भूख और गरीबी की समस्या पर मीडिया की दृष्टि का एक अध्ययन

संदीप कुमार

संदीप कुमार


सहायक प्रोफेसर, मीडिया स्टडी विभाग, चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी
चलभाष: +91 700 094 5315; ईमेल: drsandeepkumar153@gmail.com

सारांश
          भारत में भूख एवं गरीबी की समस्या नयी नहीं है। लेकिन जिस प्रकार योजना आयोग ने गरीबी की संख्या को कम दिखाने के लिए गरीबी के न्यूनतम मानक के साथ छेड़छाड़ किया था,  उसके बाद देश  की मीडिया में एक नई बहस छिड़ गई । गरीबी के मानक को लेकर हो रही बहस में योजना आयोग द्वारा प्रस्तुत मानक की मीडिया में सर्वव्यापी आलोचना हुई लेकिन मीडिया ने अपनी आलोचना के दौरान अपने विज्ञापनदाओं के ग्राहकों के ‘बाइंग मूड’ का भी ध्यान रखा। सरकार ने अपने प्रस्तुत मानक से यह स्पष्ट का दिया की वह भुखमरी का कारण गरीबी को नहीं मानती है। अर्थात अब गरीबी रेखा से उपर के लोग भी भुखमरी की चपेट में आ सकते हैं। मीडिया ने भी इस दौरान अपनी सेफ्टी वॉल्व नीति के तहत गरीबी की बात को जरूर सामने रखा लेकिन ग्रामीण गरीब जनता से इस मुद्दे पर दूरी बनाये रखी। वर्तमान अध्ययन में इन्ही जैसे तथ्यों का अध्ययन कर एक विश्वसनीय  निष्कर्ष  प्राप्त करने की प्रयास किया गया है।

प्रस्तावना
    वैश्विक पटल पर भूख से पीड़ित लोगों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। खाद्य मूल्यों में हो रही बेतहाशा वृद्धि के इस दौर में गरीब जनसंख्या खासकर विकासशील देशों  में निवास कर रही गरीब जनता समुचित खाद्यान्न खरीद पाने की स्थिति में नहीं हैं। परिणामस्वरुप भूख से तड़पते लोगों की अधिक संख्या विकासशील दुनिया में ही है। विश्व  खाद्य संगठन द्वारा जारी वैश्विक  कुपोषण  पर मानचित्र के अनुसार कुल भूखे लोगों में से 32 प्रतिशत दक्षिण पूर्व एशिया में, 30 प्रतिशत दक्षिण एशिया में, 26 प्रतिशत उप सहारा अफ्रीका में तथा 12 प्रतिशत विश्व के अन्य भागों में हैं। वर्तमान में विकासशील देशों के 33 प्रतिशत बच्चे प्रोटीन-उर्जा कुपोषण से पीडित है तथा 50 प्रतिशत से अधिक गर्भवती महिलाओं में आयरन  की कमी वाला एनीमिया रोग पाया जाता है। विश्व  में दो सौ करोड़ से भी अधिक लोगों को प्रतिदिन ऐसा भोजन प्राप्त होता है जिसमें मानव के सामान्य विकास, समय-पूर्व मृत्यु को रोकने तथा अंधापन और मानसिक कमजोरी जैसी अपंगताओं को रोकने लायक आवश्यक  खनिज-लवण, विटामिन आदि नहीं होते हैं।
     भारत में खाद्य समस्या अंग्रेजी शासन की नीति के फलस्वरुप आजादी प्राप्ती के पूर्व ही बढ़ चूकी थी। बंगाल के अकाल को भूला पाना संभव नहीं था और 1947 के देश विभाजन ने खाद्य संकट को अत्यंत गंभीर बना दिया तथा भारत में भूखों की संख्या में काफि बढ़ोत्तरी हो गयी। सरकार ने भुखमरी की समस्या व खाद्य संकट को गंभीरता से लिया तथा 1964 में ‘झा’ की अध्यक्षता में नियुक्त ‘अनाज मूल्य समिति’ की अनुशंसा पर वर्तमान खाद्य-प्रबंधन की व्यवस्था तैयार की गई। सरकार द्वारा समय-समय पर अनेक योजनाएं बनायी गई लेकिन फिर भी उदारीकरण के बाद भूखों की स्थिति में वृद्धि हुई तथा खाद्य सुरक्षा की स्थिति में गिरावट आई। वर्तमान में भारत में भुखमरी की समस्या की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है, जब 25 जुलाई  2012 को प्रणव मुखर्जी ने राष्ट्रपति पद के लिए चुने गए तब उन्होंने सबसे पहले भूख और गरीबी की समस्या को देश के सामने रखा। भारत सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार उदारीकरण के बाद के वर्षों में खाद्यान्न उत्पादन वृद्धि दर 1.2 प्रतिशत ही रही जबकी जनसंख्या में औसतन 1.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई। अतः प्रति व्यक्ति अनाज व दालों की उपलब्धता भी घटी है। अनाजों की खपत वर्ष 1990-91 में जहाँ प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 468 ग्राम थी वहीं वर्ष 2005-06 में घटकर प्रतिदिन 412 ग्राम रह गई। इस दौरान दालों की प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति खपत 42 ग्राम से घटकर 33 ग्राम रह गई। जबकी 1956-57 में दालों की उपलब्धता प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 72 ग्राम थी।
भूख और गरीबी को एक दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। भारत सरकार की रिपोर्ट के अनुसार देश में प्रतिव्यक्ति अनाज उपलब्धता में पहले की तुलना में कमी आयी है इससे स्पष्ट  है कि भूखों की संख्या में बढोत्तरी आयी है। वही नीति आयोग के मौजूदा आंकड़ों के अनुसार पिछले पांच वर्षों में गरीबों की संख्या में 7.4 फीसदी की कमी आई है। सरकार के ये दोनों आंकड़े खुद ही एक दूसरे की विश्वसनीयता  पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। देश में जबतक गरीबी के निर्धारण के लिए 1993 में दी गई डी.टी. लाकड़ावाला की समिति के अनुसार कैलोरी आधार अर्थात 2400 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन ग्रामीण क्षेत्रों में तथा शहरी क्षेत्रों में 2100 कैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन मानक रुप में मैजूद रही, गरीबों की संख्या में बढ़ोत्तरी ही होती रही। इसका मुख्य कारण खाद्य पदार्थों की कीमतों का लगातार बढ़ना था। वर्ष 2009 में गठित सुरेश डी. तेंडुलकर की अध्यक्षता वाली समिति ने गरीबी निर्धारण में बुनियादी बदलाव कर डाला और कैलोरी की जगह समिति ने कीमत के आंकड़ों का उपयोग गरीबी निर्धारण के मानक के रुप में किया। इसी मानक के अनुसार वर्ष 2004-05 में सरकार ने देश में 37.2 प्रतिशत आबादी को गरीबी रेखा के निचे बताया। वर्ष 2011 में योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा की शहरों में 32 रुपये प्रतिदिन तथा गाँवों में 26 रुपये प्रतिदिन खर्च करने वाले व्यक्ति को गरीबी रेखा के ऊपर माना जाये। पुनः योजना आयोग ने वर्ष 2012 में दावा किया की गरीबों की आबादी में 7.3 प्रतिशत की कमी आई है और इस बार सरकार ने शहरों में 28.65 रु. और गाँवों में 22.43 रु. खर्च करने वाले को गरीबी रेखा से ऊपर माना। हम केवल एक वर्ष के भीतर के सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो सरकार ने गरीबी के मानक मूल्य में लगभग 12 प्रतिशत की कमी की है जबकी इन एक वर्षों में वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार खाद्य पदार्थों की किमतों में लगभग 15 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। इस प्रकार भूख और गरीबी के संदर्भ में योजना आयोग और वाणिज्य मंत्रालय की रिपोर्ट व खाद्य उपलब्धता अध्ययन से स्पष्ट है कि भले ही योजना आयोग अंको की जादूगरी करके गरीबों का प्रतिशत कम बताये लेकिन भूखों की संख्या में हो रही बढ़ोत्तरी को वर्तमान में कोई भी नीति नहीं झुठला सकती है।
भारत सरकार की मनरेगा योजना के अंतर्गत काम करने वाले मजदूरों को 120 रु. प्रतिदिन मजदूरी मिलती है। फूड सिक्यूरिटी एटलस के अनुसार मनरेगा मजदूर अपनी मजदूरी का अधिकांश  हिस्सा खाने या खाने की वस्तु को खरीदने में खर्च करते हैं। यह ग्रामीण गरीबी को दर्शाता  है। 2015 में बिहार के महादलित आयोग ने जब 250 महादलित परिवारों का मुआयना किया तो आयोग ने पाया की 234 परिवार अर्थात 95 प्रतिशत परिवार भूखे हैं। बिहार के वैशाली जिले में कुछ वर्ष पहले 35 व्यक्तियों की मौत हो गई। एक स्वयंसेवी संगठन के अध्ययन के अनुसार इन मौतों का कारण भूख और गरीबी थी। देश में कितने लोग भूखे सोते हैं अथवा कितने लोगों के यहाँ एक शाम का भोजन ही बन पाता है अथवा एक पेट ही खाकर गुजारा करते हैं ।  इस संबंध में सरकार द्वारा अभी तक अध्ययन नहीं करवाया गया है। कई राज्यों के आयोग ने अपनी सरकारों को भूख से संबंधित सर्वेक्षण किये जाने की अनुशंसाए की हैं।
     वर्तमान में भूख को बाजार ने मुनाफे के धंधे के रुप में परिवर्तित कर लिया है। अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएं स्वास्थ्य और पोषण की कमी का वास्ता देकर ऐसी नीतियां और कार्यक्रम बना रहे हैं जिससे खाद्य उद्योग में लगी बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को सीधा फायदा पहुंच रहा है। भारत सहित दुनिया भर में नागरिकों के स्वास्थ्य और पोषण संबंधी अधिकारों को सुनिश्चित  करने के लिये सार्वजनिक निजी भागीदारी (पी.पी.पी.) को इस तरह पेश किया जा रहा है कि देश में लोगों के स्वास्थ्य की बुनियाद पी.पी.पी. के माध्यम से ही खड़ा किया जा सकता है और अगर ऐसा न हुआ तो भारत बीमारी और कुपोषण के दलदल में धंस जायेगा। भूमण्डलीकरण के इस दौर में कम्पनियों ने बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य और भूख का वास्ता देकर अपने उत्पादों को महंगे दर पर बाजार में भर दिया है। बाजार के दबाब  में यूनिसेफ और डब्ल्यू.एच.ओ. जैसे संगठनों ने भी अपने 27 वर्ष पूर्व के 34वें विश्व स्वास्थ्य सभा के घोषणा पत्र को उठाकर किनारे कर दिया है। जिसमें कहा गया था कि ‘लाभ के लिये सक्रिय कम्पनियां व्यापक जनहित की पोषक नहीं हो सकती।’ वर्तमान में यूनिसेफ ने पोषक पदार्थों की सप्लाई के लिए ‘ग्लोबल एलायंस फॉर इम्पूव्ड न्यूट्रीशन’(गेन) से समझौता किया है जबकी गेन अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर लाभ के लिए सक्रिय बहुराष्ट्रीय कंपनी है।
     वर्तमान दौर की मीडिया बाजारवादी व्यवस्था से प्रभावित है और गरीबों की संख्या कम होने के योजना आयोग के दावे को लेकर न्यूज मीडिया के बड़े हिस्से मुख्य रूप से गुलाबी अखबारों/चैनलों ने काफि खुशी जाहिर की। क्योंकि वर्तमान दौर की पत्रकारिता को ऐसी ऐसी खबरों और रिपोर्टों का बेसब्री से इंतजार रहता है। ऐसे खबरों से माहौल खुशनुमा बनता है और खुशनुमा माहौल बनाना मीडिया की मजबूरी है क्योंकि नई अर्थव्यवस्था की जान उपभोग की अधिक से अधिक बढ़ती प्रवृत्ति में है। वर्तमान बाजार सिद्धांत यह मानता है कि उपभोक्ता अपनी जेब से पैसा तभी निकालता है जब उसे माहौल खुशमा दिखाई देता है। विज्ञापन पर निर्भरता बढ़ने के बाद मीडिया का काम उपभोक्ता की जेब से पैसा निकलवाने का भी हो गया है। पिछले दो दशकों में मीडिया का तेजी से विस्तार हुआ है। मीडिया में महानगरों व उपभोग की खबरे बढ़ती जा रही हैं साथ ही साथ इन्हे कवर करने वाले रिपोर्टरों की मांग बढ़ गई है। कृषि, श्रम, गरीबी-भूख, कुपोषण, माइग्रेशन जैसी बीट या तो खत्म कर दी गई है या फिर उसे चलाऊ निर्देश के साथ छोड़ दिया गया है। मीडिया जिस प्रकार से उपभोक्तावाद की सर्वे रिपोर्ट छापने में दिलचस्पी दिखाता है उसका पांच फीसदी भी भूख और गरीबी की सर्वे छापने में नहीं दिखाता। मीडिया तो ग्रामीण खबरों को छापने में भी दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। सीएसडीएस के एक सर्वे में यह पाया गया कि अखबारों में ग्रामीण क्षेत्र से जुड़ी खबरों को दो से तीन फीसदी जगह मिलती है, चैनलों का हाल और बुरा है। मीडिया के वर्तमान दौर में गरीबों और उनके मुद्दों को मीडिया के हाशिये पर भी जगह नहीं मिलती क्योंकि बाजार सिद्धांत मानता है कि गरीबी का जिक्र भी उनके पाठकों यानी उपभोक्ताओं के ‘बाईंग मूड’ को खराब या हतोत्साहित करता है। विज्ञापनदाता इसे पसंद नहीं करते, उनका मानना है कि भूख, गरीबी, कुपोषण जैसे मुद्दों की खबरें उनके लक्षित समूह के लिए लक्षित नहीं है।

अध्ययन का उद्देश्य
1. सरकार भूख को गरीबी का ही परिणाम मानती है या दोनों को एक दूसरे से स्वतंत्र मानती है का पता लगाना।
2. बढ़ती मंहगाई के बावजूद भी गरीबी रेखा के लिए पूर्व निर्धारित मानक 32 रुपये घटाकर 26 रुपये करना जनता और मीडिया की नजर में कहाँ तक उचित है इस तथ्य का पता लगाना।
3. मीडिया भूख और गरीबी से संबंधित सरकारी रिपोर्ट को किस प्रकार लेती है इसका पता लगाना।
4. क्या मीडिया विज्ञापनदाताओं के दबाब के चलते मंहगाई के पक्ष में जनसमर्थन बनाने का कार्य कर रही है इसका पता लगाना।
5. भूख और गरीबी से संबंधित रिपोर्ट को छापते समय मीडिया भूखे और गरीब जनता की बाइट को कितना स्थान देती है इस तथ्य का पता लगाना।
6. भूख और गरीबी से पीड़ित जनता की समस्याओं के प्रति मीडिया कितना गंभीर है इसका पता लगाना।
7. भूख और गरीबी से पीड़ित जनता के मध्य में मीडिया की विश्वसनीयता कितनी है इसका पता लगाना।
अध्ययन का क्षेत्र व चयन आधार
     भूख और गरीबी से संबंधित वर्तमान अध्ययन का क्षेत्र बिहार प्रदेश को चुना गया है। बिहार प्रदेश में भूख व गरीबी की समस्या हमेशा ही प्रधान रही है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त एक सलाहकार समूह ने 16 जून 2013 को प्रकाशित अपने सर्वेक्षण में दावा किया है कि बिहार की 55 प्रतिशत जनसंख्या कुपोषण से ग्रसित है। वहीं 70 प्रतिशत महिलायें और बच्चे एनीमिया के शिकार हैं। सर्वेक्षण में इसका मुख्य कारण गरीबी के कारण भोजन की कम मात्रा का लेना बताया गया। सर्वे में यह भी बताया गया की जनकल्याणकारी योजनाओं को पूर्ण रूप से लागू न किये जाने के कारण गरीबी की स्थिति में और गिरावट आयी है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त सलाहकार समूह की उपयुत्त रिपोर्ट आने के बाद भूख और गरीबी से संबंधित वर्तमान अध्ययन का क्षेत्र बिहार प्रदेश को चुना गया। अध्ययन की सुविधा व सटीक निष्कर्ष पर आने के उद्देश्य  से बिहार के सबसे बड़े प्रमण्डल तिरहुत को चुना गया । पुनः विषय  वस्तु पर और गहनता से अध्ययन करने के लिए तिरहुत प्रमण्डल का बाढ़ प्रभावित जिला सीतामढ़ी को चुना गया। अंतिम निष्कर्ष प्राप्त करने के उद्देश्य से बहुस्तरीय निदर्शन पद्धति का प्रयोग करते हुए चार गाँव क्रमशः रायपुर, हरिहरपुर,  भंटाबारी व कुरहर को अध्ययन में सम्मिलित किया गया।
शोध  में शामिल किये गये लोगों की संख्या व गाँव का विवरण निम्न है-
क्र.सं.
  ग्राम
 महिला
   %
पुरूष
%
योग
%
1
भंटाबारी
    2
2.5%
 18
22.5%   
20
25%
2
हरिहरपुर
    7
8.75%
  13
16.25%  
20
25%
3
कुरहर
    2
2.5%
  18
22.5%    
20
25%
4
रायपुर
   12
15%
   8
10%
 20
25%
कुल योग

   23
28.75%  
57
71.25%   
80
25%

      अध्ययन में मीडिया का पक्ष जानने के लिए अध्ययन क्षेत्र में प्रकाशित दो प्रमुख हिंदी दैनिक समाचारपत्र दैनिक हिंदुस्तान व दैनिक जागरण को सम्मिलित किया गया।

शोध प्रविधि

प्रस्तुत शोध अध्ययन में विभिन्न शोध प्रविधि का उपयोग करते हुए विश्वसनीय निष्कर्ष प्राप्त करने की कोशिश की गई है। उद्देश्यपूर्ण निष्कर्ष प्राप्त करने के लिए निम्न शोध प्रविधि का इस्तेमाल किया गया है-

निदर्शन पद्धति- इस पद्धति का इस्तेमाल करते हुए शोध क्षेत्र की विभिन्न इकाईयों के सम्मिलित किया गया है।

अनूसुची प्रविधि- ग्रामीण जनता से अनूसुची प्रविधि के माध्यम से सूचना प्राप्त की गई है।

अंतर्वस्तु विश्लेषण- मीडिया का पक्ष जानने के लिए मीडिया में प्रकाशित भूख और गरीबी से संबंधित लेखों, खबरों का विश्लेषण किया गया है।

उपर्युत्त प्रविधियों के अलावा वर्तमान शोध अध्ययन में द्वितीयक सामाग्री का भी उपयोग किया गया है।


आँकड़ों का विश्लेषण

शोध प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने के लिए शोध क्षेत्र की गरीब जनता से प्राप्त किये गये आंकड़ों का विश्लेषण निम्न हैः-

क्या आप वर्तमान आय से अपनी जरूरत पूरी कर पाते हैं?


शामिल किये गये उत्तरदाताओं की औसत आय लगभग 100 रूपये है। फिर भी ये अपनी जरूरत को पूरा कर पाने में असमर्थ हैं अतः सरकार का यह दावा की ग्रामीण क्षेत्र में लगभग 22 रूपये कमाने वाला गरीब नहीं है के सरकारी दावों को प्राप्त उत्तर झुठला रहा है। 

क्या आपको जरूरत पूरी करने के लिए कर्ज लेना पड़ता है?

यदि हाँ, तो कर्ज कहाँ से लेते हैं?

अपनी जरूरत को पूरा करने लिये उत्तरदाताओं में से प्रत्येक कर्ज लेते हैं और कर्ज लेने के लिए वो स्थानिय महाजन को चुनते हैं। बैंक से ऋण नहीं लेने के कारण के रूप में उन्होंने बैंकों की ऋण प्रक्रिया का जटील व बैंक का असहयोगात्मक व्यवहार तथा बैंकों में व्याप्त घूसखोरी को माना।

क्या आपको भोजन संबंधी समस्या का सामना करना पड़ता है?

कुल 100 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने माना की उन्हे अब भी भोजन संबंधी समस्या का सामना करना पड़ता है। यह उत्तर दर्शाता है कि जब लगभग 100 रूपये की आमदनी वाला व्यक्ति वर्तमान समय में अपनी खाद्य जरूरत को पूर्ण नहीं कर पा रहा है तब महत 26 व 22 रूपये में व्यक्ति कैसे अपनी खाद्य जरूरत पूरा कर सकता है।

क्या सरकारी योजना शुरू होने से गरीबों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है?

उपर्युक्त उत्तर से स्पष्ट है कि सरकार के दावों के विपरीत सरकारी योजना शुरू होने से गरीबों की आर्थिक स्थिति में गरीबों के मुताबिक सुधार नहीं हुआ है। बिहार के ‘भूख’ नामक पत्रिका ने जब सर्वेक्षण किया तो पाया कि बड़े पैमाने पर सरकारी योजनाओं का लाभ गरीबों को नहीं मिल पा रहा है।

क्या आप गरीबी और भूख की समस्या का कारण बढ़ती मंहगाई को मानते हैं?

प्रश्न के उत्तर में 100 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने माना की उनकी गरीबी व भूख का मूल कारण मंहगाई है।

आप अपनी समस्या को किस माध्यम से सामने लाते हैं?

उपर्युक्त उत्तर से स्पष्ट  है कि मीडिया को अपने माध्यम के रूप में ग्रामीण गरीब जनता अस्वीकार करती है। अतः यह स्पष्ट हो जाता है कि मीडिया भले ही अपने लेखों से गरीब के हित की बात करे लेकिन गरीब उसे अपना माध्यम नहीं मानते।

क्या मीडिया के लोग आपसे कभी संपर्क करते हैं?

प्रस्तुत डाटा ग्रामीण गरीब में मीडिया की घटी हुई साख का उत्तर देती है। जब तक मीडिया के लोग गरीब से मिलेंगे नहीं तब तक गरीबी की वास्तविक स्थिति के बारे में कैसे जान पायेंगे या विश्लेषण कर पायेंगे।

क्या 33.33 रूपये और 27.20 रूपये को गरीबी रेखा के मानक बनाये जाने के सरकारी फैसले से आप सहमत हैं?

उत्तर से स्पष्ट है कि जनता सरकार के फैसले को 100 प्रतिशत मतों से नकार रही है।


निष्कर्ष

    नीति आयोग द्वारा 33.33 और 27.20 रूपये को गरीबी रेखा का आधार बनाना उचित नहीं जान पड़ता है। जब वर्तमान में लगभग 100 रूपये की आमदनी वाला व्यक्ति भी भोजन संबंधी समस्या से ग्रस्त है तब 33.33 और 27.20  रूपये अमदनी वाला व्यक्ति कैसे अपनी पोषण संबंधी जरूरत को पूरा कर सकता है। शोध अध्ययन में वाणिज्य मंत्रालय व योजना आयोग की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि सरकार मंहगाई, खाद्य समस्या और गरीबी के आपसी संबंधो को नहीं समझ पा रही है। वहीं मीडिया भी विज्ञापनदाताओं के दबाब में तर्कपूर्ण ढ़ंग से सरकार की इस नीति के विरोध को न्यायोचित स्वर नहीं उठा पा रही है।

    जब खाद्य पदार्थों के मुल्यों में लगभग 16 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई तो गरीबी रेखा के मानक को भी 33.33 से बढ़कर 37 रूपये होना चाहिये लेकिन मंहगाई दर के विपरीत नीति आयोग ने गरीबी रेखा का मानक क्रमशः 33.33   और 27.20 रूपये कर दिया। इससे स्पष्ट है कि सरकार गरीबी रेखा के मानक को न्यूनतम पोषण मानक प्राप्त करने से अलग मानती है। अर्थात सरकार के लिए गरीबी और भुखमरी दोनों का आपस में कोई लेना देना नहीं है जबकी सुप्रिम कोर्ट द्वारा नियुक्त एक सलाहकार समूह ने कुपोषण का मुख्य कारण गरीबी के कारण भोजन की कम मात्रा का लेना बताया है।

     भूख को बाजार ने अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने भूख और स्वास्थ्य का वास्ता देकर उपने उत्पादों को मंहगे दर पर बाजार में भर दिया है। यूनिसेफ और डब्ल्यू.एच.ओ. जैसे संगठनों ने भी अब बाजारवाद के समक्ष घुटने टेक दिये हैं तथा वे भी अब लाभ के लिए सक्रिय कम्पनियों को मुनाफा पहुँचा रहे है।

    सरकार ने गरीबी दूर करने संबंधी कई योजना को लागू किया और यह दावा किया कि गरीबी कम हो गयी है लेकिन कई सर्वेक्षण रिपोर्ट यह बताते हैं कि योजनाओं का लाभ संबंधित जनो तक सही अर्थों में नहीं पहुंच सका। इस दौरान मंहगाई की लगातार बढ़ने वाली प्रवृत्ति ने भी भुखमरी की समस्या को बढ़ाया तथा पिछले वर्षों में भूख से हुई मौत के साक्ष्य भी उपलब्ध हैं।

    मीडिया ने भी गरीबी और भुखमरी के मुद्दे पर अपने को हाई प्रोफाइल ही बनाये रखा तथा ग्रामीण गरीब जनता से इस मुद्दे पर बात करना उचित नहीं समझा। कभी प्रयास भी किया गया तो यह केवल महानगरों के गरीब तक ही सीमित रहा।  इस कारण मीडिया गरीबी और भुखमरी खत्म करने की दिशा में कोई महत्वपूर्ण कदम उठाने के लिए सरकार को बाध्य नहीं कर सकी। मीडिया ने अपनी बहस में भले ही दबाब पड़ने पर गरीबी को याद कर लिया हो लेकिन मीडिया ने आज भी ग्रामीण गरीब जनता से अपनी निश्चित दूरी कायम कर रखी है अतः गरीबी के मुद्दे पर सरकार मीडिया की बहस को लेकर गंभीर नहीं है।

सुझाव

सरकार को गरीबी और भूख दोनों को अलग करके नहीं देखना चाहिए। नीति आयोग को गरीबी के निर्धारण के लिए मानक बनाते समय मंहगाई दर को ध्यान में अवश्य रखना चाहिए। अच्छा तो यह होगा की गरीबी रेखा के मानक के रूप में मूल्य के जगह पहले वाली कैलोरी की नीति को ही फिर से लागू किया जाये। मीडिया पर भले ही विज्ञापनदाताओं का दबाब हो लेकिन मीडिया अपने उत्तरदायित्व के साथ न्याय करे । गरीब और भुखमरी के मुद्दे पर मीडिया अपने को हाईप्रोफाईल बनाने के बदले अपने को गांव की ओर ले चले।

संदर्भः-
पुस्तक सूची-
1. भल्ला जी. एस. - भारतीय कृषि - नेशनल बुक ट्रस्ट, 2011
2. श्रीकांत - राज और समाज - वाणी प्रकाशन, 2011
3. वैकल्पिक आर्थिक वार्षिकी-3- युवा संवाद प्रकाशन, नई दिल्ली 2018
पत्रिका सूची
1. आउटलुक 2. तहलका 3. सिटीजन पॉवर
समाचारपत्र सूची
1.      दैनिक हिन्दुस्तान 2. दैनिक जागरण

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