कविताएँ: संदीप नाईक

- संदीप नाईक

सी - 55, कालानी बाग़, देवास, मप्र, 455001 (चलभाष: +91 942 591 9221 - ईमेल: naiksandi@gmail.com)
जन्म: 5 अप्रेल 1967, महू (मध्य प्रदेश)। कविताएँ, कहनियाँ, आलेख प्रकाशित। वागीश्वरी सम्मान (2015)


प्रीतम घर नही आये

(स्व शोभा गुर्टू को याद करते हुए )

- 1 -
बेलगाम वह जगह है जहाँ भानुमति जन्मी थी
उन्नीस सौ पच्चीस में
बड़ी होती गई तो माँ मेनकाबाई शिरोडकर ने कहा कि
जब मैं नाचती हूँ तो सुनो
तुम्हारे कान में सुनाई देगी है धरती के घूमने की आवाज़
मंच को अपने पाँव से नाप दो
संसार को वह दो जो कोई नहीं दे सका
कभी अल्लादिया खान साहब की शिष्या रही मेनकाबाई अतरौली घराने की गायिका थी
जो बाद में घुंघरू बांध मंच पर समा गई

- 2 -
भानुमति ने जब माँ को घुंघरू से थिरकते देखा
अचरज में थी और देखती रही देर तक औचक सी
उस्ताद भुर्जी खान ने उसकी आँखों में नृत्य नहीं
संगीत का विशाल समंदर देखा
उसे लपक कर खींचा और सितार, पेटी,
तबले के सुरों में गूंथ दिया
यहाँ से उसकी ठुमरी, दादरा और
कजरी की शुरुआत हुई जो होरी पर जाकर खत्म हुई

- 3 -
बड़े गुलाम अली खाँ और बेगम अख्तर को
सुनकर भानुमति बड़ी हुई
बेलगाम से मुम्बई का सफर भी रोचक रहा
जब गाने लगी तो ऐसा गाया कि
कमाल अमरोही भी चकित थे
पाक़ीज़ा में गाया
बेदर्दी बन गए कोई जाओ मनाओ मोरे सैयाँ
पाकीज़ा और फागुन से शुरू हुए सफर में
कर्नाटक की लड़की मुम्बई में फिल्म फेयर ले बैठी

- 4 -
मैं तुलसी तेरे आँगन की में वह सैयाँ रूठ गए गाती रही
खूब गाया - खूब गाया दादरा, खूब गाई ठुमरी
मराठी में भी सामना और लाल माटी में गाती रही
बिरजू महाराज की संगत में गाया
मेहंदी हसन साहब की संगत में ग़ज़ल भी
संगीत नाटक अकादमी का पुरस्कार पाया
विश्वनाथ गुर्टू के घर आई तो भानुमति
शोभा बन गई उनके घर की - शोभा गुर्टू

- 5 -
एक दिन मेरे शहर के पुराने हॉल में
जब वह बहुत देर तक अपनी बंदिश सुना रही थी
एक खूबसूरत मिट्ठू रंग के हरी साड़ी पहने
जिस पर सफेद फुलकियाँ लगी थी
तीन संगत कलाकारों के साथ दादरा गा रही थी
पर जनता थोड़ी देर सुनती रही
यह वही शहर था जिसने कलाकारों को
सर पर चढ़ाया था - नजरों से गिराया था
बाशिंदे संगीत के मुरीद थे और गुलाम भी
जो संगीत समारोह सुनकर गर्दन हिलाते हुए
अहम और दर्द को घर छोड़ कर चले आते थे
उस दिन शोभा गुर्टू के दादरा में
किसी को रस नहीं आ रहा था
बाद में शोभा गुर्टू ने देखा कि
लोग उठकर जा रहे हैं तो वह गाने लगी
सावन की ऋतु आई रे सजनिया
खनकदार आवाज़ में कजरी सुनकर
बाहर खड़े लोग भी हॉल में आ गए
देर तक सुनते रहें जब तक नही गाई शोभा गुर्टू ने भैरवी
हिला नही जगह से कोई अपने
शोभा गुर्टू ने तीन घंटे सतत गाकर थकने की दुहाई दी
मंच से विदा लेते समय उनकी आँखों में अश्रु थे

- 6 -
अफसोस है कि मैं उसके बाद कभी
शोभा गुर्टू को आमने-सामने बैठकर नहीं सुन पाया
मुस्कुराता चेहरा और विरल दृष्टि के सघन अश्रु आज
मुझे याद आते है आज
जनता रूठ कर जाती है मंच को अपमानित कर
किसी भी गायक के दादरा, ठुमरी या कजरी गाने पर भी कोई लौटता नहीं हॉल में
भीड़ गायब है गायक जिंदा है
बाज़ार ने सुरों का धंधा ऐसा बुना है जो
सुर, साधना और तपस्या सब के ऊपर है
आज की गायिका जुगाड़ की पारंगत कलाकार,
सफल उद्यमी है जो सब बेच सकती है
ठुमरी, कजरा, दादरा, होरी या कबीर
आप क्या लेंगे श्रीमान
______

मिथ्या

(युवा कवि डॉ देवेश पथ सारिया के लिए)

नींद में याद आता है कि
खटका दबाना भूल गया
कमरे की बत्ती जल रही होगी
मोटर चल रही होगी बहुत तेज़
पानी टंकी से बहकर सड़क पर
आया होगा भीगता सा

टीवी चालू रह जाता है
गैस खुला रह जाता है
लेपटॉप खुला छोड़कर निकल जाता हूँ
दरवाजों पर लटका रहता है ताला
चाभी निकालना रह जाता है स्थगित
यह बढ़ गया है इधर कुछ दिनों में

जगहें भटकाव में ला देती है
रास्ते, पगडंडियाँ, झील, नदियाँ
समुंदर और जंगल शेष है दिलों दिमाग़ में
पूछता हूँ हर कही पगलाया सा
और रोज के अर्थहीन काम भूलता हूँ

पौधों को पानी नही दिया हफ्तों से
सफाई की नही कमरे की
अपनी किताबों की धूल नही झाड़ी
कपड़े पड़े है अवांगर्द से
पैदल नही चला बरसों से

घूमकर गया नही कभी अपने ही पीछे
अतीत के कोनों में बुझाई नही चिंगारी
दोस्तों से मिला नही खुले दिल से
कितना चूक रहा हूँ आहिस्ते आहिस्ते

अपने में जिंदा है कौन
यह बूझ पाना क्या मुश्किल है इतना
ये स्मृतियों के विलोप का समय है
कविता लिखकर याद रखना चाहता हूँ
______

केलुचरण महापात्रा की मूर्तियाँ

रास्ता तो हमने बनाया था
यक्षिणी वही थी एकांत में
बाट जोहती, कामातुर खड़ी थी
अजंता, कोणार्क या खजुराहो में

प्रेम में पड़कर ओरछा से लेकर
नदियों के तट तक और समंदर
कुओं से नालों, बावड़ियों नहरों में
हर जगह खड़ी ही मिली मुझे

दुख की आँख में सुनहले
स्वप्न लिए, हर बार पत्थर हो गई
लज्जा भूली और औचक ही रह गई
हर जगह मानो, प्रेम में सन्निपात हुआ हो
लकवा मार गया हो अंगों पर

बोल सकती तो कहती कली, केलि,
कमलिनी, ओडिसी नृत्य करते हुए
कुछ ना कहती तो निहारती रहती
प्रेम में अबोला रहना भी एक रस है
______


अदर्ज 


बाकी था नहीं कहने को
सुनने में सब ढह गया
विस्मृत होता तो कही दर्ज होता
छूटना तो तय ही था फिर भी

चलने में याद भी नही रहता
हड़बड़ी में स्वाभाविक है होना
गलियों के बीच जगह नही शेष
सड़कें दुहराव से भरी है

अतल पानी और आसमान
धरती के अनंतिम छोर
अपने ही बाये बाजू में बसे
दिल के बीच दूरी ना थी

दूर कही एक पगडंडी है
मेड़ के किनारे - किनारे
वहाँ कभी बहा होगा पानी
गीली यादें तस्दीक करती है

उस पेड़ से जंगल के खत्म होने तक
पसरा था तो प्रेम, जो दिखता नही था
______


अगढ़


दुख के इतने प्रकार थे
इतने आकार और पैमाने
कि प्रेम की हर फ्रेम में फिट थे

आहत और बेचारगी में प्रेम
अवसाद, तमस, सन्ताप में प्रेम
इतना कि एक दिन प्रेम भी ढल गया
एकाकार होकर विक्षप्त सा

साम्राज्य और विस्तृत हुआ
हर जगह अब प्रेम था, दुख नही
शाश्वत, बिलखता, दास्तान सुनाता
प्रेम को जानना आसान था
बजाय व्यक्त करने या स्वीकारने के

यह बात अभी कोहरे में
प्रेम में पगी बून्द ने कही।

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