2018 में जब श्रीराम धरती पर आए

सौरभ शर्मा

सौरभ शर्मा

क्षीरसागर की एक सुबह...
लंबे अरसे बाद आज यहाँ देवर्षि नारद का आगमन हुआ। इस बैकुंठ लोक में जहाँ भृगु जैसे ऋषियों को भी प्रभु से मिलने में परेशानी होती है वहाँ के प्रोटोकॉल में नारद जी के लिए किसी तरह का बंधन नहीं है। नारद जी ने सीधे प्रवेश लिया। प्रभु चित्र वाली मुद्रा में नहीं थे जैसे हम उन्हें देखते हैं क्षीरसागर में लेटे हुए और माता लक्ष्मी उनकी सेवा करते हुए। वे सामान्य रूप से बैठे हुए थे। नारद जी ने प्रभु और माता का चरण स्पर्श किया।
माता लक्ष्मी- नारद, इस बार बहुत विलंब से आए।

नारद- हाँ माता, देव लोक में समय वैसा ही पूर्ववत थमा हुआ है। इंद्र का सिंहासन स्थिर है। पाताल लोक में आसुरी शक्तियाँ भी फुरसत में हैं। देवासुर संग्राम जैसी स्थितियाँ नहीं है अतएव बताने के लिए ज्यादा सामग्री नहीं है।

माता लक्ष्मी- लेकिन धरती लोक से तुम हमेशा कुछ सामग्री लाते हो, कई बार ये कारूणिक होती हैं। कभी ये दिलचस्प होती हैं और कई बार चौंकाने वाली होती हैं।

नारद- हाँ माता, लेकिन अब टेक्नालाजी का जमाना है। मुझ तक खबरें पहुँचने और इसे पहुँचाने से पहले वे व्हाटसएप जैसे सोशल मीडिया के माध्यम से आप तक पहुँच जाती हैं।

माता लक्ष्मी – लेकिन तुम्हारी खबरों की बात अलग है नारद, तुम्हारा अंदाज-ए-बयाँ कुछ अलग है। यूँ ही तुम देवर्षि नहीं हो गए, व्हाटसएप में उथली-उथली जानकारी मिलती है। बहुत सी जानकारियाँ तो संदेहास्पद होती हैं।

प्रभु- नारद, मैं तुम्हारी माता से सहमत हूँ। तुम ऐसी बातें भी ले आते हों जो भविष्य में खबरें बन सकती हैं इसलिए ही लोग अब भी तुम्हारा आदर करते हैं। वैसे धरती में तेजी से आबादी के विस्तार के होने के साथ ही लोगों की तकलीफें भी बढ़ रही हैं अब हमें अपना ज्यादा समय धरती लोक पर देना होगा।

माता लक्ष्मी- अभी क्या स्थिति है?

नारद- साल भर से मैं अयोध्या और नजदीकी शहरों में घूम रहा हूँ। संतों की ओर से और आम जनता के बीच से फिर से राम जन्म भूमि में भव्य मंदिर निर्माण की माँग उठ रही है।

प्रभु- लेकिन मैंने तो लोगों की तकलीफों के बारे में पूछा था?

नारद- दैहिक, दैविक, भौतिक तापा, राम राज्य कहुहुं नहीं व्यापा। आपने राम राज्य का जो आदर्श स्थापित कर दिया है वो लोगों के अब भी जेहन में है। इसने हमेशा के लिए मृत्यु लोक में नेताओं के समक्ष मुसीबत पैदा कर दी है। कितना भी काम कर दो, मृत्यु लोक की जनता तृप्त नहीं होती।
माता लक्ष्मी- नारद, तुम हमेशा मृत्यु लोक शब्द ही क्यों इस्तेमाल करते हो। जब भी पुराण पढ़ती हूँ। प्रभु की कथा का पारायण करती हूँ। हमेशा तुम सबसे पहले यही कहते अपनी बात आरंभ करते हो। मृत्यु लोक में नाना-प्रकार के दुखों से लोग त्रस्त हैं। जबकि मैं हर बार दीपावली में जब धऱती लोक जाती हूँ तो हमेशा प्रफुल्लित चेहरे नजर आते हैं। बंदनवार से सजे घर, गेंदे के फूलों से सुवासित घर, केले के पत्तों और सुंदर रंगोली से सजे आंगन। दुख हो भी तो लोग इसे छिपा लेते हैं और उनके चेहरे पर हमेशा मुस्कान तैरती नजर आती है। लेकिन तुम इसे अपनी डायरी में दर्ज नहीं करते, हमेशा दुखदर्द और तकलीफें सामने लाते हो।

नारद- माता जी क्योंकि मैं देखता हूँ कि आपकी उपासना से भी लोगों को मुक्ति नहीं मिल पा रही। सुख नहीं मिल पा रहा। जिन पर आपकी कृपा जमकर बरसती है वे भी जीवन में सुख से रीते रहते हैं ऐसा क्यों है यह समझ नहीं आता?

प्रभु- नारद, इसका उत्तर तुम्हें देवी सरस्वती बेहतर बता पाएंगी?

माता लक्ष्मी- प्रभु, ऐसा क्यों? नारद हमेशा सरस्वती पुत्र क्यों रहे? उस पर लक्ष्मी की कृपा क्यों न बरसे? वो देवर्षि ही क्यों रहे, देवराज बनने के ख्वाब क्यों न देखे। प्रभु , जब समुद्र मंथन हुआ तो आपने भी तो लक्ष्मी का वरण किया, विष का पान केवल शिव जी ने किया, फिर नारद को इस कृपा से क्यों वंचित कर रहे हैं।

प्रभु- देवी, एक सुभाषित श्लोक तुम्हें याद होगा, विद्या ददाति विनयं, विनयाद याति पात्रत्वां, पात्रत्वाद धनाप्नोति, धनात धर्मः ततः सुखम। विद्या से विनय, विनय से पात्रता, पात्रता से धन और धन से धर्म का रास्ता खुलता है। जो शार्टकट से लक्ष्मी का वरण करते हैं उनके लिए लक्ष्मी चंचला सिद्ध होती है।

माता लक्ष्मी- आपके ज्ञान के समक्ष नतमस्तक हूँ प्रभु, देवी सरस्वती की कृपा आप पर सदैव बनी रहे, और मेरी कृपा तो आप पर है ही, मैं कभी आपके लिए चंचला सिद्ध नहीं होऊँगी ( मुस्कुराते हुए)

प्रभु- हाँ देवी, त्रेता युग में भी वनवास में कंटकाकीर्ण मार्गों में भी तुम मेरी सहगामिनी रही। मैं भी इसके लिए तुम्हारे समक्ष नतमस्तक हूँ।

माता लक्ष्मी- आपके सभी अवतारों में राम का अवतार आपका बेस्ट वर्सन है प्रभु, सचमुच यह पूर्णावतार है। जो संस्कृत साहित्य पढ़ते हैं और नायक के उद्दात चरित्र की बनावट को समझना चाहते हैं वे आपमें सब कुछ पा सकते हैं।

नारद- और माता आपका भी त्रेता का चरित्र सर्वाधिक भाता है। आप लक्ष्मी हैं लेकिन आपने महलों को छोड़कर अपने पति के साथ वनगमन का मार्ग चुना। प्रभु का जब राज्यारोहण हुआ तब भी एक अप्रिय प्रसंग के चलते आपको गृहस्थी के सबसे उत्तम वर्ष वन में गुजारने पड़े।
लंबे समय से इस वार्तालाप को ध्यान से सुनते हुए शेष नाग ने अपनी पहली प्रतिक्रिया दी।

शेषनाग- नारद, मैं कष्ट सहने को चरित्र का आधार नहीं मानता, जितने कष्ट प्रभु ने वन में महसूस किए, उतना ही कष्ट भ्राता भरत ने उठाया, वो अयोध्या में आत्मग्लानि में ग्रस्त रहे। भीतर का दुख और पीड़ा हो जाए तो आपको महलों में भी चैन नहीं मिलेगा।

नारद- प्रभु, जब मैं बैकुंठ लोक नहीं आता तब भी कई बार मंदिरों में आपके दर्शन के लिए जाता हूँ। घर-घर विचरण करता हूँ और अधिकांश तस्वीरों में आपकी क्षीरसागर की तस्वीर होती है। माता आपकी सेवा कर रही हैं और आप ध्यानपूर्वक माता की बातें सुन रहे हैं। धरती लोक में इन दिनों नारीवादी आंदोलन चला है और पति की सेवा करने वाली नारियों को परंपराग्रस्त कह कर खारिज किया जा रहा है। आपने यह बात कही, इसलिए मैंने कहा कि यह छवि पुराने राजाओं की छवि को इंगित करती है। व्हाटसएप में तो यह जोक है कि एक बार बाला जी ने पद्मनाभ जी से कहा कि मैं जीवन भर खड़ा रहकर इतना धन नहीं कमा पाया जितना आपने बैठे-बैठे अर्जित कर लिया।

माता लक्ष्मी- सेवा में जो सुख है वो कहीं नहीं है और इसके लिए यदि परंपरावादी होने का आरोप झेलना पड़े तो भी मैं तैयार हूँ। जबकि मुझे तो ऐसा लगता है कि यह बड़ी सुंदर तस्वीर है इसमें पति और पत्नी के बीच सुंदर संवाद की स्थिति दिखाई जा रही है।

नारद- यह चित्रकार पर भी निर्भर करता है कि उसने क्या बनाया। उन्होंने महलों के दृश्य देखे और ऐसा लगा कि जब उनके राजा सर्वशक्तिमान हैं तो प्रभु विष्णु तो सबके नियंता है वे उसी तरह ठाठबाठ से रहते होंगे। दूसरे यह देखने वाले पर भी है जाकि रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिंह तैसी। जबकि यहाँ देखता हूँ प्रभु आपकी आँखों में हजारों भक्तों के लिए निरंतर करूणा झलकती है।
उसी समय ध्रुव का आगमन भी हुआ। नारद जी का ध्रुव के साथ मित्रवत संबंध है। वे अक्सर उनसे कहते हैं तुम्हारी तो सितारे की हैसियत है। सतयुग में पैदा हुए तो प्रभु ने तुम्हें सितारा बना दिया। धरती लोक में इस समय तुम पैदा हुए होते तो भारत में सुपर स्टार होते।

ध्रुव- यह अच्छा हुआ कि नारद जी से भी यही मुलाकात हो गई, नहीं तो पता नहीं इनसे मिलने कहाँ-कहाँ भटकना पड़ता।

नारद जी- लेकिन तुम्हें भी मेरी तरह ही खूब भटकना चाहिए, वो शेर सुना है न, सितारों के आगे जहाँ और भी हैं अभी इश्क के इम्तिहान और भी हैं।

प्रभु- ध्रुव कैसे हो, तुम्हारे सुझाव हमेशा अच्छे रहते हैं। इस बार क्या सुझाव लाए हो।

ध्रुव- कुछ विशेष नहीं प्रभु, बस कुछ ऐसी बातें हैं जिनकी सुविधा आपने सतयुग और द्वापर में दी थी लेकिन कलियुग के लोगों को यह उपलब्ध नहीं।

नारद- कौन सी ऐसी सुविधाएँ हैं जिनका लाभ कलियुग के लोगों को नहीं मिल पा रहा।

ध्रुव- आकाशवाणी, पहले समय-समय पर आप आकाशवाणी कराते थे। जब आसुरी गतिविधियाँ बढ़ जाती थीं तब चेतावनी मिलती थी आकाशवाणी से, तुम्हारा काल आ गया है सावधान हो जाओ और लोग सचेत हो जाते थे। अब ऐसी सुविधा नहीं है।

नारद- (मुस्कुराते हए) अब प्रभु ने लोकतंत्र स्थापित कर दिया है आकाशवाणी की जरूरत नहीं, जनता के पास निर्वाचन का विकल्प है। पसंद नहीं आ रही सरकार तो बदल दो।

ध्रुव- एक और खूबी है लोकतंत्र में, वो बजट का भी विकल्प देता है हर साल लोग इस उम्मीद में बजट की ओर देखते हैं कि यह बजट उनके जीवन में खुशियाँ बिखेरेगा और कुछ अच्छा तो हमेशा होता ही है। मेरी दूसरी सलाह यही है जैसे सरकारें अपना बजट पेश करती हैं। वैसे ही प्रभु आपको आकाशवाणी के माध्यम से अपना सालाना बजट धरती के लिए, देव लोक और पाताल लोक के लिए प्रस्तुत कर देना चाहिए।

नारद- और इसका प्रारूप मैं तैयार करूंगा, जैसे इस साल लोगों के दुख-तकलीफों में दस फीसदी गिरावट होगी। गंभीर बीमारियों की जो तकलीफें लोग झेल रहे हैं उनकी तकलीफ कम कर दी जाएगी। लोगों के बीच आपसी प्रेम में दस फीसदी का इजाफा कर दिया जाएगा। लोगों की भीतरी ईमानदारी का दर दस प्रतिशत बढ़ा दिया जाएगा। इसी प्रकार की घोषणाएँ

प्रभु- प्रसन्न मुद्रा में, हमें नारद का विभाग बदलना चाहिए, इन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की जगह वित्त मंत्रालय का प्रभार देना चाहिए ताकि हमारा बजट बेहतर हो जाए।

माता लक्ष्मी- नहीं प्रभु आप एक नई मिनिस्ट्री का गठन कीजिए, इसका नाम होगा हैप्पीनेस मिनिस्ट्री। जैसे भारत के पड़ोसी देश भूटान में है। इसका काम होता है यह देखना कि लोगों को किस तरह खुश रखा जाए। क्योंकि खुशहाल लोग शांत रहेंगे और शांत लोग ही तरक्की भी कर पाएंगे।

नारद- प्रभु , सतयुग में तो आप भेष बदलकर पहुँच जाते थे कलियुग में भी धरती लोक का हाल देखने चलिये न।

प्रभु- हाँ नारद जरूर हम लोग जरूर चलेंगे। शिव जी को कैलाश से ले लेंगे, उन्हें मैसेज कर देना।

ध्रुव- हाँ शिव जी को बहुत दिनों बाद काशी जाना बहुत अच्छा लगेगा। पुराणों में वर्णन मिलता है कि इससे पहले वे काशी नगरी राजा दिवोदास के समय आए थे, तब भयंकर अकाल पड़ा था और शिव जी घर-घर भूखे घूमे थे, तब काशी नगरी को श्राप देने वाले ही थे तभी माँ अन्नपूर्णा प्रकट हुईं और शिव जी प्रसन्न हो गए।

माता लक्ष्मी- माता पार्वती का साथ मुझे भी बहुत अच्छा लगेगा।

प्रभु- पहले हम लोग उस मार्ग पर चलेंगे जहाँ से अयोध्या से हम लोग वनवास के रास्ते आगे बढ़े थे फिर लंका होते हुए पुनः अयोध्या, फिर कैलाश-मानसरोवर में शिव जी का दर्शन करते हुए उन्हें अपने साथ लेते हुए काशी आएंगे।

ध्रुव- हम सब भी आपके साथ रहेंगे। हम रामलीला मंडली का भेष धारण करेंगे, माता आप सीता जी का भेष धारण करेंगी और प्रभु श्रीराम का, शेषनाग एक बार पुनः लक्ष्मण का भेष धरेंगे। आपके अनुचर मंडली के कलाकारों की भूमिका निभाएंगे।

माता लक्ष्मी- अरसा हुआ पुष्पक में बैठे, क्या इस बार हमें पुष्पक की सेवाओं का लाभ मिल पाएगा।

प्रभु- अवश्य देवी, यह वैसा ही सुखद क्षण होगा जब हम लंका से अपनी राजधानी आए थे।
फिर जय-विजय को प्रभु ने धरती लोक में विचरण करने की तैयारी का आदेश दिया।

तमसा नदी तट पर...
पुष्पक विमान तमसा नदी तट पर उतरा। अयोध्या से राम वन गमन का पहला दिन श्रीराम ने यहीं गुजारा था तब अपने साथ वनगमन के लिए निकले हजारों अयोध्यावासियों को रात में ही सोता छोड़कर उन्होंने आगे का रास्ता अख्तियार किया था।

माता सीता- अब तमसा कितनी बदल गई है। पहली बार जब देखा तो हजारों वृक्षों के बीच कलकल करती तमसा की धारा कितना आकर्षित करती थी।

लक्ष्मण- अब नदी तट पर वृक्ष भी नहीं, कहीं क्रौंच पक्षी भी नहीं। यदि वाल्मीकि इस समय यहाँ आये होते तो शायद ही रामायण लिख पाते।

श्रीराम- अब तमसा से आगे बढ़ते हैं आज गंगा जी के तट पर जाएंगे। वहाँ जरूर अब भी निषादराज के वंशज होंगे, जो हमें गंगाजी पार करा देंगे।

ध्रुव- फिर प्रयागराज में रामलीला का आयोजन करेंगे।
प्रयागराज में रामलीला करने पहुँची मंडली शिव वाटिका पहुँची। प्रयागराज में होने वाली अधिकतर रामलीलाओं का आयोजन यहीं होता है। शिव वाटिका में रामलीला के मुखिया श्रीराम ने शिव वाटिका के प्रमुख वीरभद्र को अपना परिचय दिया।

वीरभद्र- आप अपने पूरे गेटअप में हैं। पहले प्रयाग में देखा नहीं आप लोगों को।

श्रीराम- हमने अभी-अभी रामलीला मंडली तैयार की है। हमारे पास प्रतिभाशाली कलाकार हैं और हमने बीते दिनों खूब प्रैक्टिस की।

वीरभद्र- आप तो राम कहानी जानते ही हैं यदि श्रीराम ने दक्षिण दिशा की जगह उत्तर दिशा में सीता जी को ढूँढा होता तो क्या वो मिल पातीं। प्रतिभाशाली कलाकारों को मुंबई लेकर जाइये, प्रयाग में क्या रखा है।

श्रीराम- हमारा उद्देश्य अर्थोपार्जन नहीं है।
वीरभद्र- लेकिन मंडली का गुजारा भी तो होना चाहिए। साल भर गांव-गांव घूमकर रामलीला मंडली प्रदर्शन करती है तब कहीं निबाह हो पाता है। मैंने पुराने दिन भी देखे हैं रामलीला देखते हुए लोगों की आंखें भर जाती थीं और राम का चरित्र निभा रहे व्यक्ति के प्रति ऐसा सम्मान जैसे स्वयं श्रीराम धरती पर आ गए हों।
लक्ष्मण- समय बदलता है लोगों का धार्मिक रूझान भी घटता-बढ़ता है तभी तो युग बदलते हैं और हर युग में ईश्वर अवतरित होते हैं।

वीरभद्र- आपकी मंडली बहुत आकर्षक लग रही है बिल्कुल इस कैलेंडर की तरह। जैसा इस कैलेंडर में श्रीराम को देखता हूँ वैसा ही आपको भी पाता हूँ। माता सीता और लक्ष्मण भी वैसे ही। सचमुच जब आपकी मंडली प्रदर्शन करेगी तो कमाल होगा।

वीरभद्र- लेकिन आपकी मंडली में हनुमान नजर नहीं आ रहे।
श्रीराम ने जय-विजय की ओर देखा, जय-विजय ने बताया कि उन्हें मैसेज कर दिया गया था।

श्रीराम- हनुमान जी के पात्र अभी तक नहीं पहुँचे हैं। वे पहुँचते ही होंगे।
फिर अचानक वीरभद्र बजरंगबली के रूप में बदल गए। उन्होंने प्रभु से कहा- जय-विजय का संदेश मिल गया था, यद्यपि मैंने यह नहीं बताया था कि मैं इस जगह पर मिलूंगा।

श्रीराम- हनुमान, तुम हमेशा अप्रत्याशित रूप से इसी तरह से मिलते हो। तुम बहुत शरारती हो, तुमने बातों-बातों में इशारा भी किया, पर हम लोग समझ नहीं पाये।

हनुमान- लेकिन माता सीता हतप्रभ हैं वे अब भी इस विश्वास नहीं कर पा रही हैं।

माता सीता- तो वैसे ही दिल चीरकर दिखा दो या प्रभु की कोई अमानत दिखाओ जिससे मैं यकीन कर सकूँ। (फिर मुस्कुराईं)

हनुमान- स्त्रियों के आभूषण ज्यादा समय तक रखने का जोखिम मैं नहीं ले सकता, इसलिए प्रभु से मैंने कोई भी धरोहर नहीं ली। जय-विजय का मैसेज दिखा सकता हूँ।
फिर हनुमान अपने दुनियावी स्वरूप में लौट आए। वीरभद्र के रूप में।

प्रभु श्रीराम, नारद की ओर मुखातिब होते हुए- अपने दायित्वों के निर्वहण के लिए मैं बैकुंठ चला गया लेकिन हनुमान यही हैं। वे करोड़ों भक्तों और मेरे बीच की कड़ी हैं। इतने बलशाली और विद्वान होने के बावजूद उनकी विनम्रता और सेवा भाव ने उन्हें करोड़ों भक्तों के मन में अलग ही जगह दी है। हनुमान के यहाँ होने से मैं हमेशा धरती को लेकर आश्वस्त भाव का अनुभव करता हूँ।

पहले दिन शिव वाटिका में रामलीला का आयोजन हुआ। सीता स्वयंवर से इसकी शुरूआत हुई। रामचरित मानस के दोहे गाये गए।
राम के रूप निहारत जानकी, कंकण के नग की परछाई।
फिर शिव धनुष टूटना, परशुराम का कोप और लक्ष्मण का क्रोध।

राम लीला समाप्त हुई, लोगों ने श्रीराम और सीता माता से आशीर्वाद लिया। वीरभद्र भी मौके पर उपस्थित थे। वे हारमोनियम पर यह गीत दोहराते रहे।
तेरे द्वार खड़ा भगवान, भगत भर दे रे झोली।

सचमुच भगवान शिव वाटिका में मौजूद थे और भक्त भी यही सोच रहे थे कि वे भगवान से ही आशीर्वाद ले रहे हैं। कथा समाप्त होने के पश्चात मंडली गंगा तट पर आई। चांदनी रात थी, लकड़ियाँ जलाई गई और मंडली के सभी सदस्य बैठ गए। "आज के समय में इसे कैंपफायर कहा जाता है" वीरभद्र जी ने कहा।

सीता जी ने कहा कि आज बहुत आनंद आया, सचमुच हम लोग टाइम मशीन में चले गए थे, त्रेता युग हूबहू मेरी आँखों में उमड़ आया।

श्री राम ने कहा – और मुझे तो लगा कि महाराजा जनक के यहाँ का स्वयंवर प्रसंग तो बिना शक्कर की चाय की तरह का था, अच्छा तो था लेकिन इसमें मिठास भर दी तुलसी के दोहों ने। तुलसी ने उन स्मृतियों को और भी सुखद कर दिया।

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चित्रकूट के घाट में भई संतन की भीड़।
स्फटिक शिला के समीप रामलीला मंडली ठहरी। मंदाकिनी में स्नान किया। भ्राता भरत की कई स्मृतियाँ श्रीराम के मन में उभर आईं।

स्फटिक शिला में बैठे श्रीराम के मौन को भंग करते हुए लक्ष्मण ने फिर से उनसे शरारत की। कहा कि मैंने आपके लिए इतने बरस चित्रकूट में घने जंगलों में गुजारे, फिर भी भ्राता के रूप में आप सबसे पहले भरत को ही स्मरण करते हैं। मुझे आपका वचन हमेशा याद आता है आप अपने प्रियजनों को कहते हैं। तुम मम प्रिय भरत सम भाई।

तब माता सीता ने कहा कि लक्ष्मण तुम्हें याद है जब हम लोग वनगमन के लिए निकले थे तब मैंने कहा था कि मैंने तो सात फेरों में जीवन भर साथ निभाने का संकल्प लिया है पर तुम क्यों त्यागी बनकर वनवास के लिए निकल गए। तब तुमने कहा था कि मैं तो बड़े भैया की सेवा का लाभ लेना चाहता हूँ। तब मैंने कहा था कि तुम केवल प्रेम के वशीभूत साथ आ गए न। जब मैं यह कह रही थी तब मैंने देखा कि तुम्हारे भैया की आंखों में छोटे-छोटे से आँसू छलक आए थे।

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दंडकारण्य में अपने ननिहाल में
रामलीला मंडली चंदखुरी में है। यहीं राजा भानुमंत के यहाँ माता कौशल्य का जन्म हुआ। अब यहाँ मां कौशल्या का मंदिर है। बहुत थोड़े से भक्त यहाँ आते हैं। श्रीराम ने माता के दर्शन किए और आशीर्वाद लिया। फिर मंडली पौराणिक नगरी राजिम पहुँची। श्रृंगी ऋषि के आश्रम के तट के पास, जिस दिन मंडली पहुँची, उस दिन यहाँ कुंभ मेला लगा था। वीरभद्र जी ने कहा कि आप कुंभ मेले के अवसर पर प्रयाग नहीं आ सके, यहीं कुंभ मेले में पवित्र स्नान कर लें। पवित्र स्नान के बाद श्री राम ने कुलेश्वर महादेव के दर्शन किए और दंडकारण्य की दिशा में बढ़ गये। दंडकारण्य ज्यादा नहीं बदला है। आसुरी शक्तियों की जगह नक्सलवादियों ने ले ली है और इस भूमि में संघर्ष अब भी जारी है।

यह संघर्ष केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं है। यह जीवनशैली का संघर्ष भी है। वीरभद्र जी ने कहा। हम दंडकारण्य में ठीक उस मार्ग को फॉलो नहीं करेंगे जहाँ से आप त्रेता में गुजरे थे। हम ढोलकल शिखर भी जाएंगे, यहाँ प्राचीन गणेश प्रतिमा देखेंगे, फिर आगे का सफर जारी रखेंगे।

देर शाम फरसपाल में फिर कैंपफायर किया गया। सुबह का सूरज ढोलकल में चमक रहा था। रामलीला मंडली ने देखा, गणेश अचानक मूर्ति से निकलकर अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो गये। कहा- मुझे यकीन नहीं था कि कलियुग में आपको यहाँ देख पाऊँगा। श्रीराम ने कहा कि ढोलकल गणेश, तुम्हारी सुंदरता की बहुत तारीफ की थी, अब बिल्कुल सुबह सूर्योदय के वक्त शिखर पर तुम्हें विराजित देखकर लगा कि यहाँ आने का हमारा निर्णय पूरी तरह सफल हुआ।

ध्रुव ने श्री गणेश से कहा- देखो, मेरा दोस्त भोर का तारा रोज सुबह के सूरज के साथ तुम्हारे पास आता है। इस शिखर में जब भी कभी अकेला महसूस करो, उससे बातें कर लिया करो।

शिखर पर वीरभद्र जी पुनः हनुमान के रूप में थे। माता सीता ने पुनः उन्हें परेशान किया, सुबह का सूरज तुम्हें देखकर काफी परेशान हो गया है कहीं हनुमान का बचपना न जाग जाए और उसे पुनः न निगल ले।

हनुमान ने बताया कि कुछ दिनों पहले किसी ने शिखर से गणपति की प्रतिमा को नीचे गिरा दिया था लेकिन हमारी खुशकिस्मती है कि हमारे प्रथम पूज्य अब भी इतनी ही भव्यता से शिखर पर विराजमान हैं।

फिर इंद्रावती के उस पार अबूझमाड़ में रामलीला मंडली ने वैसे ही अरण्यवासी देखे जैसे वनगमन के समय देखे थे। श्रीराम ने कहा कि त्रेता का समय यहाँ बीता नहीं है। हम टाइम मशीन से वापस त्रेता नहीं पहुँचे हैं। अबूझमाड़ में मुझे लगता है कि हम कलियुग में भी यहीं हैं।

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फिर पंचवटी में....
देवी सीता आश्चर्यचकित थी। जहाँ पंचवटी थी, वहाँ पूरा एक शहर उग आया था। भीड़भाड़ से भरा शहर नासिक। मैकडोनाल्ड जैसे रेस्तरां से भरा शहर, आधुनिक जीवन शैली के साथ बरसों की परंपरा भी यह शहर बदस्तूर निभा रहा है। नासिक का एक सांस्कृतिक चेहरा भी है। यहाँ के आडिटोरियम में वीरभद्र जी ने मैथिलीशरण गुप्त की पंचवटी का प्ले कराया। प्ले के बाद नासिक के मुक्ति धाम में टीम रूकी। देर शाम को मुक्ति धाम मंदिर में माता सीता ने कहा कि प्रभु आपकी कथा कई भाषाओं में है। संस्कृत, अवधि से होती हुई हिंदी तक पहुँची है और हमेशा मधुर लगती है। वीरभद्र जी ने कहा- देवी इस आडिटोरियम में कंबन द्वारा लिखी तमिल रामकथा, कृतिवास द्वारा लिखी रामायण का भी प्ले हुआ है। सबसे खुशी की बात यह है कि इंडोनेशिया के बाली द्वीप से आई टीम ने भी यहाँ अपना प्रदर्शन किया था। वहाँ की रामायण में वानर सबसे प्रखर पात्र हैं।

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फिर किष्किंधा पर्वत में
पहले यह  किष्किंधा था। अब इसे हंपी कहते हैं। सुग्रीव की राजधानी कलियुग में शक्ति का प्रमुख केंद्र बनी और विजयनगर साम्राज्य में राजाओं ने इस ऐतिहासिक नगरी को कई धरोहरों से सजाया। यहाँ के मंदिरों में रामकथा का अंकन हर कहीं देखने को मिला। मस्तक पर त्रिपुंड लगाए पुरुष और बालों में वेणी सजाई महिलाओं के हाथों में पूजा के दीप स्वर्ग सा दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे।

माँ सीता ने फिर से नारद को निशाने में लिया। नारद, तुम इसे हमेशा नरकलोक कहते हो, यह दृश्य तो स्वर्ग जैसा है। नारद के पास हमेशा जवाब तैयार रहते थे। आपका रूट प्लान आपके आफिसर्स तैयार करते हैं। वे हमेशा आपको ऐसी जगहों पर ले जाते हैं जहाँ जन्नत हो या जन्नत न भी हो तो आपको दिखाने के लिए वो जन्नत धरती में ही उतार देते हैं।

श्रीराम ने कहा- इसलिए मैं नारद से उलझने से बचता हूँ।

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रामेश्वरम
तमसा के तट से जो यात्रा शुरू हुई वो रामेश्वर के तट पर पहुँच गई। रामेश्वरम की सबकी स्मृतियाँ थीं। हनुमान के मन में लंका दहन की स्मृतियाँ उभरी। नल-नील के मन में सेतुबंध के स्थापत्य की स्मृतियाँ उभरीं। माता सीता को वो क्षण याद आया जब एक निर्दयी राक्षस उन्हें बलपूर्वक सागरपार ले जा रहा था। लक्ष्मण को वो प्रसंग याद आया जब भ्राता श्रीराम ने सागर पर रोष जाहिर किया था और अपने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ा ली थी। अंततः अयोध्या वापस आने का निर्णय लिया गया।

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रामजन्मभूमि में...
रामलीला मंडली दीपावली के दिन अयोध्या पहुँची। इस बार अयोध्या में विशेष रूप से दीप दीपावली उत्सव मनाया जा रहा था। पुष्पक विमान से राम सीता और लक्ष्मण राजधानी में उतरे, उनका राज्याभिषेक किया गया। हजारों अयोध्यावासियों के हाथों में मोबाइल फोन थे जिसमें वे इस अद्भुत दृश्य को अपने कैमरे में ले रहे थे। फिर सरयू में हजारों दीप प्रवाहित कर दिए गए। रामलीला मंडली ने सरयू में स्नान किए और राम लला के दर्शन के लिए पहुँचे। अयोध्या पहुँचे हजारों भक्तों के मन में चाह थी कि श्री राम ने जहाँ जन्म लिया, वहाँ भव्य मंदिर बने। राम लीला मंडली ने पास ही एक धर्मशाला में रात बिताने का निश्चय किया। नारद ने प्रभु से पूछा- आप जगत के संचालक हैं। आपके ही जन्मस्थान का विषय कोर्ट में हल हो, यह अजीब लगता है।

ध्रुव ने कहा- हाँ सच है। करोड़ों लोगों की आस्था फलीभूत तभी होगी जब यहाँ मंदिर का निर्माण होगा। अपने प्रभु के दर्शन के लिए लाखों लोग पहुँचेंगे और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करेंगे। नारद ने कहा कि प्रभु मंदिर जरूर बनाइये लेकिन लोगों को समय भी दीजिए कि वो आपके दर्शन के लिए यहाँ तक पहुँचे। उन्हें इसके लिए आवश्यक अवकाश भी प्रदान करें, जो लोग यहाँ तक पहुँच नहीं पायें, उन्हें आर्थिक सहयोग भी प्रदान करें, अब इस समय श्रवण कुमार जैसे लोग तो हैं नहीं कि अपने अभिभावकों को लेकर अयोध्या पहुँच जाएं। माता सीता ने कहा- हाँ अपनी जन्मभूमि में सबसे मिलना प्रभु के लिए बहुत सुखद होगा लेकिन उन्हें तब और अच्छा लगेगा जब लोग उनके जीवन मूल्यों को जियें। जब भरत और लक्ष्मण जैसे भाई हों, जब हनुमान जैसे सखा हों। जब गुस्सा अन्याय के विरुदध हो, सरलता फिर से जीवन का मूल्य बने। प्रभु की जन्मभूमि में मंदिर तो बनेगा ही लेकिन इसका उद्देश्य तभी पूरा होगा जब असल रामराज्य धरती लोक पर उतरे।

प्रभु के चेहरे पर मधुर मुस्कान आई। उन्होंने भगवान शंकर को फोन लगाया और कहा कि अयोध्या देख लिया, अब आपकी काशी देखनी है। आपके बगैर विश्वनाथ जी के दर्शन अधूरे रहेंगे। काशी भी तेजी से बदल रही है। आपके दर्शन के लिए हम कैलाश पहुँच रहे हैं।

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