अनुवाद: कुत्ते (पतरस बुख़ारी)

पतरस बुख़ारी

अनुवादक : आफ़ताब अहमद

व्याख्याता, हिंदी-उर्दू, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क


जंतु-विज्ञान के प्रोफ़ेसरों से पूछा। पशु-चिकित्सकों से पूछा। ख़ुद सिर खपाते रहे। लेकिन कभी समझ में न आया कि आख़िर कुत्तों का फ़ायदा क्या है? गाय को लीजिए। दूध देती है। बकरी को लीजिए। दूध देती है और मेंगनियाँ भी। ये कुत्ते क्या करते हैं? कहने लगे कि “कुत्ता वफ़ादार जानवर है।” अब जनाब वफ़ादारी अगर इसी का नाम है कि शाम के सात बजे से जो भौंकना शुरू किया तो लगातार बिना दम लिए सुबह के छह बजे तक भौंकते चले गए, तो हम पुच्छहीन ही भले। कल ही की बात है कि रात के ग्यारह बजे एक कुत्ते का मन जो ज़रा गुदगुदाया तो उन्होंने बाहर सड़क पर आकर नमूने के तौर पर एक मिसरा (पंक्ति) पेश कर दिया। एक-आध मिनट के बाद सामने के बंगले में से एक कुत्ते ने मतलाI अर्ज़ कर दिया। अब जनाब एक मंझे हुए उस्ताद को जो क्रोध आया, एक हलवाई के चूल्हे में से बाहर लपके और भन्ना के पूरी ग़ज़ल मक़ताII तक कह गए। इस पर उत्तर-पूर्व की ओर से एक काव्य-मर्मज्ञ कुत्ते ने ज़ोरों की दाद दी। अब तो जनाब वह मुशायरा गर्म हुआ कि कुछ न पूछिए। कमबख़्त कुछ तो दो-दो-तीन-तीन ग़ज़लें लिख लाए थे। कई एक ने आशु कविताएँ पढ़ डालीं। वह हंगामा गर्म हुआ कि ठंडा होने में न आता था। हमने खिड़की में से हज़ारों दफ़ा "ऑर्डर-ऑर्डर" पुकारा लेकिन ऐसे मौक़ों पर प्रधान की भी कोई भी नहीं सुनता। अब इनसे कोई पूछे कि श्रीमान तुम्हें कोई ऐसा ही ज़रूरी मुशायरा करना था तो नदी के किनारे खुली हवा में जाकर काव्याभ्यास करते, यह घरों के बीच आकर सोतों को सताना कौन सी सज्जनता है?

और फिर हम देसी लोगों के कुत्ते भी कुछ अजीब बदतमीज़ होते हैं। अक्सर तो इनमें से ऐसे राष्ट्र-भक्त हैं कि पतलून-व-कोट को देखकर भौंकने लग जाते हैं। ख़ैर, यह  तो एक हद तक प्रशंसनीय भी है। इसका ज़िक्र ही जाने दीजिए। इसके अलावा एक और बात है। यानी हमें अक्सर डालियाँ लेकर साहब लोगों के बंगलों पर जाने का इत्तिफ़ाक़ हुआ। ख़ुदा की क़सम उनके कुत्तों में वह शिष्टता देखी है कि आनंदविभोर होकर लौट आए हैं। ज्यों ही हम बंगले के अंदर दाख़िल हुए कुत्ते ने बरामदे में खड़े-खड़े ही एक हल्की सी "बख़" कर दी और फिर मुँह बंद करके खड़ा हो गया। हम आगे बढ़े तो उसने भी चार क़दम आगे बढ़कर एक नाज़ुक और पवित्र आवाज़ में फिर "बख़" कर दी। चौकीदारी की चौकीदारी संगीत का संगीत। हमारे कुत्ते हैं कि न राग न सुर, न सिर न पैर। तान पे तान लगाए जाते हैं, बेताले कहीं के!  न मौक़ा देखते हैं न वक़्त पहचानते हैं। बस गले-बाज़ी किए जाते हैं। घमंड इस बात पर है कि तानसेन इसी मुल्क में तो पैदा हुआ था।

आफ़ताब अहमद
इस में संदेह नहीं कि हमारे सम्बन्ध कुत्तों से थोड़े तनावपूर्ण ही रहे हैं। लेकिन हमसे क़सम ले लीजिए जो ऐसे मौक़े पर हमने कभी सत्याग्रह से मुँह मोड़ा हो। शायद आप इसे स्व-प्रशंसा समझें लेकिन ख़ुदा गवाह है कि आज तक कभी किसी कुत्ते पर हाथ उठ ही न सका। अक्सर दोस्तों ने सलाह दी कि रात के समय लाठी, छड़ी ज़रूर हाथ में रखनी चाहिए कि संकट-मोचक है। लेकिन हम किसी से अकारण दुश्मनी पैदा करना नहीं चाहते। हालांकि कुत्ते के भौंकते ही हमारी स्वाभाविक सज्जनता हम पर इस हद तक हावी हो जाती है कि आप हमें अगर उस समय देखें तो निश्चित रूप से यही समझेंगे कि हम बुज़दिल हैं। शायद आप उस वक़्त यह भी अंदाज़ा लगा लें कि हमारा गला सूखा जाता है। यह अलबत्ता ठीक है, ऐसे मौक़े पर कभी गाने की कोशिश करूँ  तो खरज के सुरों के सिवा और कुछ नहीं निकलता। अगर आपने भी हम जैसा स्वाभाव पाया हो तो आप देखेंगे कि ऐसे मौक़े पर आयतलकुर्सीI आपके दिमाग़ से उतर जाएगी। उसकी जगह आप शायद दुआ-ए-क़ुनूत II पढ़ने लग जाएँ । 

कभी-कभी ऐसा इत्तिफ़ाक़ भी हुआ है कि रात के दो बजे छड़ी घुमाते थिएटर से वापस आ रहे हैं और नाटक के किसी-न-किसी गीत की धुन मन में बिठाने की कोशिश कर रहे हैं। चूँकि गीत के शब्द याद नहीं और नए-नए अभ्यास की अवस्था भी है, इसलिए सीटी पर संतुष्ट होना पड़ा है कि बेसुरे भी हो गए तो कोई यही समझेगा अंग्रेज़ी संगीत है। इतने में एक मोड़ पर से जो मुड़े तो सामने एक बकरी बंधी थी। ज़रा कल्पना देखिए। आँखों ने उसे भी कुत्ता देखा। एक तो कुत्ता और फिर बकरी के आकार का। अर्थात बहुत ही कुत्ता। बस हाथ पाँव फूल गए। छड़ी की गर्दिश धीमी होते-होते एक अत्यंत अनुचित कोण पर हवा में कहीं ठहर गयी। सीटी का संगीत भी थरथरा कर ख़ामोश हो गया, लेकिन क्या मजाल जो हमारी थूथनी की शंक्वाकार शक्ल में तनिक भी अंतर आया हो। मानो एक बेआवाज़ लय अभी तक निकल रही थी। चिकित्साशास्त्रीय नुक्ता है कि ऐसे मौक़ों पर अगर सर्दी के मौसम में भी पसीना आ जाए तो कोई हर्ज नहीं बाद में फिर सूख जाता है। 

चूँकि हम स्वभावतः ज़रा सावधान हैं इसलिए आज तक कुत्ते के काटने का कभी इत्तिफ़ाक़ नहीं हुआ यानी किसी कुत्ते ने आज तक हमको कभी नहीं काटा। अगर ऐसा हादसा कभी पेश आया होता तो इस आपबीती की बजाए आज हमारा मृत्युलेख छप रहा होता। लेकिन: 
कहूँ किससे मैं कि क्या है सग-ए-रह बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होताIII

जब तक इस दुनिया में कुत्ते मौजूद हैं और भौंकने का आग्रह करते हैं, समझ लीजिए कि हम क़ब्र में पाँव लटकाए बैठे हैं। और फिर इन कुत्तों के भौंकने के उसूल भी तो कुछ निराले हैं। यानी एक तो संक्रामक रोग है और फिर बच्चों, बूढ़ों सब ही को यह बीमारी है। अगर कोई भारी भरकम दबंग कुत्ता कभी-कभी अपने रोब और दबदबे को क़ायम रखने के लिए भौंक ले तो हम भी चाहे-अनचाहे कह दें कि भई भौंक। (हालाँकि ऐसे वक़्त में उसको ज़ंजीर से बंधा होना चाहिए।) लेकिन ये कमबख़्त दो-दो तीन-तीन रोज़ के, दो-दो तीन-तीन तोले के पिल्ले भी तो भौंकने से बाज़ नहीं आते। बारीक आवाज़, ज़रा सा फेफड़ा, उस पर भी इतना ज़ोर लगाकर भौंकते हैं कि आवाज़ का कंपन दुम तक पहुँचता है, और फिर भौंकते हैं चलती मोटर के सामने आकर। मानो उसे रोक ही तो लेंगे। अब अगर यह नाचीज़ मोटर चला रहा हो तो क़तई तौर पर हाथ काम करने से इनकार करदें। लेकिन हर कोई यूँ उनकी जान बख़्शी थोड़ा ही करदेगा?  

कुत्तों के भौंकने पर मुझे सबसे बड़ी आपति यह है कि उनकी आवाज़ सोचने की सारी क्षमता को तितर-बितर कर देती है। ख़ास तौर पर जब किसी दुकान के तख़्ते के नीचे से उनका एक पूरा खुफ़िया जलसा बाहर सड़क पर आकर तब्लीग़ (प्रचार) का काम शुरू कर दे तो आप ही कहिए होश ठिकाने रह सकते हैं? हर एक की तरफ़ बारी-बारी ध्यान देना पड़ता है। कुछ उन का शोर, कुछ हमारे विरोध की आवाज़ (होंठों ही होंठों में बुदबुदाकर), बेढंगी गतिविधियाँ (गति उनकी, विधियाँ हमारी)। इस हंगामे में दिमाग़ भला ख़ाक काम कर सकता है? हालाँकि यह मुझे भी नहीं मालूम कि अगर ऐसे मौक़े पर दिमाग़ काम करे भी तो क्या तीर मार लेगा? बहरहाल, कुत्तों की यह पर्ले दर्जे की नाइंसाफ़ी मेरे नज़दीक हमेशा घृणित रही है। अगर उनका एक प्रतिनिधि शराफ़त के साथ हमसे आकर कह दे कि श्रीमान, सड़क बंद है तो ख़ुदा की क़सम हम बिना ना-नुकुर किए वापस लौट जाएँ और यह कोई नई बात नहीं। हमने कुत्तों की विनती पर कई रातें सड़कें नापने में गुज़ार दी हैं। लेकिन पूरी सभा का यूँ सर्वसम्मति से एकजुट होकर सीना-ज़ोरी करना एक कमीनी हरकत है। ( माननीय पाठकों की सेवा में निवेदन है कि अगर उनका कोई प्रिय व आदरणीय कुत्ता कमरे में मौजूद हो तो यह निबंध बुलंद आवाज़ से न पढ़ा जाए। मैं किसी का दिल दुखाना नहीं चाहता।) 

ख़ुदा ने हर क़ौम में सज्जन व्यक्ति भी पैदा किए हैं। कुत्ते इस नियम का अपवाद नहीं। आपने तपस्वी व करुणामय कुत्ता भी ज़रूर देखा होगा। आम तौर पर उसके शरीर पर तपस्या के भाव प्रकट होते हैं। जब चलता है तो इस विनम्रता और दीनता से मानो पापों के बोझ का एहसास आँख नहीं उठाने देता। दुम अक्सर पेट के साथ लगी होती है। सड़क के बीचों-बीच सोच-विचार के लिए लेट जाता है और आँखें बंद कर लेता है। शक्ल बिल्कुल दार्शनिकों जैसी, और वंशावली देव जॉन्स कलबी से मिलती है। किसी गाड़ी वाले ने लगातार बिगुल बजाया। गाड़ी के विभिन्न हिस्सों को खटखटाया, लोगों से कहलवाया, ख़ुद दस-बारह दफ़ा आवाज़ें दीं, तो आपने सिर को वहीं ज़मीन पर रखे-रखे सुर्ख़ मदहोश आँखों को खोला। परिस्थितियों पर एक दृष्टि डाली और फिर आँखें बंद कर लीं। किसी ने एक चाबुक लगा दिया तो आप बेहद शान्ति से वहाँ से उठकर एक गज़ पर जा लेटे और विचारों की कड़ियों को, जहाँ से वे टूट गई थीं, वहीं से फिर जोड़ दिया। किसी बाइसिकल वाले ने घंटी बजाई तो लेटे-लेटे ही समझ गए कि बाइसिकल है। ऐसी छिछोरी चीज़ों के लिए वे रास्ता छोड़ देना फ़क़ीरी की शान के ख़िलाफ़ समझते हैं। 

रात के वक़्त यही कुत्ता अपनी सूखी पतली सी दुम को यथासंभव सड़क पर फैलाकर रखता है। इससे केवल ख़ुदा के नेक बंदों की परीक्षा प्रयोजन होती है। जहाँ आपने ग़लती से उस पर पाँव रख दिया, उन्होंने क्रोधपूर्ण लहजे में आपसे विरोध प्रकट किया। "बच्चा फ़क़ीरों को छेड़ता है। नज़र नहीं आता हम साधू लोग यहाँ बैठे हैं।" बस उस फ़क़ीर के श्राप से उसी समय कंपन शुरू हो जाता है। बाद में कई रातों तक यही सपने आते रहते हैं कि बेशुमार कुत्ते टांगों से लिपटे हुए हैं और जाने नहीं देते। आँख खुलती है तो पाँव चारपाई की अदवान में फंसे होते हैं। 

अगर ख़ुदा मुझे कुछ समय के लिए उत्तम शैली के भौंकने और काटने की क्षमता प्रदान करे तो प्रतिशोध का जुनून मेरे पास पर्याप्त मात्रा में है। धीरे-धीरे सब कुत्ते इलाज के लिए कसौली पहुँच जाएँ । एक शेर है- 
उर्फ़ी तू मैंदीश ज़ ग़ूग़ा-ए रक़ीबाँ
आवाज़-ए-सगाँ कम न कुनद रिज़्क़-ए-गदा रा 
(अर्थात: ऐ उर्फ़ी तू रक़ीबों (प्रतिद्वंदियों) के शोरग़ुल से चिंतित न हो 
कुत्तों की आवाज़ से भिखारियों की रोज़ी-रोटी कमी नहीं आती )

यही वह प्रकृति-विरुद्ध कविता है जो एशिया के लिए लज्जा का कारण है। अंग्रेज़ी में एक कहावत है कि "भौंकते हुए कुत्ते काटा नहीं करते।" यह ठीक सही, लेकिन कौन जानता है कि एक भौंकता हुआ कुत्ता कब भौंकना बंद करदे और काटना शुरू कर दे? 

I मतला: ग़ज़ल का पहला शेर जिसके दोनों मिसरों (पंक्तियों) में रदीफ़ (वही शब्द) और क़ाफ़िया (तुक) होता है।  (अनु.)
II मक़ता: आम तौर पर ग़ज़ल का अंतिम शेर जिसमें शायर अपना तख़ल्लुस (उपनाम) डालता है। (अनु.)
I आयतलकुर्सी: क़ुरान की आयत जो संकट की घड़ी में विशेष रूप से पढ़ी जाती है।  (अनु.)
II दुआ-ए-क़ुनूत:  क़ुरान की आयत जो हर रोज़ इशा (दिन की आख़िरी) नामाज़  में पढ़ी जाती है।  (अनु.
III “शब-ए-ग़म” (शोक की रात) को “सग-ए-रह” (रास्ते का कुत्ता) से बदलकर ग़ालिब के निम्नलिखित शेर की पैरोडी है:
 कहूँ किससे मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है// मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता (मिर्ज़ा ग़ालिब)

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