विमर्श: मुसलमानों का शैक्षिक पिछड़ापन

- वसीम अनवर


शिक्षा समाज की प्रगति का सबसे अहम और बुनियादी जरिया है जो जातियाँ शिक्षा हासिल करती हैं और विज्ञान और तकनीक के मैदान में अपने कदम आगे बढ़ाते हुए नए ज्ञान की रोशनी से भरपूर फायदा उठाती हैं वही प्रगति के मार्ग पर चलती हैं और जो जातियाँ शिक्षा से दूर हो जाती हैं वह प्रगति की राह में भी पिछड़ जाती हैं यानी शिक्षा के बगैर कोई भी समाज प्रगति नहीं कर सकता। इतिहास गवाह है कि शिक्षित समुदायों ने हमेशा तरक़्क़ी की है। किसी भी व्यक्ति के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए शिक्षा अनिवार्य है। दुःख की बात यह है कि जहाँ विभिन्न समुदाय शिक्षा को विशेष महत्व दे रहे हैं, वहीं मुस्लिम समाज इस मामले में आज भी बेहद पिछड़ा हुआ है। भारत में ख़ासकर मुस्लिम महिलाओं की हालत बहुत बुरी है।

मुसलमानों के पिछड़ेपन के कारण ढूंढने ने के लिए सन 2005 में मनमोहन सिंह सरकार ने जस्टिस राजेंद्र सच्चर की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की थी जिसका उद्देश्य पूरे देश में सर्वेक्षण करके मुसलमानों की आर्थिक शैक्षणिक और सामाजिक हैसियत का पता लगाना था। जस्टिस राजेंद्र सच्चर ने बड़ी ईमानदारी मेहनत और लगन से पूरे देश का जायजा लिया इस जायजे के दौरान केंद्रीय हुकूमत राज्य शासन केंद्र तथा राज्य के अंतर्गत आने वाले सभी विभाग सरकारी तथा अर्ध शासकीय निजी शिक्षण केंद्र तथा मदरसों का जायजा लिया कि इन जगहों पर मुसलमानों की संख्या क्या है और इनकी आर्थिक तथा सामाजिक क्या हैसियत है। यह रिपोर्ट मुसलमानों की जिंदगी के अनेक पक्षों पर प्रकाश डालती है, लेकिन यह लेख में मुसलमानों शैक्षिक स्तर तक सीमित है। मुसलमानों की शैक्षिक प्राथमिकताएँ समझने के लिए उनका सामाजिक ताना बाना समझ आवश्यक है।

मुसलमानों में जाति-व्यवस्था:
सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में मुसलमानों के अंदर जात-पाँत की बात करते हुए कहा गया है कि हिंदुओं की तरह मुसलमानों में भी जात-पाँत उपस्थित है और यह जाति-व्यवस्था मुसलमानों के पिछड़ेपन का एक प्रमुख कारण है। मुस्लिम मान्यता है कि सातवीं शताब्दी ईस्वी में व्यापार हेतु भारत आये अरब मुस्लिम व्यापारियों से प्रभावित होकर इस्लाम स्वीकार करने वाले हिंदुओं में उपस्थित जाति-व्यवस्था मुसलमान बनने पर भी बनी रही।

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में मुसलमानों के तीन दर्जो की तरफ इशारा किया गया है।
1. अशराफ
2. अजलाफ
3. अरजाल

मुस्लिम समुदाय में शादी ब्याह और रिश्तेदारी के मामले में जात-पाँत और ऊँच-नीच का बहुत ख्याल रखा जाता है। अशराफ जातों में शैख, सैयद, पठान और मुगल शामिल थे, बाद में राजपूतों को भी इसमें शामिल किया गया। अशराफ की बरतरी की वजह उनका विदेशी होना माना जाता है जो कल्पना मात्र है। अजलाफ में मेहनतकश वर्ग जैसे जुलाहे या अंसारी आते हैं। नाई, धोबी, भंगी, चमार, कुंजडे, कसाई और निम्न जातियाँ अरजाल हैं।

लम्बे समय तक निचली जातों को अच्छा खाना जैसे पुलाओ या बिरयानी बनाने शिक्षा हासिल करने इस्लामी नाम रखने और कुछ इलाकों में पक्का मकान बनाने तक की आज्ञा नहीं थी। पर्दा सिर्फ अशराफ की औरतों के लिए मखसूस था। अन्य तबकों की औरतों को पर्दा करने से रोका जाता था। निचली जातियों की औरतें अशराफ की खिदमत एवं उनकी यौन संतुष्टि का सामान थी। कुछ निचली जातियों जैसे कंजर जाति की औरतों को तवायफ बनाया जाता था।

मुसलमान फिरके और इस्लाम के मसलक:
इस्लाम मानने के तरीके यानी मसलक के आधार पर भी मुसलमान अनेक फिरकों में बँटे हुए हैं। मूलरूप से दो फिरके सुन्नी और शिया हैं पर इन फिर्को को भी अनेक उप फिरकों में बाँटा गया है।
यहाँ कुछ प्रमुख फिरकों के सिर्फ नाम लिखे जा रहे हैं।

1.     अहले सुन्नत उल जमात:-
a.      मुकल्लिद
                                                           i.     हनफी
1.     बरेलवी
2.     देवबंदी
                                                          ii.     शाफई
                                                        iii.     माल्की
                                                        iv.     हंबली
b.     गैर मुकल्लिद
                                                           i.     अहले कुरान
                                                          ii.     अहले हदीस
                                                        iii.     जमात ए इस्लामी
2.     शिया:- इन के भी अनेक फिरके हैं सबसे मशहूर फिरका असनाय अर्शिया है इनको इमामियां भी कहते हैं। 

इन तमाम फिरकों में इस्लाम धर्म को लेकर बड़ा मतभेद है। ये फिरके एक दूसरे को काफ़िर तक कहते हैं। इनकी मस्जिदें अलग-अलग होती हैं आपस में शादी-ब्याह नहीं करते, यहाँ तक कि इनके कब्रिस्तान भी अलग होते हैं।

मुसलमानों का आलमी मंजर नामा:
वर्तमान काल में मुसलमानों के शैक्षिक पिछड़ापन का ग्राफ चिंताजनक है 57 आजाद खुद मुख्तार इस्लामी देशों की आबादी लगभग सवा अरब है। इस आबादी का तकरीबन 40% हिस्सा अनपढ़ है।

विश्व स्तर पर विज्ञान और तकनीकी क्षेत्रों में मुस्लिम जन संसाधन सिर्फ 4% है। दुनिया भर में हर वर्ष एक लाख से अधिक विज्ञान संबंधी पुस्तकें एवं बीस लाख से अधिक वैज्ञानिक शोध पत्र प्रकाशित होते हैं जबकि इस्लामी देशों में वैज्ञानिक पुस्तकें एवं शोध पत्र पत्रों की कुल तादाद एक हजार से भी कम है। यह सब मुस्लिम आबादी की मौजूदा शिक्षा से दूरी और उनके चिंताजनक शैक्षिक पिछड़ेपन का एक सबूत मात्र है, इसी के साथ साथ दीनी शिक्षा में भी मुसलमानों की प्रगति नगण्य है।

दुनिया भर में किताबें पढ़ने वालों की सूची में भी मुस्लिम सबसे पीछे हैं। यूरोप में प्रति व्यक्ति सालाना 35 किताबें पढ़ी जाती हैं। इजरायली 40 किताबें सालाना की औसत से पढ़ते हैं। जबकि मुसलमान एक या एक से भी कम किताब सालाना पढ़ते हैं। अरब थॉट फाउंडेशन की कल्चरल रिपोर्ट 2011 के मुताबिक यूरोपियन साल भर में 200 घंटे पढ़ते हैं जबकि अरब मुस्लिम सिर्फ 6 मिनट सालाना पढ़ते हैं।

शिक्षा के महत्त्व को कोई नकार नहीं सकता। अगर हम दुनिया के प्रगतिशील समाजों की साक्षरता पर बारीक नजर डालें तो स्पष्ट हो जाएगा कि किसी देश या जाति के निर्माण और प्रगति में शिक्षा कितनी महत्त्वपूर्ण है। सभी प्रगतिशील समाज शिक्षा में भी अग्रगण्य हैं। शिक्षा उन्हें न सिर्फ बाहरी बल्कि अंदरूनी तौर पर भी मजबूत बनाती है।

हिंदुस्तान के मुसलमानों की शैक्षिक स्थिति:
जहाँ तक हमारे देश हिंदुस्तान का सवाल है यह तकनीक के इस दौर में तेजी से आगे बढ़ रहा है और शिक्षा के मैदान में भी नई नई मंजिलें हासिल कर रहा है। आज तकरीबन 80% आबादी के साक्षर होने के दावे किए जाते हैं। साक्षरता के मामले में हिंदुस्तान के पिछड़ने की सबसे अहम वजह दलित एवं पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों की शिक्षा से दूरी रही है।

अगर तबकात के आधार पर साक्षरता पर नजर डाली जाए तो 2001 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार अल्‍पसंख्‍यक आबादी अर्थात् मुसलमानों, ईसाइयों, सिक्‍खों, बौद्धों एवं पारिसयों के प्रतिशत और उनकी साक्षरता दर इस प्रकार है:
समुदाय आबादी की प्रतिशतता साक्षरता की प्रतिशतता
मुसलमान 12.4 59.1
ईसाई 2.3 80.3
सिक्‍ख 1.9 69.4
बौद्ध 0.8 72.7
जोरोस्ट्रियन (पारसी) 0.007 97.9

जस्टिस सच्चर ने अपनी रिपोर्ट में पेश किया कि मुसलमान इस देश में भी पिछड़े हुये हैं। वे न तो आर्थिक तौर पर मजबूत हैं और न ही सामाजिक तौर पर अन्य समुदायों की तुलना में अच्छी स्थिति में हैं। और शिक्षा के क्षेत्र में तो अत्यधिक पिछड़े हैं। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में बताया गया कि मुसलमान हिंदुस्तान के दलितों और पिछड़े आदिवासियों से भी अधिक अशिक्षित हैं।

समय के साथ-साथ मुसलमानों के हालात बिगड़ते जा रहे हैं। वे जीवन के हर क्षेत्र में पिछड़ रहे हैं। 2004-05 के आँकड़ों से भी साबित होता है कि मुसलमान शिक्षा में बहुत पिछड़े हुए हैं। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक 25% मुसलमान बच्चे या तो कभी स्कूल ही नहीं जाते या जाते भी हैं तो बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं।

मुसलमानों के बारे में आम रुझान है कि वह रूढ़िवादी और पुरातनपंथी होने के कारण अपने बच्चों को मदरसों में मजहबी शिक्षा दिलवाते हैं लेकिन सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में इस भ्रम से भी पर्दा उठाया गया है
मदरसों में 4%
सरकारी स्कूलों में 66 %
प्राइवेट स्कूलों में 30%

रिपोर्ट के अनुसार,
“अधिक उम्र वाले अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति (आयु वर्ग के 51 वर्ष और उससे अधिक) की तुलना में युवा अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति (20 से 30 आयु वर्ग) में, स्नातकों के अनुपात तीन गुना अधिक है। मुस्लिमों के बीच, समिति ने पाया कि अधिक उम्र वाले मुस्लिमों की तुलना में युवा मुस्लिम स्नातकों का अनुपात दोगुना है, “’सभी अन्य ‘ की तुलना में मुस्लिम पुरुषों और महिलाओं के बीच एक खाई और अगर प्रवृत्ति उलट नहीं होती है तो लगभग एक निश्चित संभावना है कि मुस्लिम भी अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के नीचे चला जाएगा।”

हिंदुस्तान की मुस्लिम आबादी 14.23 फीसदी हैं जबकि भिखारियों में वे 25 प्रतिशत हैं। सच्चर आयोग की रिपोर्ट पहले ही बता चुकी है कि भारत में मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर है।

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के आने के बारह साल बाद भी आज मुसलमानों की हालात मे कोई सुधार नही हुआ शिक्षा नौकरी और मानव विकास के अन्य सूचकांक मे हालात वैसे ही बने है कुछ मामलो मे उनकी स्थिति पहले से भी बत्तर हो गई है।

2001 से 2011 की जनगणना के अनुसार मुस्लिम आबादी मे बढोतरी हुई है, परन्तु आज भी मुस्लिम समुदाय की आय दूसरे समुदाय से कम है। कुछ सूचकांक इस प्रकार है:
प्रतिदिन प्रति व्यक्ति औसत खर्च ₹33
सरकारी नौकरियों में मुसलमान 5% से भी कम
आईएएस-आईपीएस 3%
सेना और सुरक्षा बल 3.2%
रेलवे 4.5%
बैंक 2.2 प्रतिशत

शैक्षणिक स्थिति खराब होने और कौशल न होने के कारण रोजगार की स्थिति भी अच्छी नहीं है। शिक्षा और रोजगार ना होने की वजह से बेहद गरीबी है। नौजवान बेरोजगार हैं, बच्चे और बूढ़े कुपोषण से होने वाली बीमारियों में फँसे हैं। मुसलमान अल्पसंख्यक समुदाय का तीन चौथाई हिस्सा हैं। इनकी प्रगति के बगैर भारत प्रगति की राह पर आगे नहीं बढ़ सकता है।

मुसलमानों की स्थिति के कारण एवं उपाय:
मुसलमान समाज अनेक धार्मिक पंथों और मतों में इतना विभाजित है कि उनके बीच संवाद की स्थिति ही नहीं बनती। हर मसलक मानने वाले सिर्फ अपने धर्म गुरुओं मौलवियों मुल्लाओं की बात सुनते हैं। आमतौर पर मौलवी हाफिज और आलिम शिक्षा पर जोर नहीं देते हैं, क्योंकि शिक्षा इंसान को धर्मांधता से बाहर निकाल देती है और ये मौलवी नहीं चाहते कि उनकी पकड़ से उनके अनुयाई बाहर निकलें। जितने ज्यादा उनके अनुयाई होंगे तो वे चुनाव में उतना ही अधिक तोल-मोल कर सकते हैं।

सभी मसलकों के ज्यादातर मुस्लिम धर्मगुरु शैख, सैयद, मुगल, पठान अर्थात अशराफ ही होते हैं और वह अजलाफ और अरजाल को शिक्षा के लायक नहीं समझते लिहाजा सिर्फ धार्मिक कर्मकांड यानी रोजा नमाज हज जकात के ही दर्स देते हैं, और दीनी शिक्षा पर दुनियावी शिक्षा को कुर्बान कर देते हैं।

वर्तमान मुस्लिम पीढ़ी जो मध्यम वर्ग में आती है उसके अंदर एक खास किस्म का आत्म संतोष, निष्क्रियता और स्वार्थ पैदा हो गया है। जो आत्म केंद्रित है और दूसरों की चिंता नहीं करती। दूसरी तरफ मुस्लिम व्यापारी वर्ग है जो अपने-अपने मसलकों के मुल्लों मौलवियों के प्रभुत्व में रहते हैं और सिर्फ धन कमाने और उसके प्रदर्शन पर यकीन रखते हैं। इन हालात में मुस्लिम समाज को जिहालत से निकालना और जागरूकता फैलाना बहुत कठिन हो गया है।

कुछ समय बाद यही मध्यम वर्ग और व्यापारी वर्ग जागरूक होगा और समाज में शिक्षा के फैलाने पर जोड़ देगा। उक्त हालात उत्तर भारत के हैं दक्षिण भारत के मुसलमानों में धार्मिक और सामाजिक अंतर है। कुछ लोग और कुछ संस्थाएँ मुस्लिम समाज में काम कर रहे हैं, लेकिन यह नाकाफी हैं।

मुस्लिम समाज में चलाए जा रहे ज्यादातर कार्यक्रम मजहबी चोले से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। आधुनिक शिक्षा, नई शिक्षा के लिए मुस्लिम इलाकों में जो काम होना चाहिए वह नहीं हो पा रहा है, और यह काम मुसलमानों के सहयोग के बिना असम्भव है।

दलित आबादियों और मुस्लिम आबादीयों में कोई खास फर्क नहीं है। गरीब मुसलमान और दलित लोग सुविधाहीन बस्तियों में रहते हैं, जहाँ जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल आदि नहीं होने के बराबर हैं। और अगर हैं भी तो उनकी हालत खराब है।

दलित मुस्लिमों की बनिस्बत ज्यादा जागरूक हैं। उनके पास ज्योति राव फुले और अंबेडकर की विरासत हैं। कुछ सरकारी नीतियों और आरक्षण के कारण दलितों में शिक्षा के प्रति जागरूकता आई है, जिससे मुसलमान वंचित हैं। इसी के साथ साथ गरीब मुसलमान बच्चों के साथ स्कूलों में भेदभाव और पक्षपात होता है। उन्हें बार-बार लज्जित किया जाता है। जिस कारण वह स्कूल जाना छोड़ देते हैं। अधिकांश मुसलमानों की आर्थिक स्थिति भी कमजोर है जिस कारण उनके बच्चे स्कूली एवं शिक्षा उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते और अपनी पढ़ाई बंद कर देते हैं। घर परिवार की जिम्मेदारी का एहसास दिला कर उन्हें कमाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। जिस कारण वे छोटे-मोटे काम सीख कर या मजदूरी करते हुए अपना जीवनयापन शुरू कर देते हैं।

मुस्लिम स्त्री शिक्षा पर आम धारणा यह है कि वे पर्दा करती हैं, घरों में कैद हैं, इसलिए अनपढ़ हैं। संकीर्ण मानसिकतावादी लोगों ने मुस्लिम महिलाओं को नई शिक्षा से दूर रखकर सिर्फ धार्मिक शिक्षा ग्रहण करने पर जोर दिया है। मुस्लिम धार्मिक कट्टरपंथियों ने धर्म का सहारा लेकर स्त्रियों को शिक्षा के अधिकार से वंचित कर दिया है। इसका विरोध करते हुये ज़ोया हसन लिखती हैं कि:
“मुस्लिम औरत का हिन्दुस्तान में नहीं पढ़ने का का मूल कारण गरीबी है। उनकी स्थिति अनुसूचित जाति की तरह है जिस वजह से अनुसूचित जाति की औरतें नहीं पढ़ पाती। धर्म और पर्दा उतना बड़ा कारण नहीं। सामाजिक और आर्थिक पहलुओं को नज़र अंदाज़ कर मुस्लिम औरत की स्थिति को ठीक से नहीं समझा जा सकता।”

मुस्लिम समुदाय की स्थिति के प्रमुख बिन्दु:
• मुस्लिम समुदाय दलितों से भी अधिक पिछड़ा समुदाय
• भिखारियों की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत
• सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, स्तर पर भी पीछे मुसलमान
• मुसलमानों के प्रति समाज में भेद भेदभाव पूर्ण रवैया और वर्ताव
• मुस्लिम आबादी का प्रतिशत और आईएएस-आईपीएस की न्यूनतम भागीदारी
• आईएएस-आईपीएस में मुस्लिम समुदाय की भागीदारी 3% एवं 4% ही है जो 1 जनवरी 2016 के आंकड़े में 3.3 2% एवं 3.1% रह गई
• स्थिति और खराब हुई 2005 में पुलिस बल 7.6 3% था जो 2013 में 6.2 7% रह गया
• प्रति व्यक्ति औसत आय निरंतर गिरती जा रही है
• बाल श्रम:
2001 में पुरुष 47.5% था जो 2011 में 49.5% हो गया
2001 में महिला 14.1% था जो 2011 में 14.8% हो गया
• 2001 की जनगणना में मुस्लिम आबादी 13.43 प्रतिशत थी जो 2011 की जनगणना में मामूली वृद्धि के साथ 14.2% हो गई
• उक्त दो जनगणना के बीच कि यह न्यूनतम बढ़ोतरी है
• महिला पुरुष के मध्य लिंग अनुपात का स्तर तो बेहतर है शहरी आबादी में सर्वाधिक प्रतिशत भी मुस्लिम समुदाय का ही है

मुस्लिम समुदाय की शिक्षा के प्रमुख बिन्दु:
• मुसलमानों की 43 फीसदी आबादी अनपढ़,
• सबसे कम शिक्षित हैं मुस्लिम महिलाएँ
• मुस्लिम स्कूल ड्रॉप आउट सबसे अधिक
• सिर्फ 2.76 फीसदी मुस्लिम ही स्नातक
• उच्च शिक्षा में मुसलमान फिसड्डी
• उच्च शिक्षा के लिए गरीबी मुख्य बाधा
• डिप्लोमा हासिल करने में भी मुसलमान फिसड्डी
• उत्तर भारत में, स्कूलों की कमी के कारण उच्च शिक्षा में मुसलमान पीछे
• दक्षिण भारत की स्थिति अलग
• शिक्षा है मुसलमानों की सबसे बड़ी जरूरत
• 'मुस्लिमों के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए शिक्षा में आरक्षण की जरूरत'
• शिक्षा, रोज़गार और कौशल विकास के बिना मुस्लिम समाज का विकास अधूरा

इस प्रकार के कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं है कि मुस्लिम समुदाय के वर्ग विभाजित समाज में अशराफ, अजलाफ और अरजाल का क्या सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शिक्षा, रोजगार और कौशल विकास आदि में क्या प्रतिशत है। अनुमान से कहा जा सकता है कि अशारफ मध्यम वर्गीय समाज है अजलाफ पिछड़े हैं और अरजाल अत्यधिक पिछड़े हैं। जस्टिस सच्चर ने जो बात कही है वह मुस्लिम समुदाय के बड़े वर्ग अजलाफ और अरजाल पर साबित होती है कि वे दलितों से भी अधिक पिछड़े हैं।


- डॉ. वसीम अनवर
उप आचार्य, उर्दू व पारसी विभाग, डॉ, एच एस गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर 470003
ईमेल: wsmnwr@gmail.com चलभाष: +91 930 131 6075

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