प्रेमचंद और नोबल

अनुराग शर्मा
साथियों,

आज आधुनिक हिंदी के एक प्रमुख साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद का जन्मदिन है। हिंदी का शायद ही कोई पाठक हो जिसके सामने से उनकी कोई रचना कभी न गुज़री हो। मैंने भी उन्हें बचपन से पढ़ा, और बाद में उनकी कथाओं पर आधारित पहली ऑडियो बुक 'सुनो कहानी' के निर्माण में भी एक भूमिका निभाई। सेतु में भी समय-समय पर उनके संदर्भ आते रहे हैं। इस अंक के धरोहर स्तम्भ में हम उनकी एक अल्पज्ञात मार्मिक रचना 'शूद्रा' आपके अवलोकन के लिये प्रस्तुत कर रहे हैं।

प्रेमचंद का नाम आते ही अक्सर नोबल पुरस्कार की शिकायत भी सुनने में आती है। कवींद्र रवींद्रनाथ ठाकुर के बाद आज तक किसी अन्य भारतीय को साहित्य का नोबल न मिलने का बुरा मानना स्वाभाविक ही है। भारत उपमहाद्वीप के संदर्भ में हिंदी और उर्दू के लेखक प्रेमचंद इस पुरस्कार के प्रमुख दावेदार लगते हैं। लेकिन पाकिस्तान की बात करें तो प्रेमचंद की उर्दू विरासत की बात उस प्रकार नहीं होती है जैसे भारत में। वहाँ नोबल न मिलने की शिकायत अल्लामा इक़बाल के लिये की जाती है। भारतीय भाषाओं के लेखकों को नोबल पुरस्कार या अन्य अंतरराष्ट्रीय पहचान न मिल पाने का दोष कई लोग अंग्रेज़ी अनुवाद की कमी को देते हैं। क्या केवल अनुवाद ही इसका कारण है? एक सीमा तक हो सकता है लेकिन मुझे इसका पहला कारण साहित्यकारों तक पाठकों की पहुँच की कमी लगता है। यदि प्रेमचंद मेरी टेक्स्टबुक में न होते तो शायद मुझे उनके साहित्य की जानकारी भी न होती। यदि उनकी रचनाओं पर टीवी सीरीज़, या फ़िल्में न बनी होतीं तो क्या मैं उन्हें जान सकता था? यह बात न केवल प्रेमचंद बल्कि अन्य साहित्यकारों के बारे में भी सत्य है। भारत में, विशेषकर भारतीय भाषाओं के साहित्य समीकरण में सामान्य पाठक अनुपस्थित है। जो पढ़ते, सुनते, गुनते भी हैं, वे भी गहराई तक नहीं जाते। प्रेमचंद की बात छोड़ भी दें तो भी यह तो सोचना ही पड़ेगा कि एक सामान्य हिंदीभाषी का परिचय भारत के कितने अहिंदीभाषी साहित्यकारों से है, या एक सामान्य तमिळभाषी ने कितने हिंदी उपन्यासों का अनुवाद पढ़ा है।

दुःख की बात है कि भारतीय भाषाओं, विशेषकर हिंदी में, सामान्य पाठक तो दूर, तथाकथित बड़े भाषासेवकों तक की भक्ति बहुत सतही है। एक सरकारी पत्रिका के सम्पादक को सुदर्शन की कालजयी रचना 'हार की जीत' को लघुकथा बताते हुए सुना। जिस पत्रिका का नामकरण एक भक्तकवि के एक दोहे के अंश पर हुआ, उसकी स्थापना के दशक से भी अधिक समय बाद उसके संस्थापक को इंटरनैट पर बेताबी से उसी दोहे का शेष अंश ढूंढते पाया। सोशल मीडिया, फ़ेसबुक जैसे साधनों ने पाठक और लेखक के बीच की दूरी को मिटाया है। अच्छा साहित्य इन साधनों के सहारे कहीं आगे जा सकता है, लेकिन हुआ क्या? सोशल मीडिया ने विद्रूपता को बढ़ावा दिया है। कितने बड़े-बड़े नामों की छोटी हरकतें सरलता से सामने आ गयी हैं। सद्यख्यात शायर अपने घर में क्या करते थे यह किसी को पता नहीं था, लेकिन जब यूट्यूब पर एक महफ़िल के बीच सामान्य वार्तालाप में आप उन्हें माँ-बहन की गालियाँ देते हुये सुनते हैं तो अच्छा नहीं लगता। एक वरिष्ठ लेखिका द्वारा फ़ेसबुक पर अनुपस्थित एक अन्य लेखिका पर होती छींटाकशी को ईव टीज़िग कहे जाने पर यह चुटकी लेना कि 'किस उमर तक ईव-टीज़िंग मानी जाती है?' जैसे अनेक उदाहरण सामने हैं जो समस्या के दूसरे कारण की ओर ध्यान दिलाते हैं। वह दूसरा कारण है बुरा नेतृत्व। व्यक्तिपूजा और भक्ति-भाव भारतीय स्वभाव में रच-बस सा गया है और बहुत से लोग भारतीय जनमानस की इस सरलता का लाभ आसानी से उठा लेते हैं। वे स्वयंभू, नेता, साहित्यकार, गुरु, महापुरुष, आदि बन जाते हैं और सामान्यजन उनके आभामण्डल से प्रभावित होकर सुपात्रों से विमुख हो जाते हैं। और यह व्यवहार सामान्य पाठक का है, चटुकारों की बात तो अलग ही निराली है जो ऐसे परचमबरदारों की रहनुमाई की वकालत करते नज़र आते हैं। ये सामान्य उदाहरण सामने रखने का उद्देश्य आत्मावलोकन मात्र है - ताकि हम अच्छा लिखें, अच्छा पढ़ें, अच्छे बनें और अनुसरण केवल उन्हीं का करें जो मन-वचन-कर्म से अनुसरण योग्य हों। भारतीय परम्परानुसार भी हमें श्रेयस्कर को प्रेयस्कर से पहले अपनाने की ही शिक्षा दी गयी है -
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः। 
श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते॥ (कठोपनिषद 1.2.2)

विवेक से काम लीजिये। सामान्यजन की भाषा की कमियों की उपेक्षा की जा सकती है, लेकिन शब्दों के जादूगरों की भाषा या उद्गार में कमी, घृणा, या द्वेष, की उपेक्षा नहीं की जा सकती। सामान्य वार्ता-व्यवहार में बाहर आने वाले उनके शब्द उनके वास्तविक व्यक्तित्व को उजागर करते हैं। भावुकता और संवेदना में अंतर है। ममता और करुणा, दो अलग बातें हैं। हर बात पर प्रतिक्रिया देना आवश्यक नहीं है लेकिन फिर भी जहाँ बोलना आवश्यक हो, हमें अपने स्वार्थ और तात्कालिक लाभ के साथ-साथ अन्य व्यक्तियों के आभामण्डल से प्रभावित हो जाने की कमी से भी बचना होगा। अच्छा साहित्यकार, प्रबंधक, या नेता होना अच्छी बात है, लेकिन निर्मल व्यक्ति होना इनसे कहीं अधिक वाञ्छित होना चाहिये।

रवींद्रनाथ और प्रेमचंद, दोनों की बात आने पर बांग्ला में आनंदमठ प्रसिद्धि वाले बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का नाम भी सामने आना स्वाभाविक है। उनका जन्मदिन 26 जून 1838 को था। ध्यान दीजिये कि हममें से कितनों को याद रहा और प्रकाशन-प्रसारण के कितने माध्यमों ने हमें याद दिलाया? याद की बात पर मुझे 'वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा' की याद आयी और साथ ही याद आया एक और जन्मदिन, और उससे जुड़े दो महापुरुष - लोकमान्य बालगंगाधर टिळक, तथा चंद्रशेखर आज़ाद। इन दोनों स्वातंत्र्य-वीरों का जन्मदिन 23 जुलाई को पड़ता है, इन्हें नमन।

... और अंत में, जुलाई महीने का आरम्भ डॉ. कुँवर बेचैन के जन्मदिन से हुआ है। उन्हें भी जन्मदिन की शुभकामनाएँ, इस अंक में उषा राजे द्वारा प्रस्तुत एक संस्मरण द्वारा।
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जुलाई 2019 अङ्क आपको समर्पित है। पढ़कर इसके बारे में अपनी राय बताइये।

शुभकामनाओं सहित,
आपका

6 comments :

  1. अनुराग जी,
    प्रेमचंद एवं उन जैसे अन्य रचनाकारों को नोबेल से सम्मानित न किया जाना शायद उतना दुं;खद व दुर्भाग्यपूर्ण नही जितना अपने ही लोगों द्वारा रचना की गुणवत्ता की अनदेखी और उपेक्षा. प्रेमचंद आज भी करोड़ों भारतीयों के ह्रदय में हैं पर क्या हम अपने ही मध्य लेखकीय रचनाधर्मिता व गुणवत्ता को पहचान उसे प्रोत्साहित करने की क्षमता रखते हैं और क्या ऐसा बुनियादी ढांचा हमारे पास है? इन अहम मुद्दों पर सेतु के ही माध्यम से चर्चा होती रही है पर उसमें कितनी भागीदारी रही है? फिर भी आपने समय-समय पर इन मुद्दों को अपने संपादकीय में स्थान दिया है जो इस दिशा में आपकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है. कुछ सीमा तक आपने इनका उत्तर भी दिया है.
    परिवेशीय सृजनशीलता के अपने लेख में मैंने इन्हीं कुछ बिंदुओं पर प्रकाश डालने का प्रयास किया पर मुझे केवल आपकी की प्रतिक्रिया मिल सकी. साहित्लेय-प्क्तोंरमियों के मध्य वैचारिक सेतु को प्रभावी बनाने की जरूरत है और यह पत्रिका वह काम कर रही है यह संतोषप्रद है.


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  2. प्रिय अनुराग जी,
    स्नेहिल नमन!
    आपकी संपादकीय वैचारिकी से ओतप्रोत है.कथा सम्राट प्रेम्चंद के लिए गंभीर चैंतनिक तर्ककों के साथ नोबेल की मांग वाज़िब है.आप में एक और बडी बात है कि याद रखने लायक को भूलते नहीं हैं और नालायक को कभी याद नहीं करते हैं ,"रवींद्रनाथ और प्रेमचंद, दोनों की बात आने पर बांग्ला में आनंदमठ प्रसिद्धि वाले बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का नाम भी सामने आना स्वाभाविक है। उनका जन्मदिन 26 जून 1838 को था। ध्यान दीजिये कि हममें से कितनों को याद रहा और प्रकाशन-प्रसारण के कितने माध्यमों ने हमें याद दिलाया? याद की बात पर मुझे 'वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा' की याद आयी और साथ ही याद आया एक और जन्मदिन, और उससे जुड़े दो महापुरुष - लोकमान्य बालगंगाधर टिळक, तथा चंद्रशेखर आज़ाद। इन दोनों स्वातंत्र्य-वीरों का जन्मदिन 23 जुलाई को पड़ता है, इन्हें नमन।"
    आपकी इस जीवटता को नमन!

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  3. "अनुसरण उसी का करें जो मन, वचन,कर्म से अनुसरण योग्य हो।" बिल्कुल सही ।
    संपादकीय पढ़कर बहुतअच्छा लगा । सादर आभार 🙏

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  4. "अनुसरण उसी का करें जो मन, वचन,कर्म से अनुसरण योग्य हो।" बिल्कुल सही ।
    संपादकीय पढ़कर बहुतअच्छा लगा । सादर आभार 🙏

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  5. अनुराग जी , नमस्कार,
    अनाम सी अज्ञात कहानी शूद्रा को यहां देकर अपने प्रेमचन्द जी को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की है . उनकी बहुत सारी कहानियां इसी तरह दुखांत हैं. यथा्र्थ और आदर्श का संगम भी .
    आपने यह सही कहा है कि सोशल मीडिया ने विद्रूपता को बढ़ाया है . सम्पादकीय विचारणीय है .

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  6. आपकी संपादकीय सबसे पहले पढ़ती हूँ,आपके विचारों को हर बार सादर नमस्कार।

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