भारतीय पुरातन संस्‍कृति में राष्‍ट्रवाद

संगीता कुमारी
एम.ए.(हिंदी),
पांडिचेरी विश्‍वविद्यालय,
पुड्डुचेरी
        ममता पारीक
सहायक प्रोफेसर, शिक्षा संकाय
उच्च अध्ययन शिक्षण संस्थान,
सरदारशहर, राजस्थान


शोध-सार
समकालीन दौर में रचनात्‍मकता पर सर्वाधिक प्रभाव यह दृष्‍टव्‍य हो रहा है कि मानवीय मूल्‍य परिवर्तित होकर क्षरित हो रहे हैं। समकालीन रचनाधर्मिता में इस समय राष्‍ट्रवाद की मूल चेतना एवं स्‍वरूप को लोकचेतना की छोंक के साथ उठाया जा रहा है। ऐसे दौर में राष्‍ट्रवाद की चर्चा करना समीचीन होगा, क्‍योंकि दर्शन, साहित्‍य, धर्म और लोकानुभूति की अभिव्‍यक्ति कहीं-न-कहीं राष्‍ट्रवाद में पूरी निष्‍ठापूर्वक अभिव्‍यक्‍त होती है। राष्‍ट्रवाद पूरी तरह जनचेतना का प्रतीक होता है जिसमें राष्‍ट्र जीवन की बौद्धिकता, कृत्रिमता और भौतिकजन्‍य विसंगतियों के स्‍थान पर स्‍वच्‍छंद भावुकता, राष्‍ट्रीय संस्‍कृति की विराटता तथा जीवन की सरलता दृष्‍टव्‍य होती है। इसलिए प्रस्‍तुत आलेख के माध्‍यम से भारतीय पुरातन संस्‍कृति में राष्‍ट्रवाद की मूल चेतना एवं स्‍वरूप पर विचार-विमर्श प्रस्‍तुत कर मानवीय मूल्‍यों के प्रति संपृक्‍तता का अन्‍वेषण किया गया है।
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परिचय
राष्‍ट्रवाद की अवधारणा जीवन से विलग नहीं है। राष्‍ट्रवाद मूलत: किसी भी सभ्‍यता का आत्‍मीय अंग होता है। दरअसल मानव जीवन विभिन्‍न सांसारिक अनुभवों से होकर गुजरता है, तब वह अपने आस पास अनुभूतियों के आधार पर जीवन का ताना-बाना बुनता है। इस परिप्रेक्ष्‍य में राष्‍ट्रवाद को देखना राष्‍ट्र की धड़कन देखना है जिसमे व्‍यक्ति के जीवन संघर्ष की जीवंत धारा निकलकर निरंतर प्रवाहमान है। लेकिन, आज दु:खद स्थिति यह है कि राष्‍ट्र को राष्‍ट्रवाद से काटकर देखने की परंपरा चल पड़ी है। आज राष्‍ट्रवाद की वैज्ञानिक एवं तार्किक अवधारणा को पारंपरिक एवं रूढ़ मानकर व्‍याख्‍यायित करने का चलन अपेक्षाकृत बढ़ गया है। एक प्रकार से आज राष्‍ट्रवाद को संकुचित मानकर ‘राष्‍ट्र’ को ही नकारा जा रहा है। ऐेसे में भारतीय पुरातन संस्‍कृति में राष्‍ट्रवाद का सम्‍यक अनुशीलन बहुआयामी है, उपयोगी है।

प्रस्‍तुति एवं विश्‍लेषण
भारत की पुरातन संस्‍कृति व परंपराओं के आलोक में राष्‍ट्रप्रेम की अदम्‍य व उदात्‍त भावना को भरने के लिए हमारे वेदों में अनेक स्‍थलों पर मातृभूमि की मुक्‍त कंठ से प्रशंसा का भाव उल्लिखित है। अपनी जन्‍मभूमि को माता मानने की भावना हमें वेदों में सहज ही उपलब्‍ध होती है। उदाहरणार्थ, अथर्ववेद के बारहवें कांड के प्रथम सूक्‍त के अंतर्गत ‘माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्‍या:’ के द्वारा मातृभूमि की कल्‍पना अद्वितीय है, अभूतपूर्व है। इससे स्‍पष्‍ट होता है कि प्रत्‍येक व्‍यक्ति अपनी मातृभूमि को मातृवत् मानकर उसकी रक्षा हेतु सदैव प्रयासरत रहे। हमारे वैदिक ग्रंथों में मातृभूमि को सुखकारी, कल्‍याणकारी, निवासप्रदायिनी, अनश्‍क्षरा, निवेशनी, शिवा, उर्जस्‍वती व पयस्‍वती कहकर उसके प्रति आत्‍मीयता की भावना को प्रकट किया गया है-
‘विश्‍वस्‍वं मातरमोषधीनां ध्रुवां भूमिं पृथवीं धर्मणा धृताम्।
शिवां स्‍योनामुन चरेम विश्‍वहा।।’

दरअसल जनमानस के हृदय में मातृभावना को उद्धत करके उनमें मातृभावना के भावों को भरने की भरपूर कोशिश हमारी प्राचीन संस्‍कृति में निहित है ताकि वे मिलजुलकर मातृभूमि की रक्षा के लिए हमेशा उद्यत एवं तत्‍पर रहें। जैसा कि अथर्ववेदीय ‘भूमिसूक्‍त‘ में मातृभूमि के विषय में कहा गया है कि हमारे राष्‍ट्र में तेजस्विता एवं बल का आधान करें-
‘यार्णवेडधि सलिलमग आसीद्, यां मायाभिरन्‍वचरन् मनीषिण:।
            यस्‍याहृदयं परमे व्‍योमन्‍त्‍सत्‍येनाववृतममृतं पृथिव्‍या:।
सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्‍ट्रे दधातूत्‍तमे।’

हमारे वैदिक ग्रंथों में अनेक जगहों पर समान विचार, समान कर्म तथा समान लक्ष्‍य रखने का निर्देश दिया गया है जो कि राष्‍ट्रीय एकता के लिए महत्‍त्‍वपूर्ण एवं वांछनीय हैं। ऋग्‍वेद के एक मंत्र में कहा गया है कि हम साथ-साथ चलें, साथ-साथ बोलें तथा सबके मन समान विषयों के लिए समान हो-
‘समानो मन्‍त्र: समिति: समानी समानं मन: सह चित्‍तमेषाम्।
समानं मन्‍त्रये व: समानेन वो हविषां जुहोमि।।’

इतना ही नहीं, ऋग्‍वैदिक मन्‍त्रों में स्‍पष्‍ट कहा गया है कि जिस प्रकार भूमि, भाषा तथा धर्म के आधार पर कोई भेद नहीं करती, ठीक उसी प्रकार भूमि पर रहने वाले मनुष्‍य आपस में भाषा-भेद एवं धर्म-भेद के आधार पर कोई भेद न करें ताकि सुदृढ़ समाज एवं संगठन का निर्माण हो सके अर्थात् भेदभाव रहित तथा भ्रातृभावयुक्‍त राष्‍ट्र ही सौभाग्‍यशाली होता है। अथर्ववेदीय ‘पृथिवीसूक्‍त’ की ऋचा में उल्लिखित है-
‘जनं बिभृती बहुधा विवाचसं, नानाधर्माणं पृथिवी यर्थाकसम्।
सहस्र धारा दृविणस्‍थ में दुहां, ध्रुवेव धेनुरनपस्‍फुरन्‍ती।।’

यजुर्वेद में देवों से महान गौरव व जन राज्‍य हेतु प्रार्थना की गई है-
‘इमं देवा असपत्रं सुवध्‍यं महते क्षत्राय।
महते-ज्‍येष्‍ठयाय महते
जनराज्‍याय इन्‍द्रस्‍येन्द्रियाय।

ऋग्‍वेद में भी कथन उल्‍लेखनीय है कि राष्‍ट्र के लिए हम सदा बलिदान होने को उद्यत रहें-
‘वयं राष्‍ट्रे जागश्‍याम पुरोहित: स्‍वाहा।’

आतंकवादियों एवं देशद्रोहियों को आश्रय देना भी राष्‍ट्रद्रोह के रूप में सर्वथा निंदनीय है। वैदिक संस्‍कृति एवं मान्‍यताओं के अनुसार राष्‍ट्रद्रोहियों को राष्‍ट्रहित एवं राष्‍ट्र सुरक्षा के लिए पूर्णत: नष्‍ट कर देना चाहिए-
‘मायाभिरिन्‍द्रं मायिनं त्‍वं शुष्‍णमवतिर:।
विदुष्‍टे तस्‍य मेधिरास्‍तेषां श्रवांस्‍युत्तिर।’

वैदिक साहित्‍य के साथ-ही-साथ लौकिक साहित्‍य में भी राष्‍ट्रीय भावना विषयक अवधारणा द्रष्‍टव्‍य है। भारतीय मनीषियों व साहित्‍यकारों ने भी अपनी रचनाओं में संस्‍कृति, सभ्‍यता, जीवन दर्शन व समाजोपयोगी तत्‍वों पर प्रकाश डाला है। उदाहरण के तौर पर आदिकवि वाल्‍मीकी जी ने रामायण जैसे महत्‍त्‍वपूर्ण ग्रंथ के माध्‍यम से यह भाव प्रकट किया है कि श्रीराम के शासनकाल में प्रजाजन की स्थिति के सदृश देश की जनता तन-मन-धन से समृद्ध होनी चाहिए। सभी धर्मात्‍मा, सुशिक्षित एवं निरोगी हों तथा कोई राष्‍ट्रद्रोही न हो-
‘सर्वे नराश्रय नार्यश्‍च धर्मशीला: सुसंयता:।
मुदिता: शीलवृत्‍ताभ्‍यां महर्षय इवालमा:।।’

साथ ही इस ग्रंथ के द्वारा यह भी संदेश दिया गया है कि देश का नेता कैसा होना चाहिए। मंत्रिमंडल कैसा होना चाहिए। राष्‍ट्रीय धन का समुचित उपयोग होना चाहिए। राष्‍ट्र की समु‍चित प्रकार से सुरक्षा एवं देखभाल किया जाना चाहिए-
‘कोशलों नाम मुदित:: स्‍फीतो जनपदो महान्।
निविष्‍ट: सरयूतीरे प्रभूतधनधान्‍यवान्।।
अयोध्‍या नाम नगरी तन्‍नासील्‍लोकविश्रुता।
मनुना मानवेन्‍द्रेण या पुरी निर्मिता स्‍वयम्।।’

रामायण में ही नहीं, अपितु महाभारत में भी सर्वत्र राष्‍ट्रीय भावना दृष्टिगोचर होती है। राष्‍ट्र को सदैव आदर्श तथा अनुकरणीय राष्‍ट्र बनाने के प्रयत्‍नों की सराहना होती है। विभिन्‍न भागों में अवस्थित तीर्थों के प्रति आस्‍था को देखकर दर्शन करने की प्रेरणा देकर महाभारत में निश्‍चय ही अपने देशवासियों के हृदय में संपूर्ण देश के प्रति आत्‍मीयता एवं अखंडनीयता के भाव भरे हुए हैं जो कि वर्तमानकालिक राष्‍ट्रीय भावना के ही प्रतिरूप हैं।
कालिदास ग्रंथों में भी राष्‍ट्रीय भावना के साथ-ही-साथ समग्र विश्‍व की मंगल कामना का भाव भी विद्यमान रहा है। उन्‍होंने संसार के सभी व्‍यक्तियों को सुखी तथा उनकी कामनाओं की पूर्ति होने की कामना अभिव्‍यक्‍त की है। वे सभी को प्रसन्‍न देखना चाहते हैं-
‘सर्वस्‍तरतु दुर्गाणि सर्वो भद्राणि पश्‍यतु।
सर्व: कामनावाप्‍नोतु सर्व: सर्वत्र नन्‍दतु।।’

भास के रूप में भी अनेक स्‍थलों पर भारतीय संस्‍कृति, सभ्‍यता एवं राष्‍ट्रीय भावना का वर्णन द्रष्‍टव्‍य है। अवलोकनार्थ, विशारवदत्‍त ने ‘मुद्राराक्षस’ में तथा भवभूति ने ‘उत्‍तररामुचरित’ के माध्‍यम से यह महत्‍त्‍वपूर्ण संदेश दिया है कि देश नायक को अपने राष्‍ट्र की रक्षा तथा प्रजा के परिपालन के प्रति सदैव जागरूक एवं दृढ़संकल्‍प रहना चाहिए।

‘नैषर्धायचरितम’ में भी महाकवि श्रीहर्ष ने भारतभूमि को स्‍वर्गलोक से भी श्रेष्‍ठ माना है। ‘शिवराजविजय’ नामक उपन्‍यास भी राष्‍ट्रीय भावना से ओत-प्रोत है। गांधी गीता के अनुसार प्रत्‍येक व्‍यक्ति को अपने अंत:करण में व्‍याप्‍त दुर्भावों का पूर्णत: परित्‍याग कर देना चाहिए, क्‍योंकि दुर्भाव ही आंतरिक कलह का हेतु है-
‘कलहं वै स्‍वकीयेषु नैव कुर्यात्‍कदाचन।
कलहो राष्‍ट्रनाशाय
भवतीति सुनिश्चितम्।।’

निष्‍कर्ष
समवेतत: राष्‍ट्रीय भावना जैसी उत्‍कृष्‍ट, प्रांजल एवं उदात्‍त भावना भी नि:संदेह हमारी वैदिक संस्‍कृति व परंपरा में सर्वत्र व्‍याप्‍त रही है। आज हम सभी भारतीयों को अपनी सभ्‍यता व संस्‍कृति अभिप्रेरित होकर अपने जीवन, परिवार, सुख-संपत्ति, ऐश्‍वर्य आदि की परवाह न करते हुए सदैव राष्‍ट्र की मर्यादा, सम्‍मान, गौरव, स्‍वाभिमान एवं उत्‍कर्ष हेतु सदैव प्रयासरत रहना चाहिए। और, आवश्‍यकता पड़ने पर अपने प्राणों को आहूत करने में भी संकोच नहीं करना चाहिए। नि:संदेह, राष्‍ट्रवाद मूल की भावना से अभिभूत हमारी भारतीय संस्‍कृति की ही हमारी राष्‍ट्रीयता की धरोहर रही है। यही वजह है कि भारतीय लोकमानस में तैरती राष्‍ट्रवाद को किसी के संरक्षण की परवाह नहीं है। सबसे महत्‍त्‍वपूर्ण यह है कि भारतीय पुरातन संस्‍कृति की समृद्ध परंपरा में राष्‍ट्रवाद की चेतना एवं स्‍वरूप निरंतर जीवंत और मानवीय मूल्‍यों की रक्षा करने में समृद्ध रही है।

सहायक संदर्भ ग्रंथ सूची
पाण्‍डेय, डॉ. श्रीराजबली, भारतीय नीति का विकास, बिहार राष्‍ट्रभाषा परिषद
मकेंजी, जे.एस., नीति प्रवेशिका, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्‍ली.
वर्मा, डॉ. सुरेन्‍द्र, भारतीय जीवन मूल्‍य, पार्श्‍वनाथ विद्यापीठ, वाराणसी.
वर्मा, डॉ. सुरेन्‍द्र, भारतीय जीवन मूल्‍य, पार्श्‍वनाथ विद्यापीठ, वाराणसी.
पाण्‍डेय, गोविंद चंद्र, मूल्‍य मीमांसा, राजस्‍थान हिन्‍दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर

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