मिज़ोरम: प्रकृति में रची-बसी संस्कृति

तेजी ईशा
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सॉंगबर्ड के नाम से जाना जाने वाला एकमात्र भारतीय राज्य मिज़ोरम है। यह राज्य बेहद ही खूबसूरत और सबसे छोटा राज्य है जो प्राकृतिक रूप से सुंदर स्थानों से सुशोभित है। दरअसल मिज़ोरम  लुशाई (Lushai) की पर्वतीय तराई पर फैला है। इसे भारत का स्काटलैंड कहते हैं, लैंड ऑफ़ हाइलैंडर्स  के नाम से पुकारते हैं। यह मुख्य रूप से म्यांमार और बांग्लादेश के बीच बसे पूर्वोत्तर भारत के दक्षिणी कोने में स्थित है, लेकिन इसकी सीमा का एक हिस्सा अपने पड़ोसी राज्यों असम, मणिपुर और त्रिपुरा के साथ भी साझा करता है। मिज़ोरम का पहाड़ी क्षेत्र पहले असम का हिस्सा था, लेकिन बाद में एक अलग राज्य बना दिया गया। यह भारत में अन्य जगहों के विपरीत पहाड़ों और घाटियों से घिरा, आदिवासी गाँवों के साथ साथ आधुनिक संस्कृति और जीवन शैली का समायोजन वाला भूमि है।

इनका इतिहास कागजी तौर पर बहुत ज्यादा दर्ज नहीं हैं। मौखिक परंपराओं के अनुसार मिज़ोरम की अधिकांश जनजातियाँ इस बात में यकीन करते हैं कि इनकी उत्पत्ति दक्षिणी चीन की एक पौराणिक गुफा  ‘खुल’ (khul) से हुई थी  जो पृथ्वी की ओर निकलने का एक छेद नुमा रास्ता था। जनजातियों ने फिर पश्चिम की ओर मणिपुर, फिर दक्षिण की ओर असम की ओर प्रस्थान किया और अंत में मिज़ोरम की पहाड़ियों तथा म्यांमार के चीनी क्षेत्र में बस गए। अंग्रेजों के आने से पहले सभी जनजातियाँ स्वतंत्र रूप से एक मुखिया के अंतर्गत थे और कुछ मणिपुर के राजाओं के महत्वपूर्ण सहायक आधिकारी के रूप में। उन्नीसवीं शताब्दी में मिज़ोरम भारत में ब्रिटिशों द्वारा खोजा और जीता जाने वाला अंतिम इलाका था। मिज़ोरम की तलहटी के पास दक्षिणी असम के कछार वाले इलाको में अंग्रेजों के चाय बागान थे। वहाँ अक्सर पहाड़ी जनजातियाँ लूट-पाट-वसूली के साथ साथ-साथ दुर्व्यवहार भी करती तीं। इसके कारण वहाँ के रहने वाले जनजातियों को अंग्रेजों ने लूटमार करने वाले जनजातियों के प्रति भड़काना शुरू किया और उनसे बदला लेने को बोला। उनकी सहमति के बाद अंग्रेज़ों ने अपने सैन्य अभियान 1840 में शुरू किये।  लुशाई पहाड़ियों पर सैनिक भेजे गए ताकि उन जनजातियों पर काबू किया जा सके।  अवसरवादी अंग्रेज तो थे ही उन्होंने अंततः 1850 में थादो (Thadou) जनजाति की मदद से पहाड़ियों का औपनिवेशीकरण किया और इन जनजातियों को एक दूसरे के साथ युद्ध करवा दिया। मिज़ो पहाड़ियों आखिरकार 1895 में ब्रिटिश भारत का हिस्सा बन गईं; उत्तरी क्षेत्र असम का एक हिस्सा था जबकि दक्षिण बंगाल का एक हिस्सा था। स्वतंत्रता के बाद, दशकों के विद्रोह के बाद जब पहाड़ी लोक स्वराज्य की माँग करते थे मिज़ोरम को असम से अलग राज्य के रूप में घोषित किया गया।  1986 में शांति बहाल की गई थी और मिज़ोरम एक शांतिपूर्ण और उच्च साक्षर ईसाई राज्य घोषित किया गया है, जहाँ की हवाओं में लोक, संगीत और फूलों की खुशबू मिली हुई है।

मिज़ोरम में मुख्य रूप से आदिवासी जनजातियाँ समुदाय हैं - लुशाई, चकमा, डिमासा, गारो, पावी, राल्ते और कूकी जनजातियाँ। लुशाई जनजाति के ही नाम पर लुशाई हिल्स का इलाका पूरा मिज़ोरम को माना गया। कर्क रेखा पर स्थित आइज़ॉल  रेखा के गुण की तरह हलचल भड़ा मिज़ोरम की राजधानी है। यह छोटा शहर बड़े चर्चों वाला है जिसके निवासी फैशनेबल शहरी संस्कृति और आधुनिक जीवन शैली को अपनाए हुए हैं। एक और महत्वपूर्ण शहर मिज़ोरम के दक्षिणी भाग में लुंगलेई  है, यह ब्रिटिश औपनिवेशिक दिनों के दौरान प्रशासन का केंद्र था जब ब्रिटिश सैनिकों ने दक्षिणी लुशाई हिल्स पर विजय प्राप्त की और फोर्ट लुंगलेई का निर्माण किया। हाल के दशकों में म्यांमार के साथ सीमा व्यापार के कारण चंपई, सेरचिप और साहा जैसे छोटे शहर भी विकसित हुए। ह्मुइफांग  जो कि  ह्मुइफांगत्लांग  की चट्टानों के पास स्थित एक छोटा शहर है, जिसका पर्यटन और रोमांच के लिए महत्व है।

मिज़ोरम की संस्कृति रंगीन परिधान, गीत संगीत और सबसे लोकप्रिय बांस नृत्य चेरो  से मनमोहक और प्रसिद्ध है। मिज़ोरम के लोगों में मुख्य रूप से कूकी जनजाति के विभिन्न तिब्बत-बर्मन समूह जैसे कि हमार, लुशाई, राल्ते, पावी, थाडो और ज़ो शामिल हैं। हालाँकि एकता की भावना के साथ वे खुद को मिज़ो कहलाना पसंद करते हैं क्योंकि अधिकांश जनजातियाँ मिज़ो तावंग को आम बोलचाल को भाषा में बोलती हैं और ये इसे अपने में संपर्क भाषा भी मानती है। मैदानी इलाकों के पड़ोसी जैसे बंगालियों ने कूकी  के नाम से इन्हें पुकारना शुरू किया। मिजो जनजाति मुख्य रूप से लुशाई पहाड़ियों और म्यांमार साम्राज्य के चिन क्षेत्र के आसपास के पहाड़ों में रहती है।

मिज़ोरम में प्रवेश करने वाला पहला समूह हमर  था। उनकी उत्पत्ति चीन से मानी जाती है और शान पहाड़ियों को पाड़ करते हुए उन्होंने म्यांमार से बर्मी जनजातियों की संस्कृतियों को सीखकर और अपनाकर अपना रास्ता यहाँ तक बनाया। इन्हें उत्तरवासी के नाम से भी जाना जाता है,  पड़ोसी असम और मणिपुर के सटे हिस्से में बसे हैं। हमार जनजाति अपनी बर्बर-हिंसकता के साथ साथ अपनी रंगीन वेशभूषा और औपचारिक नृत्य के लिए भी जाने जाते हैं। चम्फाई इलाके में सबसे बड़ा समूह  मिजो की राल्ते जनजाति  रहती है। पत्थर की नक्काशी करने के लिए अपना नाम इतिहास में दर्ज कर लिया हैं। अन्य जनजातियों के आक्रमणों का विरोध भी इसी नक्काशी किये हुए पत्थर से हथियार के तौर पर करते है। ज़ू जनजाति मुख्य रूप से म्यांमार की चीन पहाड़ियों की सीमा वाले क्षेत्रों में रहती है, उनकी अपनी भाषा और ज़ोलाई लिपि  है। ज़ू जनजाति ने ब्रिटिश मिशनरियों के तौर तरीकों और गतिविधियों के जरिये हो रहे हस्तक्षेप का  विरोध किया क्योंकि वे अपने पुराने सखुआ धर्म  को बचाना चाहती थी। त्रिपुरा के पास ममित क्षेत्र के रींग लोग (ब्रू जनजाति) को इन पहाड़ियों के सबसे पुराने निवासियों में से एक माना जाता है, लेकिन वे अब मिज़ोरम में एक छोटे समुदाय हैं। माना जाता है कि उन्हें त्रिपुरी राजाओं द्वारा निर्वासित किया गया था। विभिन्न जनजातियों ने विभिन्न स्थानों से पलायन किया, समुद्र-नदी की लहरों को पार कर और इन पहाड़ियों को अपनी मातृभूमि बनाया। हालाँकि, मिजो समाज के सभी समूहों के बीच आदिवासी संस्कृति के कुछ पहलू आम हैं। सभी जातियों ने बेहतर चरागाहों की तलाश में कई प्रवासियों के रूप में झूम खेती का अभ्यास किया।

गाँवों के बीच में ज्वालबुक (Zwalbuk) होता है, यह मिज़ो युवाओं के लिए आवासीय व्यवस्था है जहाँ इन युवाओं को सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाने के लिए प्रशिक्षित किया जाता था। सबसे पहले और महत्वपूर्ण होता है नीतिविद्या या नैतिक संहिता तावलामिंगईहना (Tlawmingaihna) सिखाना।  जिसमें विनम्रता और विश्वनीयता की कीमत सिखाई जाती है।

मिज़ोरम के लोग बेंत और बाँस के काम में माहिर होते हैं। वे बाँस की कई वस्तुओं को तैयार करते हैं, अपने घरों की गन्नों से बनी दीवारों-फर्नीचरों और बेंत की टोपियों भी तैयार करने में दक्ष हैं। राज्य में बांस के जंगलों काफी हैं। ये अपने दैनिक घरेलू उपयोग के लिए प्रकृति के इस उपहार पर निर्भर हैं और अब मिज़ो संस्कृति का अहम् हिस्सा है। करंडशिल्प (Basketry) एक लोकप्रिय शिल्प है, जिसमें पाइकॉन्ग, थुलते और टैल्मेन जैसे विभिन्न आकृति वाले बास्केट कई उद्देश्यों के लिए तैयार किए जाते हैं। अधिकांश घरों में बांस से बने स्टूल (Herhsawp),  कुर्सी (Thuttleng) और पानी के कंटेनर (Tuium) देखे जा सकते हैं। मिज़ोस भी टिकाऊ और लंबे समय तक चलने के लिए बेंत को धुआं देकर प्रयोग में लाया जाता है। धार्मिक रस्म रिवाज के लिए खुम्बे टोपी  जलरोधी हेंथियल (Hnahthial) के पत्तियों से बनाये जाते हैं। मिजो महिलाएं बुनाई में अव्वल होती हैं। पुअन्चेइ और कव्र्चेई परिधान त्योहारों और चेरो बांस नृत्य के दौरान पहने जाने वाला मिज़ोरम की सुंदर पोशाक हैं।

बांस को जब काट कर सूखाया जा रहा होता है तो इस प्रक्रिया को चापचर कुट  कहते हैं और यह मिज़ोरम का एक सुन्दर उत्सव भी है। यह कृषि पर्व पौधारोपण शुरू होने से पहले मार्च के महीने में मनाया जाता है। चेरव या बाँस नृत्य  उत्सव का एक बड़ा हिस्सा है। ढोल की थापों के बीच नृत्य की विभिन्न शैलियों का प्रदर्शन होता है। कला, हस्तशिल्प, संगीत कार्यक्रम, पुष्प प्रदर्शनी और व्यंजन भी इस त्योहार का एक प्रमुख हिस्सा हैं। फरवरी के अंत तक,  मिज़ोस खेती  रोपण के लिए भूमि तैयार करते हैं। बोने के बाद से  बुवाई के बीच चापचर कुट त्योहार विश्राम काल के दौरान उत्साह-मंगल के साथ मनाते हैं।

इस दिन सभी उम्र के लोग, युवा और वृद्ध, पुरुष और महिलाएँ अपने रंग-बिरंगे परिधानों में तैयार होते हैं। पारंपरिक रंगीन कपड़े और गहने के साथ जोड़े साथ में जाते हैं। विभिन्न लोक नृत्य और पारंपरिक गीत ढोल, बाजे और झांझ की थाप के साथ होते हैं।

यहाँ की सांस्कृतिक विरासत की सबसे बड़ी पहचान है टॉलफ़ैवंग कुट । यह त्योहार नवंबर में मनाया जाता है। यह इंतजार का त्यौहार है। इस इंतजार में उल्लास को भरने का यह त्यौहार मनाया जाता है। फसल कटाई के इंतजार में खेती को पूरा करने का जश्न मनाने के लिए फसल से पहले त्योहार मनाया जाता है। यह त्योहार किसानों द्वारा मनाया जाता है क्योंकि खेती इस राज्य की प्रमुख आजीविका है। मिज़ोरम के सभी आदिवासी समूह उत्सुकता के साथ भाग लेते हैं और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों आयोजित किए जाते हैं। उत्सव में स्थानीय गीतों पर नृत्य और गायन शामिल है, जो किसानों द्वारा नृत्य करते समय गाए जाते हैं। इस उत्सव में सामूहिक दावत होती हैं। यह त्योहार मिज़ोरम के जनजातीय समूहों को अपने समुदाय की प्राकृतिक- सांस्कृतिक प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करने का मौका देती है। आदिवासी लोग दूर दराज के क्षेत्रों से भाग लेते हुए अपनी सांस्कृतिक विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं और मिज़ोरम के कोने-कोने से लोगों के साथ बातचीत करने का भी मौका मिलता है।

धन्यवाद समारोह के रूप में पैइट समुदाय के प्रमुख त्योहारों में से एक  खुआदो कुट । खेत से सभी कटाई के बाद पूर्णिमा की रात के दौरान आयोजित किया जाता है। गाँव के लोग अपने भलाई और अगली अच्छी फसल की शुभेच्छाओं के लिए एकत्रित होते हैं। खूआडो त्योहार में प्रकाश एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रत्येक परिवार अपने घर की बुरी आत्मा को दूर करने के लिए एक मशाल जलाता है। समुदाय के लोग ड्रम, गोंग, झांझ और पाइप जैसे किसी भी उपयोगी उपकरणों का उपयोग करके चिल्लाते और जप करते हैं और साथ में यह कोशिश करते हैं कि अधिकतम शोर पैदा करते हैं। इसके अलावा अन्थुरियम (Anthurium), चप्चार कूट (Chapchar Kut), तथा थाल्फवंग कूट (Thalfavang Kut) अन्य त्यौहार है जो कृषि आधारित हैं।
इनका समूचा जीवन प्रकृति के तारतम्य से जुड़ा हुआ है। जीवन शैली से लेकर लोकाचार तक प्रकृति की ही अटूट सहभागिता है।

संदर्भ: 
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7. समन्वय पूर्वोत्तर, अंक: 18, जनवरी – मार्च, 2013
8. समन्वय पूर्वोत्तर, अंक: 23, अक्टूबर – दिसंबर, 2015
9. https://www.holidify.com/pages/mizoram-culture-84.html
10. http://www.indianmirror.com/culture/states-culture/Mizoram.html

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