21वीं सदी के हिंदी उपन्यासों में पर्यावरणीय विमर्श

आलोक कुमार शुक्ल 

हिंदी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा, महाराष्ट्र
ईमेल: aloksahitya88@gmail.com;
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हाल के दौर में सम्पूर्ण विश्व अगर किसी समस्या से सबसे ज्यादा ग्रस्त है तो वह है ‘पर्यावरणीय असंतुलन’। विश्व के सभी देशों में पर्यावरणीय विमर्श को खास तवज्जो दी जा रही है और पर्यावरण असंतुलन को कम करने की बात ज़ोर-शोर से चल रही है। यूँ तो इस समस्या को कम करने के लिए विश्व के देशों ने कई क़दम उठाये हैं, कई तरह की अंतरराष्ट्रीय संधियाँ हुई हैं जिसका पालन करने के लिए ये राष्ट्र वचनबद्ध हैं। अब यह बात दीगर है कि अमेरिका जैसा विकसित देश कितनी ईमानदारी से इसका पालन करता है। अभी कुछ दिनों पहले अमेरिका ने ‘पेरिस जलवायु समझौते’ से ख़ुद को, यह कहते हुये अलग कर लिया कि इससे अमेरिका का अहित होगा। इस तरह की घटनाओं से पता चलता है कि विकसित देश उपस्थित संकट के प्रति कितने संवेदनशील हैं। जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रति व्यक्ति गैस-उत्सर्जन भारत का बीस गुना है। भारत में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन लगभग एक मीट्रिक टन है जबकि संयुक्त राज्य अमरीका में यह बीस मीट्रिक टन है। दूसरी ओर चीन भी भारत का पाँच गुना गैस उत्सर्जन करता है। इसलिए वह भारत की अपेक्षा उत्सर्जन के लिए ज्यादा जिम्मेदार है। बावजूद इसके इन देशों ने पर्यावरण असंतुलन के लिए अविकसित देशों को जिम्मेदार ठहराते रहते हैं। 

आज भारत भी इस समस्या से जूझ रहा है। लगातार जल, वायु और मृदा की स्वच्छता में गिरावट दर्ज की जा रही है। बढ़ते ‘ग्लोबल वार्मिंग’से भारत भी अछूता नहीं है जिसकी वजह से मनुष्य का अस्तित्व ही खतरे में दिखाई दे रहा है। ‘भूमंडलीकरण’ और ‘उदारीकरण’ के नाम पर जो विकास का तांडव फैलाया जा रहा है वह विनाश का कारण बन रहा है। लगातार आधुनिकीकरण, नगरीकरण और औद्योगिकीकरण ने पर्यावरण असंतुलन को सबसे ज्यादा बढ़ाया है। इस संदर्भ में वी. एन. एवं जनमेजय सिंह लिखते हैं कि - “आधुनिक भौतिकवादी संस्कृति और सभ्यता के विकास ने देश की संपदा में वृद्धि की है। औद्योगीकरण, नगरीकरण, यंत्रीकरण की प्रगति के साथ-साथ विशालकाय, मिल, फैक्टरी, कारखाने भी स्थापित हुए। कृषि में विज्ञान का प्रवेश हुआ, वैज्ञानिक ढंग से खेती करने के कार्य में वृद्धि हुई। इन सब ने मिलकर प्राकृतिक पर्यावरण को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।” इसमें संदेह नहीं कि इनसानों की भोगवादी प्रवृति ने ही विश्व को इस संकट के करीब लाकर खड़ा कर दिया। लोग सुख-सुविधा के इतने आदी होते जा रहे हैं कि उन्हें इस बात का अंदाजा ही नहीं कि इससे पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। सड़कों के लिए न जाने कितने पेड़ काट दिये जा रहें हैं, बिजली बनाने के लिए नदियों पर बड़े-बड़े बांध निर्मित किये जा रहे हैं। यही नहीं एअरकंडीशनरों, फ्रिज और गाड़ियों के धुओं से निकलने वाली गैसों से न केवल वायुमंडल दूषित हो रहा है बल्कि ओज़ोन परत पर भी असर पड़ रहा है।   

‘भूमंडलीकरण’ के मोहनी कुचक्र में फँसकर तीसरी दुनिया के देशों अर्थात अविकसित देश अपने यहाँ के प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर दोहन करना शुरू किया जिसके परिणामस्वरूप उन देशों के सामने पर्यावरणीय संकट उठ खड़ा हुआ है। विकास के नाम पर जंगलों की अंधाधुंध कटाई, खनिज संसाधनों का अनियंत्रित खुदाई, नदियों और तालाबों पर बाँध बनाने से अविकसित देशों के सामने परिस्थितिकीय संकट की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है। ज्ञातव्य है कि लगभग सारे खनिज संसाधन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में पाये जाते हैं जिसकी वजह से उनके अस्तित्व पर खतरा मडरा रहा है। यही नहीं वहाँ के मूल निवासियों को विस्थापित करने पर मज़बूर किया जा रहा है। जिस जल, जंगल, ज़मीन  को वे अपना मान कर वर्षों से उसकी रक्षा करते आये हैं, उन्हीं से उन्हें अलग किया जा रहा है या फिर डरा-धमका के छीन लिया जा रहा है।

21वीं सदी के हिन्दी उपन्यासों में ‘पर्यावरणीय’ संकट को इस समय ज़ोर-शोर से उठाया जा रहा है। पर्यावरण से जुड़े मुद्दों एवं प्रश्नों को इस युग के उपन्यासकारों ने बेहद गंभीरता से उठाने का प्रयास किया है। सिर्फ उठाया ही नहीं बल्कि उन कारणों को चिन्हित करने का प्रयास भी किया है जिसकी वजह से यह समस्या निरंतर विकराल रूप लेती जा रही है। स्वच्छ हवा, साफ पानी इनसान की बुनियादी जरूरतों में शुमार है, आज आम आदमी को यह भी नसीब नहीं हो पा रहा है। ‘जल’ समस्या इतनी विकट हो उठी है कि आँकड़ों के अनुसार चालीस प्रतिशत जनसंख्या के पास न्यूनतम स्वच्छता वाला पर्याप्त जल नहीं है। जल संकट की प्रमुख वजह वनों, जंगलों का निरंतर कटते चले जाना है। परिणामस्वरूप वर्षा का औसत दिन-ब-दिन घटता जा रहा है, जहाँ तहाँ अत्यधिक वर्षा होने से बाढ़ की विभीषिका उत्पन्न हो जा रही है और कहीं-कहीं बिलकुल वर्षा न होने से लोगों को सूखा और अकाल जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। एक अनुमान के अनुसार- ‘2025 तक आबादी बढ़ने से विश्व की करीब दो तिहाई जनसंख्या पानी की समस्या से तबाह होगी।’ इस संदर्भ में नासिरा शर्मा का लिखा उपन्यास ‘कुइयाँजान’ बड़ा ही मत्वपूर्ण हो जाता है जो जल की गंभीर होती समस्या को केंद्र में रखकर लिखा गया सशक्त उपन्यास है। पानी की किल्लत के कारण मची हाय-तौबा का जिक्र उपन्यास में कुछ इस तरह से किया गया है - “मुहल्ले के कुएँ बरसों पहले पाट दिये गए थे। एक दो घरों में हैंडपंप थे, जो खराब पड़े थे। मस्जिद वाली गली से मिली अन्दर वाली गली थी। वहाँ पक्के बड़े-बड़े घर थे। उनके यहाँ भी पानी की हाय-तौबा मची थी। शिव मंदिर के पुजारी भी बिना नहाए परेशान बैठे थे। उन्होंने न मंदिर धोया था, न भगवान को भोग लगाया था। उनके सारे गगरे-लोटे खाली लुढ़के पड़े थे। नल की टोंटी पर कई बार कौआ पानी की तलाश में आ-आकार बैठ-उड़ चुका था”। यह चित्र सिर्फ एक गाँव या फिर एक मुहल्ले भर का ही नहीं बल्कि लेखिका ने इस एक चित्र के माध्यम से पूरे देश का कोलाज निर्मित कर दिया है। क्या बड़े क्या छोटे, अमीर-गरीब, मंदिर-मस्जिद, जीव-जन्तु सबकी सिर्फ एक समस्या है ‘पानी’। इस एक उद्धरण से लेखिका ने यह भी रेखांकित करने का प्रयास किया है की जिन्होंने ‘पानी’ की क़ीमत नहीं समझी और उसे बर्बाद करते रहे उनके लिए भगवान भी कुछ नहीं कर सकता। इसके लिए सिर्फ और सिर्फ मनुष्य जिम्मेदार है। इस तरह की समस्या से लोग आए दिन दो-चार हो रहे हैं। इनसान ही नहीं, पशु-पक्षी और जानवर भी पानी के संकट से जूझ रहे हैं। परंपरागत तलाब, पोखर, जलाशय खत्म होते जा रहे हैं, अगर हैं भी तो उनमें पानी की मात्रा बहुत सीमित है। इसके अलावा उसमें बढ़ता हुआ अतिक्रमण, गंदगी, जानवरों आदि के नहाने के कारण उसका पानी दूषित होता जा रहा है। खेती में कीटनाशक के बढ़ते हुये प्रयोगों से भी पानी प्रदूषित होता जा रहा है। एक तो पानी की उपलब्धता सीमित है। जहाँ है भी वहाँ का पानी पीने योग्य नहीं है। इस समस्या की तरफ नासिरा अपने उपन्यास में ध्यान आकृष्ट कराते हुए कहती हैं - “कई ज़िलों में पानी की जाँच से पता चला है कि नलकूप से आने वाला पानी पीने लायक नहीं है। भोजपुर ज़िले में आर्सेनिक (संखिया) की मात्रा बहुत अधिक पाई गई है जिसका सेवन स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है। अब सारे नलकूप सील कर दिए गए हैं”। यह केवल एक ज़िले की ही समस्या नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारत के ज़िले की समस्या है। दूसरी तरफ नदियों पर निरंतर बनते हुए बाँध से भी परिस्थितिकीय जगत को बहुत बड़ी हानि पहुँच रही है। बाँधों के निर्माण का प्रभाव सिर्फ मनुष्यों पर ही नहीं पड़ रहा है अपितु जीव-जन्तु, पशु-पक्षी सभी प्रभावित हो रहे हैं। मज़बूरी में वहाँ से इन सबों को विस्थापित होना पड़ रहा है। फराका बाँध से बांग्लादेश को हुए अभूतपूर्व नुकसान का जीवंत चित्रण नासिरा ने ‘कुइयाँजान’ में कुछ इस तरह से किया है जो आँखें खोल देने वाला है - “इस बैराज के बनने से बंगलादेश के कुटिया सहित सात-आठ ज़िलों में जल-स्तर काफी नीचे चला गया। जिसके कारण पेड़-पौधों पर बहुत बुरा असर पड़ा। ज़मीन का लवण भी जल के साथ नीचे गया। सुंदरी पेड़, जिसकी हमारे यहाँ बहुतायत थी, जिसके कारण जंगल का नाम सुंदरवन पड़ा, वह पेड़ अब खोजने से ही नज़र आते हैं। वही हाल मछलियों का हुआ। प्रवासी पक्षियों के आगमन पर असर हुआ।” मनुष्य ने विकास के जिस मॉडल को स्वीकारा है यह उसका जीता-जागता प्रमाण है। सच कहें तो मनुष्य अपने विनाश की इबारत ख़ुद लिख रहा है। जिस तरह से वह प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहा है, उसे देखकर लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब समस्त मानवता असमय ही काल के गाल में समा जाएगी। यही नहीं विकास के मोह में हम इतने अंधे होते जा रहे हैं कि आने वाली पीढ़ी की कोई चिंता ही नहीं है। जो है बस आज है! लोग इस मानसिकता से ग्रस्त होते जा रहे हैं। प्रकृतिक संसाधन बहुत सीमित है अगर हम इसी तरह से उसका उपभोग करते रहे तो वह बहुत जल्द ही खत्म हो जाएगी फिर? इस संदर्भ में डॉ. सुरेश चंद्र राजोरा लिखते हैं कि - “मानवीय जीवन का अस्तित्व प्रकृति के अस्तित्व पर टिका हुआ है तथा प्रकृति को संरक्षण मानवीय प्रयासों से प्रदान किया जाता है। जीव वैज्ञानिकों ने प्रकृति और मानव के बीच संतुलन चक्र को समझने के लिए अनेक अनुसंधान किये और निष्कर्ष दिया कि जब तक मानवीय गतिविधियाँ प्रकृति के साथ संतुलन बनाये रखेंगी, मानवीय जीवन सुरक्षित रहेगा और प्रकृति उसे बचाये रखने में अपना सहयोग करती रहेगी।” किन्तु आज हम इसका उल्टा होते हुये देख रहें हैं, मनुष्य प्रकृति की सुरक्षा न करके उसे ही खत्म करने में तुला हुआ है जो कि मानव-जीवन के लिए अपरिहार्य तत्व है। 

जहाँ खुद को शिक्षित और शहरी मानने वाले तबक़े में इस समस्या के प्रति बेरुखी दिखाई देती है। वहीं अशिक्षित या यूं कहें कि ग्रामीण तबक़े के लोगों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति ज़्यादा जागरूकता दिखाई देती है। वस्तुतः ग्रामीण लोगों का जुड़ाव पेड़-पौधों से ज़्यादा होता है, संभवतः इसीलिए वे पर्यावरण के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं। कुसुम कुमार का उपन्यास ‘मीठी नीम’ पूरी तरह वन और पेड़-पौधों की रक्षा तथा वृक्षारोपण के आंदोलन पर ही केन्द्रित है। उपन्यास की पात्र ओमना अशिक्षित होने के बावजूद जिस तरह से पर्यावरण के लिए प्रेम प्रदर्शित करती है, वह समाज के लिए मिशाल बन जाती है। घर पर लगे वृक्षों की देखभाल करने की वजह से, वह सद्य: प्रसूत पौत्र को भी देखने नहीं जाती। वृक्षों से उसे इतना प्यार है कि वह इन्हें छोड़कर अपने पुत्रों के साथ नहीं जाती। उपन्यास के आखिर में उसकी बेटी भी यही प्रतिज्ञा लेती है - “एक बात कसम खाकर कहती हूँ मैं जहाँ रहूँगी, वृक्षों की रक्षा करूँगी।” इस तरह का संकल्प अगर समाज के सभी लोग ले लें तो पर्यावरण की समस्या का निदान खुद-ब-खुद हो जायेगा। और पर्यावरणीय  संकट से बचा जा सकता है। सम्पूर्ण उपन्यास की कथा पर्यावरण को केंद्र में रखकर बुनी गयी है। उपन्यास की पात्र ओमना पेड़-पौधों से पुत्रवत स्नेह करती है और इसीलिए उन पौधों को कभी छोड़कर कहीं नहीं जाती।

झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों में मल्टीनेशनल कंपनियों द्वारा किए जा रहे उत्खनन का, किस तरह से जल, जंगल, ज़मीन तथा वहाँ के मूलनिवासियों पर प्रभाव पड़ रहा है, इसका शोध पूर्वक विस्तृत वर्णन महुआ मांझी ने अपने उपन्यास ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ में किया है। यह उपन्यास मुख्य रूप से ‘यूरेनियम’ उत्खनन से उपजी पर्यावरणीय समस्या को केंद्र में रखकर लिखा गया है। किन्तु इसके साथ ही साथ यह उपन्यास आदिवासियों की अन्य समस्याओं से भी जुड़ता चला जाता है। मसलन बाहरी लोगों के हस्तक्षेप के कारण किस तरह से उनके सामाजिक एवं सांस्कृतिक ढांचे में बदलाव आ रहा है आदि। देश का अधिकांश खनिज संसाधन आदिवासी क्षेत्रों में पाया जाता है जिसे निकालने के लिए सरकार बड़ी-बड़ी कंपनियों को लाइसेंस देती है और ये कंपनियाँ खुदाई करने हेतु विशालकाय मशीने लगाती हैं। जिसके धुओं और कचरों से वहाँ की नदियाँ तथा वातावरण दोनों प्रदूषित हो रहे हैं।

यूरेनियम मरंग गोड़ा के लिए प्रकृति का दिया हुआ वरदान है। लेकिन वहाँ के लोगों को क्या पता था कि यही वरदान एक दिन उनके लिए अभिशाप बन जायेगी। यूरेनियम खनन से निकलने वाली विकिरण के प्रभाव ने वहाँ के लोगों को भी प्रभावित किया है जिसकी वजह से वहाँ महामारी जैसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है। उनके बच्चे विकलांग पैदा हो रहे हैं या फिर पैदा होते ही मर जा रहे हैं, किसी का सिर अस्वाभिक रूप से बड़ा हो रहा है तो किसी के शरीर का कोई अन्य अंग, शरीर में काले-काले धब्बे बनकर घाव का रूप ले ले रहें हैं, गायें दूध देना बंद कर दी हैं, फलों में बीज नहीं रहा आदि समस्याएँ लगातार बढ़ती जा रहीं हैं। यूरेनियम से निकलने वाली विकिरण के दुष्परिणामों की चर्चा उपन्यास में कुछ इस तरह से किया गया है - “विकिरण जीवित प्राणी के जीन के साथ तो छेड़छाड़ करता ही है, यह स्त्री पुरुष की जनन क्षमता को भी प्रभावित करके उन्हें बांझ बना देने की ताकत रखता है। जो प्राणी विकिरण या रेडियोधर्मिता या रेडिएशन के जितना निकट संपर्क में आता है, वह उतना अधिक प्रभावित होता है। विकिरण एक ही सेल में लाखों म्यूटेशन पैदा कर सकता है। मनुष्य के सेल में करीब 3.5 खरब (बिलियन) डी. एन. ए. के जोड़े होते हैं।” इस तरह की भयानक त्रासदी को वहाँ के आदिवासी लगातार झेल रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह कि बिना किसी सुरक्षा व्यवस्था के यह काम धड़ल्ले से जारी है। सरकार ने अनपढ, गरीब, सीधे-साधे आदिवासियों को यह तक नहीं बताया कि यूरेनियम कितनी घातक चीज है इससे सावधानी बरतनी चाहिए। उस खदान में काम करने वाले मजदूर और उनका पूरा परिवार, उस कंपनी के आसपास रहने वाले लोग, पेड़-पौधे, और जानवर सभी इस घातक विकिरण के चपेट में हैं। सरकार ने आदिवासियों की न केवल जल जंगल ज़मीन छीनी बल्कि उनकी सभ्यता, संस्कृति और तो और उनका जीवन भी छीनने में लगी है। उपन्यास का पात्र सगेन सरकार और कंपनी की इस भारी लापरवाही पर बड़े गुस्से और आक्रोश के साथ कहता है - “क्यों खदान या मिल में काम करने वाले मजदूरों को यूरेनियम की धूल लगे कपड़ों को पहन कर घर जाने से मना नहीं किया गया? यह क्यों नहीं बताया गया कि इससे घर भर के लोग विकिरण से प्रभावित हो सकते हैं? खासकर वह पत्नी, जो इसे नंगे हाथों से धोती है? क्यों नहीं बताया गया कि खदान से विस्फोट करके निकाले गये यूरेनियम अयस्क वाले पत्थरों से धुल धुलकर आते बरसाती जल के कारण उनके कुओं, तालाबों और नदी के पानी में, उनकी मिट्टी में, उनके खेतों की फसल में जहर घुल चुका है? क्यों खनन कार्य के लिए, मिल या टेलिंग डैम के लिए उनकी ज़मीन लेते वक्त उन्हें यह नहीं बताया गया कि उनसे न सिर्फ उनकी ज़मीन ली जा रही है या उनका जंगल लिया जा रहा है बल्कि उनका स्वास्थ्य, उनका खुशहाल जीवन भी छीना जा रहा है।” जो आदिवासी सदियों से जंगलों में रहते आ रहे हैं। पेड़-पौधों को पूजते हैं। उनके प्रत्येक पर्व, तीज और त्योहार में प्रकृति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल रहती हैं जिनकी वजह से पर्यावरण सुरक्षित है। उन्हें ही पूंजीवादी सरकारें खत्म करने में तुली हुई हैं। 

नदीयों को जल का अच्छा स्रोत माना जाता है। इसके पानी से लाखों लोगों की प्यास बुझती है। साथ ही साथ खेतों की सिचाई के काम भी आती हैं। इसीलिए इन्हें जीवनधारा कहा जाता है। लेकिन मनुष्य अपने स्वार्थवस इन्हें भी प्रदूषित करने में लगा है। जबकि हमें ज्ञात है कि धरती पर साफ पानी कितना कम और सीमित है। यूरेनियम के कचरे का पानी किस तरह से नदी को प्रदूषित कर रहा है इसका जिक्र कुछ इस तरह से उपन्यास में किया गया है - “यूरेनियम कचरे के पानी की पतली धारा आकार एक नाले की मार्फत स्थानीय नदी में गिर रही होती। उसी नदी में, जो आगे जाकर झारखंड की एक प्रमुख नदी सुवर्णरेखा से मिलती थी और बंगाल की खाड़ी तक जाते जाते करीब दस हजार वर्ग कि. मी. तक के लाखों लोगों की प्यास बुझाती थी, जिसके जल से लोग अपने खेतों में अनाज और फसल उगाते थे। नहाते धोते थे।” सोचने वाली बात यह है कि जिस विकिरण की समस्या को सिर्फ स्थानीय समस्या मानकर लोग उस पर ध्यान नहीं दे रहे थे, इस उद्धरण से पता चलता है कि उससे लाखों करोड़ों लोग प्रभावित हो रहे हैं। दूसरी तरफ नदियों के प्रदूषित होने की वजह से उसके अंदर रहने वाले जीव-जन्तु भी विकिरण ग्रस्त हो रहे थे। जिससे वहाँ का पारिस्थितिकीय तंत्र लगातार खराब होता जा रहा था। जलीय जीव-जंतुओं पर विकिरण के प्रभाव का वर्णन उपन्यास में कुछ इस तरह से किया गया है - “जहरीली हो गयी हैं यहाँ की मछलियाँ। खाने से पेट में ऐंठन होती है। जी मिचलाता है। वैसे मछलियों की मात्रा काफी घट गयी हैं आजकल। जो गिनी चुनी मछलियाँ हैं, उनमें से ज्यादातर बड़ी अजीब सी दिखती हैं। उनकी मुंडी बहुत मोटी होती हैं और देह पतली। ऐसी मछलियाँ आपको मरंग गोड़ा के अलावा और कहीं नहीं दिखेंगी साहब! कहीं नहीं। नाले के आसपास पाए जाने वाले सांपों का भी यही हाल है। पतली देह और बड़ा सा सिर। कितने ही सांप, मेढक, बिच्छू मरते रहते हैं जब तब।” इस भयानक त्रासदी का कोई और जिम्मेदार नहीं सिर्फ मनुष्य है? उसका स्वार्थ और अहंकार है। प्रकृति के साथ संतुलन बनाने की ज़िम्मेदारी मनुष्यों की है। अगर उसे इसी तरह से प्रदूषित और नष्ट किया जाता रहा तो एक दिन प्रकृति मनुष्यों को नष्ट कर देगी। विकास के नाम पर जिस विनाश को  मनुष्य दावत दे रहा है उससे मानवता का बच पाना कठिन लग रहा है। पर्यावरण की सुरक्षा और संरक्षा करना इनसान का कर्तव्य है, नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब हमें ऑक्सीजन भी खरीदनी पड़ेगी।

प्रकृति को अपना परिवार मानकर जिस तरह से आदिवासी उसकी सुरक्षा करते हैं, उसे पालते-पोषते हैं। क्या हम उस तरह से प्रकृति की सेवा कर सकते हैं? खुद को शिक्षित और बुद्धिमान मानने का भ्रम पाले रहते हैं। किन्तु हमसे ज्यादा जागरूक प्रकृति के प्रति आदिवासी हैं। जिस प्रकृति की रक्षा वे सदियों से करते आ रहे हैं, उसे पूंजीवादी सरकारें उखाड़ने में लगी हैं। क्या उससे सिर्फ उन्हीं का फायदा होगा अन्य लोगों को नहीं? यह सच है कि पर्यावरण की चिंता सिर्फ गरीबों को होती है अमीरों को नहीं। क्योंकि पर्यावरण प्रदूषण की वजह से उनके आर्थिक स्रोतों पर कुठाराघात होता है जिससे उन्हें रोजी रोटी की समस्या का सामना करना पड़ता है। इस संदर्भ में उपन्यास का पात्र सगेन अफसोस भरे स्वर में कहता है-यूरेनियम खदानों ने हमारी बहुमूल्य संपत्ति छीन ली है हमसे। अब हमारे पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा है। हम आदिवासियों के पास तो संपत्ति के नाम पर होती है शुद्ध हवा, हरे भरे स्वस्थ पेड़, स्वच्छ पानी, जंगलों से ढके पहाड़, पंछी, जानवर, जंगली फूल फलों से लदे पेड़... अब सब खत्म हो रहे हैं। इनके साथ-साथ हमारी संस्कृति भी नष्ट हो रही है।” कितने दुख और क्षोभ की बात है कि विकास के जिस पूंजीवादी मॉडल के लिए पूरा देश दौड़ रहा है यह उसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। अगर वे इसलिए खुश हैं कि उनके घर सुरक्षित हैं तो यह उनका भ्रम है, क्योंकि आग की लपटें उनके घरों को भी ख़ाक कर डालेंगी।

प्रकृति इन्सान की जरूरतों को पूरा कर सकती है, उसकी लालच का नहीं। क्योंकि प्राकृतिक संसाधन बहुत ही सीमित मात्रा में है। अगर हम अभी से सचेत नहीं हुये तो वह दिन दूर नहीं जब सारे गोचर-अगोचर प्राणी खत्म हो जायेंगे। 21वीं सदी के हिन्दी उपन्यासों ने पर्यावरण प्रदूषण से संबन्धित जिन प्रश्नों और मुद्दों को समाज के सामने उठाया है। उस पर सभी बुद्धिजीवियों को गंभीरता के साथ विचार-विमर्श करना होगा। साथ ही विकास के अन्य मॉडलों की खोज करनी होगी तभी इन्सानी वजूद कायम रह सकेगा अन्यथा नहीं।

संदर्भ ग्रंथ सूची 
1. पर्यावरण और विकास, सुभाष शर्मा, प्रथम संस्करण 2017, प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्ली 
2. समकालीन भारत की सामाजिक समस्याएँ, डॉ. सुरेश चन्द्र रजोरा, चतुर्थ संस्कारण 2016, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर
3. कुइयांजान, नासिरा शर्मा, प्रकाशन वर्ष 2005, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली 
4. मीठी नीम, कुसुम कुमार, प्रकाशन वर्ष 2012, किताब घर प्रकाशन, नई दिल्ली  
5. मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ, महुआ मांझी, प्रकाशन वर्ष 2015, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली  

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