न्यूटन की व्यथा

मेहेर वान

- मेहेर वान

हालांकि सर आइजक न्यूटन के बारे में काफी लिखा गया है। जीवनी लिखने वालों ने और अकादमिक संस्थानों ने उनके जीवन और कर्म से जुड़े अधिकाधिक पहलुओं के बारे में लिखा है लेकिन इसके बावजूद न्यूटन के जीवन में ऐसा बहुत कुछ है जिसके बारे में सामान्य पाठक को जिज्ञासा होती है। न्यूटन्स करस्पोंडेंस, न्यूटन्स मेमोयर्स, ट्रिनिटी कोलेज और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के आर्काइव्स आदि के बावजूद काफी कुछ ऐसा है जिसके बारे में सवाल बार-बार उठते हैं? इस सवाल को कुछ लेखकों ने भी अपने-अपने नज़रिए से व्याख्यायित करने की कोशिश की, लेकिन यह कोई नहीं जानता कि सच क्या है? यह सन 1693 का साल था और सितम्बर का महीना था। न्यूटन के बहुत अच्छे मित्र ‘सैमुअल पेपिस’ इंग्लैंड की नौसेना में अफसर थे और संसद के सदस्य भी रहे। न्यूटन किसी बात से बहुत परेशान थे और इसी व्यथा में उन्होंने यह पत्र अपने दोस्त पेपिस को लिखा था-
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श्रीमान,

श्री मिलिंगटन के द्वारा आपका सन्देश मिलने के कुछ समय बाद, उन्होंने मुझपर दबाव डाला कि जब भी मैं अगली बार लन्दन जाऊँ तो आपसे ज़रूर मिलूँ। मेरा ऐसा कोई विचार नहीं था मगर मैंने अपने उस कर्म को समझने से पहले, जिसके कारण मैं बहुत व्याकुल होने के कारण अत्यधिक परेशान हूँ, और मैंने पिछले बारह महीनों से न तो ठीक से खाना खाया है और न ही मैं ठीक से सोया हूँ, और न ही मेरा मस्तिष्क स्थिर है, मैंने उनके दबाव में आकर हाँ कर दी। मैंने न ही आपकी रूचि के कारण और न ही महाराजा जेम्स के पक्षपात के कारण कुछ भी पाने की योजना बनाई है, लेकिन अब मैं इतना समझदार हूँ कि मुझे आपसे जान-पहचान और रिश्ता ज़रूर ख़त्म कर देना चाहिए, और न ही आपसे या अपने अन्य मित्रों से आगे कभी मिलना चाहिए, और अगर कभी मिलना पड़ भी जाए तो चुपचाप कन्नी काट ली जाए। मैं आपसे यह कहते हुए क्षमा-याचना करता हूँ कि मैं अब आपसे शायद ही कभी मिलूंगा।

शेष, आपका सर्वाधिक विनम्र और आज्ञाकारी सेवक,

आइज़क न्यूटन

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न्यूटन के इस गुस्से की पड़ताल करते हुए उपन्यास शैली में एक किताब आई थी, जिसका नाम था- “द न्युटन लेटर” जिसे जॉन वेनविले ने लिखा है। इस किताब का आधार वह पत्र है जिसे न्यूटन ने अपने एक परम मित्र को कुछ नाराजगी और पश्चाताप में लिखा था। जॉन लॉक उस समय के प्रख्यात दार्शनिक थे और उन्हें रॉयल सोसाइटी ने फेलो भी चुना था। उनका तत्कालीन दर्शनशास्त्र पर काफी प्रभाव था और उन्हें आज “उदारवाद का पिता” कहा जाता है। 16 सितम्बर 1693 को न्यूटन ने एक और दोस्त जॉन लॉक को यह पत्र लिखा-

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श्रीमान,

मेरा यह विचार है कि आपने महिलाओं और अन्य तरीकों के द्वारा मुझे विपत्ति में डालने के प्रयास किये, और इसके कारण मैं इतना अधिक प्रभावित हो गया था कि जब किसी ने मुझे बताया कि आप बीमार हैं और अब जिंदा नहीं बचेंगे तो मेरा उत्तर निकला कि अच्छा ही हो आप मर जाएँ। मेरी इच्छा है कि आप मुझे इस निर्दयता के लिए माफ़ कर दें। अब जबकि मैं संतुष्ट हूँ कि आपने जो भी किया वह आपकी नज़र में न्यायसंगत था, इस कारण से मैं आपके बारे में कठोर विचार रखने के लिए आपसे क्षमा याचना करता हूँ और यह दर्शाने के लिए कि आप ऐसे नियम के कारण नैतिकता की मूल में अटक गए थे जिसकी स्थापना आपने अपने विचारों की एक किताब में की, और आगे की किताब में इसे आगे ले जाने की योजना बनाई हैं और यह कि मैं आपको शौकिया समझ रहा था। मैं यह सोचने और कहने के लिए भी आपसे क्षमा याचना करता हूँ कि आपने मुझे एक दफ्तर बेचने और विपत्ति में डालने की कोई योजना बनाई थी।

आपका सबसे विनम्र और अभागा सेवक

आइज़क न्यूटन
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इन पत्रों से ऐसा मालूम होता है कि न्यूटन पेपिस और लॉक दोनों के किसी व्यवहार से काफी परेशान थे। परेशानी का सबब इतना था कि वह महीनों ठीक से न सो पाए न काम में मन केन्द्रित कर पाए। हालांकि दूसरे पत्र में न्यूटन अपनी परेशानी के कारणों का संक्षिप्त ज़िक्र भी करते हैं, और उनकी परेशानी का कारण पेपिस और लॉक एक द्वारा न्यूटन के साथ पहचान कराई गई महिलायें हैं और इसके साथ ही न्यूटन यह भी आरोप लगते हैं कि यह दोनों मित्र न्यूटन को कोई दफ्तर भी बेचना चाह रहे थे। लॉक से तो न्यूटन बहुत नाराज़ थे जिसकी वज़ह उनके जीवन में महिलाओं द्वारा उत्पन्न की गई विपत्तियाँ थी। ऐसा हो सकता है कि उनके दोस्त न्यूटन की शादी करवाने के उद्देश्य से न्यूटन का परिचय लड़कियों या महिलाओं से करवाते हों लेकिन अपने व्यवहार से न्यूटन रिश्ते बनाने के बजाय बिगाड़ लेते हों और परेशान रहते हों। लेकिन ऐसा कयास लगाया जा सकता है, कि जिस तीव्रता की व्यथा का जिक्र न्यूटन करते दिखते हैं ऐसा अक्सर प्यार में होता है। लेकिन यह भी सच है कि यह सब कयास ही हैं, सच क्या है कोई नहीं जानता। न्यूटन का ख़त मिलकर पेपिस इतना परेशान हो गए कि न्यूटन से मिलकर आये उनके दोस्त मिलिंगटन को उन्होंने तुरंत ख़त लिखा। मिलिंगटन उस समय मैगडालेन कोलेज, कैम्ब्रिज में फेलो थे। इसके उत्तर में मिलिंगटन ने पेपिस को लिखा-

“माना कि उन्होंने आपको बहुत ही बेहूदा पत्र लिखा था, जिसके बारे में वह काफी चिंतित भी थे, न्यूटन ने कहा कि वह ऐसा अचानक से कर गए और जिसके लिए उन्हें काफी दुःख हुआ, न्यूटन ने बताया कि वह अगली पांच रातों तक सो नहीं पाए। इसलिए उन्होंने मेरे ज़रिये आपसे क्षमा-याचना करने के लिए आग्रह किया था। वह बहुत शर्मिन्दा थे कि जिसका वह आज तक इतना आदर करते थे उससे वह इतना अभद्र कैसे हो गए। हालांकि वह अब ठीक हैं, मगर मुझे डर है कि अब भी किसी प्रकार के अवसाद में हो सकते हैं।”

न्यूटन इस पूरे प्रकरण से काफी शर्मिंदा महसूस कर रहे थे। पेपिस ने न्यूटन को वापस पत्र में लिखा कि “उम्मीद है कि उन्होंने न्यूटन के रूप में अपना एक दोस्त नहीं खोया है।”

लम्बे समय तक ठीक से सो न पाने के सम्बन्ध में न्यूटन के कई जीवनी लिखने वालों का एक और मत है। उनके अनुसार चूँकि न्यूटन एक बार में महीनो तक लम्बे प्रयोग करते रहते थे इसलिए उन्हें नींद न आने की समस्या शुरू हो गई थी। कुछ इसे सनक के रूप में देखते हैं, ऐसी सनक जो महान लोगों में होती है। कुछ यह भी कहते हैं कि न्यूटन को निकोलस फेसिओ डे ड्यूलियर नामक एक युवा वैज्ञानिक से बहुत लगाव था। ऐसा कहा जाता है कि उससे अनबन हो जाने के कारण भी न्यूटन को काफी परेशानी हुई थी। न्यूटन के कुछ जीवनीकार न्यूटन के ड्यूलियर के प्रति लगाव को समलैंगिकता की और ले जाते हैं। वह यह तर्क देते हैं कि न्यूटन के जीवन से ऐसा प्रतीत होता है कि न्यूटन की महिलाओं में कोई खास रूचि नहीं थी, और यह ड्यूलियर के प्रति न्यूटन के प्रेम के कयास लगाने का मौका देता है। यह पत्राचार उस समय का है जब न्यूटन की उम्र लगभग पचास वर्ष थी। हालांकि न्यूटन आजीवन कुंवारे रहे। मरते समय न्यूटन ने यह स्वीकार भी था कि वे आजीवन ब्रह्मचारी थे। हालांकि अगर न्यूटन का पूरा जीवन देखा जाये तो ऐसा भी महसूस होता है कि न्यूटन को न तो महिलाओं में रूचि थी न पुरुषों में। उनका लगाव विज्ञान से था, जिसके लिए वह आजीवन प्रयासरत रहे।

Reference: Memoirs of the Life, Writings, and Discoveries of Sir Isaac Newton, vol. 2 (Edinburgh:1855) by David Brewster

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