लोगों के लिए विज्ञान और विज्ञान के लिए लोग

- अज़ीज़ राय

हम भारतीय प्रत्येक वर्ष 28 फ़रवरी को "रमन प्रभाव" की खोज की घोषणा की याद में राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाते हैं। भारत रत्न सर चंद्रशेखर वेंकट रमन (7 नवंबर 1888 – 21 नवंबर 1970) ने 28 फ़रवरी 1928 को "रमन प्रभाव" की खोज की घोषणा की थी। रमन सर विज्ञान क्षेत्र के पहले एशियाई और भारतीय भौतिकविद थे, जिन्हें सन 1930 में रमन प्रभाव की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार की घोषणा अनुसार राष्ट्रीय विज्ञान दिवस - 2019 का थीम विषय 'लोगों के लिए विज्ञान और विज्ञान के लिए लोग' है।

लोगों के जीवन को ख़ुशहाल और सुखमय बनाने में हर कदम पर विज्ञान सहयोगी है परन्तु उसका केवल तकनीकी और चिकित्सा के रूप में ही उपयोग किया जाता है। विज्ञान के अन्य प्रभावों को अनदेखा कर दिया जाता है फलस्वरूप इसका नुकसान भी मानव जाति को ही भुगतना होता है। इस तरह विज्ञान से लोगों के जीवन और समाज का सम्बन्ध जुड़ जाता है। चूँकि आमजन का अपने दैनिक जीवन में विज्ञान के योगदान और उसकी सामाजिक भूमिका से सम्बन्ध होता है इसलिए 'लोगों के लिए विज्ञान' क्या मायने रखता है वह यह भलीभांति जानता है। परन्तु 'विज्ञान के लिए लोग' क्या मायने रखते हैं। आमजन के लिए यह समझना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। क्योंकि वह यह बहुत अच्छे से जानता है कि विज्ञान में तो लोगों का मत और उसकी मत-शक्ति कोई मायने नहीं रखती है। तब फिर प्रश्न यह उठता है कि विज्ञान के लिए लोग क्या मायने रखते हैं?

“राजनीति के विपरीत विज्ञान, लोगों के मत द्वारा संचालित नहीं है।” ― भौतिकशास्त्री प्रो. लियोनार्ड सुसस्किंड (‘द ब्लैक होल वॉर: माय बैटल विथ स्टीफेन हॉकिंग टू मेक द वर्ल्ड सेफ फॉर क्वांटम मैकेनिक्स’ पुस्तक से)

विज्ञान के लिए लोग क्या मायने रखते हैं इससे जुड़ी एक विशुद्ध मानवीय अवधारणा (concept) है। इस अवधारणा के अनुसार चूँकि एक वैज्ञानिक सत्य एक विशेष प्रक्रिया (Process) और अनुभव के आधार पर मनुष्य द्वारा खोजा जाता है इसलिए सत्य और उसकी सुंदरता मनुष्य के अस्तित्व के बिना अर्थहीन है। यह अवधारणा मानव आश्रित सापेक्षीय सत्य पर आधारित होती है। जबकि इस अवधारणा के विपरीत एक अवधारणा मानवेतर यथार्थ सत्य के बारे में है। जिसके अनुसार मनुष्य के अस्तित्व का सत्य के स्वरूप और उसके अर्थ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। साधारण शब्दों में उदाहरण दिया जाये तो मानव जाति के अस्तित्व के बिना भी यह पृथ्वी, सूर्य की परिक्रमा वैसे ही लगायेगी जैसा कि वर्तमान में पृथ्वी, सूर्य की परिक्रमा करती है।

दार्शनिक बर्ट्रैण्ड रसेल, सैद्धांतिक भौतिकशास्त्री अल्बर्ट आइंस्टाइन, गणितज्ञ जैकब ब्रोनोव्स्की, भौतिकशास्त्री स्टीवन वेनबर्ग (Steven Weinberg), जीव-वैज्ञानिक जॉन डेसमंड बर्नाल और भौतिकशास्त्री स्टीफेन हॉकिंग ने समाज के सामने विज्ञान के उद्देश्य के बारे में अपने भिन्न-भिन्न मत रखे हैं, परन्तु अल्बर्ट आइंस्टाइन के शब्दों में विज्ञान का उद्देश्य - “विज्ञान, हमारे अनुभवों का समन्वय और उन्हें एक तर्कसम्मत व्यवस्था में समायोजित करता है।” अर्थात विज्ञान, मानव आश्रित एकरूप विश्व से मानवेतर यथार्थ विश्व को जानने का प्रयास करता है। सरल शब्दों में कहें तो विज्ञान के अंतर्गत हम व्यक्तिपरक से वस्तुनिष्ठ सत्य की ओर प्रवृत्त होते हैं। इस तरह से विज्ञान के लिए लोगों के अनुभव की आवश्यकता सिद्ध हो जाती है परन्तु इस शर्त के साथ कि वैज्ञानिक सत्य के लिए प्रस्तुत किया गया दावा व्यक्तिपरक न होकर वस्तुनिष्ठ होना चाहिए।

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