'घास' के रूप में प्रतिरोध के एक सार्वभौम और जनवादी प्रतीक की केदारनाथ सिंह की कविताओं में उपस्थिति


- पूजा तिवारी


           केदारनाथ सिंह की कविता का वितान इतना विस्तृत है कि वह एक बार में देखा जाना संभव नहीं है। कुछ-कुछ अनंत व विस्तृत फलक सा! उनके भीतर के कवि को जिलाए रखने में; उनके कवि मन को सिंचित करने में; उनके अचेतन और अवचेतन मन में निरंतर कुठाराघात करते उनके आंचलिक और ग्रामीण परिवेश से लगाव का विशेष योगदान है, जिसे उन्होंने स्वयं भी कई बार कविताओं, संस्मरणों आदि में स्वीकार किया है। साथ ही उनकी कविताओं का भदेसपन और गंवईपन इसका प्रमाण है। वे एक यायावार की तरह थे जो विभिन्न स्थानों पर रहता तो है किन्तु वहाँ से कुछ न कुछ सीखता चलता है। केदारनाथ की कवितायें इस बात का प्रमाण हैं कि उन्होंने विभिन्न स्थानों से उसकी झलकें, संस्कृतियाँ और समाज चुराकर अपनी कविताओं में उसे सम्पूर्ण स्पंदन के साथ अभिव्यक्त कर दिया है। इस अभिव्यक्ति के लिए उन्होंने कई प्राकृतिक प्रतीकों के माध्यम से कविता की संरचना को ठोस आधार दिया है। इनमें से एक महत्वपूर्ण प्रतीक है - घास।

           डॉ. धीरेन्द्र वर्मा लिखते हैं, “विचारों का सबसे महत्वपूर्ण कार्य 'प्रतीकीकरण' है।”[1] उनके इस कथन से स्पष्ट है कि प्रतीक विचारों को सशक्तता और सामर्थ्य प्रदान करते हैं। प्रतीक शब्द का सामान्य अर्थ है - चिन्ह, लक्षण, किसी की स्थानापन्न वस्तु, सूचक या प्रतिनिधि।[2] साहित्य में प्रतीक का प्रयोग रचनाकार की विशेष उपलब्धि के रूप में देखा जाता है। यह मनुष्य की अन्य जीवों से श्रेष्ठता व पृथकता का सूचक है। इसी कारण एन्सर्त कारिरेद ने मनुष्य को 'एनीमल रेशनल' की अपेक्षा 'एनीमल सिम्बोलिकम'[3] कहना अधिक उचित समझा है। साहित्य का अवलोकन यह सिद्ध करता है कि लेखकों ने समय-समय पर अपने लेखन को समृद्ध और पुख्ता बनाने के लिए कुछ ऐसे प्रतीकों का सहारा लिया है, जो कई बार मानक बन उठे हैं। ऐसे ही प्रतीकों में एक प्रतीक है 'घास'। 'घास' शब्द सामने आते ही एक हरी-सी, पतली सिकुड़ी पत्ती का बिम्ब आँखों के आगे उभर आता है। कभी यह अपने रंग के कारण मोहक लगती है और कई बार उपेक्षित भी। घास का एक प्रकार है 'दूब' जिसकी अपनी पौराणिक महत्ता है। यह मिथ प्रचलित है कि समुद्र मंथन के समय जब विष्णु मदरांचल पर्वत को अपनी जांघ पर रख समुद्र मंथन करने लगे तो उनकी जांघ के कुछ बाल टूटकर समुद्र में गिर गये और वही बाल बाद में किनारे लग दूब बन गये। समुद्र मंथन के समय निकला अमृत सबसे पहले इसी दूब पर रखा गया, जिसके बाद अमृत के संपर्क में आने से यह घास भी पवित्र और अमर बन गयी।[4] इस मिथक के अतिरिक्त वैज्ञानिक दृष्टि से भी घास की महत्ता कई बार सिद्ध हुई है।

           इस व्यावहारिक महत्ता से इतर साहित्य में घास की महत्ता एक सार्वभौमिक प्रतीक के रूप में देखी जा सकती है। सार्वभौमिक इसलिए कि यह प्रतीक केवल हिंदी भाषा के साहित्य में ही नहीं बल्कि विभिन्न भारतीय भाषाओं के साथ विदेशी साहित्य में भी महत्वपूर्ण रहा है। इसके लिए सर्वप्रथम यह देख सकते हैं कि केदारनाथ से इतर घास का प्रतीक के रूप में किस प्रकार प्रयोग किया गया है। हिंदी साहित्य में 'घास' का प्रतीक के रूप में सर्वप्रथम प्रयोग संभवतः कबीर ने किया है। उनके यहाँ घास उपेक्षित या दबे कुचले वर्ग का प्रतीक है किन्तु साथ ही उसकी शक्ति से भी वे परिचित कराना नहीं भूलते -

“कबीर घास न निंदिये, जो पाँव तलि होय
उड़ी पड़ी जब आँखि में, खरी दुहेली होय।”[5]

           'घास' के एक प्रकार 'दूब' की खूबी के कारण ही गुरुनानक ने एक स्थान पर दूब के समान जड़ों से जुड़े रहने की सीख कुछ इस प्रकार दी है -

“नन्हका चाहो चल, जैसे नीची दूब
और घास सूख जाएगा, दूब खूब की खूब।”

           अज्ञेय ने, जिन्होंने 'सारे प्रतिमानों के मैले' होने की बात कही 'घास' को एक नये प्रतिमान के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने 'घास' को शीर्षक और प्रतीक बनाकर कई कवितायें लिखीं। उनकी कविता में घास वह है जो सबकुछ जानती है और 'जिस के खुले निमंत्रण के बल जग ने जिसे रौंदा है और वह नहीं बोली है'[6]। उनकी कविता 'हरी घास पर क्षण भर' में घास मानव मन की संवेदना की तरह वितरित है, जिसे कोई रौंदे तो कवि कह उठता है -

नमो, खुल खिलो, सहज मिलो
अन्तः स्मित, अन्तः संयत हरी घास सी।”[7]

           'घास फूल धैर्य का ' कविता में अज्ञेय इसे धैर्य का प्रतीक बना देते हैं -

“दृश्यों के अंतराल में जीवन बिला गया
संशय के दंश से साहस तिलमिला गया
प्यार का हारा नहीं अमल विनय से
घास फूल धैर्य का चुपके खिला गया।”[8]

           'छन्द है यह फूल' कविता में घास सभी अर्थों को अलंकृत करने वाली पुरोधा बन गयी है -

छन्द है यह फूल, पत्ती प्रास
सभी कुछ में है नियम की साँस
कौन सा वह अर्थ जिसको अलंकृत कर नहीं सकती
यह पैरों तले की घास”[9]

           अज्ञेय के द्वारा प्रयुक्त घास के प्रतीक रूप के सन्दर्भ में संजय कुमार लिखते हैं, “इस घास में लय है, संगीत है। कहने की जरूरत नहीं कि यह लय और संगीत प्रकृति से जुदा है - मानव की अपसृष्टियों से नहीं।”[10]

           'कलगी बाजरे की' कविता में अज्ञेय ने घास को प्यारा प्रतीक माना है -

“आज हम शहरातियों की
पालतू मालंच पर संवरी जूही के फूल से
सृष्टि के विस्तार का -ऐश्वर्य का -औदार्य का
कहीं सच्चा-कहीं प्यारा एक प्रतीक
बिछली घास है।”[11]

           गोपाल नारायण श्रीवास्तव लिखते हैं, “बिछली घास क्या है ? बिलकुल नया प्रतीक, नया उपमान। परन्तु यह उपमान नारी की कोमलता, सजलता और ताजगी के अहसास को व्यक्त करता है। इसमें  सूखापन नहीं अपितु एक आर्द्रता एक नमी है, सौन्दर्य की व्यापकता है। कवि कहता है कि हमारे जैसे शहरी लोग अपने मालंच (गृह-वाटिका) पर साज-संभार के साथ जूही का जो फूल उगाते है और मुग्ध होते है उन्हें उस ऐश्वर्य, सच्चे औदार्य सृष्टि के विस्तार का बोध ही नहीं जो ‘हरी बिछली घास’ में है या फिर शरद ऋतु की सांध्य-वेला में आकाश की शून्य पीठिका पर लहलहाते बाजरे की कलगी में है।”[12]

           स्पष्ट है, अज्ञेय ने अपनी कविता में घास को प्रेमिका के साथ-साथ आमजन और सौन्दर्य के एक सुन्दर उपमान के रूप में स्थापित किया है।

           समकालीन कविता में 'घास' को एक तरफ तो सर्वहारा वर्ग के प्रतीक के रूप में तो कई बार क्रांति के प्रतीक के रूप में प्रयुक्त किया गया है। उदाहरण के लिए, अवतार सिंह संधू 'पाश' की कविता में घास का चरित्र विद्रोहात्मक हो उठा है -

मैं घास हूँ
मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊँगा[13]

           इसी प्रकार नरेश सक्सेना लिखते हैं -

सारी दुनिया को था जिनके कब्ज़े का अहसास
उनके पते ठिकानों तक पर फैल चुकी है घास
धरती भर भूगोल घास का तिनके भर इतिहास
घास से पहले, घास यहाँ थी, बाद में होगी घास।[14]


           कविता से इतर हिंदी गद्य साहित्य में भी घास को प्रतीक के रूप में प्रयोग किया गया है। प्रेमचन्द ने एक कहानी लिखी 'घासवाली'। इसमें उन्होंने घास छीलने के दौरान दुःख दर्द सहने वाले एक सहयोगी के रूप में घास को दिखाया है। साथ ही घास के माध्यम से समाज में श्रमिक जीवन की बदहाली और विसंगति को इंगित किया है। विश्वनाथ त्रिपाठी इस सन्दर्भ में लिखते हैं, “ठाकुर के खेत में घास छीलने वाली की अपेक्षा कचहरी के सामने घास बेचने वाली मुलिया ज्यादा स्वतंत्र है। गाँव से बाहर निकलते ही वह घास की स्वामिनी है। वह घास के रूप में अपना श्रम बेच रही है। यह सामन्तवाद से बाहर निकलने की एक छोटी से उछाल या कुदान है।”[15] इसी प्रकार विद्यासागर नौटियाल की कहानी 'घास' श्रमिक और ग्रामीण जीवन का एक आधार बनकर आती है -”इस भैस के लिए घास चाहिए। घास के लिए रूपसा को बिस्तर बनना पड़ता है कोठरी में पुलिसवालों के लिए और वन में पतरौल के लिए। जब जब रूपसा प्रतिरोध करना चाहती है उसे बीमार भैंस की याद आती है।”[16]

           घास को प्रतीक बनाते हुए नरेंद्र कोहली ने एक लेख लिखा 'सरकार का पति' - इसमें वे लिखते हैं -”कबीर बाबा ने कहा था: शेर भूखा मर जाता है, पर घास नहीं खाता। निष्कर्ष यह निकलता है कि जंगल में घास इसलिए अधिक मात्रा में होती है, क्योंकि शेर स्वयं घास नहीं खाता और घास खाने वाले जानवरों को खा जाता है। तो जंगल की घास शेर की वीरता का प्रमाण है।”[17] दूसरी तरफ सुरेन्द्र वर्मा की एकांकी 'हरी घास पर घंटे भर' में घास जैसा कि डॉ. चंद्रशेखर ने लिखा -”तीनों पीढ़ियों में एक ही हरी घास की परिवर्तित निरंतरता है। जैसे व्यक्ति पीढ़ी-परिवर्तन में आता है वैसे-ही-वैसे सापेक्षता में हरी घास भी बदल जाती है। हरी घास हमारी संवेदनाओं रुचि बोधों, संस्कारों के समकालीन सन्दर्भों से जुडी है।”[18]

           उपरोक्त के अतिरिक्त घास की साहित्य में सार्वभौम उपस्थिति का प्रमाण तब मिलता है जब हम पाश्चात्य साहित्य में इसके साक्षी बनते हैं। घास को प्रतीक के रूप में प्रयोग कर कविता लिखने वाले पाश्चात्य साहित्यकारों की सूची काफी लम्बी है। कुछ उदाहरण दृष्टव्य हैं -

           क्विनिसो मोगाले 'ग्रास सफर्स' कविता में घास को उस आम आदमी के प्रतीक के रूप में प्रयोग करते हैं जो तीसरे विश्वयुद्ध की कगार पर खड़ा संघर्ष करने और नष्ट होने के लिए बाध्य है-

हम तीसरे विश्वयुद्ध की कगार पर हैं
हम अवसान की कगार पर हैं
हम विलुप्त होने की कगार पर हैं
घास पीड़ित है, घास पीड़ित है।[19]”

           एमिलि डिकिन्सन की कविता है 'द ग्रास सो लिटिल हैज टू डू'। इसमें घास के जीवन और उसके योगदान को उल्लिखित होते हुए कवि इच्छा व्यक्त करता है कि 'काश! वह एक घास होता'।[20]



           कार्ल सैण्डबर्ग 'घास' कविता में लिखते हैं -

‘इन सड़ती लाशों का ढेर ऑस्तेरलित्जो और वाटरलू में ले जाकर लगाओ।
उन्हें जमीन में गाढ़ दो और मुझे अपना काम करने दो।
मैं घास हूँ
सब कुछ को ढक लेती हूँ।


           पोलिश लेखक तादयुश रोज़ेविच


‘मैं प्रतीक्षा करती हूँ दीवारों के ढहने की
और उनके धरती पर लौट आने की
और तब
मैं सारे नामों और चेहरों को
ढाँक लूंगी।”[21]

           वाल्ट व्हाइटमैन की कविता है 'अ चाइल्ड सेड व्हाट इज अ ग्रास'। इसमें उन्होंने घास को कई सारी चीजों के प्रतीक के रूप में देखा है। कभी वे इसे स्वयं की सोच के प्रतीक के रूप में, तो कभी जंगल के बच्चे के रूप में, तो कभी 'सार्वभौम चित्रलिपि' के रूप में देखते हैं। घास के सम्बन्ध में वे लिखते हैं, “Grass is an image of hope, growth, and death. According to the speaker, the bodies of countless dead people lie under the grass we walk on, but they also live on and speak through this grass.”[22] इसी प्रकार बाल रचनाकार ज्वाएस सिडमैन की 'ग्रास' कविता में भी घास की उस क्षमता की बात की गयी है जो किसी और में नहीं है। और वह है - 'हर जगह उग आना'। घास की यह हर जगह उग आने की प्रवृत्ति सामान्य जन और उसकी चेतना का प्रतीक है जिसके भले ही विविध रूप है किन्तु जब यह एकत्रित होती है तो इसका स्वरुप जनवादी हो जाता है और तब इसे केवल एक प्रकृतिवादी प्रतीक या उपमान के रूप में नहीं बल्कि जनवादी उपमान के रूप में देखा जाना अनिवार्य हो जाता है। अज्ञेय के ये शब्द “प्रकृतिवाद है स्खलन/क्योंकि युग जनवादी है”[23] इसी बात की पुष्टि करते हैं।

           अब यदि केदारनाथ की कविताओं में 'घास' प्रतीक और उसके स्थान को देखें तो यह उनके तीन कविता संग्रहों 'सृष्टि पर पहरा', 'अकाल में सारस' और 'यहाँ से देखो' में प्रयुक्त किया गया है। केदारनाथ सिंह की पुस्तक 'सृष्टि पर पहरा' में सम्मिलित 'घास' कविता में वे इसे सामान्य जन और उसके भीतर की क्रांति और शक्ति का प्रतीक मानते हुए इसके सार्वभौमिक और सार्वदेशिक रूप की तलाश करते हुए ही तो लिखते हैं -

दुनिया के तमाम शहरों से
खदेड़ी हुई जिप्सी है वह
तुम्हारे शहर की धूल में
अपना खोया हुआ नाम और पता खोजती हुई
आदमी के जनतंत्र में
घास के सवाल पर
होनी चाहिए लंबी एक अखंड बहस
...

एक छोटी सी पत्ती का बैनर उठाए हुए
वह तो हमेशा मैदान में है।
कभी भी...
कहीं से भी उग आने की
एक जिद है वह।[24]

           इस कविता के सन्दर्भ में कुमार मुकुल ने लिखा है, “केदार जी की कविता लोक के जीवट को तमाम तरह से अभिव्‍यक्‍त करती है। यहाँ तक कि आधुनिक तकनीक के संदर्भ भी जब केदारजी की कविता में आते हैं तो वे भी लोक की संवेदना को ही इंगित करते हैं। जैसे ‘घास’ कविता में घास लोक जनों का ही प्रतीक है क्‍योंकि केदार जी के शब्‍दों में ‘दुनिया के तमाम शहरों से खदेड़ी हुई, जिप्‍सी है वह ’ और वे उसके धुंधले ‘मिस्‍ड-काल’ मोबाइलों में देखने की बात करते हैं। हालाँकि वे इस घास की कभी भी कहीं से भी उग आने की खूबसूरत जिद को भी जानते हैं।”[25]

           इसी तरह केदार ने 'अकाल में दूब' कविता लिखी और इसमें दूब की जिजीविषा दिखाई जिसे अकाल तक में समाप्त नहीं कर सकता। यहाँ घास मृत्यु के बीच जीवन की तलाश और सकारात्मकता का प्रतीक बनकर उभरती है। नैराश्य के बीच कवि कुछ इस प्रकार दूब की तलाश में निकलता है -

“निकलता हूँ मैं दूब की तलाश में
खोजता हूँ परती पठार
झाँकता हूँ कुओं में
छान डालता हूँ गली चौराहे
मिलती नहीं 'दूब'[26]

किन्तु वह दूब को अच्छी तरह पहचानता है इसलिए अचानक उसे पाकर आह्लादित हो उठता है -

अचानक मुझे दिख जाती है
शीशे के बिखरे टुकड़ों के बीच
एक हरी पत्ती
दूब है
हाँ हाँ दूब है
पहचानता हूँ मैं'[27]

और सुधीश पचौरी के शब्दों में कहें तो 'दूब वाली कविता केदार के काव्यत्व के मिजाज को बेहतर ढंग से खोलती है।”[28] यह कांच के टुकड़ों के बीच दूब का जीवित रहना अहर्निश जिजीविषा नहीं तो और क्या है ? तभी तो अगली पंक्तियाँ बन पड़ी हैं -

है अभी बहुत कुछ है
अगर बची है 'दूब'।[29]

           'यहाँ से देखो' कविता संग्रह में संकलित कविता 'दो मिनट का मौन' बड़े सुन्दर तरीके से सर्वहारा वर्ग की टूटन, तड़प और राजनीतिक व्यंग्य के लिए घास का प्रयोग करती है। केदारनाथ सिंह ने बिम्बों के सन्दर्भ में कहा, “कविता में बिम्ब की बुनावट महत्वपूर्ण है, बिम्ब की प्रमुखता नहीं।' उनकी इस कविता में 'टूटी हुई घास' का की जो बिम्बात्मक बुनावट हुई है वह ही केदारनाथ को कृतिमता से बचाती है -

“गिरे हुए छिलके पर, टूटी हुई घास पर
हर योजना पर, हर विकास पर
दो मिनट का मौन “[30]

           अजय तिवारी अपने लेख 'केदार सिंह का स्वप्नलोक' में इस कविता के सन्दर्भ में लिखते हैं, “यह कविता हमारे चारो ओर वस्तुओं और प्रक्रियाओं की विसंगत उपस्थिति को एक फलक प्रदान करती है, इस तरह व्यंग की सृष्टि करती है।”[31]

           उमेश कुमार सिंह चौहान का मत यहाँ उद्धृत करना समीचीन जान पड़ता है, “केदारनाथ सिंह अपनी कविताओं में हर जगह सामान्यजन के पक्ष में ही खड़े दिखते हैं। 'घास' कविता में वे अपनी इसी जन पक्षधरता को - 'कवि अपनी पंक्तियों के बीच घूमने टहलने दो उसे/ वहाँ जो भी खाली है/ उसे भर देगी वह' कहकर सामने लाते है। घास सर्वव्यापी है। वह सर्वहारा की प्रतीक है। उसमें यह क्षमता भी है कि सारी विषमताओं से जूझती हुई कहीं भी पनप सकती है। उन्होंने घास की संघर्षशीलता का जो बिम्ब उसके द्वारा छोटी सी पत्ती का बैनर उठाये जाने का उल्लेख करके खींचा है, वह अद्भुत है। उन्होंने -'कभी-कभी लगता है/ और पिछले कुछ समय से कुछ ज्यादा ही लगता है/ कि आदमी के जनतंत्र में/ घास के सवाल पर/ होना चाहिए लम्बी एक अखंड बहस/ पर जब तक वह न हो/ शुरुआत के तौर पर मैं घोषित करता हूँ/ कि अगले चुनाव में मैं घास के पक्ष में/ मतदान करूँगा/कोई चुने या न चुने/ एक छोटी सी पत्ती का बैनर उठाये हुए/ वह तो हमेशा मैदान में है' कहकर एक साथ कई तरह के समसामयिक राजनीतिक मुद्दों की ओर इशारा किया है। सबसे प्रमुख मुद्दा तो यही है कि क्या जनतंत्र के सरोकारों के केंद्र में सर्वहारा, सामान्यजन या आज की भाषा में कहें तो आम आदमी या हाशिये पर पड़ा आदमी ही होना चाहिए ...दूसरा मुद्दा यह कि जनपक्षधरता सिर्फ बहस तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। आम आदमी को पहचानना चाहिए और उसे नेतृत्व करने का अवसर देना चाहिए। तीसरा यह कि परिवर्तन के लिए दूसरों का मुँह देखने के बजाए उसकी शुरुआत खुद से ही करनी चाहिए...अगले चुनाव में घास के पक्ष में मतदान किये जाने की घोषणा करके केदारनाथ सिंह लोक-चेतना के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को निस्संदिग्ध रूप से अभिव्यक्त कर देते हैं।”[32]

           दूसरी तरफ उदय प्रकाश आलेख 'कविता की ओट में 'बाघ' में लिखते हैं, “केदारनाथ के संघर्षों का एक और महत्वपूर्ण पक्ष अपने लिए एक भिन्न और निजी काव्यभाषा और युक्ति के आविष्कार का है, जिसमें वे उन शब्दों, ध्वनियों, अनुगूंजों, और अनुभवों-अभिव्यक्तियों को अपनी कविता में बचा लेना चाहते हैं, जो विजातीय और आधुनिक तथा तकनीक के विभिन्न प्रारूपों से उपजे बाहरी दबावों के सामने अकस्मात विलुप्त होने के संकट के बीच अकस्मात घिर गये हैं। आधुनिकता विरोधी रोमैंटिक जनपदीयतावाद या हिंदी के कथा संसार में पनपा 'किसानवाद' या आंचलिक ग्रामीणतावाद नहीं, बल्कि एक आधुनिक कवि की सचेष्ट बौद्धिक काव्यचेष्टा। एक भिन्न तरह की ब्रेख्तियन काव्य युक्ति। एक सुविचारित पोएट्रिक स्ट्रेटेजी। वर्ना ऐसा क्यों होता कि एक लोकधर्मी जातीय भाषा के साथ-साथ ऐसे असंख्य बिंब उनकी कविताओं में निरंतर मिलते चलते जो साधारण मनुष्य के दैनन्दिनी जीवनानुभव में उपस्थित आसपास- के साधारण चित्र हैं।”[33] इस आधार पर वे केदारनाथ को रूपवादी कवि घोषित करते हुए लिखते हैं, “केदारनाथ सिंह किसी 'निष्णात रूपवादी या अगर गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर का शब्द उधार लें तो किसी 'रूपदक्ष' कवि की तरह विलक्षण भाषिक संरचनात्मकता और लगभग अति-यथार्थवादी या अभिव्यंजनावादी लगती काव्ययुक्ति के द्वारा अपनी उस निजी काव्य विशिष्टता को हासिल करते हैं, जिससे हम सब परिचित हैं।”[34]

           यदि सभी मतों से इतर केदारनाथ का मत देखना है तो तीसरे सप्तक की ओर मुड़कर देखना होगा जिसमें अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए लिखते हैं, “कला का संघर्ष एक तरह का आत्म-संघर्ष होता है -विशेष रूप से एक नये कवि के लिए। कवि के अनुभव और उसका दर्शन इस संघर्ष को लेकर दिशा भर देते हैं, उसे समाप्त नहीं कर देते। मेरी कुछ कविताओं में इस संघर्ष की झलक बहुत साफ़ है। मैं मन को बराबर खुला रखने की कोशिश करता हूँ। ताकि वह आस-पास के जीवन की हल्की से हल्की आवाज़ को भी प्रतिध्वनित कर सके। समाज के प्रगतिशील तत्वों की और मानव के उच्चतर मूल्यों की परख मेरी रचनाओं में आ सकी है या नहीं, मैं नहीं जनता। पर उनके प्रति मेरे भीतर एक विश्वास, एक लालसा, एक लपट ज़रूर है, जिसे मैं हर प्रतिकूल झोके से बचाने की कोशिश करता हूँ, करता रहूँगा।”[35] केदार ने अपने भीतर की लालसा और लपट को प्राकृतिक उपादानों के माध्यम से बचाए रखा है और यह उन्होंने अपने 'क्वालिटेटिव लीप' के दौरान सीखा जो अज्ञेय के शब्दों में कहें तो 'प्रकृति के तत्भव संसार का चित्रण' बन गया है। अज्ञेय का कथन यहाँ केदारनाथ सिंह के सम्बन्ध में सटीक दिखाई देता है, “नई कविता के दौर में कवि जहाँ अपनी 'अनुभूति सत्यता' के आग्रह के कारण जब प्रकृति-चित्रण करते हैं तो पाठक को यह बताना जरूरी समझते हैं कि यह प्रकृति कहाँ की है, वहाँ अनुभूति के व्यापकता के कारण ऐसे दृश्यों का वर्णन करना पसंद करते हैं, जो प्रादेशिकता से परे हों। इसलिए इनकी कविता में प्रकृति क्षेत्र की आत्यंतिक घटनाओं का चित्रण अधिक मिलता है, जैसे- सूर्योदय, सूर्यास्त, बरसात का घंटा, आँधी आदि।”[36] केदारनाथ की घास को प्रतीक बनाकर लिखी गयी कवितायें प्रकृति क्षेत्र की आत्यन्तिक घटनाओं के चित्रण का एक प्रकार का 'एस्थेटिक सेन्स' ही तो देती हैं वो भी बिना किसी प्रकार के 'नास्टेल्जिक ट्रीटमेंट' के।

           कह सकते हैं कि केदारनाथ घास जैसे प्राकृतिक प्रतीक को एक जनवादी प्रतीक के रूप में प्रयोग करते हैं किन्तु यह प्रतीक कहीं भी कविता के सौन्दर्य पर हावी नहीं होता। बल्कि वे इसका प्रयोग कर प्रादेशिक परिवेश से आगे निकल कविता को सार्वभौमिक मंच पर ला खड़ा करने की मुहिम में सम्मिलित हो जाते हैं। क्योंकि घास के रूप में केदारनाथ की कविताओं में मैं, तुम, हम सब के साथ प्रकृति, आमजन, क्रान्ति, शांति और आशा का संचार करने वाला एक सशक्त प्रतीक उपस्थित है। अब इसे केदारनाथ की 'पोएटिक स्ट्रेटेजी' का हिस्सा माना जाये या उनपर प्रकृति के प्रभाव की परिणति, यह तो हमारे विवेक पर निर्भर है।


सन्दर्भ सूची
1. http://bharatdiscovery.org/india/दूब_घास'.(8/8/18).
2. http://kavitakosh.org/kk/हरी_घास_पर_क्षण_भर/_अज्ञेय.(15/08/18).
3. https://samalochan.blogspot.com/2014/04/blog-post_10.html(21/08/18).
4. https://www.poemhunter.com/poems/grass/page-1/28675/.(15/08/18).
5. Whalt Whiteman. 'Song of Myself'. https://www.shmoop.com/song-of-myself/grass-symbol.html.(21/08/18).
6. अजय तिवारी, समकालीन कविता और कुलीनतावाद, राधकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1994.
7. अज्ञेय (सं), तीसरा सप्तक, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, 2009.
8. अज्ञेय(सं), सदानीरा, भाग-1.
9. अज्ञेय, बावरा अहेरी, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, छठवां संस्करण-2003.
10. अवतार सिंह संधू 'पास', सबसे खतरनाक.
11. उदय प्रकाश, नई सदी का पंचतंत्र, वाणी प्रकाशन, 2008.
12. उमेश कुमार सिंह चौहान का लेख 'सृष्टि पर पहरा देता कविता के झरनाट वृक्ष का पत्ता' http://umeshkschauhan.blogspot.com/2014/09/blog-post_27.html.(20/08/18).
13. कबीर की साखी संग्रह, वेल्वेडियर प्रेस, प्रयाग, 1926.
14. कुमार मुकुल, परख: सृष्टि पर पहरा: केदारनाथ सिंह.
15. केदारनाथ सिंह, अकाल में सारस, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1988
16. केदारनाथ सिंह, यहाँ से देखो, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1983.
17. केदारनाथ सिंह, सृष्टि पर पहरा, राजकमल प्रकाशन, 2014.
18. डॉ. कुमार विकल: सौन्दर्य शास्त्र के तत्व, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1967.
19. डॉ. गोपाल नारायण श्रीवास्तव, कलगी बाजरे की पर मुग्ध अज्ञेय, nov 25, 2014http://www.openbooksonline.com/forum/topics/03?xg_source=activity, (5/09/18).
20. डॉ. चंद्रशेखर, समकालीन हिंदी नाटक: कथ्य चेतना, आत्माराम एंड संस, दिल्ली, 1982.
21. डॉ. धीरेन्द्र वर्मा: हिंदी काव्य में प्रतीकवाद.
22. डॉ. रामनिवास गुप्त: काव्यशास्त्र के मानदंड, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण:2001.
23. नरेंद्र कोहली, व्यंग गाथा-1, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2015.
24. नरेश सक्सेना, समुद्र पर हो रही है बारिश, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2001.
25. विश्वनाथ त्रिपाठी, कहानी के साथ-साथ, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016.
26. संजय कुमार, अज्ञेय प्रकृति काव्य: काव्य प्रकृति, वाणी प्रकाशन, 1995.
27. सुधीश पचौरी, उत्तर यथार्थवाद, वाणी प्रकाशन, 2001.

पदटीका
[1] डॉ धीरेन्द्र वर्मा : हिंदी काव्य में प्रतीकवाद, पृष्ठ -4.
[2] डॉ रामनिवास गुप्त: काव्यशास्त्र के मानदंड, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण:2001, पृष्ठ -148.
[3] डॉ कुमार विकल: सौन्दर्य शास्त्र के तत्व, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1967, पृष्ठ-237.
[4] http://bharatdiscovery.org/india.
[5] कबीर की साखी संग्रह, वेल्वेडियर प्रेस, प्रयाग, 1926.
[6] http://kavitakosh.org/kk/हरी_घास_पर_क्षण_भर/_अज्ञेय.
[7] http://kavitakosh.org/kk/हरी_घास_पर_क्षण_भर/_अज्ञेय.
[8] बावरा अहेरी, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, छठवां संस्करण-2003, पृष्ठ-13
[9] http://kavitakosh.org/kk/हरी_घास_पर_क्षण_भर/_अज्ञेय.
[10] संजय कुमार, अज्ञेय प्रकृति काव्य : काव्य प्रकृति, पृष्ठ-33
[11] अज्ञेय(सं), सदानीरा, भाग-1 पृष्ठ-240.
[12] डॉ. गोपाल नारायण श्रीवास्तव, कलगी बाजरे की पर मुग्ध अज्ञेय, nov 25, 2014. http://www.openbooksonline.com/forum/topics/0-3?xg_source=activity, (5/09/18).
[13] अवतार सिंह संधू 'पास', सबसे खतरनाक, पृष्ठ-32.
[14] नरेश सक्सेना, समुद्र पर हो रही है बारिश, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2001, पृष्ठ-37.
[15] विश्वनाथ त्रिपाठी, कहानी के साथ-साथ, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृष्ठ-60
[16] विश्वनाथ त्रिपारी, कहानी के साथ-साथ, पृष्ठ-63
[17] नरेंद्र कोहली, व्यंग गाथा-1, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2015, पृष्ठ-43
[18] डॉ. चंद्रशेखर, समकालीन हिंदी नाटक : कथ्य चेतना, आत्माराम एंड संस, दिल्ली, 1982.
[19] https://www.poemhunter.com/poems/grass/page-1/28675/
[20] https://www.poemhunter.com/poems/grass/page-1/28675/.
[21] कुमार मुकुल, परख: सृष्टि पर पहरा: केदारनाथ सिंह https://samalochan.blogspot.com/2014/04/blog-post_10.html.
[22] Whalt Whiteman. 'Song of Myself'. https://www.shmoop.com/song-of-myself/grass-symbol.html.
[23] http://kavitakosh.org/kk/हरी_घास_पर_क्षण_भर/_अज्ञेय.
[24] केदारनाथ सिंह, सृष्टि पर पहरा, राजकमल प्रकाशन, 2014.
[25] https://samalochan.blogspot.com/2014/04/blog-post_10.html
[26] केदारनाथ सिंह, अकाल में सारस, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1988, पृष्ठ-20.
[27] केदारनाथ सिंह, अकाल में सारस, पृष्ठ-20.
[28] सुधीश पचौरी, उत्तर यथार्थवाद, वाणी प्रकाशन, 2001, पृष्ठ-240.
[29] केदारनाथ सिंह, अकाल में सारस, पृष्ठ-20.
[30] केदारनाथ सिंह, यहाँ से देखो, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1983, पृष्ठ-15-16.
[31] अजय तिवारी, समकालीन कविता और कुलीनतावाद, राधकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1994, पृष्ठ -183
[32] उमेश कुमार सिंह चौहान का लेख 'सृष्टि पर पहरा देता कविता के झरनाट वृक्ष का पत्ता' http://umeshkschauhan.blogspot.com/2014/09/blog-post_27.html
[33] उदय प्रकाश, नई सदी का पंचतंत्र, वाणी प्रकाशन, 2008, पृष्ठ-310.
[34] उदय प्रकाश, नई सदी का पंचतंत्र, पृष्ठ-310.
[35] अज्ञेय(सं), तीसरा सप्तक, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, 2009, पृष्ठ-125.
[36] संजय कुमार, अज्ञेय प्रकृति काव्य : काव्य प्रकृति, वाणी प्रकाशन, 1995, पृष्ठ-19. 

2 comments :

  1. केदारनाथ को श्रधांजलि
    शानदार।
    नयापन शोध की मूल आत्मा है।

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  2. बेहतरीन आलेख। बहुत दिनों बाद कुछ बेहतर पढ़ने को मिला आपको बधाई।

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