भारत में लोकतांत्रिक अधिकारों का विकास - सूचना का अधिकार

एस. आर. शुक्ल

सहायक प्रोफेसर, विधि विभाग, नेहरू ग्राम भारती मानित विश्वविद्यालय, हनुमानगंज, इलाहाबाद।   

    नागरिकों को सूचित किये जाने की अवधारणा महान सम्राट अशोक के शासन काल में भी रही है उन्होंने विभिन्न स्थलों पर स्थापित किये गये, और विभिन्न शिलालेखों के माध्यम से लोगों के साथ सीधे पहुँच बनाई थी। स्वच्छंद अभिव्यक्ति और सूचना प्रदान करने के अधिकार को सामान्य कानून ने विगत अनेक वर्षों से स्वीकार किया है।

   भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ प्रत्येक नागरिक को सभी प्रकार की गतिविधियों से सम्बन्धित सूचनायें जानने का अधिकार है। उसे यह भी जानने का पूरा अधिकार है कि उसके द्वारा दिये कर का उपयोग कैसे किया जाता है, किन्तु इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि कुछ वर्ष पूर्व तक भारत के नागरिकों के पास ऐसी कोई कानूनी व्यवस्था नहीं थी जिसके माध्यम से वे सरकारी कार्यालयों से सूचना प्राप्त कर पाते।

     देश की सामान्य जनता के प्रति अधिकारी तंत्र की गोपनीयता एवं अहंकार की व्यापक संस्कृति को शासन द्वारा निरन्तर कायम रखे जाने का प्रयास किया जाता है जिससे भ्रष्टाचार बढ़़ा है पारदर्शिता ऐसा तत्व है जिससे कुछ न छिपाने की प्रणाली अपनाने एवं आम आदमी को प्रशासन द्वारा सूचना प्रदान करने से विवेकाधिकार का दुरुपयोग स्वतः ही समाप्त हो जायेगा और यही पारदर्शिता किसी भी शासनतंत्र में पद का दुरूपयोग व भ्रष्टाचार पर लगाम लगा सकती है जितनी ज्यादा सूचनायें नागरिकों तक पहुँचेगी सरकार उतनी ही अधिक संवेदनशील होगी।

कोई भी नागरिक बिना सूचना के अपने अधिकार का प्रयोग भलीभांति नहीं कर सकता है, शासकीय दस्तावेज, सरकारी सूचनाऐं एक राष्ट्रीय साधन है कोई भी सूचना न तो किसी अधिकारी या सरकार विशेष के लिए है, यह तो जनता के हितों के लिए सृजित की जाती है। सूचनाऐं किसी पद के कर्तव्यों के वैध सम्पादन से सम्बन्धित उद्देश्यों के लिए अथवा जनता की सेवा के लिए होती है तथा नागरिकों के लाभ के लिए सरकारी संस्थाऐं अस्तित्व में बनी रहती हैं, सरकारी संस्थाऐं एवं कर्मचारियों के वेतन एवं खर्चों के लिए नागरिकों से धन एकत्रित करती है इसका अभिप्राय यह हुआ कि सरकार एवं उसके कार्मिक जनता के लिए इस सूचना के न्याय मात्र है।

 सूचना के अधिकार के ऐसे अनेक रास्ते हैं जिनके माध्यम से सरकारी सूचनाऐं लोगों को पहले से ही प्राप्त होती हैं संसदीय व्यवस्था के अन्तर्गत सूचना का अधिकार  हस्तांतरण सरकार द्वारा सांसद एवं विधायकों द्वारा होता है जनता अपने लिए निर्वाचित सदस्यों से कोई भी सूचना ले सकती हैं। किसी भी लोकतंत्र का मूलमंत्र शासन में भागीदारी है। शासन के सभी कार्यों जैसे नीतिगत निर्णयों कानूनों, योजनाओं में जन भागीदारी होती है।

  जन सहभागिता न केवल शासन की गुणवत्ता में वृद्धि करती है, वह सरकार के कामकाज में पारदर्शिता और जबावदेही को भी बढ़ावा देती है। लोग कैसे जाने कि उनके द्वारा अदा किये गये टैक्स से आये पैसों को कैसे खर्च किया जा रहा है या सार्वजनिक योजनाऐं सही तरीके से चलाई जा रही है या नहीं या फैसले लेते समय सरकार ईमानदारी और निष्पक्षता से काम कर रही है या नहीं, सरकारी अधिकारियों का काम जनता की सेवा करना है, पर इन अधिकारियों को जनता के प्रति जबावदेह कैसे बनाया जाये।

देश के नागरिकों को भाषा एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है भारतीय संविधान। बिना सूचना या जानकारी के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या औचित्य है, वर्तमान युग तो सूचना का ही है और सूचना जीवन का प्राणस्वरूप है, बिना सूचना कुछ भी संभव नहीं है। सूचना का अधिकार या सूचना की स्वतंत्रता से तात्पर्य ‘‘उस वैधानिक नागरिक अधिकार से है जो किसी देश के व्यक्तियों को सरकार कार्यकरण से सम्बन्धित सूचनायें प्राप्त करने के अवसर एवं पहुंच प्रदान करता है।

आधुनिक विश्व के लगभग 55 अग्रणी देशों में सूचना के अधिकार प्रवर्तित है। स्वीडन वह देश है जिसमें सर्वप्रथम सन् 1766 में सूचना के अधिकार का  संवैधानिक प्रावधान किया।  संयुक्त राष्ट्र जैसी पवित्र संस्था जिन उद्देश्यों को लेकर बनी उनमें सभी स्वतंत्रताओं की यह कसौटी भी है। विश्वव्यापी घोषणा जो कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित मानवाधिकारों के अनुच्छेद 19 में कहा गया है प्रत्येक व्यक्ति को विचार तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार घोषणा का अनुच्छेद 19 सूचना के अधिकार की गांरटी देता है।

यदि एक समाज लोकतांत्रिक व्यवस्था को पूर्ण मनोयोग के साथ स्वीकार करता है तो वहाँ के नागरिकों को यह जानने का पूर्ण अधिकार है कि उनकी सरकार क्या कर रही है।

   आम जनता को भारतीय प्रशासनिक कार्यो की जानकारी प्रायः नहीं दी जाती है इस राह में सबसे बड़ी बाधा शासकीय गुप्त बात अधिनियम 1923 रहा है जिसके अनुसार -देश की एकता अखण्डता या सम्प्रभुता की रक्षा के लिये शासन की नीतियों या प्रक्रिया की जानकारी जन साधारण से छुपा कर रखी जाती थी शासकीय गुप्त बात अधिनियम के अतिरिक्त भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 भी सूचना के अधिकार की राह में एक बाधा है इस कानून की धारा-123 के अनुसार राज्य के कार्यकलापों की जानकारी प्रशासनिक तंत्र से बाहर उजागर करना या न करना विभागाध्यक्ष पर निर्भर है।

    ‘‘संविधान के भाग-3 में संविधान के निर्माताओं ने मूल अधिकार में अभिव्यक्ति के अधिकार के प्रावधान को शामिल किया था जिसमें अनुच्छेद 19 -1(क) वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार तथा दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 21 में शामिल है, के तहत उच्चतम न्यायालय ने संवैधानिक रूप से संरक्षित मूल अधिकार के रूप में सूचना के अधिकार को मान्यता दी है।

 राष्ट्रीय सूचना का अधिकार अधिनियम के लिये प्रयास 1996 से प्रारंभ किया इसके सदस्यों में सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, अधिवक्ता, व्यवसायी, सेवानिवृत्त सिविल सेवक और शिक्षाशास्त्री शामिल थे। साधारण जन आन्दोलन, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों से दबाव के उत्तर में भारतीय प्रेस कौन्सिल ने मॉडल विधेयक प्रारूपित किया। जिसे बाद में राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थान, तथा सुधार हेतु सामाजिक कार्यकर्ता एच.डी. शौरी की अध्यक्षता में कार्यदल गठित किया गया।

 इस कार्यदल की रिपोर्ट 5 जुलाई 2000 को सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम 2002 के रूप में लागू हुआ। 23 दिसम्बर सन् 2004 में सप्रंग सरकार ने नया सूचना का अधिकार प्रस्तुत किया जो 11 मई 2005 में लोकसभा एवं 12 मई 2005 में राज्यसभा में पारित हुआ तथा 12 जून 2005 में राष्ट्रपति ने स्वीकृति प्रदान की।

 इस प्रकार 12 अक्टूबर 2005 से (जम्मू व कश्मीर छोड़कर) सम्पूर्ण भारत में लागू हो गया। वजाहत हबीवुल्ला देश के प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त बने थे। इससे पहले राज्य स्तर पर सूचना का अधिकार कानून बनाने वाले प्रथम राज्य का गौरव तमिलनाडु को प्राप्त था।  सूचना का अधिकार का तात्पर्य है, सूचना पाने का अधिकार, जो सूचना अधिकार कानून लागू करने वाला राष्ट्र अपने नागरिकों को प्रदान करता है। सूचना अधिकार के द्वारा राष्ट्र अपने नागरिकों को अपनी कार्य और शासन प्रणाली को सार्वजनिक करता है।

लोकतंत्र में देश की जनता अपने चुने हुए व्यक्ति को शासन करने का अवसर प्रदान करती है और यह अपेक्षा करती है कि सरकार पूरी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ अपने दायित्वों का पालन करेगी। भ्रष्टाचार के इन कीर्तिमानों को स्थापित करने के लिए हर वो कार्य किया जो जनविरोधी और अलोकतांत्रिक हैं। प्रत्येक नागरिक सरकार को किसी न किसी माध्यम से टैक्स अदा करता है। यहाँ तक एक सुई से लेकर एक माचिस तक पर टैक्स अदा करता है। सड़क पर भीख मांगने वाला भिखारी भी जब बाजार से कोई सामान खरीदता है, तो बिक्री कर, उत्पाद कर इत्यादि टैक्स अदा करता है।

    इसी प्रकार देश का प्रत्येक नागरिक टैक्स अदा करता है और यही टैक्स देश के विकास और व्यवस्था की आधारशिला को निरन्तर स्थिर रखता है। इसलिए जनता को यह जानने का पूरा हक है कि उसके द्वारा दिया गया, पैसा कब, कहाँ, और किस प्रकार खर्च किया जा रहा है इसके लिए यह जरूरी है कि सूचना को जनता के समक्ष रखने एवं जनता को प्राप्त करने का अधिकार प्रदान किया जाए जो एक कानून द्वारा ही सम्भव है।

    अंग्रेजों ने भारत पर लगभग 250 वर्षो तक शासन किया और इस दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारत में शासकीय गोपनीयता अधिनियम 1923 बनाया, जिसके अन्तर्गत सरकार को यह अधिकर हो गया कि वह किसी भी सूचना को गोपनीय कर सकेगी। सन् 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिलने बाद 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ, लेकिन संविधान निर्माताओ ने संविधान में इसका कोई भी वर्णन नहीं किया और न ही अंग्रेज़ों का बनाया हुआ शासकीय गोपनीयता अधिनियम 1923 का संशोधन किया। बाद में आने वाली सरकारों ने गोपनीयता अधिनियम 1923 की धारा 5 व 6 के प्रावधानों का लाभ उठाकर जनता से सूचनाओं को छुपाती रही।

सूचना के अधिकार के प्रति कुछ सजगता वर्ष 1975 के शुरूआत में उत्तर प्रदेश सरकार बनाम राज नारायण से हुई। मामले की सुनवाई उच्चतम न्यायालय में हुई, जिसमें न्यायालय ने अपने आदेश में लोक प्राधिकारियों द्वारा सार्वजनिक कार्यो का ब्यौरा जनता को प्रदान करने की व्यवस्था की। इस निर्णय ने नागरिको को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19,) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा बढ़ाकर सूचना के अधिकार को शामिल कर दिया।

   वर्ष 1982 में द्वितीय प्रेस आयोग ने शासकीय गोपनीयता अधिनियम 1923 की विवादस्पद धारा 5 को निरस्त करने की सिफारिश की थी, इसलिए परिभाषा के अभाव में यह सरकार के निर्णय पर निर्भर था, कि कौन सी बात को गोपनीय माना जाए और किस बात को सार्वजनिक किया जाए। बाद के वर्षो में साल 2006 में वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में गठित द्वितीय प्रशासनिक आयोग, ने इस कानून को निरस्त करने की सिफारिश की।
1989 में कांग्रेस की सरकार गिरने के बाद बी.पी. सिंह की सरकार सत्ता में आई, जिसने सूचना का अधिकार कानून बनाने का वायदा किया। 3 दिसम्बर 1989 को अपने पहले संदेश में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने संविधान में संशोधन करके सूचना का अधिकार कानून बनाने तथा शासकीय गोपनीयता अधिनियम में संशोधन करने की घोषणा की। किन्तु इसे लागू नहीं किया जा सका।

सूचना के अधिकार की मांग राजस्थान से प्रारम्भ हुई। राज्य में सूचना के अधिकार के लिए 1990 के दशक में जनान्दोलन की शुरूआत हुई, जिसमें मजदूर किसान शक्ति संगठन द्वारा अरूणा राय की अगुवाई में भ्रष्टाचार के विरूद्व जनसुनवाई कार्यक्रम के रूप में हुई।

    वर्ष 1997 में केन्द्र सरकार ने एच.डी शौरी की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित करके मई 1997 में सूचना की स्वतंत्रता का प्रारूप प्रस्तुत किया, किन्तु कमेटी के इस प्रारूप को संयुक्त मोर्चे की दो सरकारों ने दबाए रखा। वर्ष 2002 में संसद ने सूचना की स्वतंत्रता विधेयक  पारित किया। इसे जनवरी 2003 में राष्ट्रपति की मंजूरी मिली, लेकिन इसकी नियमावली बनाने के नाम पर इसे लागू नहीं किया गया।

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार ने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में किए गए अपने वायदे तथा पारदर्शिता युक्त शासन व्यवस्था एवं भ्रष्टाचार मुक्त समाज बनाने के लिए अन्ततः 12 अक्टूबर 2005 को यह कानून जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू किया गया। इसी के साथ सूचना की स्वतंत्रता विधेयक 2002 को निरस्त कर दिया गया।  इस कानून के राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने से पूर्व नौ राज्यों ने पहले से ही लागू कर रखा था, जिनमें तमिलनाडु और गोवा ने 1997, कर्नाटक ने 2000, दिल्ली 2001, असम, मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं महाराष्ट्र ने 2002, तथा जम्मू-कश्मीर ने 2004 में लागू कर चुके थे।

सूचना का तात्पर्यः रिकार्ड, दस्तावेज, ज्ञापन, ई-मेल, विचार, सलाह, प्रेस विज्ञप्तियाँ, परिपत्र, आदेश, लॉग पुस्तिका, ठेके सहित कोई भी उपलब्ध सामग्री, निजी निकायों से सम्बन्धित तथा किसी लोक प्राधिकरण द्वारा उस समय के प्रचलित कानून के अन्तर्गत प्राप्त किया जा सकता है। सूचना के अधिकार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भारत सरकार ने सूचना के अधिकार की महत्ता एवं प्रभावाशीलता को ध्यान में रखते हुए और जनसामान्य तक सूचना पहुँचाने एवं प्रशासन को अधिक प्रभावी एवं पारदर्शी बनाने के लिए आवश्यक है।

सूचना की स्वतंत्रता 2002 को अधिक प्रगतिशील भागीदारी वाला और अधिक सार्थक बनाया जाये। इस हेतु विभिन्न स्तरों पर सुझाव मांगे। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद तथा अन्य लोगों द्वारा दिये गये सुझावों के परीक्षण करने के बाद यह निर्णय लिया गया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के अन्तर्गत मान्य सूचना के अधिकार को कार्यान्वित करने के उद्देश्य से एक प्रभावी संरचना का प्रावधान करने वाले एक नये कानून का निर्माण किया जाये।

उपरोक्त उद्देश्यों को पूरा करने के प्रयास में एक विधेयक भारत संघ के कार्मिक प्रबंध लोक शिकायत एवं पेशन विभाग द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 भारत संसद में पेश किया गया जिसे दिनांक 15 जून 2005 को भारत के राष्ट्रपति के द्वारा स्वीकृति दी गई। इस कानून की धारा 123 के अनुसार राज्य के कार्यकलापों की जानकारी प्रशासनिक तंत्र से बाहर उजागर करना या न करना विभागाध्यक्ष पर निर्भर है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 74 एवं 163 का संबंध सरकार द्वारा दावा किये जाने वाले विशेषाधिकार के प्रश्न से होता है यहाँ विशेषाधिकार की माँग केवल उस परामर्श तक सीमित होती है। जो मंत्रिमंडल अथवा राष्ट्रपति या राज्यपाल के द्वारा जैसी भी स्थिति हो दिया जाता है उस सूचना को अर्थात जो भी कुछ मंत्रिमंडल तथा सरकार के प्रमुख के बीच धारित होता है न प्रकट करने के विशेषाधिकार का दावा केवल औपचारिक निर्णय तक ही, अपितु दिये गये परामर्श के कारणों तथा उसकी पृष्ठभूमि तक ही सीमित होता है।

ऋग्वेद में भी उल्लिखित है कि- महान विचारों को हम में प्रत्येक दिशा में आने दे। सूचना के अधिकार की सत्य से तुलना बाइबिल में भी की गई है कि तुम सत्य को समझोगे और सत्य तुमको आजाद बनायेगा।

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