जंगलराज की कहानी ‘जंगल जहाँ शुरू होता है’

- मनीष कुमार गुप्ता

शोधार्थी (हिन्दी विभाग), अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय
चलभाष: +91 838 201 8200; ईमेल: manishg808@gmail.com


एक तरफ डाकू दूसरी तरफ पुलिस और नीचे इंतजार करते सेठ, महाजन, पूर्वजमींदार, ठेकेदार तथा इन सबके बीच में झूलते हुए आम इंसानों की मन विचलित कर देने वाली यथार्थ कहानी को लेकर बारह वर्षों तक अथक परिश्रम, क्लिष्ट शोध, दुर्बोध जिज्ञासा, दुर्निवार संकल्प के परिणाम स्वरूप दुर्गम, दुरुह, असाध्य जंगल एवं उसके निवासियों को आधार बनाकर सुप्रसिद्ध कथाकार संजीव द्वारा लिखा गया उपन्यास ‘जंगल जहाँ शुरू होता है’ सन् 2000 में प्रकाशित हुआ; जिसे इंदु शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा दिया जाने वाला प्रतिष्ठित ‘यू.के. साहित्य सम्मान’ से सम्मानित किया जा चुका है। यह एक अरण्यगाथा है, जिसमें मनोरता, भयावहता के साथ-साथ जुगुप्साकारी तत्त्व विद्यमान हैं। इस उपन्यास में आदिवासियों के शोषण, उत्पीड़न, दरिद्रता आदि को केंद्र में रखा गया है। लेखक ने इस उपन्यास में अनछुए पहलुओं को आधार बनाकर इनको सामने लाने का सार्थक प्रयास किया है, इसलिए इनके बारे में कहा गया है, “संजीव के उपन्यासों का कथ्य मौलिक और अछूत संदर्भों को उजागर करता है। वे किसी व्यक्ति की कहानी कहने की अपेक्षा किसी अंचल संदर्भ या समस्या को व्यापक धरातल पर व्याख्यायित करते हैं।”1

संजीव आदिवासीजनों की सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षणिक समस्याओं और शोषण आदि से उत्पन्न घृणा, संघर्ष, असंतोष को आधार बनाकर अपने उपन्यासों का कथानक बुनते हैं तथा जीवंत दस्तावेज़ को यथार्थ रूप में प्रस्तुत करने का सार्थक प्रयास करते हैं। इनके उपन्यास किसी व्यक्ति की कहानी कहने की अपेक्षा किसी विशेष अंचल की समस्याओं और अछूते-पहलुओं को उद्घाटित करते हुए, वहाँ की जन-जीवन, संस्कृति-सभ्यता को जीवंत रूप में सामने लाते हैं। ये उस क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक संदर्भों को गहराई से चित्रित करते हैं, इसलिए इनके बारे में प्रसिद्ध विद्वान सृजन ने कहा है, “देश से ज्यादा यह वंचित वर्ग के बारे में लिखता है, सामाजिक उत्पीड़न, मानवीय जलालत, धार्मिक तिरस्कार, आर्थिक असमानता के खिलाफ़ लिखता है। यह साम्यवादी पार्टियों में आस्था रखता है उसके प्रचार-प्रसार के लिए तन, मन, धन से जुड़ा रहता है।”2

उपन्यास की शुरुआत इस क्षेत्र के डी.एस.पी. कुमार से होती है जो अपने बाबूजी, माँ, पत्नी अनीता और बेटा मयंक से विदा लेकर इस क्षेत्र में डाकू उन्मूलन अभियान ‘ऑपरेशन ब्लैक पाइथॅन’ में डाकुओं के सफाये के लिए आते हैं। यहाँ आते ही उन्हें एक बोर्ड दिखाई देता है, जिस पर एक अजगर बनाया गया है। “बोर्ड पर एक चित्र अंकित था- जबड़े फैलाए एक भयानक काला अजगर और उसकी आँतों से लेकर जबड़े तक में समाए बेशुमार इनसान।”3 यह केवल एक बोर्ड ही नहीं था, यह मिनी चंबल को पूर्णरूपेण प्रदर्शित करता मानचित्र था, जिसको अजगर रूपी अपराध पूरे समाज को अपने आगोश में ले लिया था या धीरे-धीरे लील रहा था।

यह ‘मिनी चम्बल’ के नाम से विख्यात पश्चिम चम्पारण को केंद्र में रखकर लिखा गया उपन्यास है। पश्चिम चम्पारण बिहार राज्य का सबसे पश्चिम में एक जिला है जो पश्चिम में उत्तर प्रदेश के कुशीनगर और उत्तर में नेपाल से लगा हुआ है। यहाँ नदियाँ, पर्वत, जंगल सभी प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध है । यहाँ की मिट्टी अधिक उपजाऊ है। यहाँ धान, गेहूँ, गन्ना, मक्का आदि फसलों की अच्छी पैदावार होती है परंतु बरसात में एक तरफ नदियाँ सभी फसलों को बाढ़ में बहा ले जाती है तो दूसरी तरफ डाकू डकैती द्वारा लोगों की जिंदगी बर्बाद कर देते हैं। यहाँ अपराध अपने चरम पर है। कहीं पुलिस तो कहीं नेता सब साँठ-गाँठ से जनता को लूट रहे हैं। “उपन्यास केंद्र में है ‘मिनी चम्बल’ के नाम से जाने जाने वाला पश्चिम चम्पारण, जहाँ अपराध पहाड़ की तरह नंगा खड़ा है, जंगल की तरफ फैला हुआ है, नदियों में दूर-दूर तक बह रहा है, इतिहास के रंध्रों से हवा में घुल रहा है, भूगोल की भूल-भुलैया में डोल रहा है। जनजातियों और जंगली जीवों के बिन्दु से शुरू होकर यह जंगल फैलता ही चला गया है- पटना, लखनऊ, दिल्ली, नेपाल और देश-देशांतर तक।”4

उपन्यास का मुख्य उद्देश्य समाज में फैली भ्रांतियाँ, सामाजिक, आर्थिक राजनीतिक, जनतांत्रिक समस्याओं के परिणाम स्वरूप डाकू बनने पर मजबूर हो जा रहे हैं या कष्टकारक जीवन जीने को मजबूर हैं। बिसराम अपनी लड़की के मर जाने पर विलाप करते हुए वहाँ की यथार्थ एवं दारुल स्थिति का वर्णन करता है, “हमार तो हर तरीका से मौवत लिखल बा, ए बेटी! जिमींदार से, डाकू से, देवता-पिता से भूत भवानी से पुलिस लेखपाल से, भूत-भवानी से, पुलिस-लेखपाल से...”5

इस अनुसंधान और संवेदनशील उपन्यास में कहीं लगता है कि इसका नायक पुलिस उपाधीक्षक कुमार है तो कभी लगता है कि मुख्य नायक काली है। परशुराम, परेमा, मुरली पांडेय, बिसराम, मलारी, मंत्री, आदि मुख्य पात्र हैं तो वही सिन्हा साहब, भंडारी, जायसवाल, सुन्नर पांडेय, ललन सिंह, नोनिया, लंगड़, पारबती, शम्सुल खाँ, जोगी, गोकुल, बिन्दा, इस्लाम, चन्द्रदीप सिंह आदि गौण पात्र हैं। प्रत्येक घटना कुमार और काली के ईद-गिर्द घूमती रहती है।

इस डाकू उन्मूलन अभियान ‘आॅपरेशन ब्लैक पाइथॅन’ को चार जोन ए.बी.सी.डी. में बाँटा गया है जिसके चार इंचार्ज है जिसमें ए. जोन के आॅपरेशनल इंचार्ज मिस्टर पी.के. भंडारी, बी. जोन के ऑपरेशनल इंचार्ज मिस्टर एन.पी. सिंह, सी. जोन के ऑपरेशनल इंचार्ज मिस्टर आर. पांडेय, जोन के ऑपरेशनल इंचार्ज मिस्टर बी. कुमार। डी. जोन के ऑपरेशनल इंचार्ज डी.एस.पी. कुमार का तालुक एक मध्यम परिवार से है। वह अपने पढ़ाई और परिश्रम से इस पोस्ट तक पहुँचा है। “एक मामूली मास्टर का लड़का है तो क्या हुआ! बिन किसी पैरवी के आ तो गया पुलिस उप-अधीक्षक की पोस्ट पर! आगे प्रमोशन नहीं मिल पा रहा है, जातिवाद के चलते, नहीं, ठीक जातिवाद भी नहीं, पैरवी न होने के चलते... मगर कब तक रुकेंगे? आखिर तो उन्हें उसकी सत्ता को स्वीकार करना पड़ा न! पचीसों अफसरों में से इस जोन से सिर्फ उसे चुना गया इस जोखिम भरे अभियान के लिए।”6 कुमार हष्ट-पुष्ट शरीर से युक्त आकर्षक इंसान है जो दूर से देखने में ही सबके नजर में आ जाता है। जिसके बारें में उपन्यास में इस प्रकार बताया गया है-  “छह फीट की गोरी, सुंदर, स्वस्थ काया, आग-सी धधकती उम्र और कुछ कर गुजरने की तमन्ना-इस पर चुनौती जब डाकुओं से दो-दो हाथ करने की हो तो क्या करने। सीधे फिल्मों या गाथाओं से निकलकर आ रहा था, मानो वह।”7

कुमार एक तेज तरार अधिकारी है जो मंत्रीजी के घर उनकी बेटी की शादी में छुपे तीन में से दो डाकुओं को मार गिराता है। जिस पर मंत्री दुबेजी उसे मेडल दिलाने के लिए अपने साथ दिल्ली ले जाते हैं। वह अपने लिए सिफारिस नहीं लगवाता है, न ही किसी वैसे घराने से है जिससे उसे वह पद या पुरस्कार मिल पाए जिसके वह योग्य है। वह कोशिश करता है कि किसी निरपराधी को सजा न दिलवाए या उसे परेशान ना करे, परंतु बाद में वह भी और पुलिसवालों के समान कुछ समय के लिए बहक जाता है लेकिन बाद में संभल भी जाता है। वह ऐसा अधिकारी है जो निहत्था काली और अन्य डाकुओं से मिलने का हौसला रखता है। वह डाकुओं के मन को बदलना चाहता है। वहीं खून-खराबे को शांत तरीके से निपटाना चाहता है। इसलिए डाकू को समर्पण करने के लिए प्रेरित करता है। वह काली से जब जंगल में मिलता है तो उसे दो पुस्तक गिफ्ट करता है तथा उससे आत्मीयता प्रकट करता है। वह एक तरफ से डाकू के खात्मे के लिए संघर्ष करता है तो दूसरी तरफ खुद अपने आपसे संघर्ष करता है। डाकू उससे डरते हैं, नेता भी घबराने लगे हैं। वह गरीबों, आदिवासियों पर हुए अत्याचार का प्रतिरोध करता है तथा कोशिश करता है कि उन पर अब कोई अत्याचार ना हो।

इस उपन्यास का दूसरा नायक काली है जो कालिया, काली से काली सरदार तक का सफर अनेक घटनाओं, अत्याचारों को सहन करके प्रतिक्रिया स्वरूप बना है। कई विद्वानों ने माना है कि कोई पेट से डाकू बनकर पैदा नहीं होता है उसे समाज एवं वहाँ की परिस्थितियाँ डाकू बनने पर मजबूर कर देती है। “यह उपन्यास भी एक समाजशास्त्री अध्ययन है, जिसके मूल में लेखक की यह भावना है कि कोई भी जाति जन्मना डाकू नहीं होती। वस्तुतः व्यवस्था ही किसी व्यक्ति या जाति को डाकू बनने पर मजबूर करती है।”8 काली एक सामान्य युवक था जो मजदूरी करके अपने बड़े भाई बिसराम एवं भाभी के साथ जीवन यापन करता था। उसकी शादी हो चुकी थी, परंतु गौना ना होने कारण पत्नी अपने मायके में ही रह रही थी। हर जगह उसके साथ अत्याचार होता रहता है। कोई मजदूरी नहीं देता तो कोई पैसा हड़पकर मारके भगा देता है; पर वह अपने भाग्य को कोसते हुए सहन कर लेता है। जब ठेकेदार सुलेमान खाँ को डाकू परशुराम को बिना कार्य के पंद्रह हजार देते देखता है तो रोष व्यक्त करते हुए कहता है, “हक की कमाई माँगने पर ठेकेदार के पास पैसे नहीं है और हराम की कमाई डकारनेवाले दुराचारी लूटेरे परशुराम के लिए पंद्रह हजार! आग घुल रही है काली के मन में। क्या वह इन हरामखोरों की बेगार करने और उनकी गाँड़ धोने के लिए ही पैदा हुआ है? ”9

 उसकी भाभी को डाकू खाना लाने के लिए बुलाते हैं, वह सहन करता है। उसकी भाभी से पुलिस थाने में रात भर अत्याचार करते हैं फिर भी वह सहन करता है। उसकी भैंस को जमीदार खोल ले जाता है, वह भी सहन करता है। पर यह सब उसके सीने में थोड़ा-थोड़ा करके ज्वाला बन जाती है। वह नौकर के रूप में कई घरों में कार्य करता है, पर समय पर पैसा माँगने पर फटकार मिलती है, कई जगह लोग उसे गाली देकर भगा देते हैं। जब पानी सिर से ऊपर बहने लगता है तो वह प्रतिशोध के ज्वाला में जलते हुए डाकू बनने का फैसला करता है। जब पहली बार अल्ताफ का अपहरण करके लाता है तो अपने साथी नरैना की बाह पर सिर रखकर फफक पड़ता है और उससे कहता है, “हमने लाख चाहा कि ऐसा न हो, जब-जब हम पर जुल्म हुआ, मन बेकाबू हुआ, मन को जब्त ही किया- हे माता भवानी, हे देवता पित्तर, सोमेश्वर देब, हमको कुमारग से बचाना लेकिन आखिरकार आज...’××× हमने नहीं चुनी थी यह जिंदगी। नहीं बने थे हम इन राहों के लिए। फिर भी देखो... कैसे ढकेल दिए गए।”10

डाकुओं द्वारा थारू सहित अन्य आदिवासियों पर तरह तरह के अत्याचार किये जाते हैं। उनकी बहू-बेटियों को नहीं छोड़ा जाता है। कभी खाना बनाने के लिए तो कभी अन्य तरीके से परेशान किया जाता है। जब वे डाकू का खाना बनाकर उनके पास पहुँचाती हैं तो पुलिस थाने ले जाकर उन पर रात-दिन अत्याचार करती है तथा जब वह डाकुओं को खाना बनाने के लिए मना कर देते हैं तो डाकू पकड़कर उन पर कहर ढाने लगते हैं। जब काली की भाभी परशुराम के लिए खाना बनाकर पहुँचा देती है तो उसे पुलिस पकड़कर थाने ले जाती है। उसे तरह-तरह से टार्चर करके परशुराम के बारे में पूछतें है। हिरण का मांस खिला कर उसका धर्म भ्रष्ट करते है पर वह अनभिज्ञ होने के कारण कुछ नहीं बता पाती है तो अमानवीय कृत्य करते हुए उसे रात भर थाने में ही रखा जाता हैं। वह अपनी बच्ची की दुहाई देते हुए छोड़ने की भीख माँगती है, पर वे उसे नहीं छोड़तें हैं। बेचारा बिसराम उसकी राह देख रहा है। बच्ची भूख से बिलबिला रही है। बिसराम को आज वह पुरानी बातें याद आने लगती है, जब उसकी पत्नी के साथ एक बार और दरिंदगी हुई थी। वह सोचकर आशंकित हो जाता है, “मलिकार का हुकुम हुआ और बाँधकर उठा लाया आदमी, औरत, गोरू, बछरू, सामान-सब कुछ!××× नया-नया गौना हुआ था बिसराम का। परशुराम ही जबरन उठाकर ले गया था तब पहली बार खेत से दुलारी की माई को। वह रात थी वह रात भी ऐसी ही थी भयानक आशंकाओं से गर्म पहाड़-सी रात।”11 जब उसकी पत्नी थाने से छूटकर सुबह घर आती है तो बिसराम देवी-देवताओं को याद करके इज्ज़त बचाने की प्रार्थना करते हुए उसको ध्यान से देखता है। वह प्रार्थना करते हुए कहता है, “हे माता भवानी, उसे सिर्फ मारा-पीटा ही गया हो, इज्जत न गई हो। उसने घबराकर फिर देखा, वह गन्ने के खेत की मेड़ पर चली आ रही थी, मानो निबटान से आ रही हो-टाँगे फैलाए, लस्त-मस्त-सी लँगड़ाकर चलती हुई। इस तरह आने का मतलब...!”12

  एक घटना और दिखाया गया है जिसमें मुरली पांडेय के मना करने पर थारू डाकुओं का खाना बनाकर नहीं ले जाते है। जब डाकू सोले फिल्म देखकर आते है और उन्हें पता चलता है कि पांडये के मना करने पर थारूओं ने खाना बनाने से मना कर दिए हैं तो वे उन्हें ट्राली-ट्रैक्टर में भरकर अपने अड्डे पर ले जाते हैं तथा बसंती की तरह नाच करने को कहते हैं। जबरदस्ती मार-पीटकर उन्हें नचवाते हैं। फिर गाय-भैस के नाद में सड़े हुए सानी के साथ खाना खिला देते हैं जिससे वे बीमार पड़ जाते है तथा इनमें से कईयों की मौत हो जाती है। इसी प्रकार बिसराम और बिसराम बहु को पुलिस प्रताड़ित करती है मल्हारी का चचेरा ससुर लंगड काली से मिलता है तो उससे बताता है कि, “अब ई से भाई-भौजाई से भेंट हो पाना मुश्किल है काली। पुलिस ने इतना मारा है, कि छूट भी गए तो चल नहीं पाएँगे जियादा दिन!”13 इन सभी प्रकार के प्रताड़नाओं से दुखी होकर काली ने कुमार को एक पत्र लिखा जिसमें पुलिस का आम इंसान पर किया जाने वाला अत्याचार, घृणित कार्य का उल्लेख किया गया है, इस पत्र में एक भाई की व्यथा को दर्शाया गया है। “भैया पर पुलिस जिस ढंग से अत्याचार कर रही है, उसका एक भाई होने के नाते मुझ पर क्या बीत रही है, यह मैं बयान नहीं कर सकता। आदमी इतना जल्लाद हो सकता है! ”14

काली के डाकू बन जाने पर पुलिस उसके भाई बिसराम एवं भाभी को पकड़ ले जाती है, जिन्हें काली के बारे में कुछ भी पता नहीं है। उन्हें बहुत टॉर्चर करती है। यहाँ तक कि पुलिसवाले बिसराम के नाखूनों को उखाड़ लेते हैं तथा उसके हाथ-पैर तोड़ देते हैं। उसकी पत्नी पर भी पुलिस अमानवीय, क्रूर अत्याचार करती है। इतना ही नहीं अंत में बिसराम को मारकर एनकाउण्टर दिखा देती है। पुलिस की इस अमानवीय कृत्य को कई जगह दिखाया गया है। यह अमानवीय कृत्य काली को झकझोर देता है। काली अपनी नियति, भाग्य और अपने ऊपर हुए अत्याचार का जिक्र करते हुए डी.एस.पी. कुमार को एक पत्र से आगाह करते हुए लिखता है, “मेरी भतीजी को साँप ने डँसा, भैया को आप और पांडेजी ने मिलकर डँसा, पत्नी को किसी औरत बेचनेवाले ने... अब सारा कुछ छीन कर नियत ने मुझे सोलह आने डाकू बनने को ठेल दिया है। मेरे अंदर का जंगल घना होता जा रहा है। मेरे अंदर का जंगल घना होता जा रहा है...”15 वह अपने भाई बिसराम की हत्या में पांडेय के साथ डी.एस.पी. कुमार को भी कसूरदार मानता है। पहले वह कुमार की बहुत इज्ज़त करता था और अपना भाई मानता था। वह कुमार को कसूरदार मानते हुए पत्र लिखता है जिसमें वह अपने मन का गुबार निकालता है, “बिना किसी कसूर के एक निरीह आदमी की बर्बर हत्या। पांडे का स्वार्थ तो समझ में आता है कि भैया के बहाने वे मुझे पाना चाहते थे- इस मिनी चंबल के अपने ढंग के सबसे खतरनाक क्रिमिनल को, कारण वह सिर्फ धन लूटने नहीं आया था, सम्मान और बराबरी का हक छीनने के लिए उतरा था। मेरे पकड़े जाने पर उन्हें पचास हजार का इनाम तो मिलता ही, बड़ी जातियों के लंपट लुटेरों की नजर में वह हीरो बन कर सामने आता। मगर आपका स्वार्थ क्या था? लगता है, आप की असलियत को मुझे फिर से समझना होगा।”16

बिसराम की तरह ही पुलिस मलारी तथा उसके ससुर लंगड़ का भी एनकाउण्टर करती है। पुलिस दर्दनाक दस्तुओं और नामी-गिनामी नेताओं, ठेकेदारों को हाथ लगाने से डरती है, वहीं दूसरी ओर गरीब असहाय लोगों खासतौर पर जनजातियों (थारूओं) पर तरह-तरह की क्रूरतम अत्याचार करती रहती है। इस त्रासदी (ट्रेजडी) का यथार्थ अंकन किया गया है। डाकू समस्या एवं पुलिस की बर्बरता, नेता-डाकू-पुलिस की साठ-गाँठ, जनता खासतौर पर जनजातियों के शोषण प्रताड़ना का यथार्थ अंकन किया गया है। चम्पारण के दारुल दशा पर आधारित इस उपन्यास पर जाने-माने कथाकार प्रेम कुमार मणि लिखते हैं, “यह उपन्यास मुख्यतः दस्यु समस्या पर नहीं बल्कि सीधे जनतंत्र की समस्या पर केंद्रित है।”17

डाकू, पुलिस के साथ ही साथ गाँव के अन्य सम्पन्न भी गरीब, असहाय आदिवासियों पर जुल्म करते रहते है। फेंकन और काली एक साथ अपने गाँव के सुन्नर पांडेय के घर काम करते थे। फेंकन जाति से दुसाध था। उसकी पत्नी बहुत सुंदर थी। वह कोइलरी में रहकर पढ़ी-लिखी थी। वह पहनावे पर भी विशेष ध्यान देती थी। तथा पड़ाइन से कभी-कभी व्यंग्य रूप में कुछ कह भी देती थी। इसलिए पड़ाइन उससे जलती थी। एक दिन वह सुन्नर पांडेय के साथ मिलकर अपने भाई से उसका बलात्कार करवा देती है। काली और फेकन के आने के बाद वह उनके चुंगल से छूट पाती है। इस घटना से फेंकन और काली दोनों में रोष व्याप्त है और दोनों उन्हें सजा दिलवाने के लिए थाने जाते हैं। पर वहाँ से उन्हें भगा दिया जाता है। उसके बाद वे डाकू सरगना परशुराम के पास इस आस में जाते हैं कि वह दया करके उन्हें न्याय दिलाएगा। पर वह से भी उन्हें लौटा दिया जाता है। “लाचार फेकन थाने गया, मगर कुछ हुआ नहीं। फिर पता चला कि वह परशुराम यादव के पास गया था, जिसने उसे यह कहकर लौटा दिया कि वह चमारों, दूसाधों, धोबियों, कुम्हारों, लोहारों और नोनियाओं का केस नहीं लेता।”18 चारों तरफ से हार थककर फकन गाँव के पंचों के पास जाता है। गाँव में पंचायत बैठती है। सबको बुलाया जाता है। परंतु वहाँ भी इनके साथ न्याय नहीं होता है और यह कहकर इन्हें ही दोषी करार दे दिया जाता है कि भला ऊँची जाति का पुरुष नीच जाति के साथ बलात्कार कैसे कर सकता है। “पंचायत ने एक स्वर से यह फैसला दिया कि ‘पांडे या उसके साले ऊँची जात के आदमी फेकन बहु जैसी नीच जाति के साथ यह कर्म कर ही नहीं सकते।”19 यह फैसला पूरे उच्च जाति के पंचों को कटघरे में खड़ी करती है तथा जो निम्न वर्ग का उन पर विश्वास था उसे मटियामेट कर देती है। इस प्रकार इस जंगलराज में दिखाया गया है कि निम्न जाति के लोगों का गरीबों का हर जगह शोषण हुआ है। उनका इस क्षेत्र में पैदा होना पाप है। उनका पुलिस डाकू बड़े लोग बड़े आसानी से शारीरिक, मानसिक शोषण मिलकर करते हैं। जो प्रतिकार स्वरूप सर उठाता है उसे कुचल दिया जाता है। अगर वह बच जाता है तो वह भी जंगलराज में जंगली बन कर बदला लेता है। इसी के परिणाम स्वरूप काली और फेकन अपने गिरोह के साथ पांडे के घर आकर पंडिताइन का भी बलात्कार करने की कोशिश करते हैं।
काली, काली से काली सरदार का सफर तय करता है। वह कई अपहरण कर चुका है। उसके ऊपर सरकार द्वारा एक लाख का इनाम रखा गया है। वह डाकू में सरदार होते हुए भी अपहरण का पैसा सब में बाँट देता है तथा किसी जरूरतमंद को अपना हिस्सा देने से कतराता भी नहीं है। जब उसे पता चलता है कि उसकी पत्नी का जोगी द्वारा दूसरे घर बेच दिया गया है तथा उसके पति के बीमार होने का पता चलता है तो वह उसे सकुशल घर पहुँचाने को बोलता है। साथ ही दस हजार रूपया उसके बीमार पति के उपचार के लिए देता है। इसी प्रकार जब पांडेय उससे मिलकर अपना दुखड़ा रोता है तथा अपने को उसके गिरोह में शामिल करने के लिए प्रार्थना करता है तो वह दया दिखाते हुए उसे पैसा देता है और उसके गाँव में संदेशा पहुँचाता है कि पांडे उसका भाई है उसका दुश्मन मेरा दुश्मन होगा। काली के वजह से पांडे की इज्जत फिर लौट आती है।

इस उपन्यास में डाकू सरगना परशुराम यादव सबसे दुर्दांत, कुख्यात डाकू है, जिसपर सरकार द्वारा एक लाख इनाम रखा गया है। इस पर हत्या, बलात्कार, अपहरण आदि दर्जनों मुकदमें दर्ज है। उससे पुलिस भी डरती है। अगर कहा जाय कि इस उपन्यास का मुख्य खलनायक वही है तो गलत नहीं होगा। परशुराम अपराध करने के साथ-साथ चुनाव में भी सक्रिय रहता था। नेताओं को जिताने के लिए पूरा बूथ कैप्चर कर लेता था। लेकिन अब वह सोचता है कि जब हम डाकू ही चुनाव जीतवाते और हरवाते हैं तो क्यों न हम ही चुनाव लड़ लें। हम लोगों का काम डकैती करना है, पर हम से भी बड़े डकैत तो नेता और अफसर हैं, जो पूरे क्षेत्र के अमीर-गरीब सबके हक पर दिनदहाड़े डाका डालते हैं। वे हमसे भी बड़े डाकू हैं तो हम क्यों नहीं चुनाव लड़ सकते हैं। वह व्यंग करते हुए कहता है-
“हमहूँ डाकू, तोहूँ डाकू, कौना बात का हल्ला बा,
तोहरा खातिर गेट खुलल बा, हमरे खतिर ताला बा?”20

जब ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ के पत्रकार जगत नारायण उर्फ जगदंबा परशुराम का असली चेहरा बेनकाब करने की कोशिश करता है तो परशुराम के गिरोहवाले उसे पकड़ ले जाते हैं। डाकू और अन्यायी उसे अपना दुश्मन समझने लगे हैं क्योंकि वह पत्नी के लाख मना करने पर भी डाकुओं और अन्याय के खिलाफ सच्चाई लिखने में नहीं कतराता है। जगदंबा अपने पेपर ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ के संपादक, पत्रकार एवं सेलर सब था। वह अपहरण जैसी घटनाओं के साथ चुनाव का भी सटीक विश्लेषण कर देता था, इसलिए डाकू परशुराम उसे अपना दुश्मन मान बैठा था। अंत में परशुराम उसे पकड़वाकर उबलते हुए दूध से नहलवाकर मौत के घाट उतरवा दिया। जब जगदंबा दुख-दर्द से तड़प रहा था तो उसे देखकर परशुराम कहता है, “अभी वह कुछ बोलता कि गर्म दूध के शरीर पर पड़ते ही देह तिलमिला उठी। खौलते दूध की धार। जिंदा भूनी जा रही मछली-सा तड़प उठा जगदंबा, फिर तड़प और कराह शिथिल पड़ती गई। वह दम तोड़ चुका था। परशुराम ने उसे घृणा के साथ देखा, अइसन लाग-अता, जे फँफूदी पड़ गईल सार के।”21

नेताओं के बारे में भी व्यंग्य किया गया है कि कैसे-कैसे लोग नेता बन जाते हैं। कही परशुराम यादव जैसा दुर्दांत डाकू चुनाव जीत जाता है तो कहीं डाकुओं के संरक्षण देनेवाले मंत्री दूबेजी। ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली कहावत यहाँ सटीक बैठती है जिसके पास बल है, वह इस जंगलराज में राज करेगा और सब पर अधिकार जमाएगा तथा सबको अपने अधीन रखेगा। नेताओं को बोलना, लिखना, पढ़ना आए या ना आए, अपने लड़ाकों द्वारा बूथ कब्जा करके चुनाव जीत जाते हैं और विकास के नाम पर अपना घर भरते रहते हैं। इन्हीं सबको देखकर डी.एस.पी कुमार कहता है- ”ऐसे ही लोग मंत्री होते हैं? इन्हें तो शुद्ध-शुद्ध बोलना भी नहीं आता। न सलीका, न ज्ञान, न आत्मसम्मान। तीन-तीन बार कुत्ते की तरह प्रधानमंत्री निवास पर भेंट लेकर हाजिरी देने जाना, ताकि कुर्सी बची रहे।”22

मुरली पांडेय एक प्रतिष्ठित अध्यापक थे जो गाँधी जी से प्रेरित थे। ये समय-समय पर असहाय, गरीब आदिवासियों, दलितों के हक के लिए खड़े रहते थे। उनकी हक की लड़ाई लड़ते रहते थे तथा उनकी सुरक्षा एवं तरक्की के लिए प्रयासरत थे। पांडे जी डाकुओं के डकैती तथा अपहरण जैसी घटनाओं से बचने के लिए ‘ग्राम सुरक्षा दल’ की स्थापना किए, ताकि डाकुओं से लोगों की रक्षा हो सके। इसके बाद डाकू इन्हें डराते, धमकाने लगे थे परंतु वे विचलित नहीं हुए। वे यहाँ के दारूल स्थिति को बखूबी जानते थे। इसलिए डी.एस.पी. कुमार से मुलाकात के समय कहते है, “जहाँ सिर्फ एक प्रतिशत लोगों के हाथ में 90 प्रतिशत जमीन हो, जहाँ साधारण लोगों के पास सिर्फ 5 प्रतिशत जमीन हो, बाकी पर बड़े लोगों का कब्जा, वहाँ क्या हो सकता है?”23
कुछ दिनों बाद उनकी ग्राम सुरक्षा दल दो गाँवों में डकैती की तथा अपहरण की धमकी देकर मोटी रकम वसूली। इतना ही नहीं इनके द्वारा बलात्कार करने की कोशिश भी की गई। “मोहना और गोनहाँ में तो सुरक्षा दल के सदस्यों ने डाके डाले थे और अपहरण करा देने की धमकी देकर पैसे वसूले थे। गोनहाँ में तो बलात्कार के प्रयास भी किए थे।”24 मुरली पांडेय इन सब घटनाओं से विचलित होकर ‘ग्राम सुरक्षा दल’ को भंग कर दिया।
थारू समाज के पिछड़ने का मुख्य कारणों में अंधविश्वास का स्थान अग्रणीय है। केवल थारू ही नहीं, यह पूरा क्षेत्र इसके गिरफ़्त में इस प्रकार फँस चुका है कि इसमें से निकलना मुश्किल है। मुरली पांडेय लगातार कोशिश करते हैं पर वे भी असहाय हो जाते हैं। इन सब पिछड़ने के कारणों से काली भी दुखी है। वह अपने समाज की स्थिति को देखते हुए कहता है, “हम थारू वैसी ही कंगाल की जिंदगी जी रहे हैं- औरत भी, मर्द भी। इतिहास अगर कुछ रहा भी हो तो, सड़-गलकर बदबू दे रहा है। बदबू को ढकने के लिए हमने तरह-तरह के तरीके अपनाए-थारू गाय का दूध नहीं पीते, थारू हिरण का मांस नहीं खा सकते वगैरह-वगैरह, मगर लाज कि उघरती ही गई। अच्छा हुआ कि सरकार ने हमें ट्राइबल्स मान लिया।”25

थारू समाज में एक भ्रांति है कि थारू हिरण का मांस नहीं खा सकते न ही गाय का दूध पी सकते हैं। अगर कोई ऐसा महापाप करेगा तो देवी माँ उसे दंड देगी। बिसराम बहु को पुलिस जबरदस्ती हिरण का मांस खिला देती है तथा बिसराम अपनी अबोध बच्ची को अत्यधिक भूखी होने पर गाय का दूध पिला देता है। एक बार जब बिसराम बहु के ऊपर देवी माँ आ जाती हैं, तब वह सब बातों को बताने लगती है तथा इसे सबसे बड़ा अपराध बताती है। जिस पर मुरली पांडेय व्यंग्य रूप में देवी माँ से ही प्रश्न करते हैं, “रहने दो मैया, खाकी तो दोनों की वर्दी है। एक बात ई बताओ कि हिरण का मांस अनजाने में खा लेने पर तो तुम बेचारी बिसराम बहू को इतना बड़ा दंड दे रही हो तो जिसने हिरण मारा उसका नाश क्यों नहीं कर देती? गाय का दूध लाचारी में बच्ची को पिला दिया बिसराम ने तो अनर्थ हो गया, लेकिन मलिकार उसकी भैंस ही ले गए-उसका क्या कर रही हो?”26

समाज का पिछड़ा वर्ग तो अंधविश्वास के चपेट में था ही पढ़ा लिखा वर्ग भी इसके चुंगल में फँस गया था। जब कुमार के बिछाए जाल से परेमा दो-दो बार सकुशल निकल जाता है तो कुमार सोच में पड़ जाता है कि आखिर कैसे वह निकल गया? यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। पांडेय उसे एक पहुँचे तांत्रिक के पास ले जाता है। कुमार उस तांत्रिक के शक्ति के जाल में आ जाता है। उस तांत्रिक के कहने पर अनुष्ठान एवं पूजा पाठ कराता है। “तीसरे दिन तांत्रिक व्योम बिहारी पांडेयजी के कैंप में हाजिर था। कुमार की कल्पना से अलग सफेद धोती-कुर्ते में वह एक गृहस्थ पंडे जैसा लग रहा था। परिचय के बाद प्रणाम किया कुमार ने मगर जवाब में उसकी आँखें मुँद गईं, दाहिना हाथ नाक के नीचे जा लगा...!”27

चोर, डाकू, पुलिस, नेता सब जनता को लूटती है तथा समय-समय पर देवी पूजा कराकर अपने को पवित्र मान लेते है। वे उन अनुष्ठानों से अपने को पाक-साफ कर लेते हैं तथा भोली जनता भी उनके अनुष्ठान में शामिल होकर अपने को भाग्यशाली समझती है और उनके पाप को माँफ कर देती है। इस पर मुरली पांडेय व्यंग्य रूप में हँसते हुए डी.एस.पी. कुमार से कहते हैं, “हाँ सर, लूट, हत्या और बलात्कार के दागों से जब चुनर मैली हो जाए तो धर्म की लांड्री में भेज दो। सारा मैल धुल जाएगा, जिसे शिवजी उठाकर पी जाएँगे। इसके बाद फिर पाप करने की सहूलियत-जितना चाहो करो।”28

इस उपन्यास में थारूओं, धांगड़ों, दुसादों आदि के तीज-त्योहार, मेला, देवी-पूजन, रहन-सहन, व्यवसाय आदि का वर्णन हुआ है। इसके साथ ही इनके इतिहास, भूगोल आदि का भी वर्णन मिलता है। रेता, नदी, पर्वत-पहाड़, पेड़-पौधा, वनस्पति आदि के बारे में भी विस्तार से बताया गया है। उपन्यासकार ने आदिवासी जीवन सहित अनेक अनछुए पहलुओं एवं समस्याओं को उजागर करने का सफलतम प्रयास किया गया है, जिससे पाठक अनछुए पहलुओं को जानने और सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इस उपन्यास में पाठकों के सामने गहरी मानवीय संवेदना, दारूल स्थिति, जनता की त्रास के साथ-साथ लगभग वहाँ की सभी छोटी-बड़ी समस्याओं का चित्रण किया गया है। इसमें यह भी दिखाया गया है कि डाकुओं से भी बड़े डाकू तथाकथित राजनेता है जो सत्ता प्राप्त करने के लिए इनका उपयोग करते हैं तथा मौका मिलते ही इन पर भी राजनीति कर जाते है। उपन्यासकार ने अपने यथार्थ अनुभव तथा तार्किक शक्ति से देश की राजनीति में अपराधीकरण और अपराध के राजनीतिकरण की बढ़ती प्रवृत्ति को बहुत ही सटीक तरीके से प्रस्तुत किया है। उपन्यास कथानक-शिल्प-शैली-भाषा-उद्देश्य की दृष्टि से अपना विशिष्ट स्थान रखता है। उपन्यासकार ने पात्रों द्वारा भोजपुरी बोली मिश्रित हिन्दी सहित अंग्रेजी का प्रयोग कराया है। इसमें पढ़ा-लिखा अधिकारी वर्ग अंग्रेजी का इस्तेमाल करता है जबकि आम जनता भोजपुरी प्रभावित हिन्दी।

संदर्भ:

1- (सं.) मनीष कुमार गुप्ता, आदिवासी समाज और हिन्दी उपन्यास, 2017, अनुसंधान पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, कानपुर, पृ. 157
2- कदम भगवान रामकिसन, संजीव के उपन्यासों में व्यक्त आदिवासी जीवन संघर्ष, शोधगंगा से उद्धृत 15-06-2019
3- संजीव, जंगल जहाँ शुरू होता है, दूसरी आवृति 2015, राधाकृष्ण पेपर बैक्स, दिल्ली, पृ. 8
4- वही, कवर पेज
5- वही, पृ. 21
6- वही, पृ. 7
7- वही, पृ. 7
8- गोपाल राय, हिंदी उपन्यास का इतिहास, छठा संस्करण 2016, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 376
9- संजीव, जंगल जहाँ शुरू होता है, पृ. 93
10- वही, पृ. 96-97
11- वही, पृ. 26
12- वही, पृ. 26
13- वही, पृ. 126
14- वही, पृ. 134
15- वही, पृ. 193-194
16- वही, पृ. 193
17- (सं) राजेंद्र यादव, हंस, 2001, पृ. 82
18- संजीव, जंगल जहाँ शुरू होता है, पृ. 92
19- वही, पृ. 92
20- वही, पृ. 244
21- वही, पृ. 239
22- वही, पृ. 40
23- वही, पृ. 236
24- वही, पृ. 239
25- वही, पृ. 137
26- वही, पृ. 30
27- वही, पृ. 161
28- वही, पृ. 143

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।