दिल नाम का एक पुर्ज़ा, खून साफ़ करते-करते, कई बार ऐसे अहसासात और ज़ज़्बात के सवालों को पिरो देता है जिनके जवाब किसी भी बीज-अंक या रेखागणित, या फिर किसी भी भौतिकी-रसायन की, कैसी भी किताब में नहीं मिलते।

अब तो परिमल को, उस बड़ी-सी, ख़ूबसूरत मेज़ पर सजे हुये अनगिनत, बेशक़ीमती और शानदार तोहफ़े फीके लगने लगे। वो वहीं स्थिर-चित्त खड़ा, उस अभी-अभी आंखों के सामने से गुज़री हुई दुबली-पतली लड़की के गहरे मनोभावों और उसके दिल की तमाम कश्मकश को एक एक कर जैसे पढ़ने लगा।

उसके मन में जैसे अचानक एक बड़ा-सा तूफ़ान उठा, और तत्क्षण ही जैसे ख़ुद-ब-ख़ुद शान्त भी हो गया। कुछ पलों के लिये, उस कोलाहल, राग-रंग, तड़क-भड़क से भरी पार्टी में वो ख़ुद को बड़ा ही नीरव और नितान्त अकेला पा रहा था।

परिमल ने अपनी आँखों के सामने उस चाबी के छ्ल्ले को दोबारा लाया और बड़े ही प्रेम से देखता रहा। वे एक छोटा सा पानी से भरा ग्लोब था, जिसके भीतर खूब सारी रंग-बिरंगी बनावटी मछलियाँ, चमकीले सितारे और सुनहरी किरकिरियाँ तैर रहीं थीं। उसने मन ही मन में कहा, “जया, तुमने मुझे सिर्फ़ एक बाइक की चाबी का छल्ला नहीं दिया। तुमने तो पूरी क़ायनात ही मेरे हाथ में रख दी है...थैंक्स जया, अ लौट ऑफ़ थैंक्स...”

और फिर परिमल अचानक बड़ा उत्साहित होकर ख़ुशी-ख़ुशी अपनी दी हुई पार्टी की ओर मुख़ातिब हुआ।

1 comment :

  1. बहुत सुन्दर कहानी | प्रस्तुति और कथ्य दोनों ही दृष्टि से | लेखिका को बधाई | सुरेन्द्र वर्मा |

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