काव्य: प्रियांकी मिश्रा

प्रियांकी मिश्रा

ये जो तुम कहते हो न 


ये जो छोटे छोटे लाल फूल हैं न,
जंगल की आग कहते हैं इसको,
फागुन में दस्तक देते हैं,
आहट से ही इनकी,
हवा बौराने लगती है,
जंगल की आग मन पर भी,
फैलने लगती है चादर की तरह,
कहने लगती है असंख्य कथाएँ,
खंगालने लगती हैं अशेष स्मृतियाँ,
गीले हो जाते हैं नैनों के कोने तब,
लगता है किसी ने प्रस्तर रख दिया है
सीने पर, या खोद दिया हो एक
कुआँ, सीधे दिल के पार,
ये जिन्हें तुम छोटे छोटे लाल फूल कहते हो न,
ये पलाश हैं,
जो मौसम बदलते ही झड़ जाते हैं,
फिर अगले फागुन की प्रतीक्षा में,
ये मैं ही तो हूँ।

ये जो लंबे लंबे गाछ हैं न,
जंगल की शान कहते हैं इनको,
चिंरंतन अनंत की ओर ताकते,

पतझर में भी पत्तियाँ,
लाल, हरी, पीली, और न जाने,
रंग कितने सारे धरती हैं ये,
मौन पसारे इस अटल विस्तार में,
थाह पाना मुश्किल है इनका,
अंदर किसी के कौन झाँक सका है भला,
कल्पना से आकृतियाँ ही बनती हैं मात्र,
अजीब सी कशमकश में जिंदगी हो जैसे,
खेलती उंगलियाँ या मुखड़ा हो किसी गीत का,
ये जिन्हें तुम हरे हरे पत्ते कहते हो न,
ये शाल हैं,
जो हर मौसम में बदलेंगे रंग,
पर ताकते रहेंगे अपने ही स्थान से निरंतर,
ये तुम ही तो हो।

ये जो दूर तक काला काला दिखता है न,
हर पथिक की आस कहते हैं इसको,
आखिर तलक बढ़ता ही जाता,
हर मौसम से बेफिक्र,
हर आंधी से भी अनजान,
काला तो बस काला ही रह जाता है,
सारे रंग अवशोषित कर लेता ये,
आरंभ नहीं, कोई अंत नहीं,
चलने वाले को सुकून देना पेशा है इसका,

थोड़ी सी आसाँ करनी है डगर उनकी,
स्पंदनहीन होकर भी पीड़ा को समझता है जैसे,
काफिले की नुमाईश या अकेला ही चला हो कोई,
ये जिन्हें तुम काला-काला कहते हो न,
ये कोलतार है,
जो चढ़ा हर राह पर परतों में,
मुलम्मा हो जैसे हर मुसाफिर के सफर का,
ये जीवन ही तो है।

3 comments :

  1. Prakriti ke saunderya ka anterman avlokan aur atishay sunder vivechan

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  2. गहराई तक समाया हुआ है तुम्हारे भीतर पलामू का प्राकृतिक रूप। बेहद सुंदर भावना जिसे वही समझेगा जो तुम्हें समझता हो।प्यार

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