व्यंग्य: वे इशारा दे कर चले गए

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

बिना जान-पहचान के लोग नमस्ते करने लगते हैं तो मेरा माथा संदेह से ठनकने लगता है। वे बिना सोर्स लगाए सरकारी कर्मचारियों से काम करवाने की हिम्मत कर लेते हैं। यह ट्रिक मुझ पर काम नहीं करती। अतिथि ने नमस्ते किया तो मेरी उँगलियाँ स्वत: नोट गिनने की मुद्रा में आ गईं। वे बोले, "भाई साहब मेरा इंटरव्यू अख़बार में छपवा दो।" मैं चौंका। मैं कोई पत्रकार नहीं हूँ, न पुलिसवाला हूँ। अख़बार वाले मेरे पत्नी-पक्ष के भी नहीं हैं कि वे मेरा लिहाज पालें। वे पिता-पक्ष जैसे हैं, हाथ उठाया और दे दिया धप्प, अस्वीकृत। किस ख़ुशी में छपवाऊँ उनका इंटरव्यू? फिर भी मैंने पूछा, "आपका अ... अ... शुभ नाम क्या है?"

"कवि प्रमेय, सर"। मैंने यह नाम कहीं पढ़ा-सुना नहीं था। मन हुआ उन्हें कह दूँ कि आपको छपास नामक असाध्य रोग लग गया है, उसका इलाज करवाइए। पर मैंने अपना व्यंग्य बाण रोक लिया और पूछा, "आपने कुछ उल्लेखनीय कार्य किया है?" वे बोले "आप कुछ भी काम लिख दीजिए। इंटरव्यू छपवाने के लिए काम करने की क्या ज़रूरत है, आप तो तगड़ा इंटरव्यू लिख दीजिए। मेरी तीन प्रकाशनाधीन किताबों की चर्चा कर दीजिए। आठ-दस अप्रचलित पुरस्कारों के नाम लिख दीजिए। क्या है न आजकल साहित्य में इंटरव्यू की धूम है, बिना इंटरव्यू के आपका मूल्यांकन नहीं होता।" उनकी छपास-बुद्धि ने मुझे चर्चित होने का गड़ा खजाना बता दिया। मैं रोमांचित हो उठा, रहस्य जानने की जिज्ञासा लिए मैंने पूछा, आपकी तीनों प्रस्तावित किताबों के नाम बताइए।

उनकी अंगुलियाँ बालों में घुस गयीं, दिमाग़ से बोध नहीं मिला तो बोले, "किताबों के नाम आप ही रख दीजिए। मुझे कौन साहित्य अकादमी वालों को किताबें भेजना है। मुझे तो एक अदद इंटरव्यू छपवाना है बस। क्या है न इंटरव्यू होगा तो वाहवाही होगी, मस्का लगाने वाले लोग मुझे विचारक कहेंगे और मैं खुद को स्थापित कवि कहूँगा। भोली-भाली जनता मुझे महापुरूष समझेगी और रिश्वतखोर कर्मचारी बिना भोग माँगे मेरी पेंशन फाइल आगे बढ़ा देंगे।"

- पर प्रमेय जी, मैं आप के बारे में कुछ नहीं जानता।
- यही साफगोई आप के पक्ष में जाती है। आप तो बस दस-बारह प्रश्न लिख दीजिए, मैं उनके उत्तर लिखवा लाऊँगा।

कवि प्रमेय सच कहते हैं। लोग पत्र-पत्रिकाओं में येन-केन अपना इंटरव्यू छपवाना चाहते हैं। प्रेस और सत्ता से अपने बड़े-चढ़े रिश्ते बताना चाहते हैं। वे पत्र-पत्रिकाओं की कटिंग जेब में रखते हैं और शनि महाराज के नाम पर खाने-कमाने वालों की तरह अपना उल्लू सीधा करते हैं। यूँ कहिए कि एक चिन्दी मिल जाये तो बजाजखाना खोल देते हैं। कवि प्रमेय तो सिर्फ इंटरव्यू छपवाना चाहते हैं। राजनेता भैये लच्छेदार भाषण से लगाकर ख़ुद पर पीएच. डी. का शोध-प्रबंध लिखवाते हैं। परिचित लोग अपने पड़ोसियों के हीन-चरित्र का कच्चा-चिट्ठा लिखवाते हैं। कुछ प्रतिवाद करता हूँ तो कहते हैं, "आप तो लिख दो, शेष अगले अंक में; या कि संवाददाता तथ्यों की खोज में लगा हुआ है। काली करतूतों का भंडाफोड़ और पर्दाफाश क्रमशः होगा।" 

"अच्छा बताइए, इससे पहले आपने कहीं इंटरव्यू दिया है", मैंने पूछा। वे बोले, "हाँ बच्चे के नर्सरी में एडमिशन के लिए इंटरव्यू दिया था। पर वे इंटरव्यू की आड़ में डोनेशन माँग रहे थे।" मैं क्या कहता, मुझे चुप देख वे झन्ना कर बोले, "इस शहर में चालीसों लोग खुद को पत्रकार कहते हैं। उनमें न लिखने की तमीज़ है न बोलने की। वे दो रुपये वाला अख़बार बेचते हैं और खुद को पत्रकार कहते हैं। हॉकर को हिन्दी ने कितना सम्मानित नाम दिया है।"

कवि प्रमेय सच बोल रहे थे हिन्दी में आठ-दस अख़बार हैं, बाकी मुजरे को तैयार नगरवधुएँ हैं। कुछ सौ रुपयों का चन्दी-चन्दा बहुत है उनके लिए। मैंने कवि प्रमेय से कहा, "इंटरव्यू छपवाना आसान नहीं हैं। कुछ करो तो अख़बार वाले ख़ुद-ब-ख़ुद इंटरव्यू छाप देंगे। देश में बड़े-बड़े अभियान चल रहे हैं, झाड़ू पकड़ कर खड़े हो जाओ तो स्वच्छता से जुड़ जाओगे। कमर झुका कर खड़े हो जाओ तो फिटनेस चैलेंज से जुड़ जाओगे। सेल्फी मुद्रा में एक्शन फोटो लो। फोटो और इंटरव्यू छपवाने के इससे सरल और अच्छे मौके पहले कभी नहीं थे।"

कवि प्रमेय तेश में आ गये। बोले, "बहुत देखे कुछ करके इंटरव्यू छपवाने वाले। बीसियों लोगों के इंटरव्यू धुप्पल में छप रहे हैं। राजनेता कुछ भी बकें तो पहले पन्ने पर छप जायें। वक्तव्य दें तो वे फोटो सहित छप जाये। मैं भी चाहता हूँ कि अख़बार में मेरा इंटरव्यू छपे तो उसकी कतरन अपनी फेसबुक वॉल पर पोस्ट करूँ, लोगों को टैग करूँ और द्रुतगति से आती डिजिटल बधाइयों का आनंद उठाऊँ।"

"देखिये भाई सा’ब आप प्रतिष्ठित लेखक हैं इसलिए मैं इज्जत से कह रहा हूँ मेरा इंटरव्यू अख़बार में छपवा दीजिए नहीं तो....।" मैं इस चुनौती के लिए तैयार हो गया, जिम्मेदार लेखक को अपना बचाव करते आना चाहिए। प्रतिभावान लेखक को कुछ आए न आए, नौटंकी करनी ज़रूर आनी चाहिए। मैंने कवि प्रमेय से पूछा "नहीं तो क्या कर लोगे?"

"आपका इंटरव्यू मासिक "विशेष" में छपवा दूँगा। मालूम है न पत्रकार रामबाबू के इंटरव्यू। उन्हें दो सौ रुपये दूँगा तो वे सब कर देंगे। आप से ही कहलवा देंगे कि आपका कोई चरित्र नही हैं, आप स्वमूत्र पीते हैं, पराये माल पर बुरी नज़र रखते हैं, असहिष्णु हैं और आतंकवादी सोच रखते हैं। और हज़ारों बातें हैं जो नाउम्मीद लेखकों के बारे में लिखी जा सकती हैं।"

मैं मानसिक हमले के लिए तैयार नहीं था। अनाड़ी लेखकों का क्या है, साहित्यिक भाषा में असाहित्यिक लिख सकते हैं। मेरी मुट्ठियाँ ढीली हो गईं। मैंने कहा, "कवि प्रमेय, आप अपना ही इंटरव्यू मासिक "विशेष" में क्यों नहीं छपवा लेते? वह भड़क गये, बोले कवि हूँ, अपनी इज्जत अन्यत्र करवा सकता हूँ और मासिक "विशेष" में लोगों की इज्जत उतरवा सकता हूँ। मुझे तो वहाँ इंटरव्यू छपवाना है जिसकी सामाजिक और राजनैतिक प्रतिष्ठा हो। जो पढ़ा जाता हो। मासिक "विशेष" को अपने मासिक दौरों पर आये गुप्त रोग विशेषज्ञ खोलते हैं अपना विज्ञापन देखने के लिए।" उन्होंने सीधे-सीधे कहा, भाई सा’ब, बोलो आप मेरा इंटरव्यू सादर छपवाते हो कि मैं आपका इंटरव्यू छपवा दूँ और वे इशारा दे कर चले गए।
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