सम्पादकीय: सर्वे संतु निरामया:

अनुराग शर्मा
साथियों,

सेतु की तीसरी वर्षगाँठ पर आप सभी का हार्दिक अभिनंदन! सेतु के तीन वर्ष हमारे लिये आशा की एक किरण के समान हैं। जो कुछ भी अच्छा लिखा जा रहा है, उसे प्रकाशित कर सामने लाने का यह चत्वर स्थायित्व ले रहा है, यह हमारे लिये गर्व का विषय है।

इन तीन वर्षों में संसार में बहुत कुछ बदल चुका है। लेकिन कितना कुछ वैसा का वैसा ही है। दुःखद है कि भारत में आज भी कुपोषित बच्चे कच्ची लीची खाकर मर रहे हैं। कुपोषण और अशिक्षा के साथ-साथ यह समस्या प्रशासनिक अक्षमता की भी है। आज से हज़ारों साल पहले जिस भारत-भूमि ने दुग्ध और शाकाहार के आधार पर एक पूर्ण पोषण का वह सिद्धांत मानवता को दिया जो आज संसार भर में सराहा जा रहा है, वहाँ के नौनिहालों की ऐसी अकाल-मृत्यु असहनीय शोक का विषय है। दुर्भाग्य से ये दुखद घटनाएँ राजनीति का विषय बनकर रह जाती हैं। समाज और सरकार दोनों को ही इनसे सबक लेना चाहिये। व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा, और त्वरित लाभ के इस युग में भी यह आवश्यक है कि पारम्परिक वनस्पति, फल-फूलों की आम, इमली, अनार, अमरूद जैसी उन प्रजातियों को प्रोत्साहन दिया जाये जो शताब्दियों से प्रामाणिक हैं। भारतीय स्कूलों में मिड-डे मील योजनाओं की बात बहुत पढ़ने में आती है लेकिन लगता है वहाँ भी संतुलित पोषण पर और ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है। जिस देश में जल ही विलासिता का प्रतीक बन गया हो वहाँ निर्धन परिवारों के बच्चों को दूध जैसे लगभग सम्पूर्ण पोषण की मात्रा प्रदान करना कठिन भले हो लेकिन मिड-डे मील जैसे कार्यक्रमों के द्वारा उसे सुनिश्चित किया जा सकता है। देश भर में कुकुरमुत्तों की तरह उगी एनजीओ संस्थाओं में से छाँटकर वास्तविक जनसेवकों को चुनकर उनकी सहायता ली जानी चाहिये। केंद्र और राज्यों के स्वास्थ्य विभागों, और चिकित्सकों की जाग्रति भी आवश्यक है। लेकिन इन सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्रशासन को सचेत होना पड़ेगा। सिविल सर्वेंट्स को सर्वेंट शब्द का अर्थ समझने की ज़रूरत है और जन-प्रतिनिधियों को प्रतिनिधि शब्द का, तभी 'मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्' के उद्घोष वाली संस्कृति अपने जीवित होने की घोषणा कर सकेगी।

हाल ही में 6-7 साल की भारतीय बच्ची मेक्सिको सीमा से अपनी माँ के साथ अमेरिका में अवैध प्रवेश के प्रयास के दौरान एरिज़ोना के मरुस्थल में प्यास और लू लगने से मर गई। बच्ची का पिता शरणागति के आवेदन के साथ सन 2013 से अमेरिका में है। पंजाब में कितने ही लोग कैसे भी, खेत, ट्रैक्टर आदि बेचकर, कर्ज़-उधार लेकर, या अन्य तरीकों से अपराधियों को लाखों रुपये चुकाकर, कई बार मानवाधिकार के आधार पर पश्चिमी देशों में शरण पाने के लिये दमन और भेदभाव के झूठे आरोप लगाकर भी अपनी जान नृशंस अपराधियों के हवाले करने का जोखिम उठाते हैं। ऐसी भी घटनाएँ हुई हैं जहाँ अनपढ़ लोग जाली वीसा के सहारे यूरोप बताकर पाकिस्तान की फ़्लाइट में चढ़ा दिये गये।

इसी वर्ष देवामाता-2 नामक मत्स्य-नौका केरल में एर्नाकुलम के तट से अपनी क्षमता से कहीं अधिक कुल 243 लोगों को न्यू ज़ीलैंड में बेहतर जीवन दिलाने का सपना दिखाकर लापता है। केरल और पंजाब जैसे तथाकथित समृद्ध राज्यों में भी ऐसी गतिविधियों की उपस्थिति घातक है। मानव-तस्करी को माओवाद, जिहाद, नक्सलवाद आदि से अलग करके नहीं देखा जा सकता क्योंकि ड्रग्स, हथियार और मानव तस्करी करने वाले गिरोह सब एक ही हैं। जब तक ऐसे अपराध भारी आर्थिक लाभ का साधन बने रहेंगे, गिरोहबंदी चलती रहेगी। प्रशासनिक भ्रष्टाचार इस कोढ़ की खाज है। मानव तस्करी भारतीय उपमहाद्वीप का एक ऐसा बड़ा और संगठित अपराध है जिस पर पकड़ हर सरकार की उच्च प्राथमिकता होनी चाहिये। साथ ही यह समझने के प्रयास भी ज़रूरी हैं कि खाते-पीते घर के लोग किसी अज्ञात क्षेत्र में जाने के लिये झूठ बोलकर, पैसे लुटाकर, क्रूर अपराधियों के चंगुल में फँसने को बेताब क्यों हो जाते हैं।

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तीसरे वार्षिकाङ्क पर अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत कराते हुए हमारा उत्साहवर्धन करने के साथ-साथ हमारी कमियों के बारे में अवश्य बताइये ताकि हमारा प्रयास सार्थक हो।

शुभकामनाओं सहित, आपका


4 comments :


  1. अनुराग जी,

    सेतु पत्रिका का तीन वर्षों का यह सफर हिंदी साहित्य संसार के लिये संजीवनी के
    समान रहा है जिसने हिंदी जगत की एक बड़ी कमी को दूर किया है. आज एक ऐसा
    मंच विद्यमान है जिसमें एक विराट जनसमूह की सृजनशीलता को मुखर करने का
    अवसर उपलब्ध है. आपका एवं आपके सहयोगी बंधुओं का यह प्रयास सराहनीय है.
    जरूरत इस बात की है कि यह रथ रुके नहीं और यह साहित्य यात्रा समय से साथ अधिक
    प्रभावी हो सके.

    साथ ही आपने संपादकीय में अपने देश में कुपोषण से हुई त्रासदी का जिक्र किया है जो
    न केवल सामयिक एवं प्रासंगिक है अपितु हमारे दैश से जुड़ी अनेक विसंगतियों को उजागर
    करने में सक्षम है. इसमें कहीं न कहीं हम सभी की जिम्मेदारी बनती है अगर हम राष्ट्र का
    अर्थ ठीक से समझते हैं और साथ ही नागरिक के रूप में अपनी जिम्मेदारी भी. कभी इन मसलों
    पर भी परिचर्चा संभव हो सकती है.

    एक बार फिर आपके प्रयासों एवं सेतु के लिये शुभकामनाओं के साथ

    चन्द्र मोहन भंडारी

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  2. अनुराग जी , हेतु का जून अंक सामने है . आपके इस शानदार प्रयास के तीन वर्ष पूर्ण हो चुके हैं यह हर्ष की बात है और आपके लिये गर्व की भी .
    सम्पादकीय में आपने बहुत सारी समस्याओं पर आवश्यक प्रश्न उठाए हैं . यह सही हैं कि यदि सभी अपने पद और दायित्त्व का ध्यान रखें तो बहुत सी समस्याएं खत्म हो जाएं लेकिन अब यह बात बड़ी बेमानी लगती है . फिर भी कुछ लोग हैं जो लौ को जलाए हुए हैं सेतु इसी दिशा में एक प्रयास है .
    पढ़ रही हूं . लघुकथा पुत्रहीन बहुत अच्छी लगी .

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  3. अनुज अनुराग सेतु की तीसरी वर्षगाँठ पर आपको व इससे जुड़े सेतु परिवार को बधाई । हिन्दी भाषा स्थापित व ख्यात हो रही है ।बधाइयाँ पाठक वर्ग को भी ।
    संपादकीय में तकरीबन गंभीर समस्याओं की तरफ़ ध्यान आकृष्ट करवाया है । बहुत सारी समस्याएँ लापरवाही का नतीजा हैं ,वे विकराल रूप धारण कर लेती हैं । सिलसिलेवार घटनाएँ घट जाती हैं । छितरी - पसरी अव्यवस्था में कोई खास सुधार नहीं हो पाता । जड़ में हमारी बढ़ती संवेदनहीनता के अलावा सेवाभावना का ह्वास है । आपने बिल्कुल सही नब्ज़ पकड़ी है । विदेश में बसने का , रोजगार का सपना आज भी ग़रीब और मध्यवर्गीय भारतीयों का 'सपना' है । संपादकीय विचारणीय है ।
    शनै: शनैः अन्य चुनी हुई सामग्री पढूँगी जो सदा अच्छी लगती है ।

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  4. प्रिय अनुराग जी,
    सेतु की तीसरी वर्षगाँठ की अनेक बधाइयाँ।सेतु जुबलियाँ मनाये।कुपोषण और मानव तस्करी जैसे ज्वलंत मुद्दों पर
    संतुलित एवं सकारात्मक संपादकीय के लिए साधुवाद ।
    'गौरैया का जॊड़ा'--वीना जैन ---लता,पत्र,तरु जैसे हमारे मौन मित्र और गौरैये के जोड़े जैसे निकटतम पड़ोसी
    के माध्यम से पर्यावरण के प्रति हमारी चिंता के उन्मुखीकरण के रोचक एवं औत्सुक्यपूर्ण आयोजनक के लिए
    वीना जी को साधुवाद।
    महाभारत के कथा प्रसंग का आधुनिक परिप्रेक्ष्य से कलात्मक योग --'पुत्रहीन'।मृणाल आशुतोष की लधुकथा
    अच्छी लगी।
    विस्तारभय के कारण अभी इतना ही।।
    निष्कर्षतः,सेतु के सारे अंक रोचक और ज्ञानवर्धक होते हैं-को बड़ छोट कहत अपराधू...।
    इसका स्तर और इसकी वांछनीयता बनी रहेगी ऐसा दृढ़
    विश्वास है ।।
    धनेन्द्र प्रवाही।

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