सम्पादकीय: वृष्टि पड़े टापुर टूपुर

अनुराग शर्मा
वर्षा ऋतु, चौमासा - उसमें भी अगस्त मास भारतीयों के लिये बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि 15 अगस्त 1947 को वह बहु-प्रतीक्षित पूर्ण स्वतंत्रता मिली जिसे हम तक पहुँचाने के लिये स्वातंत्र्य-वीरों ने अनेक कष्ट सहे और कितने हुतात्माओं ने अपने प्राण भी त्याग दिये। 18 अगस्त के दिन एक दुर्घटना में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का देहावसान हुआ। उनके जापानी सहयोगी टोक्यो के रेनकोजी मंदिर में रखे उनके अवशेषों की उपस्थिति में हर वर्ष इस दिन को किसी देवात्मा के निर्वाण की तरह समारोहपूर्वक मनाते हैं। 'तोक्यो में एक दोपहर नेताजी के साथ' शीर्षक से जापान में रह चुके पत्रकार मित्र मुनीश शर्मा हमारे लिये लेकर आये हैं, ऐसे ही एक समारोह की झलकियाँ और आज़ाद हिंद फ़ौज के कुछ जापानी सैनिकों के शब्द।

आज़ादी की बात चलने पर कश्मीर की बात चलना स्वाभाविक है। यथार्थ से नितांत अपरिचित जम्मू-कश्मीर के महाराजा और तिब्बत के सम्राट हरिसिंह ने आगत में तिब्बत और बलोचिस्तान को खाने वाली चीन और पाकिस्तान जैसी तानाशाहियों के बीच बसे स्विट्ज़रलैंड जैसे एक स्वतंत्र राज्य का सपना तो देखा लेकिन पाकिस्तान के आक्रमण को झेल न सके। देखते-देखते एक-तिहाई राज्य में पाकिस्तानी हमले, लूट और भयानक नरसंहार होने पर अंततः सम्पूर्ण राज्य का भारत में शर्तहीन विलय किया। कानूनी विलय प्रपत्र के बाद अन्य भारतीय राज्यों की तरह जम्मू-कश्मीर भी वैधानिक रूप से भारत में ही रहा लेकिन राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव में राज्य विदेशी कब्ज़े, आतंकवाद, साम्प्रदायिक द्वेष, और राजनैतिक अस्थिरता जैसी समस्याओं से जूझता रहा है।

भारत में भाषा और भूगोल के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन कोई नयी बात नहीं है, होता रहा है, शायद भविष्य में भी होगा। अब राज्य के विभाजन और केंद्र-शासित प्रदेश बनने के बाद जहाँ जम्मू-कश्मीर और लद्दाख सहित अधिकांश भारतीय नागरिकों के मन में उत्साह है वहीं पाकिस्तान अति-क्रोधित है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा जम्मू-कश्मीर राज्य से अपनी सेनायें हटाने के स्पष्ट अनुरोध के बावजूद पाकिस्तान, गिलगित, बाल्टिस्तान से लेकर तथाकथित 'आज़ाद' कश्मीर तक न केवल अपना कब्ज़ा बनाये रहा बल्कि पाकिस्तानियों को वहाँ बसाकर भविष्य में होने वाले किसी भी संभावित जनादेश को अपने पक्ष में प्रभावित करने में दिलोजान से लगा रहा है। और तो और, पाकिस्तान ने सीमा के इस ओर की जनसंख्या को भी आतंकवाद, हत्या और पलायन द्वारा लगातार प्रभावित किया है। इतना ही नहीं खुद ही हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर कश्मीरियों की इच्छा की बात करने वाला देश निरंतर 'कश्मीर बनेगा पाकिस्तान' का नारा ही लगाता है। राज्य के हिमायती दिखने की पाकिस्तानी पोल तब ही खुल गयी थी जब उसने राज्य का कुछ क्षेत्र राजमार्ग के निर्माण के लिये चीन को खैरात किया था।

मित्रों, यह संयम से काम लेने का समय है। दुःख की बात यह है कि प्रतिदिन परमाणु युद्ध की धमकी देने वाले पाकिस्तान में संसारभर में समाप्त हो चुकी पोलियो की बीमारी पोलियो के टीके के हराम होने जैसी घातक अफ़वाहों के चलते अभी भी पनप रही है। अफ़वाहें अक्सर मानवता की शत्रु होती हैं। हमारी प्रतिक्रियाएँ और उनकी अभिव्यक्ति महत्वपूर्ण हैं लेकिन सत्य देखना और विवेक से काम लेना हमेशा की तरह इस समय भी आवश्यक है - सत्यमेव जयते!

11 सितम्बर भी निकट है। ट्विन टॉवर्स पर हुआ हमला संसार की सबसे बड़ी आतंकवादी घटनाओं में से एक है। यह इस बात का स्मारक भी है कि घृणा और कट्टरता किस प्रकार समृद्धि, शिक्षा और क्षमता से सम्पन्न युवाओं को भी अविवेकी, क्रूर और नृशंस बना सकती है। इस घटना के बाद तो हमने बहुत कुछ देखा है। अमेरिकी सैनिक कार्यवाही और भारतीय निर्माण सहयोग से अफ़गानिस्तान फिर से उठ खड़ा हो रहा है। लेकिन तालेबान और साम्प्रदायिक आतंकवाद के समर्थक और उनकी विचारधारा कमज़ोर भले हुए हों, अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। इस दिशा में अभी बहुत कार्य होना बाकी है। प्रसन्नता की बात यह है कि एक पाकिस्तान के अपवाद के अतिरिक्त सभी पड़ोसी देशों के साथ भारत के सम्बंध सौहार्दपूर्ण हैं।

दूसरी प्रसन्नता की बात उच्च-तकनीकी क्षेत्रों में भारतीय प्रगति है। अंतरिक्ष-खोज के क्षेत्र में हम चंद्रयान-2 तक पहुँचे हैं, और इस समय गूगल तथा माइक्रोसॉफ़्ट जैसी शिरोमणि संस्थाओं के प्रमुख भारतीय हैं। यह सही है कि औद्योगिक क्रांति में हम पीछे थे, लेकिन भारतीय संस्कृति सदा से सिद्धांत, शिक्षा, समन्वय, और विचार की संस्कृति रही है। निर्माण में हम कम नहीं लेकिन औद्योगिक क्रांतियों में जिस प्रकार दासत्व, शोषण, तानाशाही तथा अन्य प्रवृत्तियों का बोलबाला रहा है, वे 'सत्यमेव जयते' के हमारे राष्ट्रीय चरित्र से कम मेल खाती हैं, इसलिये उस क्षेत्र में चीन जैसी दमनकारी कम्युनिस्ट तानाशाहियों से हमारी तुलना किया जाना सही नहीं है।

सोनिया तनेजा अमेरिका के पश्चिमी प्रांत कैलिफ़ोर्निया में हिंदी शिक्षण के कार्य में लगी हैं। पिछले दिनों, सेतु से उनकी नयी पुस्तक प्रकाशित हुई है - Basic Hindi 2 Workbook: मूल हिंदी 2 कार्यपुस्तिका

इसके अतिरिक्त सेतु के अंग्रेज़ी संस्करण के सम्पादक डॉ सुनील शर्मा की अंग्रेज़ी कथाओं का संस्करण - Ps-Fs: Prompts and Fictions भी इस माह सेतु से प्रकाशित हुआ है।

ये दोनों पुस्तकें पेपरबैक और किंडल स्वरूपों में ऐमेज़ॉन पर उपलब्ध हैं। युवा लेखक और वैज्ञानिक चिंतन के प्रवर्तक अज़ीज़ राय सेतु में लिखते रहे हैं। उनकी पुस्तक "आग से अंतरिक्ष तक" भी सेतु द्वारा प्रकाशित की जा रही है और निम्न लिंक पर उपलब्ध है: https://www.amazon.in/dp/B07XBVQNBW/

22 अगस्त को प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई का जन्मदिन होता है, इस उपलक्ष्य में उनकी रचना 'पवित्रता का दौरा' इस अंक में प्रस्तुत की जा रही है। अगस्त और सितम्बर के कुछ उल्लेखनीय जन्मदिन नीचे दिये हैं:

1 अगस्त 1939 गोविन्द मिश्र
3 अगस्त 1886 मैथिलीशरण गुप्त
8 अगस्त 1915 भीष्म साहनी
17 अगस्त 1916 अमृतलाल नागर
18 अगस्त 1950 प्रभु जोशी
19 अगस्त 1907 आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
22 अगस्त 1924 हरिशंकर परसाई
26 अगस्त 1891 आचार्य चतुरसेन शास्त्री
28 अगस्त 1929 राजेंद्र यादव
30 अगस्त 1903 भगवती चरण वर्मा
31 अगस्त 1919 अमृता प्रीतम
18 सितम्बर 1906 काका हाथरसी
23 सितम्बर 1908 रामधारी सिंह दिनकर

भारतीय सांस्कृतिक सम्बंध परिषद (ICCR) की द्वैमासिक पत्रिका ‘गगनांचल’ के ‘अमेरिका और कनाडा हिंदी लेखन विशेषांक’ के भारतीय उपदूतावास, न्यूयॉर्क में हुये भव्य लोकार्पण के लिये अमेरिका पधारे डॉ. हरीश नवल से एक भेंटवार्ता भी इस अंक में प्रस्तुत है।

हिंदी भाषा और लेखन के लिये 'आओ हिंदी सीखें' शृंखला के साथ एक अन्य आलेख 'ता ता थैया' भी इस अंक में है। कविता, कहानी, शोधपत्र, समीक्षा, आदि सहित अन्य सभी सामग्री तो है ही। उत्तम लेखन को प्रोत्साहित करने के लिये आपका हार्दिक आभार, कृपादृष्टि बनाये रखिये।

शुभकामनाओं सहित,
आपका

2 comments :

  1. चन्द्रमोहन भंडारीSeptember 1, 2019 at 12:43 PM

    अनुराग जी,

    संपादकीय में आपने अगस्त मास से जुड़े लगभग सभी महत्वपूर्ण सामयिक पहलुवों को छुवा है. स्वातंत्र्योत्तर दशकों में भारत एक नयी ऊर्जा के साथ आगे बढा जिसमें चंद्रयान के सफल प्रक्षेपण का जिक्र भी आपने किया. हमारी कामना है चंद्रमा पर उतरने का अंतिम चरण ( soft landing) भी सफल रहे.

    हरिशंकर परसाई जी के लेखन की एक झलक लम्बे अर्से के बाद देखने को मिली.जीवन की विसंगतियों एवं विडम्बनाओं की प्रस्तुति व्यंग्य में ही संभवत: इतनी प्रभावी हो सकती है. एक व्यंग्यकार के रूप में उनका स्थान हिंदी संसार में अद्वितीय है.
    सुंदर संपादकीय के लिये धन्यवाद.

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    1. चंद्रमोहन जी,
      आप सरीखे अनुभवी विद्वान से निरंतर मिलता प्रोत्साहन सेतु की प्रेरणा है।
      धन्यवाद

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